मेरे लेख पर अच्छी प्रतिक्रियाएं मिलीं. सबने मेरे सवाल का जवाब अपने-अपने दृष्टिकोण से दिया. पर अफ़सोस, अधिकतर लोगों ने मेरे सवाल के संदर्भ पर ध्यान नहीं दिया, सुमन को छोड़कर. मेरा सवाल उस संदर्भ में था, जब हमारे एयर वाइस चीफ़ मार्शल ने यह कहा था कि वे सुखोई विमान उड़ाने के लिये महिला पायलटों को इसलिये प्रशिक्षित नहीं कर रहे हैं क्योंकि वे जब गर्भवती होने के दरम्यान दस महीने का अवकाश लेंगी तो वायुसेना का उतना समय और श्रम बेकार जायेगा. मेरा यह पूछना था कि क्या उनका यह तर्क सही है? क्या एक औरत को सिर्फ़ इसलिये कोई एक विशिष्ट कार्य करने से रोका जा सकता है कि वह अपनी कार्यावधि में मातृत्त्व अवकाश लेती है? मेरा सवाल उन महिलाओं के लिये था, जो ऐसे कार्य की चुनौती भी लेना चाहती हैं और माँ बनने की भी? मेरा प्रश्न उन महिलाओं के लिये नहीं था जो बच्चे पैदा करना ही नहीं चाहतीं? मैं यह कतई नहीं मानती कि माँ बनना औरतों के लिये ज़रूरी है. पर यदि कोई औरत माँ भी बनना चाहती है(जैसा कि अधिकतर औरतें चाहती हैं, यह उनकी स्वाभाविक इच्छा भी है और अधिकार भी) और फ़ाइटर पायलट भी, तो क्या सिर्फ़ इसी कारण उसे इस कार्य से बाहर रखा जाय कि वह माँ बनने वाली है?
इस बात का जवाब सुमन ने अच्छी तरह से दिया है. मैं उनकी हर बात से सहमत हूँ, पर एक बात से नहीं. उन्होंने कहा है कि फ़ाइटर पायलट जैसे कैरियर परिवार के साथ नहीं चल सकते. पर ऐसा सिर्फ़ औरतों के साथ क्यों? मेरा प्रश्न यही है कि औरतों के लिये सीमित विकल्प क्यों होते हैं?
मैं नहीं मानती कि फ़ाइटर पायलट की जॉब परिवार के साथ नहीं चल सकते. आज एक समाचार चैनल की बहस में मैंने देखा कि एयरचीफ़ मार्शल एस.के.सरीन ने निम्नलिखित तर्क दिये अपने पक्ष में-
१. गर्भावस्था के दौरान होने वाले हॉर्मोनल परिवर्तन के कारण औरतें इतना स्ट्रेस नहीं झेल सकतीं जितना कि एक पायलट को झेलना पड़ता है.
२. उनका दूसरा तर्क वह है जिसे सुमन ने अपनी पोस्ट में लिखा है कि पायलटों पर चार से पाँच साल का समय तथा लगभग १५ करोड़ रुपये खर्च होते हैं और यदि युद्ध के समय आवश्यकता पड़ने पर महिला पायलट अनुपस्थित हो गयी तो सारी मेहनत बेकार हो जायेगी.
इसी तरह के और भी तर्क दिये हमारे चीफ़ मार्शल ने. कार्यक्रम में उपस्थित महिला अतिथियों ने, जिनमें एक डॉक्टर भी थीं सिरे से उनके तर्कों को खारिज कर दिया. उनके अनुसार-
-अमेरिका और चीन जैसे देशों में महिला पायलट होती हैं. तो क्या वे शारीरिक दृष्टि से भारतीय महिलाओं से अलग हैं.
-क्या औरत के द्वारा किसी क्षेत्र में भागीदारिता को मात्र आँकड़ों में आँकना सही है.
