नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था
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July 07, 2011

आगे बढिए : बढाइये कदम महिला भ्रूण हत्या के खिलाफ


 (मैं जानती हु इस लेख को पढने वाले अधिकतर लोग मानसिक रूप से सुद्रढ़ है पर और सभी मुझसे ज्यादा अनुभवी है सबने मुझसे ज्यादा दुनिया देखी है हो सकता है ये लेख आप सबको बचकाना लगे पर अगर १ भी व्यक्ति पर मेरे लेख का सकारात्मक प्रभाव पड़ा तो मैं मानूगी की की मेरा लिखना सफल हुआ....अगर कोई त्रुटी हो तो क्षमा करें और अपने सुझाव अवश्य दें )


तू कितनी अच्छी है,तू कितनी प्यारी है न्यारी न्यारी है ओ माँ मेरी माँ !

अच्छा लगता है न ये गाना मुझे लगता है सबको अच्छा लगता होगा.

पर उन अजन्मी बच्चियों के बारे मैं सोचिये जो सिर्फ माँ के गर्भ मैं कभी एक आध बाद इस गाने की धुन भी महसूस नहीं कर पाई होंगी और इस दुनिया मैं आने से पहले ही दूसरी दुनियां मैं चली गई .आज न जाने क्यों एक तीस सी उठ रही है मन मैं की काश वो भी मेरी तरह ये दुनिया देख पाती.वो भी अपने माँ के कोमल अहसास को महसूस कर पाती.

पर न जाने क्यों उसकी अच्छी प्यारी और न्यारी माँ उसे इस दुनिया मैं लाने की हिम्मत नहीं कर पाई ,जाने किसके दबाव मैं उसने अपनी बच्ची को अपने से दूर कर दिया.या खुद को आधुनिका कहने वाली उसकी माँ खुद ही अपनी दकियानूसी सोच नहीं बदल पाई.

अजीब है ये देश जहा इतनी उन्नति के बाद भी लोग लिंगभेद करते है भारत की हाल ही मैं हुई गिनती के अनुसार भारत मैं महिलाओं एवं पुरुषों का अनुपात ९३३ प्रति १००० हो गया है और सबसे ज्यादा चौकाने वाली बात ये है की शहरी क्षेत्रो मैं ये अनुपात ९०० महिलाएं प्रति १००० पुरुष है जबकि गावों मैं ये अनुपात ९४६ प्रति १००० पुरुष है.स्वतंत्रता के बाद ये पहली बार है जब महिला पुरुष अनुपात मैं इतना अंतर आया है.
शर्म आती है मुझे ये सोचते हुए भी की पढ़े लिखे लोग तकनिकी का किस तरह फायदा उठा रहे है .
जब भारत स्वतंत्र हुआ था तब लोगो ने शायद ये सोचा होगा की जेसे जेसे शिक्षा का प्रसार होगा लोगों मैं जागरूकता आएगी और महिला भ्रूण हत्या कम होगी पर सेंसेक्स की रिपोर्ट देखकर लगता है शेहरी लोगो ने तकनिकी का महिला भ्रूण हत्या मैं भी जमकर फायदा उठाया है .बढती महंगाई ने शहर के लोगो इस बात के लिए तो मानसिक रूप से तैयार कर दिया की उन्हें १ या २ ही बच्चे चाहिए पर गिरती हुई मानसिकता कहिये या जड़ मैं बेठी हुई सोच की अब वो १ ही बच्चा उन्हें लड़का चाहिए .मतलब साफ़ है जनसँख्या चाहे उस तेजी से न बढे पर लड़कियों की संख्या तेजी से कम हो रही है.

हम क्यूँ अपने आप को पढ़ा लिखा कह रहे हैं?क्या लोग पढाई सिर्फ इसलिए करते है की वो पैसा कमा सके ?क्या शिक्षा अपने साथ सोच मैं बदलाव नहीं कर रही ? क्या शिक्षा गुणात्मक फायदा नहीं दे रही ?

एक बार सोचकर देखिये नए ढंग के कपडे पहनना ,बड़े होटलों मैं खाना,वीकेंड पर बाहर जाना ,कंप्यूटर,लैपटॉप,आई -फ़ोन ,इन्टरनेट,वेबकैम और न जाने कितनी तकनिकी सुविधाओं का उपयोग करना ,माल्स मैं शौपिंग करना,गावों के लोगो को दकियानूसी कहना ,नौकरी करना ,पैसे कमाना ,और हमें सिर्फ १ बच्चा चाहिए या हमें सिर्फ दो बच्चे चाहिए जेसी बातें करके फॅमिली प्लानिंग की डींगे हांकना क्या यही सब शहरीपन है? क्या फायदा असी पढाई लिखाई का जो हमें सही रस्ते पे चलना भी नहीं सिखा रही.....

पढ़ी लिखी लड़कयाँ और महिलाएं क्या सिर्फ इसलिए पढ़ रही है की वो अपने आप को साबित कर सके,पुरुषों के कंधे से कन्धा मिला मिला सके ,या आज की शहरी भाषा मैं कहे तो घर की अर्निंग मेम्बर बन सके ,क्या वो अभी भी इतनी समझदार और परिपक्व नहीं हुई की अपनी बच्ची को दुनिया मैं लाने के लिए आवाज उठा सके? और खुद को प्रबुद्ध कहने वाला पुरुष वर्ग क्या अब भी नहीं समझ पा रहा महिलाओं की ये घटती संख्या देश मैं १ दिन कुवरो पुरुषों की भीड़ बढ़ा देगा.

इस देश मैं सब समझदार है सारे लोग क्रिकेट पर टिपण्णी करना जानते है,सब ओसामा की मौत पर बातें करते है,अमेरिका के बारे मैं बोलते है,मुफ्त के रायचंद काफी है यहाँ. पर महिला भ्रूण हत्या के विरोध में  मैआवाज उठाने  वालो  की संख्या कम है क्योंकि  सब जानते है ये गलत  है पर सब डरते  है बोलने  से .में मानती हु कुछ लोगो में जाग्रति आई है पर प्रतिशत काफी कम है .

मेरी बस लोगो से यही उम्मीद  है की वो पढ़े लिखे है तो अपनी शिक्षा का सही उपयोग करें  और अपनी तरफ  से पूरी  कोशिश  करें  की वो कभी महिला भ्रूण हत्या में  शामिल  न हो साथ ही अपने आस  पास  के लोगो को भी असा  करने  से रोकें .युवा  हो तो युवा  होने  के उत्तरदायित्व  को समझो  ,भीड़ में  शामिल  हो जाओ  पर भीड़ का हिस्सा  बनकर  गन्दगी  को साफ़ करो ........


                                                                                                    कनुप्रिया गुप्ता


June 23, 2011

संयुक्त परिवार में बुजुर्ग महिलाओं की स्थिति ...

दृश्य एक ...
भरा पूरा संयुक्त परिवार है ...बहू तीन छोटे बच्चों को घर छोड़ कर सुबह कार चलाना सीखने और दोपहर में फैशन डिजायनिंग का कोर्स सीखने जाती है ...कार चलाना सीखना तो फिर भी महीने भर का कार्यक्रम ही है , मगर फैशन डिजायनिंग कोर्स पूरा एक साल चलने वाला है ...बहू टैलेंटेड है , सिलाई , चित्रकला में प्रवीण ...वह कुछ और नया सीखे और आत्मनिर्भर होने की ओर कदम बढ़ाये , अच्छा ही है ...अब चूँकि घर में सिर्फ दो ही महिलाएं हैं , पुरुष सदस्यों को घरेलू काम काज में दिलचस्पी नहीं है या फिर उनकी कंडिशनिंग इस तरह की गयी हैं कि वे इन कार्यों को करना अपनी हेठी समझते हैं ...ऐसे में घर में एकमात्र बची बुजुर्ग विधवा माँ के पास घर को सँभालने के सिवा कोई चारा नहीं है ....उनकी परेशानी की बात की गयी तो बहू अपने बच्चों के लिए खाना अलग पकाने लगी ...मगर बाकी बचे सदस्यों, अतिथियों की जिम्मेदारी , बुजुर्ग महिला पर ही है ...

दृश्य दो ...
यहाँ भी संयुक्त परिवार है मगर सिर्फ एक बेटा -बहू, अपने दो छोटे बच्चों के साथ रहते हैं ... इस पुत्र का विवाह बहुत बड़ी उम्र में हुआ ...उसके विवाह नहीं होने तक तीनों का सुखी परिवार चल रहा था , मगर अब जब वह भी विवाहित और दो बच्चों का पिता है , गृहक्लेश से स्थिति तनावपूर्ण बनी रहती है ...कारण कि पुत्रवधू सरकारी शिक्षक की नौकरी प्राप्त करने के प्रयास में पढने -लिखने में भी समय देती है , बात यहाँ भी वही कि उनके बाल गोपाल ,रसोई और अतिथियों का सत्कार उक्त वृद्ध महिला की जिम्मेदारी ही है , यहाँ थोड़ी कंडीशन अलग है कि पुरुष सदस्यों को घर के काम काज से परहेज नहीं है...

दोनों दृश्यों में जो कॉमन है वह है, नारी की अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता , आर्थिक मोर्चे पर भी पति के कदम से कदम मिला कर चलना..जाहिर है कि इस स्थिति में घर की जिम्मेदारी प्रत्येक सदस्य को समान रूप से उठानी पड़ेगी ...मगर चूँकि ये बुजुर्ग महिलाएं आजीवन अपना कर्तव्य ही निभाती रही हैं , अधिकारों को लेकर उन्होंने कभी सोचा ही नहीं , इन परिस्थितियों में वे न सिर्फ खुद को उपेक्षित महसूस करती हैं, अपितु उनकी उम्र के मद्देनजर गृहस्थी का भार भी उनपर अधिक होता है ...कमोबेश मध्यमवर्गीय परिवारों में बुजुर्ग महिलाओं की दशा आर्थिक और सामाजिक स्तर दोनों ही दिशा से दयनीय है ...

आधी आबादी की क्षमता , प्रतिभा और कार्यशक्ति देश और समाज के उत्थान में प्रयोग करना ही होगा , इसमें कोई दो राय नहीं ...ये उच्च शिक्षित अथवा आत्मनिर्भर होने की मंशा रखती महिलाएं यदि दबाव में सिर्फ घर तक सीमित रही तो उनके कुंठित होकर मानसिक बिमारियों का शिकार होने की सम्भावना भी बनती है ...मध्यम आय वर्ग के लिए बुजुर्ग व्यक्तियों की देखभाल के लिए अलग से सेवक की नियुक्ति करना आर्थिक भार ही साबित होगा ...

पिछले दिनों ऐसे कई परिवारों में बुजुर्गों की दुर्दशा देखने के बाद ओल्ड एज होम की सार्थकता पर मेरे विचारों में बदलाव आया है ...पहले मुझे यह शब्द गाली- सा लगता था , मगर अब मैं सोचती हूँ कि यदि घर में रहकर बेगानों सा रहना पड़े तो , ओल्ड एज होम एक अच्छा माध्यम है जहाँ अपने हमउम्र लोगो के साथ सुख दुःख बाँट कर मन हल्का कर सकते हैं , अपनी मर्जी और सुविधा से रह सकते हैं ...

ओल्ड एज होम से बेहतर विकल्प मुझे डे -केअर सेंटर लगता है , जहाँ बुजुर्ग और बच्चे दोनों अपना क्वालिटी समय साथ बिता सकते हों , बच्चे बुजुर्गों की आँखों के सामने भी हो और उन पर अतिरिक्त जिम्मेदारी भी ना हो ...पुरुष , महिलाएं और बच्चे भी इन सेंटर्स में अपना फ्री समय देकर इन सेंटर्स के माहौल को खुशनुमा और आरामदायक बना सकते हैं ... सरकार और सामाजिक संस्थाओं को इस दिशा में प्रयास करने चाहिए ...अधिक से अधिक सुविधायुक्त डे केयर सेंटर की स्थापना इस सामाजिक समस्या के हल की ओर एक बेहतर कदम है ...

नई पीढ़ी की अपनी जिम्मेदारियों से भागने की बात अथवा पुराने समय को बेहतर बता कर उसका गुणगान करते रह कर हम इस समस्या से भाग नहीं सकते ... हमें इस पर विचार करना होगा कि ऐसे में घर के बच्चों और बुजुर्ग सदस्यों की देखभाल किस तरह की जाए कि वे स्वयं को उपेक्षित ना समझे , यही इस पोस्ट का उद्देश्य है ...इस पर बहस और कार्य किया जाना अपेक्षित है...

आपकी राय और प्रतिक्रिया का इंतज़ार है !!

October 12, 2010

छेड़छाड़ की समस्या: समाधान के कुछ सुझाव (1.)