-एक सामान्य गर्भवती स्त्री अपने गर्भकाल में पाँच महीने तक सभी सामान्य काम कर सकती है. आखिरी चार महीनों में उसे अवकाश लेना होता है.
-क्या पुरुष कर्मी स्वास्थ्य-सम्बन्धी परेशानी में छुट्टी नहीं लेते हैं?
संक्षेप में वहाँ उपस्थित डॉ. खन्ना ने उनके इस तर्क को भी खारिज़ कर दिया कि युद्ध के समय अचानक महिला पायलटों में से पचास प्रतिशत छुट्टी पर जा सकती हैं. एक ऐसे कार्य को करने वाली कोई महिलाकर्मी मात्र एक या दो बच्चे को जन्म देना चाहेगी. ऐसे में उनका यह तर्क बचकाना है.
यकीन मानिये मैंने यह कार्यक्रम बड़े ध्यान से देखा और आप में से जिसने भी देखा होगा उसे ही एयर चीफ़ मार्शल के सारे तर्क खोखले लगे होंगे. सच तो यह है कि हमारी सैनिक सेवा अभी भी पुरुष वर्चस्व का शिकार है. अक्सर जो खबरें आती हैं कि सेना में औरतों को आगे नहीं बढ़ने नहीं दिया जाता, वे बेबुनियाद नहीं होती हैं. हमारा समाज अब भी औरतों को "विकल्प की स्वतन्त्रता" से वन्चित किये हुये है. सुमन जी, मैं आपकी इस बात से सहमत तब हो सकती हूँ कि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें कार्य करने के लिये परिवार का मोह छोड़ना होगा यदि पुरुषों को भी वैसा ही त्याग करना पड़े. आखिर त्याग की अपेक्षा हमेशा औरतों से क्यों?
" जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की " "The Indian Woman Has Arrived " एक कोशिश नारी को "जगाने की " , एक आवाहन कि नारी और नर को समान अधिकार हैं और लिंगभेद / जेंडर के आधार पर किया हुआ अधिकारों का बंटवारा गलत हैं और अब गैर कानूनी और असंवैधानिक भी . बंटवारा केवल क्षमता आधारित सही होता है
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था
हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।
यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का ।
15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं
15th august 2012
१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं
15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं
15th august 2012
१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं
"नारी" ब्लॉग
"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।
" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "
हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था
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November 19, 2009
November 17, 2009
क्या बच्चे पैदा करना औरतों की कमज़ोरी है?
कल एक समाचार सुनकर मन प्रसन्न हुआ था. खबर थी कि एक कुश्ती मुकाबले में एक महिला पहलवान ने पुरुष पहलवान को पटखनी दे दी. सोचा कि "नारी" ब्लॉग पर एक आलेख लिखुँगी कि यह एक मिथक है कि महिलाएँ शारीरिक रूप से कमज़ोर होती हैं. यदि उनका पालन-पोषण भी लड़कों की तरह हो, उन्हें बचपन से शारीरिक श्रम कराया जाये, उनका खान-पान अच्छा हो तो वे भी शारीरिक रूप से पुरुषों की तरह मजबूत हों. जो बातें जैविक रूप से अपरिवर्तनीय हैं वो तो हैं ही, पर जिन बातों पर हमारा वश है उसे तो कर ही सकते हैं... ... ... पर ये आलेख लिखने का मेरा उत्साह जाता रहा, जब आज एयरफ़ोर्स के एक बड़े अधिकारी को यह कहते सुना कि वे सुखोई विमान उड़ाने के लिये महिला पायलटों को इसलिये प्रशिक्षित नहीं कर रहे हैं क्योंकि जब वे अपना परिवार बढ़ाने के लिये नौ-दस महीने की छुट्टी लेंगी तो उतना वक्त बेकार जायेगा... इस बात ने मुझे सोचने पर मज़बूर कर दिया कि कोई औरत जब एक बच्चा पैदा करती है तो क्या सिर्फ़ अपने लिये? क्या वह बच्चा समाज और देश की सम्पत्ति नहीं होता? तो क्या बच्चा पैदा करने की क्षमता उसकी शारीरिक कमज़ोरी मानना सही होगा? यह बात सही है कि कोई बाहर कार्य करने वाली महिला अपना परिवार बढ़ाने लिये छुट्टी लेती है तो वह उतने दिन अपनी कार्य की ज़िम्मेदारी नहीं निभा पाती, पर क्या वह एक दूसरी महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी नहीं निभा रही होती है? यदि हमारे देश के महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग ऐसी सोच रखेंगे तो कौन सी महत्त्वाकांक्षी औरत शादी करना या परिवार बढ़ाना चाहेगी. और जब वो ऐसा करेगी तो ये ही लोग कहेंगे कि आजकल की औरतें तो ऐसी हो गयी हैं... तो बात यहीं खत्म करके मैं आप सभी से यह पूछना चाहती हूँ कि क्या बच्चा पैदा करना औरत की कमज़ोरी है? क्या सिर्फ़ इसीलिये औरत को पुरुष से कमज़ोर मान लिया जाये?
October 11, 2008
स्त्रीदेह : कितनी ढँके, कितनी उघड़े
ये पोस्ट दुबारा डाली जा रही हैं क्योंकि पिछले लिंक मे कुछ हिस्सा गार्ब्ल हो गया हैं


गत दिनों स्त्री के वस्त्रों के अनुपात से उसके चरित्र की पैमाईश करने वाले कई प्रसंग उठते रहे हैं और स्त्री के वस्त्रों को उसके साथ होने वाले अनाचार का मूल घोषित किया जाता रहा है। जबकि वस्तुत: अनाचार का मूल व्यक्ति के अपने विचारो, अपने संस्कार, आत्मानुशासन की प्रवृत्ति, पारिवारिक वातावरण, जीवन व संबंधों के प्रति दृष्टिकोण, स्त्री के प्रति बचपन से दी गयी व पाई गयी दीक्षा, विविध घटनाक्रम, सांस्कृतिक व मानवीय मूल्यों के प्रति सन्नद्धता आदि में निहित रहता है। पुरूष व स्त्री की जैविक या हारमोन जनित संरचना में अन्तर को रेखांकित करते हुए पुरुष द्वारा उस के प्रति अपनी आक्रामकता या उत्तेजना को उचित व सम्मत सिद्ध करना कितना निराधार व खोखला है, इसका मूल्यांकन अपने आसपास के आधुनिक तथा साथ ही बहुत पुरातन समाज के उदाहरणों को देख कर बहुत सरलता व सहजता से किया जा सकता है।
इस महत्वपूर्ण सूचना व उसके विवेचन को अत्यंत सुलझे हुए ढंग से समझने जानने के लिए
यहाँ पूरा पढ़ें

गत दिनों स्त्री के वस्त्रों के अनुपात से उसके चरित्र की पैमाईश करने वाले कई प्रसंग उठते रहे हैं और स्त्री के वस्त्रों को उसके साथ होने वाले अनाचार का मूल घोषित किया जाता रहा है। जबकि वस्तुत: अनाचार का मूल व्यक्ति के अपने विचारो, अपने संस्कार, आत्मानुशासन की प्रवृत्ति, पारिवारिक वातावरण, जीवन व संबंधों के प्रति दृष्टिकोण, स्त्री के प्रति बचपन से दी गयी व पाई गयी दीक्षा, विविध घटनाक्रम, सांस्कृतिक व मानवीय मूल्यों के प्रति सन्नद्धता आदि में निहित रहता है। पुरूष व स्त्री की जैविक या हारमोन जनित संरचना में अन्तर को रेखांकित करते हुए पुरुष द्वारा उस के प्रति अपनी आक्रामकता या उत्तेजना को उचित व सम्मत सिद्ध करना कितना निराधार व खोखला है, इसका मूल्यांकन अपने आसपास के आधुनिक तथा साथ ही बहुत पुरातन समाज के उदाहरणों को देख कर बहुत सरलता व सहजता से किया जा सकता है।