पिछली पोस्ट में मैंने छेड़छाड़ के कारणों को ढूढ़ने का प्रयास किया था. इस बार मैं कुछ समाधान सुझाने की कोशिश कर रही हूँ. इसके पहले मैं स्पष्ट कर दूँ कि छेड़छाड़ से मेरा मतलब उस घटिया हरकत से है, जिसे यौन-शोषण की श्रेणी में रखा जाता है. यह वो हल्की-फुल्की छींटाकशी नहीं है, जो विपरीतलिंगियों में स्वाभाविक है, क्योंकि वह कोई समस्या नहीं है. कोई भी इस प्रकार की हरकत समस्या तब बनती है, जब वह समाज के किसी एक वर्ग को कष्ट या हानि पहुँचाने लगती है.
समस्या यह है कि हम यौनशोषण को तो बलात्कार से तात्पर्यित करने लगते हैं और छेड़छाड़ को हल्की-फुल्की छींटाकशी समझ लेते हैं, जबकि छेड़छाड़ की समस्या भी यौन-शोषण की श्रेणी में आती है. मैं अपनी बात थोड़ी शिष्टता से कहने के लिये छेड़छाड़ शब्द का प्रयोग कर रही हूँ. किसी को अश्लील फब्तियाँ कसना, अश्लील इशारे करना, छूने की कोशिश करना आदि इसके अन्तर्गत आते हैं. लिस्ट तो बहुत लम्बी है. पर यहाँ चर्चा का विषय दूसरा है. मेरा कहना है कि ये हरकतें भी गम्भीर होती हैं. यदि इन्हें रोका नहीं जाता, तो यही बलात्कार में भी परिणत हो सकती हैं.
पिछली पोस्ट में छेड़छाड़ की समस्या के कारणों को खोजने के पीछे मेरा उद्देश्य था, इसे जैविक निर्धारणवाद के सिद्धान्त से अलग करना, क्योंकि जैविक निर्धारणवाद किसी भी समस्या के समाधान की संभावनाओं को सीमित कर देता है. मेरा कहना था कि यह समस्या जैविक और मनोवैज्ञानिक से कहीं अधिक सामाजिक है. समाजीकरण की प्रक्रिया में हम जाने-अनजाने ही लड़कों में ऐसी बातों को बढ़ावा दे देते हैं कि वे छेड़छाड़ को स्वाभाविक समझने लगते हैं. इसी प्रकार हम लड़कियों को इतना दब्बू बना देते हैं कि वे इन हरकतों का विरोध करने के बजाय डरती हैं और शर्मिन्दा होती हैं. चूँकि इस समस्या के मूल में समाजीकरण की प्रक्रिया है, अतः इसका समाधान भी उसी में ढूँढ़ा जा सकता है. वैसे तो सरकारी स्तर पर अनेक कानून और सामाजिक और नैतिक दबाव इसके समाधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, पर इसे रोकने का सबसे अच्छा और प्राथमिक उपाय अपने बच्चों के पालन-पोषण में सावधानी बरतना है. भले ही यह एक दीर्घकालीन समाधान है, पर कालान्तर में इससे एक अच्छी पीढ़ी तैयार हो सकती है.
मैं यहाँ लड़कियों के प्रति रखी जाने वाली सावधानियों की चर्चा कर रही हूँ, जिससे उन्हें ऐसी हरकतों से बचाया जा सके-
-लड़कियों में आत्मविश्वास जगायें. घर का माहौल इतना खुला हो कि वे अपने साथ हुई किसी भी ऐसी घटना के बारे में बेहिचक बता सकें.
-लड़की के साथ ऐसी कोई घटना होने पर उसे कभी दोष न दें, नहीं तो वह अगली बार आपको बताने में हिचकेगी और जाने-अनजाने बड़ी दुर्घटना का शिकार हो सकती है.
-लड़कियों को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग ज़रूर दिलवाएँ. इससे उनमें आत्मविश्वास जगेगा और वो किसी दुर्घटना के समय घबराने के स्थान पर साहस से काम लेंगी.
-लड़कियों को कुछ बातें समझाये. जैसे कि-
-वे रात में आने-जाने के लिये सुनसान रास्ते के बजाय भीड़भाड़ वाला रास्ता चुनें.
-भरसक किसी दोस्त के साथ ही जायें, अकेले नहीं.
-किसी दोस्त पर आँख मूंदकर भरोसा न करें.
-अपने मोबाइल फोन में फ़ास्ट डायलिंग सुविधा का उपयोग करें और सबसे पहले घर का नम्बर रखें.
ऐसी एक दो नहीं अनेक बातें हैं. पर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात बेटियों को आत्मविश्वासी बनाना है और अति आत्मविश्वास से बचाना है. उपर्युक्त बातें एक साथ न बताने लग जायें, नहीं तो वो या तो चिढ़ जायेगी या डर जायेगी. आप अपनी ओर से भी कुछ सुझाव दे सकते हैं. अगली कड़ी में मैं लड़कों के पालन-पोषण में ध्यान रखने वाली बातों की चर्चा करूँगी.

March 22, 2010

क्या मुस्लिम औरतों को इसी तरह बेइज्ज़त होते रहना होगा...?

देश के एक वरिष्ठ पत्रकार से बात हुई... बात दुआ सलाम के बाद महिला आरक्षण और फिर शिया धर्म गुरु कल्बे जव्वाद के शर्मनाक बयान पर आकर रुक गई... वरिष्ठ पत्रकार महोदय ने हमारी प्रतिक्रिया जाननी चाही...

हमने कहा- कौम के लिए इससे ज़्यादा डूब मरने की बात क्या होगी कि कल्बे जव्वाद जैसा व्यक्ति मुस्लिम औरतों के बारे में सरेआम बेहद शर्मनाक बयान दे रहा है और मुस्लिम मर्द तमाशा देख रहे हैं...आख़िर कोई अपनी मां, बहन और बेटियों की इस 'बेइज्ज़ती' पर खामोश कैसे रह सकता है...? क्या लोगों की ग़ैरत मर चुकी है...? क्या मुस्लिम औरतों को हमेशा इसी तरह बेइज्ज़त होते रहना होगा...?

-फ़िरदौस ख़ान

March 13, 2010

हे ईश्वर इन्हें माफ़ करना...

शिया धर्म गुरु कल्‍बे जव्‍वाद का यह बयान बेहद शर्मनाक है कि महिलाएं सिर्फ़ बच्‍चे पैदा करें, राजनीति उनका काम नहीं है. जिस समाज के 'ठेकेदार' ऐसे (तुच्छ मानसिकता वाले) हों, वह समाज किस दिशा (गर्त) में जाएगा, कहने की ज़रूरत नहीं.

हालांकि महिला आरक्षण विधेयक को लेकर अनेक गैर मुस्लिम लोग पिछड़ी महिलाओं के साथ ही मुस्लिम महिलाओं के लिए भी आरक्षण की बात कर रहे हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं (हे ईश्वर इन्हें माफ़ करना, यह नहीं जानते कि...यह क्या कर रहे हैं...? (कब मज़हब के ठेकेदार इन नेताओं को इस्लाम का दुश्मन क़रार देकर इनके ख़िलाफ़ फ़तवा जारी कर दें, कहा नहीं जा सकता).

कुछ हिन्दू भाइयों ने कल्‍बे जव्‍वाद के बयान पर प्रतिक्रिया जताते हुए हैरत ज़ाहिर की है कि किसी भी मुस्लिम संगठन ने मुस्लिम महिलाओं के बारे दिए गए शर्मनाक बयान के ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाई... हैरत इस बात की भी है कि हिन्दू भाई अब तक भी नहीं समझे कि "इस्लाम के 'प्रचारक' सिर्फ़ यह बताने का बीड़ा उठाए हुए हैं कि मुस्लिम औरतों को मारना-पीटना मर्दों का 'नैतिक अधिकार' है, मर्दों को चार-चार औरतें रखने की 'विशेष सुविधा' है, और पत्नी 'भोग की सर्वोत्तम वस्तु' (यानि पति की अर्धांगिनी नहीं) है...

-फ़िरदौस ख़ान

February 13, 2010

कुछ नये धारावाहिकों में आधुनिक-नारी के रूप

अगर आप टी.वी. धारावाहिकों में औरतों का रोना-धोना, उनकी पारिवारिक समस्याओं, उनके शोषण आदि को देख-देखकर ऊब चुके हों तो कुछ नये धारावाहिक शुरू हुए हैं, जो नारी को एक नए रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं. ये धारावाहिक हैं यशराज बैनर के, जो कि करण जौहर का फ़िल्म-निर्माण का बैनर है और गुडी-गुडी फ़िल्में बनाने के लिये जाना जाता है. जब इनका प्रचार सोनी चैनल पर आना शुरू हुआ था, तो मैंने सोचा था कि उन्होंने अपनी फ़िल्मों की तरह ही धारावाहिक भी बनाये होंगे. फिर कुछ दिन धारावाहिक देखकर प्रतीक्षा की कि ऐसा न हो कि एक-आध एपिसोड के बाद कहानी वहीं आ जाये. वही रोना-धोना, पतियों को पाने, सहेजने या छीनने के लिये लड़ती औरतें. ऐसा लगता है कि औरतों के जीवन में एक ही काम है- पति को प्राप्त करना और फिर उसे किसी दूसरी औरत की ओर आकर्षित होने से बचाए रखना. शुक्र है, कि यशराज के तीन धारावाहिकों में मुझे ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला.
इन धारावाहिकों में एक है "माही वे", जो सोनी पर शनिवार आठ बजे आता है. इसकी मुख्य पात्र माही, एक पच्चीस साल की, आम लड़कियों से थोड़े अधिक वजन की लड़की है. एक फ़ैशन मैगज़ीन में माही वे नाम का कॉलम लिखती है. उच्च-मध्यमवर्गीय परिवार की है. उसके सपने भी आम लड़कियों जैसे ही हैं. चाहती है कि उसका भी एक ब्वॉयफ़्रैंड हो. लेकिन वो कैसा होगा, इसका निर्णय वह खुद करेगी. ये आम लड़की माही, धता बताती है-औरतों के लिये बनाये उन सौन्दर्य-मानकों को, जो बड़ी-बड़ी सौन्दर्य-प्रसाधन बनाने वाली कम्पनियों द्वारा बनाये जाते हैं और फिर लड़कियों में उन मानकों में फ़िट होने की ललक जगायी जाती है.
दूसरा धारावाहिक है "रिश्ता डॉट कॉम". इसकी मुख्य पात्र ईशा एक आधुनिक, आत्मनिर्भर लड़की है, जो अपनी आधुनिक सोच के साथ-साथ मानवीय मूल्यों में विश्वास करने वाली है. वह किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्त्व को आन्तरिक गुणों से तौलती है, न कि शारीरिक आकर्षण से. वह अपने पार्टनर रोहन के साथ ये कम्पनी चलाती है और बहुत अच्छे से सबको डील करती है. इन दोनों ही धारावाहिकों में बड़ी ही नेचुरल कॉमेडी है.
तीसरा और मेरा मनपसंद कैरेक्टर है वृंदा साहनी का, जो "पावडर" नाम के धारावाहिक की मुख्य पात्र है. वृंदा एन.सी.बी.(नेशनल क्राइम ब्यूरो) में काम करती है, जो पुलिस का एक विशेष दस्ता है. एन.सी.बी. अन्सारी नाम के ड्रग डीलर के पीछे है. वृंदा का रोल मुझे इसलिये अच्छा लगा क्योंकि वह एक ऐसे फ़ील्ड में अपनी जगह बनाने के लिये संघर्ष कर रही है, जो मर्दों की कही जाती है. उसका एक सहकर्मी उससे कहता है "क्राइम और पुलिस मर्दों की फ़ील्ड है, औरतें आयेंगी, तो पिटेंगी." ये सब सहकर भी वो डटी है. उसने नशे के सौदागरों को खत्म करना अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है.
ये धारावाहिक थोड़े नाटकीय ज़रूर लगते हैं, पर इतना न हो तो फिर इसे मनोरंजन नहीं, ज्ञान कहेंगे. लेकिन फिर भी इनका निर्देशन अन्य सीरियल्स से अच्छा है. जब औरतें बाहर निकलकर काम कर रही हैं और उन्हें वर्कप्लेस पर भी बहुत कुछ झेलना पड़ता है, तो प्राइम टाइम पर आने वाले लगभग सभी धारावाहिकों में औरतों को सिर्फ़ घर की समस्याएँ झेलते ही क्यों दिखाया जाता है? ये धारावाहिक औरतों की घर से बाहर की ज़िन्दगी और वहाँ की चुनौतियों को दिखाते हैं, इसलिये ये धारावाहिक कुछ हटकर लगते हैं.

October 29, 2009

अब ये कहना की शादी को सेक्स से जोड़ कर ना देखा जाए अपने आप मे एक बड़ी बहस का मुद्दा है

यहां एक एक और खटकी...महावीर और जानकी के रिश्ते को सिर्फ सेक्स के नज़रिए से ही क्यों देखा गया...हाई क्लास सोसायटी में लिव इन रिलेशन को मान्यता मिल सकती है...पेज थ्री पार्टियों की चकाचौंध के पीछे वर्जनाओं के टूटने के अंधेरे का नज़रअंदाज किया जा सकता है...लेकिन समाज में निचली पायदान पर खड़ा कोई महावीर या कोई जानकी इस तरह का कदम उठता है तो हम सबको ये नितांत गलत नज़र आने लगता है...


ये एक कमेन्ट का हिस्सा हैं और पूरा कमेन्ट और बहस आप लिंक क्लिक्क कर के देख सकते हैं
समाज मे शादी की संस्था को क्यूँ मान्यता हैं ?
ताकि सेक्स लेजिटिमेट तरीके से हो

ताकि प्रजनन की प्रक्रिया के लिये एक सही और सुविधा जनक तरीका हो

ताकि बच्चो को माँ पिता का नाम दिया जा सके और एक परिवार की संरचना हो जिस से एक समाज बने जो "एक दायरे मे रहे "
अब ये कहना की शादी को सेक्स से जोड़ कर ना देखा जाए अपने आप मे एक बड़ी बहस का मुद्दा है
आज भी भारत मे पुरूष वर्ग के ज्यादा लोग शादी इसीलिये करते हैं ताकि वो अपनी biological needs को पूरा कर सके अगर शादी से सेक्स को हटा दिया जाए तो कितने पुरूष इस व्यावस्था को स्वीकारेगे । पुरूष की जरुरत को पूरा करने के लिये ही शादी जैसी संस्था को निरंतर मान्यता दी जाती हैं और इसकी पैरवी भी सबसे ज्यादा पुरूष ही करते नज़र आते हैं ।

भारत मे पुरूष समुदाय का एक बहुत बड़ा हिस्सा हैं जिनकी पत्नी को सेक्स मे रूचि नहीं होती शादी और बच्चो के बाद , क्युकी औरत की बेसिक जरुरत घर पति और बच्चे पूरी हो जाती हैं ।

इसके अलावा एक बहुत बड़ा समुदाय बन रहा हैं पुरूष समाज मे जिन के विचार आज भी १९६० मे अटके हैं पर उनकी उम्र केवल ४० वर्ष के आस पास हैं । इस समुदाय के पुरुषों की समस्या हैं उनकी पत्नी का बाहर जा कर काम करना और उनसे बराबरी करना जिसका अंत अब बहुत बार तलाक मे होता हैं । जब इन सब की शादी हुई थी तो ये सब प्रोग्रेसिव थे और इन्होने एक वर्किंग पत्नी चाही थी पर पकेज डील मे " उसके स्त्री होना और उसका इनसे स्वतंत्र होकर सोचना " और उससे भी ज्यादा "उसका हर समय सेक्स के लिये तैयार ना रहना " इनको नहीं मंजूर हुआ क्युकी इनकी पत्नी आर्थिक रूप से स्वतंत्र थी इस लिये वो तलाक ले सकती थी ।
और जहाँ तलक नहीं हुआ वहाँ रिश्ते इतने कड़वे हैं की आपसी प्रेम कभी था ही नहीं जैसे । एक शादी हैं टूटी फूटी सी जिसे कोई बच्चो के लिए तो कोई और कोई विकल्प ना होने के लिये निभा रहा हैं ।
सेक्स को शादी से काट दे तो क्या शादी शादी रह सकती हैं ।
और एक पुरूष वर्ग और तैयार हो रहा हैं जहाँ पति पत्नी दोनों बड़ी बड़ी कम्पनियों मे उचे पदों पर काम कर रहे हैं और पत्नी की सेक्स के प्रति कोई रुची है ही नहीं इस वर्ग के पुरूष अपनी जरूरते घर से बाहर पूरी करते हैं और तमाम लिव इन रिलेशनशिप ऑफिस और ऑफिस के बाहर बन रही हैं

लिव इन रिलेशनशिप को जितनी मान्यता बे पढे लिखे तबके मे हैं उतनी पढे लिखे तबके मे नहीं हैं आज भी अगर आप अपने घर मे काम करने वाली बाई से बात करके देखे तो आप को पता चलेगा की उनमे से ना जाने कितनी बिना शादी के किसी भी पुरूष के साथ रह रही हैं ।

महावीर और जानकी के सम्बन्ध मे जितने लोगो ने भी इस शादी को सेक्स से जोड़ा हैं वो सब सही हैं शादी की बेसिक बुनियाद पति पत्नी के दैहिक सम्बन्ध ही हैं

October 11, 2008

स्त्रीदेह : कितनी ढँके, कितनी उघड़े

ये पोस्ट दुबारा डाली जा रही हैं क्योंकि पिछले लिंक मे कुछ हिस्सा गार्ब्ल हो गया हैं














गत दिनों स्त्री के वस्त्रों के अनुपात से उसके चरित्र की पैमाईश करने वाले कई प्रसंग उठते रहे हैं और स्त्री के वस्त्रों को उसके साथ होने वाले अनाचार का मूल घोषित किया जाता रहा है। जबकि वस्तुत: अनाचार का मूल व्यक्ति के अपने विचारो, अपने संस्कार, आत्मानुशासन की प्रवृत्ति, पारिवारिक वातावरण, जीवन व संबंधों के प्रति दृष्टिकोण, स्त्री के प्रति बचपन से दी गयी व पाई गयी दीक्षा, विविध घटनाक्रम, सांस्कृतिक व मानवीय मूल्यों के प्रति सन्नद्धता आदि में निहित रहता है। पुरूष व स्त्री की जैविक या हारमोन जनित संरचना में अन्तर को रेखांकित करते हुए पुरुष द्वारा उस के प्रति अपनी आक्रामकता या उत्तेजना को उचित व सम्मत सिद्ध करना कितना निराधार व खोखला है, इसका मूल्यांकन अपने आसपास के आधुनिक तथा साथ ही बहुत पुरातन समाज के उदाहरणों को देख कर बहुत सरलता व सहजता से किया जा सकता है।





वस्तुत: जब तक स्त्री - देह के प्रति व्यक्ति की चेतना में भोग में वृत्ति अथवा उपभोग की वस्तु मानने का संस्कार विद्यमान रहता है तब तक ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को सौ परदों में छिपी स्त्री को देख कर भी आक्रामकता व उत्तेजना के विकार ही उत्पन्न होते हैं देह को वस्तु समझने व उसके माध्यम से अपनी किसी लिप्सा को शांत करने की प्रवृत्ति का अंत जब तक हमारी नई नस्लों की नसों में रक्त की तरह नहीं समा जाता तब तक आने वाली पीढी से स्त्री देह के प्रति 'वैसी" अनासक्ति की अपेक्षा व आशा नहीं की जा सकती योरोप का आधुनिक समाज व उसी के समानान्तर आदिवासी जन जातियों का सामाजिक परिदृश्य हमारे समक्ष २ सशक्त उदाहरण हैं। असल गाँव की भरपूर युवा स्त्री खुलेपन से स्तनपान कराने में किसी प्रकार की बाधा नहीं समझती क्योंकि उस दृष्टि में स्तन यौनोत्तेजना के वाहक नहीं हैं उनका एक निर्धारित उद्देश्य है, परन्तु जिनकी समझ ऐसी नहीं है वे स्तनों को यौनोत्तेजना में उद्दीपक ही मानते पशुवत जीवन को सही सिद्ध किए जाते हैं । और अपनी उस दृष्टि के कारण जनित अपनी समस्याओं को स्त्री के सर मढ़ते चले जाते हैं ।


एक आलेख इस दिशा में महत्वपूर्ण दिशाबोध दे सकने में पूर्ण समर्थ है, जिसे मैंने गत दिनों BEYOND THE SEX : स्त्रीविमर्शस्त्रीविमर्श पर प्रस्तुत किया था। यहाँ निस्सन्देह एक दूसरी प्रकार का पाठकवर्ग तो है ही, साथ ही आलेख की प्रासंगिकता व महत्व को देखते हुए आज इसे आप सभी के निमित्त यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ।



पिछले हफ्ते स्त्री-पुरुष समानता की दिशा में एक उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। वहां अब स्त्रियों को सार्वजनिक स्विमिंग पूलों में टॉपलेस हो कर तैरने तथा पूल के इर्द-गिर्द टॉपलेस अवस्था में टहलने की स्वतंत्रता मिल गई है। इस स्वतंत्रता के लिए वहाँ के टॉपलेस फ्रंट द्वारा लगभग एक साल से अभियान चलाया जा रहा था। फ्रंट के नेतृत्व का कहना था कि जब पुरुष टॉपलेस हो कर सार्वजनिक स्विमिंग पूलों में तैर सकते हैं, तैरने के पहले उसी अवस्था में पूल के किनारे टहल सकते हैं, तो स्त्रियों के लिए यह पाबंदी क्यों कि उन्हें अपने को ढक कर रखना होगा।


इस महत्वपूर्ण सूचना व उसके विवेचन को अत्यंत सुलझे हुए ढंग से समझने जानने के लिए
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October 10, 2008

स्त्रीदेह : कितनी ढँके, कितनी उघड़े













गत दिनों स्त्री के वस्त्रों के अनुपात से उसके चरित्र की पैमाईश करने वाले कई प्रसंग उठते रहे हैं और स्त्री के वस्त्रों को उसके साथ होने वाले अनाचार का मूल घोषित किया जाता रहा है। जबकि वस्तुत: अनाचार का मूल व्यक्ति के अपने विचारो, अपने संस्कार, आत्मानुशासन की प्रवृत्ति, पारिवारिक वातावरण, जीवन व संबंधों के प्रति दृष्टिकोण, स्त्री के प्रति बचपन से दी गयी व पाई गयी दीक्षा, विविध घटनाक्रम, सांस्कृतिक व मानवीय मूल्यों के प्रति सन्नद्धता आदि में निहित रहता है। पुरूष व स्त्री की जैविक या हारमोन जनित संरचना में अन्तर को रेखांकित करते हुए पुरुष द्वारा उस के प्रति अपनी आक्रामकता या उत्तेजना को उचित व सम्मत सिद्ध करना कितना निराधार व खोखला है, इसका मूल्यांकन अपने आसपास के आधुनिक तथा साथ ही बहुत पुरातन समाज के उदाहरणों को देख कर बहुत सरलता व सहजता से किया जा सकता है।




वस्तुत: जब तक स्त्री - देह के प्रति व्यक्ति की चेतना में भोग में वृत्ति अथवा उपभोग की वस्तु मानने का संस्कार विद्यमान रहता है तब तक ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को सौ परदों में छिपी स्त्री को देख कर भी आक्रामकता व उत्तेजना के विकार ही उत्पन्न होते हैं देह को वस्तु समझने व उसके माध्यम से अपनी किसी लिप्सा को शांत करने की प्रवृत्ति का अंत जब तक हमारी नई नस्लों की नसों में रक्त की तरह नहीं समा जाता तब तक आने वाली पीढी से स्त्री देह के प्रति 'वैसी" अनासक्ति की अपेक्षा व आशा नहीं की जा सकती योरोप का आधुनिक समाज व उसी के समानान्तर आदिवासी जन जातियों का सामाजिक परिदृश्य हमारे समक्ष २ सशक्त उदाहरण हैं। असल गाँव की भरपूर युवा स्त्री खुलेपन से स्तनपान कराने में किसी प्रकार की बाधा नहीं समझती क्योंकि उस दृष्टि में स्तन यौनोत्तेजना के वाहक नहीं हैं उनका एक निर्धारित उद्देश्य है, परन्तु जिनकी समझ ऐसी नहीं है वे स्तनों को यौनोत्तेजना में उद्दीपक ही मानते पशुवत जीवन को सही सिद्ध किए जाते हैं । और अपनी उस दृष्टि के कारण जनित अपनी समस्याओं को स्त्री के सर मढ़ते चले जाते हैं ।


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पिछले हफ्ते स्त्री-पुरुष समानता की दिशा में एक उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। वहां अब स्त्रियों को सार्वजनिक स्विमिंग पूलों में टॉपलेस हो कर तैरने तथा पूल के इर्द-गिर्द टॉपलेस अवस्था में टहलने की स्वतंत्रता मिल गई है। इस स्वतंत्रता के लिए वहाँ के टॉपलेस फ्रंट द्वारा लगभग एक साल से अभियान चलाया जा रहा था। फ्रंट के नेतृत्व का कहना था कि जब पुरुष टॉपलेस हो कर सार्वजनिक स्विमिंग पूलों में तैर सकते हैं, तैरने के पहले उसी अवस्था में पूल के किनारे टहल सकते हैं, तो स्त्रियों के लिए यह पाबंदी क्यों कि उन्हें अपने को ढक कर रखना होगा।





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October 03, 2008

“ विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो स्त्री इतनी दयनीय न रहेगी ” भाग ३

“ विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो स्त्री इतनी दयनीय न रहेगी ”
–महादेवी वर्मा
सुप्रणीति वरेण्या
पिछले अंक से आगे (भाग-३)


)


एक ऐसा ही विषय “अर्थ-स्वातंत्र्य” है। धन सदा सबल व्यक्ति का अनुसरण करता है। यह सत्य है कि जब भी स्त्री आर्थिक संकट से गुज़री है, उसे सदा पति, पुत्र, पिता, भाई आदि के चेहरे ताकने पड़े हैं। विवाह के पहले और बाद भी स्त्री का अपनी पैतृक संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं रहा। पति के घर में उसका काम रहा बच्चों का पालन-पोषण और पति का काम रहा धन की आपूर्ति। ऐसी स्थिति में पति को पत्नी और धन में कोई संबंध नहीं दिखा और आज भी आर्थिक सहायता के लिए स्त्री पुरुष पर निर्भर है। परंतु पति-पत्नी में हर पड़ाव पर संतुलन होना चाहिए, आर्थिक मामलों में भी। जब एक ओर संकट हो तो दूसरी ओर से सहयोग प्रस्तुत हो। परंतु यहाँ संतुलन नहीं है। आर्थिक मामलों में पुरुष पत्नी के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करता और पत्नी को भी सदा पुरुष से सहयोग माँगना पड़ता है। स्त्री को कमज़ोर बनाने वाले और क्या कारक हो सकते हैं? वह कभी एक सहयोगी को मिलने योग्य आदर नहीं पा सकी। उसकी पहचान सुख के एक साधन या बोझ के रूप में ही हुई।



जब स्त्री को देवी मान लिया जाने लगा तो उससे यही अपेक्षा की गई कि वह दिए गए थोड़े-से प्रसाद को पाकर ही संतुष्ट हो जाए। फिर यह देवी आज कैसे अपने अधिकारों की माँग कर बैठी! ये परिवर्तन पुरुष के लिए असह्य थे। एक सामाजिक प्राणी होने के नाते स्त्री का अर्थ पर उतना ही अधिकार है जितना पुरुष का; जीवन-निर्वाह की समस्याएँ वह भी झेलती है। अपने जीवन के व्यवसाय को मजबूर स्त्रियों की मजबूरी भी अर्थ है। समाज में स्त्रियों की ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि उनके साथ किसी पुरुष संबंधी के न होने पर उनकी साधारण सुविधाएँ भी नष्ट हो जाती हैं। यदि ऐसी स्थिति बदली न जाए तो स्त्री का विद्रोह बढ़ता जाएगा, जिससे नाश के अलावा और कोई अपेक्षा नहीं की जा सकती।



आज समाज में कई दुविधाओं के रहते कुछ प्रश्न आ खड़े हो गए हैं। हमारी मूर्खताओं और गलतियों के कारण समाज में अराजकता फैली है और सबसे बड़ी समस्या आज की शिक्षा बन गई है। जहाँ हम शिक्षा को एकता और जागृति का कारण मानते हैं, वहीं आजकल शिक्षा प्राप्त कर लोगों में विशिष्ट होने की भावना जन्म ले रही है। शिक्षा यों तो ऊँचे-नीचे, सभी वर्गों को पिरोने का काम करती है, परंतु आज शिक्षितों व अशिक्षितों में ऐसी दीवार बन गई है, जिसका टूटना असंभव – सा लगता है। दुविधाओं में फँसे लोगों में से यदि एक बचने का मार्ग पा जाए तो उसका यह कर्तव्य बनता है कि वह अपने बाकी बंधुओं की सहायता करे। शिक्षा प्राप्त कर समाज का एक अंग केवल स्वयं शिक्षा प्राप्त कर कैसे चैन की नींद ले सकता है, जब उसके अन्य भाई-बहन अशिक्षित बैठे हैं या फिर साक्षर हो कर ही संतुष्ट बैठे हैं, जब कि जीवन-संसार के बारे में वे कुछ नहीं जानते। शिक्षित महिला-समाज ने अनजाने में ही पुरुष-समाज की कई कमज़ोरियों को भी आत्मसात कर लिया है। उसने शिक्षा तो प्राप्त कर ली किंतु सेवा की भावना मन से भुला दी।


आजकल ऐसी स्त्रियाँ भी मिल जाएँगी जो साक्षर हैं, सरल और कोमल भी हैं, परंतु जो अक्षरज्ञान तक सीमित हैं, विवेकशक्ति उनमें नाम मात्र की भी नहीं। उनके कोमल हृदय पर अच्छे संस्कारों की छाप और अच्छे संस्कारों की नींव की आवश्यकता है। “शिक्षा एक ऐसा कर्तव्य नहीं है जो किसी पुस्तक को प्रथम पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक पढ़ा देने से ही पूर्ण हो जाता, वरन् वह ऐसा कर्तव्य है जिसकी परिधि सारे जीवन को घेरे हुए है।“