वस्तुत: जब तक स्त्री - देह के प्रति व्यक्ति की चेतना में भोग में वृत्ति अथवा उपभोग की वस्तु मानने का संस्कार विद्यमान रहता है तब तक ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को सौ परदों में छिपी स्त्री को देख कर भी आक्रामकता व उत्तेजना के विकार ही उत्पन्न होते हैं देह को वस्तु समझने व उसके माध्यम से अपनी किसी लिप्सा को शांत करने की प्रवृत्ति का अंत जब तक हमारी नई नस्लों की नसों में रक्त की तरह नहीं समा जाता तब तक आने वाली पीढी से स्त्री देह के प्रति 'वैसी" अनासक्ति की अपेक्षा व आशा नहीं की जा सकती योरोप का आधुनिक समाज व उसी के समानान्तर आदिवासी जन जातियों का सामाजिक परिदृश्य हमारे समक्ष २ सशक्त उदाहरण हैं। असल गाँव की भरपूर युवा स्त्री खुलेपन से स्तनपान कराने में किसी प्रकार की बाधा नहीं समझती क्योंकि उस दृष्टि में स्तन यौनोत्तेजना के वाहक नहीं हैं उनका एक निर्धारित उद्देश्य है, परन्तु जिनकी समझ ऐसी नहीं है वे स्तनों को यौनोत्तेजना में उद्दीपक ही मानते पशुवत जीवन को सही सिद्ध किए जाते हैं । और अपनी उस दृष्टि के कारण जनित अपनी समस्याओं को स्त्री के सर मढ़ते चले जाते हैं ।
एक आलेख इस दिशा में महत्वपूर्ण दिशाबोध दे सकने में पूर्ण समर्थ है, जिसे मैंने गत दिनों BEYOND THE SEX : स्त्रीविमर्शस्त्रीविमर्श पर प्रस्तुत किया था। यहाँ निस्सन्देह एक दूसरी प्रकार का पाठकवर्ग तो है ही, साथ ही आलेख की प्रासंगिकता व महत्व को देखते हुए आज इसे आप सभी के निमित्त यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ।
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पिछले हफ्ते स्त्री-पुरुष समानता की दिशा में एक उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। वहां अब स्त्रियों को सार्वजनिक स्विमिंग पूलों में टॉपलेस हो कर तैरने तथा पूल के इर्द-गिर्द टॉपलेस अवस्था में टहलने की स्वतंत्रता मिल गई है। इस स्वतंत्रता के लिए वहाँ के टॉपलेस फ्रंट द्वारा लगभग एक साल से अभियान चलाया जा रहा था। फ्रंट के नेतृत्व का कहना था कि जब पुरुष टॉपलेस हो कर सार्वजनिक स्विमिंग पूलों में तैर सकते हैं, तैरने के पहले उसी अवस्था में पूल के किनारे टहल सकते हैं, तो स्त्रियों के लिए यह पाबंदी क्यों कि उन्हें अपने को ढक कर रखना होगा।
इस महत्वपूर्ण सूचना व उसके विवेचन को अत्यंत सुलझे हुए ढंग से समझने जानने के लिए
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October 10, 2008
स्त्रीदेह : कितनी ढँके, कितनी उघड़े