आजकल शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा रखने वाली महिलाओं के दो प्रकार के ध्येय हैं – पुरुष की तरह स्वतंत्र जीवन-निर्वाह करना या अपने को विदुषी और शिक्षिता प्रमाणित करना ताकि अपने धन और विद्या के बल पर ऐसा पति पा सकें जो विवाह के बाद सभी सामाजिक सुविधाएँ जुटा सके ताकि भावी जीवन में स्वयं का कोई कर्तव्य न रहे। परंतु इन सभी विषयों से अधिक आवश्यक है अपने देश के बच्चों का विकास और अशिक्षित स्त्रियों का विकास ताकि वे अपने बच्चों का भविष्य बनाना सीखें, ुनिया को जानें, स्वावलंबी बनें। स्त्रियों को अपना उत्तरदायित्व समझ कर अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए परंतु आजकल स्त्रियाँ, पुरुषों के अनुकरण को ही अपना लक्ष्य समझ रही हैं, जिसके परिणामस्वरूप धीरे-धीरे उनकी कोमल भावनाएँ रूप बदल कर कठोर हो रही हैं। महादेवी के शब्दों में – “शिक्षा के सत्य अर्थ में शिक्षित वही व्यक्ति कहा जाएगा जिसने अपनी संकीर्ण सीमा को विस्तृत, अपने संकीर्ण दृष्टिकोण को व्यापक बना लिया हो।“



समाज में आजकल युवक-युवतियों के आपस में बढ़ते संपर्क से शिष्टाचार की परिधि लाँघी जा चुकी है, क्योंकि इतने खुलेपन में वे अपनी सीमाएँ निश्चित नहीं कर पाते। इस समस्या का हल या तो शक्तिबल से हो जो अनुचित ही लगता है। दूसरा मार्ग है समाज में स्त्री –पुरुष का इस चेतना से दूर रहना कि वे स्त्री-पुरुष हैं, जिसे “सेक्स-कांशसनेस” कहते हैं। परंतु इस मार्ग को इतना सरल नहीं माना जा सकता, यह असंभव – सा ही है, क्योंकि इसका अर्थ होगा अपने गुण, स्वभाव, बनावट आदि सब कुछ छोड़कर बस अपनी आत्माओं पर ध्यान देना। सामान्य जन-समाज से ऐसी आशा का फल निराशा के रूप में मिलेगा। किंतु यदि स्त्री-पुरुष में यह चेतना है तो वे अपनी चेतना व गुणों के आधार पर समाज को नया रूप देकर दृढ़ बना सकते हैं। यह भी तब तक ठीक है जब तक सामंजस्य है। यदि कहीं दोनों में से कोई एक स्वयं को उत्तम मानने लगे या स्वयं को ही सभी अधिकारों का स्वामी मान ले, तो असंतुलन होगा, जो अब भी है, जिसके बुरे परिणाम हम सब देख ही सकते हैं।



हमारे समाज में बहुत पहले से ही स्त्री-पुरुष के बीच अजीब रेखा खींची गई। विद्यार्थी जीवन में वे एक दूसरे को देखने को भी स्वतंत्र न थे। इससे बचपन से ही उनके मन में एक दूसरे के प्रति कौतूहल की ऐसी भावना पैदा हुई कि वे एक दूसरे को सामान्य मानव के बजाय असाधारण समझने लगे। उस समय इसके पीछे उचित व मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त रहे होंगे परंतु आज जहाँ समाज में इसके परिणाम दिख रहे हैं वे बहुत अच्छे भी प्रतीत नहीं होते। इसके विपरीत परिणाम जगह-जगह पर देखे जा सकते हैं। पश्चिम में युवक-युवतियाँ नैतिकता की मूल बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते। चरित्र-निर्माण में वे पीछे छूट गए हैं। समाज को आज ऐसे युवकों की आवश्यकता है जो साहसी होने के साथ अच्छे सिद्धान्तों का पालन भी करते हों, स्त्रियों का सम्मान करते हों। आजकल स्त्रियों के मान की रक्षा करने वाल दिलेर कहाँ मिलता है? हाँ, उसके साथ बुरा व्यवहार कर उसे अपमानित करने वाले हर गली में मिल जाते हैं।



साथ में बुरी तरह से फैल रही है एक और समस्या, छोटे-छोटे विद्यार्थियों का रोमानी दुनिया में उड़ना। हर जगह पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों और चित्रों के माध्यम से प्रेम के नाम पर मूर्खतापूर्ण सामग्री परोसी जा रही है, जिसका सच्चे प्रेम से कोई संबंध नहीं है। शिक्षा के बजाय बालक-बालिकाओं, किशोरों और युवक-युवतियों पर उलटे संस्कार यहीं से पड़ते हैं और फिर वे कब दुनिया को किसी स्वप्निल आकाश की अपेक्षा उसके यथार्थ रूप में देख पाते हैं? उनकी मनोस्थिति अस्वस्थ हो जाती है।



इसी संदर्भ में वेशभूषा के विषय में महादेवी कहती हैं कि मनुष्य के हाव-भाव व वेशभूषा बहुत कुछ कह सकते हैं। आजकल युवक युवतियों को विद्यार्थी का पूरा श्रेय देना भी कठिन हो जाता है, क्योंकि उन्हें सादी वेश-भूषा में नहीं देखा जा सकता, जिससे कि वे गंभीर और उत्सुक विद्यार्थी लगें। वे अब आकर्षण का केंद्र बनना चाहते हैं। स्त्रियों के विषय में वे यह तर्क करती हैं कि उनसे तपस्विनी बनने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, परंतु जिस समाज में पुरुषों की दृष्टि ठीक नहीं और अन्य महिलाओं की स्थिति भी खराब हो वहाँ श्रृंगार छोड़ देने में क्या हानि है? उनका तर्क और बल पकड़ता है जब वे यह कहती हैं कि यदि यह श्रृंगार आत्मतुष्टि या अपने संतोष के लिए है तो फिर इसे घर तक ही क्यों नहीं सीमित कर दिया जाता, क्या इसे बाहर दिखाने की आवश्यकता है?



पुरुषों द्वारा कुचेष्टा की संभावना के बारे में यदि खुले दिमाग और आत्मविश्वास से सोचा जाए तो समस्या का हल निकल सकता है। स्त्रियाँ यदि अपने सद्‍भाव से इसे दूर करने की कोशिश करें तो बल प्रदर्शन से मिलने वाले परिणामों से अधिक अच्छे परिणाम मिल सकते हैं, किंतु यहाँ भी जिस पुरुष में आत्मिक परिवर्तन लाना हो, उसके आत्मिक बल का सौ गुना आत्मिक बल उसमें होना चाहिए जो परिवर्तन लाने की चेष्टा कर रहा हो।




पुरुषों को इन विभिन्न परिस्थितियों में एक समझदार सहायक के रूप में अपने को प्रस्तुत करना होगा और स्त्रियों की थोड़ी सी गलतियों की ओर इशारा करने से पहले उनकी कठिनाइयों को भी देखना होगा। यदि स्त्रियाँ व्यवहार में बहुत कटु हों तो इसका अर्थ समझ जाना चाहिए कि उन्हें सज्जन पुरुष कम और समय-समय पर धोखा देने वाले पुरुष अधिक मिले हैं।




मनुष्य जिस समाज का अंग है और सामाजिक प्राणी कहलाता है, वह केवल एक मानव-संगठन नहीं है। इस संगठन के सभी सदस्यों से सभी प्रकार के सहयोग की अपेक्षा रखी जाती है। साथ में समाज के अपने अनुशासन के नियम भी होते हैं और उनके उल्लंघन पर दंड का भी विधान होता है। छिपा कर किए जाने वाले बुरे आचरण से लोगों के मन को डराने वाला अज्ञात का भय भी है, जो पारलौकिक है। उस ईश्वर के बारे में समाज की विभिन्न धारणाएँ हैं। चूँकि हर सामाजिक प्राणी किसी भी धारणा को अपनाने में स्वतंत्र है, अत: समाज में अलग-अलग धारणाएँ रखने वाले लोग मिल जाते हैं, लेकिन ये धारणाएँ सोच तक ही सीमित रह सकती हैं। मनुष्य को यह स्वतंत्रता अपने व्यवहार में नहीं है क्योंकि प्रत्येक का व्यवहार समाज को प्रभावित करता है। अतः प्राचीनकाल में भी अलग-अलग धारणा रखने वाले लोगों के अलग-अलग समाज नहीं बने।




ऐसा भी नहीं है कि व्यक्ति का पूरा जीवन बस समाज के लिए ही है। उसे निजी जीवन स्थापित रखने का अधिकार यह दर्शाता है कि मानवीय स्वभाव को बंधन नहीं रोक सकते और रोकना भी नहीं चाहिए। जब मानव समाज में पलकर बड़ा होता है तो उसकी मानसिकता में समाज के सिद्धान्तों की नींव गड़ी होती है। अपने विकास के बाद अनुचित लगने वाले सिद्धांतों पर मानव आक्षेप लगा सकता है और तब से बदलाव के रंग दीख पड़ते हैं। सिद्धांतों का रूप समाज में इसी तरह समय-समय पर बदलता रहता है।



समाज के दो मुख्य भाग हैं जो संचालन के महत्वपूर्ण अंग हैं : एक, अर्थ विभाजन और दूसरा, स्त्री-पुरुष-संबंध। किसी भी भाग में खटपट से समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है।



आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सभी व्यक्ति एक-दूसरे से भिन्न हैं, परंतु एक-दूसरे के सहयोग से ही वे आगे बढ़ सकते हैं। इस समय समाज में ऐसे भी लोग हैं जो जीवन की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं कर सकते। यह समाज की लक्ष्य-भ्रष्टता है, क्योंकि समाज का संगठन ही मनुष्य ने इसलिए किया था कि उसे कभी ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े। समाज में उत्पन्न अनुचित पक्षपात भी आजकल ऐसी स्थितियाँ खड़ी कर रहा है। जीवन के प्रति ऐसे हताश तथा दासत्व झेल रहे व्यक्तियों का कोई भी सरल –सा समाधान संभव नहीं लगता। अपने ही सदस्यों को इतना दिशाहीन बनाने में समाज का ही हाथ है। इन स्थितियों में क्रांतियाँ बवंडरों की भाँति आती हैं और फिर युग में परिवर्तन होते हैं। क्रांति कुछ नहीं करती, बस समाज की धारा की दिशा बदल देती है, लेकिन इस से समाज का पूरा अस्तित्व ही बदल जाता है। जो समाज क्रांति को सहन करने की क्षमता रखता है, वही क्रांति से अपना रूप बचा पाता है और तब व्यापक उलट फेर के बाद स्वच्छता आती है।


स्त्री-पुरुष संबंध समाज के दूसरे आवश्यक पहलू हैं। स्त्री बर्बरता के युग में विनोद की वस्तु मानी जाती थी। पुरुष को उसकी इच्छा के बिना ही उसका अपहरण तक कर लेने की छूट थी। सभ्यता के समय स्थिति में सुधार आया। वैदिककाल सबसे आदर्शकाल प्रतीत होता है, जहाँ स्त्री का आदर-सम्मान था, वह किसी भी दृष्टि में पुरुष से हेय नहीं थी, परंतु पुरुष की अधिकार-लालसा से पतन होने लगा। आज स्त्री की स्थिति बर्बरतायुग की स्त्री की स्थिति से मिलती-जुलती है। शासन में महिलाओं के लगभग न्यून प्रतिनिधित्व के कारण सामाजिक व्यवस्था पुरुषों की सुविधानुसार हुई। केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण के छोटे उदाहरणों का सहारा ले पुरुष ने स्त्री और समाज की ओर ध्यान देना ही बंद कर दिया। समाज का कभी इस ओर ध्यान ही नहीं गया कि स्त्री-पुरुष केवल आध्यात्मिक नहीं, व्यावहारिक भी हैं। व्यावहारिकता और आध्यात्मिकता एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं और इसलिए आज इनके अंसतुलन से समाज में असामंजस्य है।



धर्म के संबंध में यही कहा जा सकता है कि वह सुंदर और पूर्ण तभी है जब उसे हृदय ने स्वीकार किया है और आचरण ने अपनाया है। बुद्धि पर बलपूर्वक थोपा गया धर्म भावनाओं पर अपना बुरा प्रभाव ही दिखा पाता है और फिर उस धर्म का, जीवन से मिलने पर जो सौंदर्य दिखना चाहिए, वह नहीं दीख पड़ता।



समाज के विभिन्न पहलुओं पर दृष्टि डालने के बाद हम यह भी देखते हैं कि एक ही जाति के सदस्यों में ही स्नेह नहीं रहा। उनमें मेल-जोल, दुःख-सुख का आदान-प्रदान क्रमशः समाप्त होता जा रहा है। इससे समाज में दूरियाँ तो बढ़ ही रही हैं, वैर भाव भी लोगों के मन में पल रहे हैं।



संस्कृतियों के प्रभाव का अवलोकन करते हुए हम पाएँगे कि जिस तरह किसी धर्म का मानव पर सही प्रभाव डालने के लिए उसके हृदय में स्थान बनाना आवश्यक है, वैसे ही संस्कृति के लिए भी मानव-मन पर छाप छोड़ना आवश्यक है। जिन-जिन संस्कृतियों ने हम पर आक्रमण कर अधिकार जमाने का प्रयास किया, वे यहाँ अधिक समय तक नहीं टिक पायीं। परंतु पाश्चात्य संस्कृति यहाँ टिकने में सफल हो गई, क्योंकि वह एक मैत्रीपूर्ण ढंग से यहाँ आई। युद्ध जैसे रूखे तरीके को न अपना उसने सामाजिक संस्थाओं द्वारा यहाँ के जन-जीवन के हृदय में प्रवेश किया। आज हमारे भारतीय समाज पर दो तहें हैं, उसके प्राचीन मूल्य और पाश्चात्य संस्कृति के भिन्न विचार। हमारी संस्कृति के ऊँचे सिद्धान्तों और पाश्चात्य सभ्यता के भौतिकवाद की रस्साकशी में यह समाज जर्जर हुआ जा रहा है। यहाँ अर्थ-विभाजन सम नहीं है और स्त्री की दशा शोचनीय है। “केवल शक्ति से शासन हो सकता है, समाज नहीं बन सकता” जिसकी स्थिति मनुष्य के स्वच्छंद सहयोग पर निर्भर है।



हमारे देश और समाज की यह विडंबना है कि संसार के सबसे उच्चकोटि के सिद्धान्तों के होते हुए भी हम आज पिछड़े हैं। जब सुविधा के सभी उपकरण उपलब्ध हों तो कार्य पूरा करने में कैसी कठिनाई? कठिनाई तब है जब कार्य पूरा करने की कला न आती हो। हमें अपने ही अमूल्य सिद्धान्तों का सदुपयोग कर जीने की कला नहीं आती, तो ये सिद्धान्त हम पर बोझ क्यों न बनें?



पूरा देश जीने की इस कला से अनभिज्ञ है और इसका परिणाम सबसे अधिक महिलाओं ने सहा है। हमारे देश की महिलाएँ दूसरे देश की महिलाओं से कहीं अधिक त्यागमयी और सहनशील हैं। परंतु दोष यही रह गया कि वे जीवन की कला नहीं समझ पायीं और समाज उसी का लाभ उठा रहा है। बचपन से कन्या पति के घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों से अवगत होने में लग जाती है, पराई अमानत कहलाती है। विधवा हो जाए तो जीवन-भर की मुसीबत तो है ही, यदि पति दुराचारी हो तो भी उसके साथ सात जन्मों की प्रार्थना करने को बाध्य है। पुरुष-प्रधान समाज के सिद्धान्तों के अनुसार स्त्री को अपनी पवित्रता का प्रमाण भी देना होगा और हर नारी यदि सीता की भाँति अग्निपरीक्षा से गुजरे तो इसमें आश्चर्य ही क्या है? सिद्धान्तों का असली अर्थ समझ लिया जाए वही बहुत है, उन्हें स्वयं पर लागू करना दूर की बात है। यह जानना बहुत ही असामाजिक व अमानवीय प्रतीत होता है कि पुरुष स्वयं स्वतंत्रता की कामना करता है, लेकिन स्त्री से कठिन बंधनों में जकड़ी रहने की अपेक्षा करता है।



परिस्थिति का उत्तरदायित्व स्त्री पर भी आता है, क्योंकि युगों से सिद्धान्तों का भार ढोने वाली महिला ने कभी जीने की कला की ओर अपनी जिज्ञासा जागृत नहीं की। वह आज भी मूक-भाव से यंत्रणा सह रही है, परंतु उसकी इस सहनशीलता की हम प्रशंसा नहीं कर सकते, ठीक उसी तरह से जैसे कि एक मृत शरीर लाख ठोकर भी सह सकता है, लेकिन उसकी सहनशक्ति प्रशंसनीय नहीं है।



आवश्यकता आज आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों पक्षों को मजबूत करने की है। तुला में तब तक संतुलन है जब तक मात्रा-भार दोनों और समान है। मनुष्य सौहार्दपूर्ण जीने की कला सीखे तो प्रगति मार्ग अवश्य खुलेगा, सिद्धान्तों की सही रूप में पहचान भी तभी हो पाएगी। “जीवन का चिह्न केवल काल्पनिक स्वर्ग में विचरण नहीं है, किन्तु संसार के कंटकाकीर्ण पथ को प्रशस्त बनाना भी है।“



महादेवी वर्मा अपनी कृति “श्रृंखला की कड़ियाँ” में जहाँ सामाजिक परिस्थितियों पर प्रकाश डाल कर समस्याओं को जता, उनके समाधानों की ओर इंगित करती हैं, वहीं वह यह भी बताती हैं कि स्वयं नारी होकर नारी जागरण और सुधार के विषय में उनके विचार पुरुष समाज के प्रति उग्र हो सकते हैं, लेकिन वे विध्वंसात्मक नहीं हैं। “अन्याय के प्रति मैं स्वभाव से असहिष्णु हूँ, अतः इन निबंधों में उग्रता की गंध स्वाभाविक है, परंतु ध्वंस के लिए ध्वंस के सिद्धान्त में मेरा कभी विश्वास नहीं रहा।“



प्रगतिशीलता के इस युग में समाज को अपनी भौतिक प्रगति के साथ आत्मा के उत्थान पर भी ध्यान देना चाहिए। जहाँ नारी जागरण के प्रति शिक्षित महिलाओं के कई कर्तव्य हैं, वहाँ पुरुषों से भी सहयोग और समझदारीपूर्ण भूमिका की अपेक्षा की जाती है। बीसवीं शताब्दी के पूर्व में महादेवी वर्मा द्वारा लिखित इस कालजयी कृति के शब्द-शब्द को हम वर्तमान समाज में चरितार्थ होते देख रहे हैं। संक्षेप में “जब तक बाह्य तथा आंतरिक विकास सापेक्ष नहीं बनते, हम जीना ही नहीं जान सकते।“


September 25, 2008

“ विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो स्त्री इतनी दयनीय न रहेगी ” भाग २

“ विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो स्त्री इतनी दयनीय न रहेगी ” --- –महादेवी वर्मा सुप्रणीति वरेण्या

पिछले अंक से आगे (भाग-२)

वर्ग की नारियों को महादेवी तीन वर्गों में बाँटती हैं : पहली वे, जिन्होंने राजनैतिक आंदोलनों को बढ़ाने के लिए पुरुषों की सहायता की, दूसरी वे, जो समाज की त्रुटियों का समाधान न पाकर अपनी शिक्षा व जागृति को ही आजीविका का साधन बना लेती हैं और तीसरी वे सम्पन्न महिलाएँ जो थोड़ी- सी शिक्षा के रहते पाश्चात्य शैली की सहायता से अपने गृहजीवन को नवीन रंग देती हैं।आधुनिक महिलाओं को प्राचीन विचारों में जकड़ा पुरुष अवहेलना की दृष्टि से देखता है और जो आधुनिक सोच रखते हैं, वे भी समर्थन करके कोई क्रियात्मक सहायता नहीं करते और उग्र विचारधारा रखने वाले प्रोत्साहन देकर भी उन्हें अपने साथ ले चलने में झिझकते हैं।

महादेवी के अनुसार आधुनिक नारी जितनी अकेली है, उतनी प्राचीन नारी नहीं, क्योंकि “उसके पास निर्माण के उपकरण-मात्र हैं, कुछ भी निर्मित नहीं।“जिन महिलाओं ने राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लिया, बलिदान – त्याग किए, जागृति की ओर बढ़ीं, उन्हें स्त्री के दुर्बल प्रतीत होते रूप को किसी सीमा तक समाप्त करने में सफलता मिली। परंतु इन आंदोलनों में शिक्षिताओं के साथ अनेक अशिक्षिताएँ भी थीं, जिनके बौद्धिक विकास पर किसी का ध्यान ही नहीं गया। शायद यहीं जागृति फैलने से मिले मधुर फल में कड़वाहट भी आ गई क्योंकि इन आंदोलनों से उपजी कठोरता उनके बाह्यजीवन के साथ उनके गृहजीवन को भी प्रभावित करने लगी।स्त्रियों को कठोर परिस्थितियों का सामना करने के लिए कठोरता अपनानी पड़ी और इससे उनकी कोमलता नष्ट हो गई। जो स्त्रियाँ विचारशील न थीं उन्हें अपने स्त्रीत्व पर कम और संघर्ष तथा विद्रोह पर अधिक भरोसा था। संघर्ष मानव के आदिकाल से ही चला आ रहा है। इतने युगों में यदि मानव द्वारा कुछ सीखा न गया है, तो वह है जीने की कला। जिसको सीखकर एक व्यक्ति का जीवन पूर्ण है, परंतु उसके बिना केवल एक संघर्षपूर्ण जीवन अपूर्ण ही है। नाश करते संघर्ष से स्वयं को बचा, विकास के लिए संघर्ष की ओर बढ़ना ही जीने की कला है।प्रगति के दौरान विपरीत परिस्थितियों को भी अपने अनुकूल बनाना पड़ता है, किंतु सामाजिक जीवन में विविधताएँ हैं और इन्हीं के कारण महिला कभी समय-समय पर उन्हें अपने अनुकूल नहीं बना पाई। इस युग की महिला की दृष्टि भी वातावरण तथा परिस्थिति नहीं देख पा रही, जबकि मार्ग में कई बाधाएँ हैं। अपने गृह बंधनों के विरुद्ध कदम उठाती आधुनिक महिलाएँ बाहर त्याग और बलिदान के लिए प्रस्तुत थीं।

घर में उनसे त्याग की माँग भी हद पार कर गई और वे भी समझ गईं कि इस अस्वेच्छा से किए गए त्याग को कभी दान का सम्मान नहीं मिलेगा।स्त्री समाज की समस्याओं का हल निकालने की जिम्मेदारी आज की शिक्षित स्त्री पर है। स्त्री द्वारा विरोध को भावी समाज के बेहतर अस्तित्व के लिए अपना लक्ष्य बनाना और पुरुष द्वारा समझौते को अपनी पराजय समझना, दोनों ही हानिकारक हैं। नारी को क्रांति के लिए एक स्वस्थ सृजन में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए, ध्वंस में नहीं।’घर और बाहर’ की समस्याओं और परिस्थितियों का अवलोकन करते हुए महादेवी समय के साथ बदली स्थितियों पर नज़र डालती हैं। पहले घर की दीवारों में स्त्री का बंद होना निश्वित था, आज वहाँ थोड़ा सुधार है। आज महिलाओं के लिए बाहर का कार्यक्षेत्र भी उतना ही आवश्यक बन गया है।

आज शिक्षित महिलाएँ घर और बाहर के जीवन में सामंजस्य बिठाने का प्रयत्न कर रही हैं। ऐसी शिक्षित महिला का मिलना आज दुर्लभ है जो केवल घर के कामकाज कर संतुष्ट हो। आज की युवा पीढ़ी वर्षों से चले आ रहे

रीति-रिवाज़ों पर भी प्रश्न उठाती है, तर्क और उपयोगिता के संदर्भ में सफल प्रमाणित बात पर ही विश्वास करती है। इसी तरह सदा घर में बैठकर काम करती महिला की छवि पर भी प्रश्नचिह्न लग गए हैं और शिक्षित महिलाओं ने इसे अस्वीकार कर बाह्य जगत में भी अपनी कार्य कुशलता का सुंदर परिचय दिया है। ऐसे समय में महिलाओं को इस घर-बाहर के द्वन्द्व में सामंजस्य बिठाने में समय लगेगा।घर के वातवरण में ठहराव और निश्चयता तब है जब गृहिणी की परिस्थिति समझी जाए और उसके साथ सहानुभूति रखी जाए। बाहर समाज के वातावरण में भी तभी तक सामंजस्य है जब तक स्त्री-पुरुषों के कर्तव्यों में सामंजस्य है।

वर्तमान काल में कई क्षेत्र स्त्री-सहयोग की उतनी ही अपेक्षा रखते हैं जितनी पुरुष के सहयोग की। कई ऐसे भी क्षेत्र हैं जहाँ पुरुष के सहयोग से अधिक स्त्री की स्नेहपूर्ण सहानुभूति की आवश्यकता है। उनमें से एक कार्यक्षेत्र शिक्षा का है जहाँ कितने ही बच्चों को विद्यार्जन का सुअवसर मिलता है। विद्यालयों में कठोर और निष्ठुर मास्टरों और अनुभवहीन कुमारियों के व्यवहार से बच्चों के सुकोमल मन पर जितना बुरा असर पड़ता है, वहीं एक समझदार सुलझी शिक्षित स्त्री अपने स्नेह से उनके उज्ज्वल भविष्य की नींव रख सकती है।

बच्चों की मानसिक शक्तियाँ स्त्री के मातृत्व स्नेह से अधिक परिपूर्ण होती हैं।मनुष्य को सामाजिक प्राणी होने के नाते, समय-समय पर अपने स्वार्थ को भुलाकर समाज के लाभ के बारे में भी सोचना पड़ता है। समाज के प्रति सहयोगपूर्ण दृष्टिकोण रखने का गुण बचपन में ही पैदा होता है। यदि बच्चे को अन्यों से अलग-थलग कर रखा जाए तो वह अवश्य ही आगे चलकर स्वार्थी और आत्मकेंद्रित बन जाएगा। तभी बड़े आदमियों के बच्चों में यह नैसर्गिक गुण नहीं पैदा होता। उन्होंने बचपन में दूसरे बच्चों के साथ धूल-मिट्टी, हवा का आनंद ही नहीं लिया होता, फिर उनमें वह भाव कैसे उत्पन्न हो जो सामान्य बच्चों में एक-दूसरे के लिए और भविष्य में समाज के लिए पैदा होता है।माता का स्वाभाविक स्नेह भी सीमित नहीं होना चाहिए कि वह मात्र अपनी संतान के लिए स्नेहमयी बनी रहे और दूसरी स्त्री की संतान के प्रति निष्ठुर।

किशोरावस्था में कदम रख चुकी कन्याओं की शिक्षा के लिए ऐसी अनुभवी महिलाओं की आवश्यकता होगी जो उन्हें गृहस्थ जीवन और गृहिणी के गुणों के बारे में उचित शिक्षा दे सकें। आजकल शिक्षा के क्षेत्र में अनेक ऐसी महिलाएँ उतर आयी हैं जो अपनी संस्कृति और गृह-जीवन से अनभिज्ञ हैं। फलस्वरूप विद्यार्जन करती युवतियों को अविवाहित जीवन अधिक आकर्षक लगता है (जिसका आकर्षण असली रूप में उतना सुंदर नहीं है)। वे अपने स्वच्छंदता के स्वप्न को समाप्त नहीं करना चाहतीं।

कोई भी पुस्तक उन्हें गृहस्थ जीवन के सच्चे रूप का उतना दर्शन नहीं करा सकती जितना एक महिला का जीता-जागता उदाहरण।आजकल ऐसी शिक्षित महिलाएँ कम मिलती हैं जो घर के लिए उतनी ही उपयोगी सिद्ध हों जितना वे बाहर कार्यक्षेत्र में होती हैं, लेकिन यह कथन सत्य है कि समाज ने उनकी शक्तियों को नष्ट करने की भरपूर कोशिश की है। यदि शिक्षा जैसे विभिन्न विषयों में वे कार्यरत हैं तो घर उन्हें स्वीकार नहीं करता। वे कार्य तभी कर सकती हैं जब आजीवन संतान और गृहस्थी के सुख के बारे में सोचें तक नहीं।

विवाह के बाद पुरुष की प्रतिष्ठा की दर्शिनी बनने वाली महिला अपनी इस बेढंगी छवि से आहत है, यह स्वाभाविक भी है। इसी तरह के कितने ही कारणों का परिणाम है कि आज की युवतियाँ विवाह से विरक्त हो रही हैं। आधुनिक और शिक्षित महिला अच्छी गृहिणी नहीं बन सकती, यह एक ऐसी धारणा है जो पुरुष ने स्वयं को केंद्र में रख कर बना दी है, स्त्री की कठिनाइयों पर ध्यान देकर नहीं। पुरुष के जीवन में विवाह के बाद भी कोई परिवर्तन नहीं आता, उसकी दिनचर्या, घर, मित्र सभी कुछ पूर्ववत्‌ रहता है। किंतु इन सबके विपरीत स्त्री को अपना सब कुछ छोड़ यहाँ तक कि पैतृक निवास भी, अपने आपको पुरुष की इच्छानुसार उसकी दिनचर्या में ढालना पड़ता है।