गत दिनों स्त्री के वस्त्रों के अनुपात से उसके चरित्र की पैमाईश करने वाले कई प्रसंग उठते रहे हैं और स्त्री के वस्त्रों को उसके साथ होने वाले अनाचार का मूल घोषित किया जाता रहा है। जबकि वस्तुत: अनाचार का मूल व्यक्ति के अपने विचारो, अपने संस्कार, आत्मानुशासन की प्रवृत्ति, पारिवारिक वातावरण, जीवन व संबंधों के प्रति दृष्टिकोण, स्त्री के प्रति बचपन से दी गयी व पाई गयी दीक्षा, विविध घटनाक्रम, सांस्कृतिक व मानवीय मूल्यों के प्रति सन्नद्धता आदि में निहित रहता है। पुरूष व स्त्री की जैविक या हारमोन जनित संरचना में अन्तर को रेखांकित करते हुए पुरुष द्वारा उस के प्रति अपनी आक्रामकता या उत्तेजना को उचित व सम्मत सिद्ध करना कितना निराधार व खोखला है, इसका मूल्यांकन अपने आसपास के आधुनिक तथा साथ ही बहुत पुरातन समाज के उदाहरणों को देख कर बहुत सरलता व सहजता से किया जा सकता है।
वस्तुत: जब तक स्त्री - देह के प्रति व्यक्ति की चेतना में भोग में वृत्ति अथवा उपभोग की वस्तु मानने का संस्कार विद्यमान रहता है तब तक ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को सौ परदों में छिपी स्त्री को देख कर भी आक्रामकता व उत्तेजना के विकार ही उत्पन्न होते हैं देह को वस्तु समझने व उसके माध्यम से अपनी किसी लिप्सा को शांत करने की प्रवृत्ति का अंत जब तक हमारी नई नस्लों की नसों में रक्त की तरह नहीं समा जाता तब तक आने वाली पीढी से स्त्री देह के प्रति 'वैसी" अनासक्ति की अपेक्षा व आशा नहीं की जा सकती योरोप का आधुनिक समाज व उसी के समानान्तर आदिवासी जन जातियों का सामाजिक परिदृश्य हमारे समक्ष २ सशक्त उदाहरण हैं। असल गाँव की भरपूर युवा स्त्री खुलेपन से स्तनपान कराने में किसी प्रकार की बाधा नहीं समझती क्योंकि उस दृष्टि में स्तन यौनोत्तेजना के वाहक नहीं हैं उनका एक निर्धारित उद्देश्य है, परन्तु जिनकी समझ ऐसी नहीं है वे स्तनों को यौनोत्तेजना में उद्दीपक ही मानते पशुवत जीवन को सही सिद्ध किए जाते हैं । और अपनी उस दृष्टि के कारण जनित अपनी समस्याओं को स्त्री के सर मढ़ते चले जाते हैं ।
एक आलेख इस दिशा में महत्वपूर्ण दिशाबोध दे सकने में पूर्ण समर्थ है, जिसे मैंने गत दिनों BEYOND THE SEX : स्त्रीविमर्श स्त्रीविमर्श पर प्रस्तुत किया था। यहाँ निस्सन्देह एक दूसरी प्रकार का पाठकवर्ग तो है ही, साथ ही आलेख की प्रासंगिकता व महत्व को देखते हुए आज इसे आप सभी के निमित्त यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ।
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पिछले हफ्ते स्त्री-पुरुष समानता की दिशा में एक उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। वहां अब स्त्रियों को सार्वजनिक स्विमिंग पूलों में टॉपलेस हो कर तैरने तथा पूल के इर्द-गिर्द टॉपलेस अवस्था में टहलने की स्वतंत्रता मिल गई है। इस स्वतंत्रता के लिए वहाँ के टॉपलेस फ्रंट द्वारा लगभग एक साल से अभियान चलाया जा रहा था। फ्रंट के नेतृत्व का कहना था कि जब पुरुष टॉपलेस हो कर सार्वजनिक स्विमिंग पूलों में तैर सकते हैं, तैरने के पहले उसी अवस्था में पूल के किनारे टहल सकते हैं, तो स्त्रियों के लिए यह पाबंदी क्यों कि उन्हें अपने को ढक कर रखना होगा।
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