शिक्षित स्त्री को मैत्री के लिए भी शिक्षित स्त्रियाँ कम मिलती हैं और इस तरह उनके जीवन में एक अभाव-सा रह जाता है। अच्छी गृहिणी बनने के लिए उसे कुछ नहीं करना, बस, पति की इच्छानुसार काम करना है और जब पति खाली हो तो उसे खुश रखना है, लेकिन क्या इससे उस स्त्री का अभाव पूरा किया जा सकता है?ऐसी पढ़ी-लिखी महिलाओं के अभावों को पूरा करने के लिए उन्हें बाहर भी काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। इस घर-बाहर की समस्या का समाधान निकालना आवश्यक है, अन्यथा उसके मन की उथल-पुथल घर की शांति और समाज का स्वस्थ वातावरण ही नष्ट कर देगी।

स्त्रियों की उपस्थिति बाहर भी उतनी ही आवश्यक है जितनी घर में और इसलिए उन्हें एक ही सीमा में नहीं बाँधा जा सकता।शिक्षा के क्षेत्र के बाद महादेवी चिकित्सा के क्षेत्र में स्त्रियों की आवश्यकता का अवलोकन करती हैं। पुरुष यदि चिकित्सक हो तो उसकी व्यावसायिक बुद्धि ही काम करेगी, लेकिन यदि महिलाएँ इस क्षेत्र में उतरें तो रोगियों को आधे से अधिक मर्जों की दवा मिल जाएगी। उन्हें स्नेह और सहानुभूति महिलाएँ ही दे सकती हैं। कानून जैसे विषय में भी महिलाओं की स्थिति अनिवार्य ही है। यदि वे इस क्षेत्र में बढ़ें तो समाज में महिलाओं की स्थिति और आवश्यकताओं पर भी ध्यान दिया जा सकेगा। इतनी संख्या के वकीलों-बैरिस्टरों से जो संभव नहीं है, वह स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती चंद महिलाओं से संभव है।पुरुषों का यह कथन कि अधिक पढ़ी-लिखी महिलाओं से उन्हें विवाह करते डर लगता है, हास्यास्पद होने के साथ-साथ उनके अहम्‌ और स्वार्थ का दर्पण है।

यदि अनपढ़ या पुरुष के कार्यक्षेत्र के विषय में जरा भी जानकारी न रखने वाली महिला उसी पढ़े-लिखे, ऊँची पदवी के पुरुष से विवाह करने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाती तो पुरुष को क्यों डर लगता है? इसका कारण यह है कि उसे सदा भय रहता है कि भावी पत्नी मूकभाव से उसका अनुसरण नहीं करेगी, शिक्षित और आवश्यक जानकारी रखती महिला उसके आचरण पर प्रश्न उठा सकती है। तभी पुरुषों का मन उस कल्पना से ही सिहरता है और उनका अहम्‌ डरता है।बालकों की प्रगति में संलग्न संस्थाएँ चलाने, स्त्री संगठन बनाने और स्त्रियों को स्थतियों से परिचित कराने के कार्य का भार आज स्त्री के ऊपर है और निश्चय ही केवल वही इन्हें सुचारु रूप से पूरा कर सकती है। जब बाहर इतने आवश्यक कार्यभार उसकी प्रतीक्षा कर रहे हों तब उससे घर में बैठे रहने की अपेक्षा करना मूर्खता है। यह एक और मूर्खता है कि यह आशा रखी जाए कि बाहर काम करती स्त्री घर से सन्यास ले ले।

उन्हें घर-बाहर दोनों स्थानों पर कार्य करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।इस सोच को कि संतान पालन के लिए स्त्री का घर होना आवश्यक है, महादेवी एक भ्रांति सिद्ध करते हुए बताती हैं कि कार्यरत महिलाओं की संतान घर बैठी महिलाओं की संतान से अधिक प्रखर हैं और साथ में कामकाजी महिलाएँ शाम को घर लौट कर संतान को गोद में ले खेलती हैं, वहीं यह गुण थके माँदे घर लौटे एक पुरुष में नहीं देखा जाता। मूलरूप में यदि “विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो निश्चय ही स्त्री इतनी दयनीय न रह सकेगी।“साहित्य एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ स्त्री घर बैठे ही उन्नति कर सकती है। यह बहुत चकित कर सकता है कि जहाँ पुरुषों के कमरे पुस्तकों से भरे होते हैं, वहाँ महिला की अपनी दस पुस्तकें भी नहीं होतीं। संभवतः इसलिए कि उन्हें पुस्तकों के लिए उचित नहीं माना जाता, फिर यह भी कि घर के कामकाज में जुटी औरत की रुचि कभी इस ओर बढ़ी ही नहीं। साहित्य जैसे क्षेत्र में घर बैठे स्त्रियाँ बालकों के लिए भी बहुत कुछ कर सकती हैं। बाल-साहित्य में उनके हाथ अनुभवी प्रमाणित हो सकते हैं, क्योंकि बच्चों के मनोविज्ञान को एक माता के अलावा शायद ही कोई ठीक से समझ पाए।इन क्षेत्रों में स्त्रियों को कुछ करने देने के लिए पुरुषों को उदार होना पड़ेगा, क्योंकि इनमें स्त्रियों की आवश्यकता जब-तब पड़ती रहेगी और कदाचित्‌ स्त्री को भी पुरुष के समान सामाजिक कोण और आयाम स्थापित करने का पूरा अधिकार है।भारत में नारी की स्थिति ने दयनीय रूप ले लिया है। यह एक ऐसा अजीब देश है, जहाँ इस क्षेत्र में दूसरे देशों की तरह प्रगति नहीं पतन हुआ है। आज दूसरे देशों में नारियों ने पुरानी रीतियों को तोड़ कर एक स्वतंत्र जीवन शुरू किया है, जबकि भारत में वही स्थिति बरकरार है। घर के लोग पुत्री के विवाह की चिंता उसके जन्म से ही करने लगते हैं, उसके विवाह के समय बड़ी से बड़ी रकम देते हैं।

यह समस्या भारत में इसलिए है क्योंकि यहाँ के लोगों को महिला की आजीविका का इससे सरल उपाय नहीं मिलता। यदि विवाह के बाद स्त्री स्वावलंबी बन कर रहे तो विवाह जीवन का सुंदर पड़ाव बन जाए। वैदिक काल की चर्चा करते हुए महादेवी बताती हैं कि उस काल में आर्य-पुरुष ईश्वर से उत्तम संतान की कामना करते थे और स्त्री उस समाज का एक बहुत सम्मानित और महत्वपूर्ण अंग थी। हर स्त्री इतनी आदरणीय थी कि उँचे से ऊँचे कुल के पुरुष किसी भी वर्ण या कुल की स्त्री को पत्नी स्वीकार कर सकते थे। समय के साथ नीचे कुल की कन्याओं से विवाह के पश्चात्‌ उनके परिवार से कुल में अंतर होने के कारण, दूरी बनाने के लिए यह विधान उभरने लगा की माता-पिता पुत्री के विवाह के बाद दामाद के घर जाना उचित न समझें। आज उसी का रूप हम एक विकृत प्रथा में देखते हैं, जहाँ “बेटी के घर का पानी” तक नहीं पिया जाता।आज दूसरे देशों में स्त्री-पुरुष दोनों ही जीवन-साथी चुनने में पूरी तरह से स्वतंत्र हैं।

भारत में भी प्राचीनकाल में ऐसी ही व्यवस्था थी, जब नारी को अपनी इच्छा से ब्रह्मचारिणी का जीवन चुनने का अधिकार था और एक राजकन्या भी एक ऋषि का वरण कर सकती थी। यूरोप के देशों में कुछ वर्ष पहले तक स्त्री एक पशु के समान थीं, परंतु क्रांतियाँ उलट-फेर करने में सक्षम हैं और वही हुआ। लेकिन भारत के सामान्य पुरुष की सोच आज भी यही है कि आँगन में बँधे पशु और घर की स्त्री में कोई अंतर नहीं है और इसलिए स्त्री के मन और शरीर पर उसका पूरा अधिकार है।कुछ लोगों का मानना है कि स्त्री स्वावलंबी बनने पर विवाह नहीं करेगी और इस तरह दुराचार बढ़ जाएगा।

यदि यही सत्य है तो जिन देशों में स्त्रियाँ स्वतंत्र और स्वावलंबी हैं, वहाँ तो विवाह जैसी संस्था का नामोनिशान ही मिट जाना चाहिए था! हमारे यहाँ तो कन्या की शिक्षा के लिए खर्च करना घरवालों से सहन नहीं होता। स्त्री पुरुष के अधिकार से बाहर न चली जाए इसलिए उसके लिए एक ही विद्या प्राप्त करना उपयुक्त है – मनोरंजन विद्या। कभी भारतीय पत्नी अपने देश के लिए गौरव का कारण थी, आज वह एक विडंबनामात्र है।आरंभ से ही नारी ने शारीरिक बल (पशुबल) में अपने को पुरुष से हेय पाया और साथ ही पुरुष की बाहरी कठोरता के अंदर छिपी कोमल भावनाओं को भी उसने ढूँढ लिया। इस खोज के बाद से नारी ने पुरुष के समक्ष अपने बल या विद्या के प्रदर्शन का विचार छोड़ दिया, क्योंकि इससे तो प्रतिद्वन्द्विता उपजती और वैसी स्थिति में केवल हार-जीत संभव है, आत्मसमर्पण नहीं।

इसलिए उसने अपने स्त्रीत्व और रूप के बल पर पुरुष को चुनौती दी और इसमें नारी की जीत हुई। उसकी यह जीत लगातार चलती रही; क्योंकि उसके पास वह था जो पुरुष के जीवन में कोमलता और सरसता भर सकता था। परंतु प्रेयसी होने के साथ-साथ नारी का कर्तव्य और भी बढ़ गया, क्योंकि उस पर मातृत्व का भी भार आ गया। एक स्नेहिल मातृत्व का कर्तव्य निभाते-निभाते वह धीरे-धीरे अपने रमणीत्व को भूल गयी, क्योंकि नारीत्व के विकास के लिए संतान साध्य है और रमणीत्व साधन-मात्र है।पुरुष ने नारी के इस माता के रूप का आदर किया, अर्चना भी की, लेकिन उसे आत्मतुष्टि नहीं मिली।

उसकी इच्छा हुई कि वह आजीवन ऐसी स्त्री के साथ रहे जो सदैव प्रेयसी बनकर मनोंजन करती रहे। उसके इस असंतोष का परिणाम है कि आज बाजारों में ऐसी स्त्रियाँ मिल जाती हैं जो केवल एक रमणी की भूमिका निभा सकती हैं, दूसरे शब्दों में पुरुषों का मनोरंजन कर सकती हैं। उन स्त्रियों में मोहकता है, स्थायित्व नहीं। उनके नारीत्व का ध्येय दूसरों का मनोरंजन है। स्त्री पत्नी के रूप में पुरुष के जीवन को और सरल और सुंदर बना सकती है, परंतु मातृत्व में उत्तेजना नहीं है जबकि पुरुष उत्तेजना की कामना करते हैं, जिसे पाकर वे कुछ समय तक बेसुध हो जाएँ। अपने नारीत्व को बाजार में बेचती स्त्रियों के हृदय के मर्म को पुरुष ने कब समझा? और समझने की आवश्यकता भी उसे कब लगी? जीवन-भर इस क्रय-विक्रय में लीन स्त्री अपनी सभी कोमल भावनाओं तथा आत्मसमर्पण की इच्छाओं को कुचल कर रख देती है और अंत में भी उसे एकाकी दुःख ही मिलता है।

इन स्त्रियों को केवल भावुकता के दृष्टिकोण से न देखकर यथार्थ को समझने के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी देखना होगा। कुछ लोगों का कहना है कि हर स्त्री – समुदाय में ऐसी स्त्रियाँ मिल जाएँगी जो मातृत्व के भार से बचकर स्वतंत्र जीवन बिताना चाहती हैं और कुछ का कहना है कि कितने ही पुरुषों को मनोरंजन करने के लिए ऐसी स्त्रियों की आवश्यकता रहेगी; परंतु यह विचारणीय है कि क्या किसी सामाजिक प्राणी को अपनी आवश्यकता के लिए दूसरे के स्वत्व को कुचलने का अधिकार है?इतने बलिदान करती और दुःख सहती ऐसी स्त्री फिर भी समाज में पतिता मानी जाती है लेकिन इन स्त्रियों में और चुपचाप पति का घर संभालने पर देवी कहलाने वाली मानवी में स्थिति के संकट के अलावा क्या अंतर है? यदि प्रेम और त्याग कर एक विवाहिता अमर बन सकती है तो एक मजबूर महिला के लिए भी यह काम असंभव नहीं। यह तो समाज है जो उसके काम में रुकावट डाल देता है। समाज ने कुष्ठ रोगियों और विक्षिप्तों के लिए भी आश्रम-चिकित्सालय बनाए, परंतु इन पतिता कही जाने वाली स्त्रियों के कल्याण के बारे में कभी नहीं सोचा। इनके मन को भी किसी के स्नेह की आवश्यकता है। दिखावटी मुसकान सजा कर शरीर के साथ अपनी आत्मा बेचती महिलाओं को खरीदने वाले इनकी हत्या नहीं कर रहे तो क्या कर रहे हैं? इतिहास साक्षी है कि इस प्रथा के चलन में गिरावट नहीं आई है, क्योंकि मदिरा से कभी प्यास नहीं बुझती।

पुरुष की इस पशुता को जैसे-जैसे भोजन मिला वह और बलशाली होकर अधिक भोजन की अपेक्षा रखने लगा। यदि कोई ऐसी स्त्री मिल भी जाए जो ऐसे व्यवसाय में अपना अपमान न मानती हो तो इसका अर्थ है कि अवश्य ही उसके जीवन में कोई ऐसी घटना घट चुकी है जो उसके हृदय के समूचे स्नेह को उड़ा ले गई, जिससे उसका हृदय जीवन के प्रति इतना निष्ठुर है। इन स्त्रियों के प्रति जो घृणा हम देखते हैं, वह बाहरी है, दिखावटी है, जब-तब समाज अपनी लालसा बुझाने के लिए इन्हीं स्त्रियों की सहायता लेता है, अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान बचाने के लिए निंदा भी इन्हीं की करता है।

“समाज पुरुष-प्रधान है, अतः पुरुष की दुर्बलताओं का दंड उन्हें मिलता है, जिन्हें देखकर वह दुर्बल हो उठता है।“ इस तरह स्त्रियों को दोहरा दंड मिलता है। उनके सपने भी धरे रह जाते हैं और उनके ही सभी सामाजिक अधिकार भी खो जाते हैं। दूसरी ओर पुरुष का चारित्रिक पतन उसके सामाजिक अधिकारों में कटौती नहीं लाता, उसे गृह जीवन से भी निर्वासन नहीं मिलता। वह उँचे से ऊँचे पद पर विराजमान हो सकता है और स्वयं पतित व दुराचारी होकर भी एक सती स्त्री के जीवन पर, चरित्र पर कीचड़ उछाल सकता है। महादेवी वर्मा स्त्री के शरीर-व्यवसाय संबंधी विषय पर इस टिप्पणी से अपनी बात पूरी करती हैं कि “जब तक पुरुष को अपने अनाचार का मूल्य नहीं देना पड़ेगा, तब तक इन शरीर व्यवसायिनी नारियों के साथ किसी रूप में कोई न्याय नहीं किया जा सकता।“

September 24, 2008

“ विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो स्त्री इतनी दयनीय न रहेगी ”

“ विवाह सार्वजनिक जीवन से निर्वासन न बने तो स्त्री इतनी दयनीय न रहेगी ” --- –महादेवी वर्मा सुप्रणीति वरेण्या
(भाग-१)
स्त्री-पुरुष, दोनों ही समाज के मुख्य अंग हैं। यह बहुत आश्चर्य में डाल सकता है कि स्त्री-पुरुष दो ऐसी आत्माएँ हैं जिनमें मात्र शरीर-संरचना में ही अंतर है। परंतु यही शरीर-संरचना उनके मानसिक विकास पर सबसे अधिक प्रभाव डालती है। स्त्री में कोमलता स्वभाववश ही पैदा होती है। इससे ही स्त्री की दशा आज दुविधाजनक है, यह कथन पूर्णतया उचित नहीं, परन्तु अनुचित कहना सत्य भी नहीं। समय ने ऐसी विषमता खड़ी कर दी है कि उसने स्त्री की इस स्वभाववश उत्पन्न कोमलता को स्थान-स्थान पर उसकी कायरता, उसकी कमज़ोरी बना दिया है। दुर्भाग्य यह है कि भारतीय नारी ने उसे विधि का विधान मानकर चुपचाप स्वीकार कर लिया है।भारतीय समाज में स्त्री की महत्ता का अवमूल्यन चिंतनीय है। वह अब भी हर घरेलू काम के लिए विवश है। आज भी उसे सिर ढँकना पड़ता है। आज भी उसे ससुराल की इच्छानुसार धनादि की आपूर्ति न करने पर प्रताड़ना सहनी पड़ती है, मृत्यु तक के लिए विवश होना पड़ता है। आज भी विवाहादि के समय कोई अनिष्ट होने पर मिथ्याओं में विश्वास करने वाले समाज के उलाहने जीवनभर सुनने पड़ते हैं। थोड़े शब्दों में, आज भी स्त्री का महत्व पशु के ऊपर आँका जा रहा है, इतना भी नहीं कहा जा सकता।महिलाओं के लिए दुर्भाग्य का विषय है कि उन्हें ’मानवी’ छोड़, समाज ने बहुत कुछ माना।
वे कभी देवी बनकर पूजनीय वस्तु मान ली गईं, कभी नरक का द्वार। परन्तु यह समझने योग्य बात है कि वह पुरुष कितना कमज़ोर होगा जो एक स्त्री के संपर्क मात्र से नरक में ढकेला जा सकता है।जब समाज में कहीं कुछ ऐसा घटित हो रहा हो, जिसकी उपस्थिति नाशकारी है तो संभवतः समाज के उस भाग को जो इससे अवगत नहीं है, अवगत कराने के लिए स्वतः ही क्रांतिकारी विचारों वाले व्यक्तियों का प्रवेश हो जाता है। स्त्री की इस दुर्दशा का विषय हम सभी से अछूता नहीं रहा है। हम सभी इन परिस्थियों से अवगत हैं और इन विपरीत परिस्थियों के विरुद्ध कई लोग कई प्रयास कर चुके हैं। इन प्रयासों के बारे में बात करते समय महादेवी वर्मा जैसे व्यक्तित्व के बारे में भूल जाना सर्वथा अनुचित होगा।महादेवी वर्मा की स्त्री के सशक्तीकरण के विषय में बहुत महती भूमिका रही है।

’श्रृंखला की कड़ियाँ’ उनके इस कार्य का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह पुस्तक उनके विचारों से ओत-प्रोत है और वे निस्संदेह इस विषय को नए आयाम देने और सोच के लिए नए प्रश्न उठाने में अग्रणी व सफल रही हैं।’श्रृंखला की कड़ियाँ’ पाश्चात्य और पूर्वी समाज की कमज़ोरियों, कमियों व नारी की दशा तथा समस्याओं पर प्रकाश डालती है। आरंभ में ’अपनी बात’ को संक्षेप में यह कहकर वे निष्कर्ष देती हैं कि भारतीय नारी की मूल समस्या असंतुलन है। उसमें कहीं असाधारण दीनता है और कहीं असाधारण विद्रोह। ’श्रृंखला की कड़ियाँ’ का प्रकाशन पुस्तक रूप में १९४२ ई० में हुआ, जबकि इसमें सम्मिलित विविध आलेख १९३१, १९३३, १९३४, १९३५, १९३६ तथा १९३७ में लिखे जा चुके थे और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से चर्चा का विषय बन चुके थे।महिलाओं का स्वभाव अधिक कोमल होता है। प्रेम और घृणा जैसे भाव अधिक स्थायी रूप में उनके हृदय में वास करते हैं।

महादेवी इसे स्पष्ट करके कहती हैं कि नारी की इन्हीं विशेषताओं से उनका व्यक्तित्व समाज के उन अभावों की पूर्ति करता है जो पुरुष द्वारा संभव नहीं। दोनों की प्रकृति पूर्णतया विपरीत है। उन विशेषताओं की अनुपस्थिति समाज में ऐसे रिक्त स्थान उत्पन्न कर देगी जो अन्यथा नहीं भरे जा सकते। प्राचीनकाल में समाज का स्त्री के प्रति स्नेह और सम्मान प्रकट करना इसका द्योतक है कि नारी समाज का महत्वपूर्ण और आदरणीय अंग थी। आर्य नारी ने वैदिक काल में कभी सहधर्मिणी के रूप में पति का अंधानुसरण किया हो, ऐसे प्रमाण नहीं मिले हैं। वे कहती हैं, “छाया का कार्य आधार में इस प्रकार अपने आप को मिला देना है, जिससे वह उसी समान जान पड़े और संगिनी का अपने सहयोगी की प्रत्येक त्रुटि को पूर्ण कर उसके जीवन को अधिक से अधिक पूर्ण बनना “।

“स्त्री सहधर्मिणी से अधिक पुरुष की छाया है”, यह सोच शायद किसी अशांत वातावरण की देन है, जिसने पुरुष की इस आपत्तिजनक धारणा को भी सिद्धान्त का रूप दे दिया। साथ ही स्त्री ने अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को भुला कर अपने विवेकशक्ति खो दी। उसे अपनी सफलता - असफलता पुरुष की संतुष्टि में दीखने लगी, और इसी कारण-वश, जहाँ स्त्री माता या पत्नी के रूप में गौरवान्वित होती थी, वहीं उसे जीवन उदेश्यहीन तथा पिंजड़े- सा लगने लगा। ऐसे समय में उसे लगा कि ऐसी समस्या का निवारण तब होगा जब वह भी पुरुष के समान बने। परिणामस्वरूप उसने व्यक्तित् ें एक टेढ़ेपन को लाने की कोशिश की, जिसके कारण वह पुरुष समान कठोर बन गई। परंतु स्त्री के मधुर व्यक्तित्व का लोप हो गया। इसी से आज की विद्रोहशील नारी अधिक कठोर, निर्मम, स्वाधीन, स्वच्छन्द परंतु अपनी “निर्धारित रेखाओं की संकीर्ण सीमा की बंदिनी” है। लेकिन यह एक स्वाभाविक तथ्य है कि केवल नारी की कोमलता और सहानुभूति ही समाज पर शीतल लेप की भाँति काम कर सकती है।

“हमारी श्रृंखला की कड़ियाँ” शीर्षक के अन्तर्गत महादेवी वर्मा आगे लिखती हैं कि अपने पूर्ण से पूर्ण विकसित रूप में होते हुए भी कोई वस्तु दूसरी वस्तु हो ही नहीं सकती। जो वस्तु उससे भिन्न है, उसका अभाव उसमें सदा रहेगा। एक पूर्ण नारी भी इतनी पूर्ण नहीं हो सकती कि पुरुष के स्वभाव को समाहित कर सके। किसी और गुण की पूर्णता स्वयं के अस्तित्व को पूर्ण बना ही नहीं सकती, इसलिए समाज में संतुलन के लिए स्वभावों का आपसी सहयोग ठीक है, परंतु प्रतिद्वन्द्विता ठीक नहीं।प्रायः पुरुषों का जीवन स्वच्छन्दता में और स्त्रियों का परंपराओं की सीमा के भीतर बीतता है जो उन्हें बाहर के जीवन से अवगत होने का मौका नहीं देता। इसी से महिलाओं में शुष्कता और आक्रोश जैसे भाव अधिक पाए जाने लगे हैं। ऐसे में स्त्रियों के व्यक्तित्व में स्वाभाविक कोमलता के साथ-साथ साहस और विवेक की आवश्यकता है, जिससे वे किसी भी अन्याय के प्रति जवाब देने में जरा भी न चूकें।शासन आदि व्यवस्थाओं में आधे समाज के प्रतिनिधि के रूप में स्त्रियों का होना आवश्यक है।

स्त्रियों की आवश्यकताएँ, हित संबंधी बातें तो स्त्रियाँ ही समझ सकती हैं और यदि वे प्रतिनिधित्व करें तो समाज भी स्त्रियों के हित-अहित से परिचय पा सकता है।महादेवी वर्मा के अनुसार ’विवाह’ नामक संस्था पवित्र व उच्चकोटि की है, परंतु वर्तमान काल में उसमें कुछ परिवर्तनों की आवश्यकता है क्योंकि इस पवित्र मानी जाने वाली संस्था में कई रूढ़ियों के प्रवेश के कारण लगातार पतन ही दीख रहा है। स्त्रियों की दुर्दशा के निवारण में समर्थ महिलाएँ भी उचित कदम उठाती नहीं दीख रहीं। जो संपन्न महिलाएँ हैं, वे अपनी गृहस्थी और संतान के लिए सेवक नियुक्त करती हैं, परंतु दुर्भाग्यवश अपना धन और ऊर्जा व्यक्तिगत मनोरंजन आदि में खर्च कर देती हैं। यदि वे इनका सदुपयोग आत्मनिरीक्षण कर अपने स्वत्व को पहचान कर इसी ज्ञान से समाज की मदद कर सकें तो अवश्य ही सुधार के लक्षण दीखेंगे।

उन्हें अपने देश की अन्य साधारण महिलओं के अधिकारों, उन्नति के साधनों और अवनति के कारणों से परिचित होना चाहिए। महिलाओं को स्वयं को किसी से ऊँचा जताने की आवश्यकता नहीं, न ही किसी को ऊँचा जताने की, बस आवश्यकता उन्हें उस स्वत्व ही की है जिसे पाकर पुनः समाज का उतना ही महत्वपूर्ण अंग बन सकें; ऐसा स्वत्व जो अचानक रूढ़ियों में कस कर दब गया है। मध्यम वर्ग की नारी स्वावलंबन से रहित है। वह जीवन-भर घरेलू क्लेशों में बँधी रहती है। समाज में भी कोई ऐसी व्यवस्था नहीं जो उन्हें ऐसी परिस्थितियों से उबार कर उनमें आत्मविश्वास भर दे। श्रमजीवी वर्ग की महिलाओं की कहानी सबसे दुःखद है। दिन-भर के असह्य शारीरिक श्रम के पश्चात् जब रात्रि में घर लौटती हैं तब भी उन्हें कुछ शांति के क्षण नहीं मिल पाते।

सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह है कि समाज-सुधार के कार्यक्रमों में उन्हें भुला दिया जाता है और वे आजीवन अपने द्रारिद्रय में पीड़ा सहती रहती हैं। उनकी सबसे बड़ी आवश्यकता ज्ञान-प्राप्ति है ताकि वे अपने ऊपर होते अत्याचार का विरोध कर सकें।महिलाओं का सबसे बड़ा गुण यह है कि वे अपने को और बाह्यजीवन को परिस्थितियों के अनुसार ढाल लेती हैं। वे अपने स्वभाव के गुणों को भी छोड़ने में तत्पर हो सकती हैं, दुःख को परीक्षा मान उसका सामना करती हैं और इसलिए उनकी सतर्कता पुरुष से अधिक प्रतीत होती है। स्त्री में त्याग अथवा बलिदान करने की असीम शक्ति है और वह यह प्रमाणित कर चुकी है कि परिस्थितिवश दुर्बल प्रतीत होती नारी में पुरुष से किसी भी दशा में कम शक्ति नहीं है।’युद्ध और नारी’ के अन्तर्गत महादेवी लिखती हैं कि पुरुष के जीवन में संघर्ष है तो नारी के जीवन में आत्मसमर्पण। इसी से नारी ने पुरुष की दुर्बलता को पहचान लिया, जब उसकी नीरसता को समझा। गृह के संबंध में वह कहती हैं कि गृहों की नींव स्त्री की बुद्धि पर रखी गई है। स्त्री और पुत्र के आगमन से पुरुष को लगा कि उसे किसी सबल पर शासन नहीं करना बल्कि एक नन्हें निर्बल को सबल बनाना है और एक सामंजस्यपूर्ण गृहस्थी बसाने में उसे कोई आपत्ति नहीं
स्त्री ने यह स्पष्ट किया कि अपने शिशु को सबल बनाने के लिए उसे पुरुष की आवश्यकता है और तब से गृह रक्षा और भरण-पोषण की जिम्मेदारी स्वयं पर ली। तब से दैनिक आवश्यकताओं के लिए छीना-झपटी के युद्ध का उद्देश्य बदल गया और युद्ध गृह-समूह की रक्षा के लिए होने लगे। परंतु स्त्रियाँ कभी युद्ध से संबंधित हिंसक धारणा नहीं बना पाईं। उनके लिए युद्ध, युद्ध के अलावा और कुछ नहीं था, था तो उनके गृह-जीवन को धमकाता एक कारण, जिससे उन्हें भय था। क्योंकि वही गृहस्थी अब उनका जीवन बन गई थी।युद्ध के लिए स्त्री मानसिक और शारीरि, ोनों ही रूप से अनुपयुक्त तो रही ही, साथ ही उसके विकास में भी यह आड़े आया। जहाँ युद्ध का वातावरण हो, वहाँ एक स्त्री अपने गुणों में स्वतः अपूर्ण हो जाती है, क्योंकि अगले दिन मृत्यु की आशंका लिए बैठे पुरुष के पास नारी के सभी गुण आँकने का समय नहीं, उनकी कोई उपयोगिता ही नहीं। वह एक रूप की पुतली से अधिक सार्थक नहीं हो पाती और ऐसे में उसके सभी गुण विकसित नहीं हो पाते।पुरुष के स्वार्थों का दायरा धीरे-धीरे बढ़ने लगा। उसे अधिकारों की सीमा का विस्तार करने की चाह परेशान करने लगी। उसके लिए यह असह्य हो गया कि स्त्री अधिकारों की कामना में रुकावट बने।

स्त्री सलाह दे तो अहम् पर चोट पड़ती और यदि उसकी हर बात दुःखी मन से चुपचाप स्वीकार ले तो उसके साहस का उपहास होता। अतः बीच का मार्ग अंततः उसने निकाल ही लिया। उसने नारी के सम्मुख यह तर्क रखा कि युद्ध के प्रति उसकी विमुखता उसकी कायरता है, मूल रूप से दुर्बल होने पर उसकी भावुकता का आवरण काम आता है। बस, फिर स्त्री में चुनौती का उत्तर देने की ललक जाग उठी और वह यह कामना करने लगी कि वह पुरुष की बराबरी में खड़ी हो जाए और जो निष्ठुरता उसकी प्रकृति के विरुद्ध थी, वही निष्ठुरता उसके स्वभाव में बसने लगी। पुरुष को भी अपना मार्ग विस्तृत प्रतीत हुआ। फलस्वरूप आज सामान्यतः युद्ध-प्रिय आधुनिक देशों की नारियों को लगता है कि यदि उनमें दया, करुणा, प्रेम जैसे स्वाभाविक गुण हैं, तो वे जीने योग्य नहीं। पुरुष-सा पाशविक बल और संहार करने की लालसा उनके मन में प्रतिदिन बढ़ रही है।नारी की कोमलता में उसकी दुर्बलता ने शरण ले ली है। ’नारीत्व का अभिशाप’ की चर्चा करते हुए महादेवी कहती हैं कि मानसिकता और शारीरिक बल का समन्वय अत्यन्त आवश्यक है, परंतु प्रायः एक बल की कमी दूसरे की अधिकता से भर जाती है। अतः उसके पशुबल की न्यूनता को आत्मबल से भरना बहुत ही स्वाभाविक है।

अपने युद्ध-कौशल में भी प्रतिद्वंद्वियों को चकित करने वाली स्त्री निहत्थी होकर भी, बलवान विपक्षियों से घिरी रह कर भी, अपने आत्मसम्मान की रक्षा कर चुकी है।समाज को अपनी शक्ति से अधिक देकर, त्याग कर आज की नारी संज्ञाहीन हो गई है, इतनी कि कठोर से कठोर दिल दहला देने वाली यंत्रणाएँ भी वह मूकभाव से सह लेती है। समाज और घर, दोनों ही ओर स्त्री की दशा दयनीय है। विवाह से पूर्व वह पराया धन है, जहाँ उसे सदा ’अपने’ घर जाने की शिक्षा मिलती है। विवाह के समय मानो उसका मोल-भाव होता है और उसी का घर विवाहोपरांत इतना पराया हो जाता है कि दुःख के क्षणों में उसे आत्मीयता और संबल नहीं मिलता, विपत्ति में अन्न के दाने तक नहीं। पतिगृह भी उपेक्षा के अलावा और कुछ देने में असमर्थ ही लगता है। यदि वह अपने पति की अपेक्षा के अनुकूल न हो या उसे वह देने में समर्थ न हो जो पति की इच्छा हो तो उसका शेष जीवन अंधकार में ही बीत जाता है। स्त्री एक बंदिनी के समान है, चाहे सोने का पिंजरा हो या लोहे का, वह स्वतंत्रता की अधिकारिणी नहीं है। वह जिस व्यक्ति की बंदिनी है, वह उसके साथ कैसा भी व्यवहार करे, उसे अवश्य साधुवाद मिल जाएगा। महादेवी स्पष्ट करती हैं – “उनके विचारों में नारी मानवी नहीं, देवी है और देवताओं को मनुष्य के लिए आवश्यक सुविधाओं का करना ही क्या है! नारी के देवत्व की कैसी विडंबना है!

”यदि दुर्भाग्य से वह विधवा हो जाए तो अपने बालक के भरण-पोषण की जिम्मेदारी भी उसी पर आ पड़ती है। रूढ़ियों से बँधे समाज में शास्त्रों के नियमों को पालने की इतनी ललक अचानक पैदा हो जाती है कि वह इसके लिए एक निरपराध स्त्री को मृत्यु से भी भयंकर दुःखों में ढकेलने के उपरांत भी नहीं हिचकिचाता।समाज में स्त्री का मूल्य आज जरा भी नहीं। यह तो इसी से स्पष्ट होता है कि स्त्री के अपहरण जैसी कुरीति आज समाज में निरंतर फैल रही है। स्त्री स्वयं भी आज अपने दुःखी जीवन से इतनी परेशान है कि वह इससे छुटकारा पाने के लिए कोई भी मूल्य देने को तैयार है। नारी-अपहरण जैसी समस्या जहाँ मुँह-बाए खड़ी है वहाँ हमारे युवकों का लम्बी तान कर सोना एक आश्चर्य है।सबसे मूर्खतापूर्ण स्थिति तो तब प्रकट होती है,जब कुछ तर्कशील पुरुष यह तर्क देते हैं कि स्त्रियों को आत्मरक्षा करने से कौन रोकता है? यदि प्रत्येक मानव आत्मरक्षा में इतना ही समर्थ होता तो मनुष्य जाति को कभी सैनिकों और हथियारों की आवश्यकता नहीं पड़ती। आज आत्मनिर्भरता, अपनी गरिमा, अपने अस्तित्व तक को भुला चुकी महिला से यदि अपने आत्मसम्मान और गरिमा की रक्षा की बात की जाए तो वह अवश्य ही एक निरर्थक प्रयास है।यदि इसके विरुद्ध एक ऐसा देशव्यापी आंदोलन स्थान ले जिससे लोगों का हृदय नारी वेदना के प्रति संवेदनशील बने और नारी स्वयं भी अपने अस्तित्व और गरिमा को पहचाने तो परिस्थितियों में सुधार की संभावना है “....... अन्यथा नारी के लिए नारीत्व अभिशाप तो है ही.....।“आधनिक स्त्री परंपरागत रूढ़ियों से जकड़ी स्त्री से अधिक सतर्क लगती है। जब स्त्री को लगा कि उसकी कोमलता पुरुष के सामने उसकी कमजोरी है तो उसने उे समूल नष्ट कर दिया। अपनी भावुकता और बाह्य संघर्ष के लिए पुरुष पर निर्भर होने की इस प्रकृति को उसने जड़ से उखाड़ फेंका। परंतु वह इस तथ्य से अपरिचित नहीं थी कि कोमलता उसका प्राकृतिक गुण है। अपने इस प्राकृतिक गुण पर नियंत्रण पाकर वह चाहे बाहरी परिस्थितियों का सामना कर लेती हो, परंतु वह अंदर सुखी नहीं।पाश्चात्य जीवन शैली की नारी भारतीय नारी की अपेक्षा अधिक स्वतंत्र प्रतीत होती है – साधारणतः आर्थिक आदि दृष्टि से, परंतु महादेवी के अनुसार सामाजिक बंधनों से वह आज भी (चाहे अनभिज्ञ होकर ही) बँधी हुई है। पाश्चात्य नारी की स्वतंत्रता उसे पुरुष के मनोविनोद की वस्तु बने रहने के जंजाल से छूटने का अवकाश देती है, परंतु उसका श्रृंगार के प्रति लगाव, रूप को स्थिर रखने का आकर्षण, साधन और उपकरणों का प्रयोग उसकी दुर्बलता दिखाता है कि उसकी रमणीत्व की इच्छा नहीं नष्ट हुई, उसे गरिमा प्रदान करने वाले गुण अवश्य खो गए। जहाँ उसने पुरुष को नीचा दिखाने के लिए कठिन परिश्रम किया, वहीं वह पुरुष की अपने प्रति जिज्ञासा को जगाने के लिए सौंदर्य को प्रधानता देने लगी। उसका मन सौंदर्य आकर्षण में इतना उलझा है कि उसे स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता।जिस तरह इंद्र धनुष के रंग हमें विस्मित तो कर देते हैं, पर इससे अधिक उनकी सार्थकता नहीं बन पाती, एक आकर्षक नारी की पुरुष के सामने महत्ता भी वैसी ही रह जाती है।

आधुनिक नारी अपने नारीत्व की उपेक्षा भी नहीं सह सकती और इसलिए ऐसा मार्ग अपनाती है। परंतु इस आकर्षित करने वाले मार्ग में भी निरर्थकता है क्योंकि उसका अस्तित्व पुरुष के लिए अधिक मायने नहीं रखता। अतः दोनों ही स्थितियाँ महिलाओं के लिए दुष्कर हैं और आधुनिक पश्चिमी (और भारतीय भी) नारियाँ इन्हीं में जकड़ कर रह गई हैं
दूसरा भाग कल

June 30, 2008

भारत में बेटियों के जिन्दा रहने की दर अब तक के सबसे निम्न स्तर पर









आकलन
है कि भारत में पिछले बीस साल में एक करोड़ बच्ची गर्भपात का
शिकार

बनी हैं.


ब्रितानी संस्था 'एक्शन एड' ने कहा है कि भारत में नवजात शिशुओं में बच्चियों के ज़िंदा रहने की दर अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई है.संस्था का कहना है कि अजन्मी बच्चियों के गर्भपात की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है

'एक्शन एड' का मानना है कि नवजात लड़कियों की जान-बूझकर अनदेखी की जाती है उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाता है

संस्था की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के संपन्न प्रांतों में गिने जाने वाले पंजाब के एक इलाक़े में ऊँची जातियों के दस लड़कों पर मात्र तीन लड़कियाँ हैं

'एक्शन एड' की रिपोर्ट का आकलन है कि अगर भारत लड़कों को प्राथमिकता देने के चलन में बदलाव नहीं ला पाता है तो आने वाले दिनों में हालात 'विकट' हो सकते हैं।

लड़कियाँ को मानें बोझ
लड़कियों की संख्या में रही कमी का अध्ययन करने के लिए एक्शन एड ने कनाडा की संस्था इंटरनेशनल डेवेल्पमेंट रिसर्च सेंटर (आईडीआरसी) के साथ हाथ मिलाया

दोनों संस्थाओं के संयुक्त अध्ययन दल ने उत्तर-पश्चिम भारत के पांच राज्यों में छह हज़ार से ज़्यादा घरों में लोगों से बातचीत की। सर्वेक्षण और भारत की पिछली जनगणना के आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया तो नतीजे लैंगिक अनुपात में बढ़ते अंतर की गंभीरता का अहसास करानेके काफ़ी थे।

रिपोर्ट में बताया गया है कि 'सामान्य' परिस्थितियों में हर 1000 लड़के पर 950 लड़कियाँ होनी चाहिए थीं।लेकिन सर्वेक्षण में शामिल पाँच में से तीन राज्यों में यह अनुपात 1000 लड़कों पर 800 लड़कियों का पाया गया

पाँच में से चार राज्यों में वर्ष 2001 की जनगणना के बाद से लड़के और लड़कियों के अनुपात में गिरावट दर्ज की गई

अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि ऐसा सिर्फ़ गाँवों या ग़रीब या पिछड़े इलाक़ों में ही नहीं हो रहा है।इसका कहना है कि शहरी इलाक़ों के संपन्न तबकों में भी लड़कों के मुक़ाबले लड़कियों की संख्या में तेज़ी से कमी रही है.एक्शन एड का मानना है कि गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग बता देने वाली अल्ट्रासाउंड तकनीक का बढ़ता उपयोग इसकी एक वजह हो सकता है।

वंश बढ़ाने का बोझ

संस्था की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय औरतों पर लड़के पैदा करने का ज़बर्दस्त दबाव रहता है।भारतीय समाज के बारे में रिपोर्ट का आकलन है कि यहाँ लड़कियों को संपत्ति मानकर एक बोझ के रूप में देखा जाता हैरिपोर्ट के मुताबिक कई परिवार अल्ट्रासाउंड तकनीक की मदद से गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग जान लेते हैं और लड़की होने पर गर्भपात कराना बेहतर समझते हैं।

यह सब तब धड़ल्ले से चल रहा है जब भारत में 1994 में बना वह क़ानून लागू है जिसके तहत गर्भ में पल रहे बच्चे के लिंग की पहचान करना और उसके बाद गर्भपात कराना अपराध है।

रिपोर्ट का मानना है कि बच्चे के पैदा होने के दौरान अप्रशिक्षित दाई का होना नाभि में संक्रमण का ख़तरा बढ़ाता है और यह भी बढ़ते लैंगिक असमानता का एक कारण है।

एड की महिला अधिकार नीति अधिकारी लौरा तुर्केट कहती हैं, "ख़ौफ़नाक बात तो यह कि औरतों के लिए बच्ची पैदा करने से बचना अक्लमंदी माना जाता है।"

वे कहती हैं, "व्यापक समाज को देखों तो यह डरावनी और निराशाजनक स्थिति पैदा कर रही है।"लौरा का मानना है, "आगे इसमें बदलाव की ज़रूरत है। भारत को संपत्ति के अधिकार, शादी में दहेज और लिंग के महत्व जैसी सामाजिक और आर्थिक बाधाओं पर ध्यान देना होगा जो पैदा होने से पहले ही लड़कियों को निगल जाती हैं"
उनका आकलन है, "अगर हम अभी क़दम नहीं उठाते हैं तो भविष्य सूना-उजड़ा नज़र रहा है"ब्रिटिश मेडिकल पत्रिका 'लैंसेट' का अनुमान है कि भारत में पिछले बीस साल में लगभग एक करोड़ लड़कियों को माँ की पेट से ही अलविदा कह दिया गया।



लड़कियों को निगलती बाधाएँ...भारत को संपत्ति के अधिकार, शादी में दहेजऔर लिंग के
महत्व जैसी सामाजिक और आर्थिक बाधाओं पर ध्यान देना होगा जो पैदा होनेसे पहले ही
लड़कियों को निगल जाती हैं .


लौरा तुर्केट,एक्शन

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