नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

July 26, 2008

क्या करूँ और क्या जवाब दूँ???

कुछ महीनो पहले अमेरिकासे आयी बिटिया (अब तो जानेका समय आ गया है) और परसों पोहोंचे मेरे दामाद्से मेरा अक्सर एक बातपे टकराव हो जाता है! उनके मुताबिक हिन्दोस्तान रहने लायक जगह नही रही है!!मेरा कहना है की जो बाहर जाके बस गए हैं, उन्हें ये टिपण्णी देनेका कोई इख्तियार नही!!हाँ, यहाँ रहें, इस देशके लिए कुछ करें, तभी कुछ टीका करनेका हक बनता है!!
कुछ रोज़ पहले बिटियाके पेटमे दर्द उठा। किडनी स्टोन का निदान हुआ। दोक्टार्स जो मेरे मित्र गन हैं, सलाह देने लगे की खूब पानी पिके देखो शायद खुदही बाहर आ जाए। खैर एक दिन मैंने उस से कहा की, अच्छा हुआ जो होना था, हिन्दोस्तान मे अपनी माँ के घर हुआ। बिटियाने मचलके घुस्सेसे कहा," क़तई नही ! वहाँ होता तो अच्छा होता!अबतक तो मुझे आपातकालीन रूम मे ले गए होते और पत्थर बाहर आ गया होता"!
मै खामोश हो गयी। इस दरमियान कुछ दिनोके लिए वो अपने ननिहाल रहके आयी थी। छाया चित्रकारीका नया नया शौक़ और खूब सारी तस्वीरें खींचना ये उसकी दिनचर्यामे शामिल हो चुका है। वास्तुशात्र छोड़ वो पूरी तरह इसीको अपना व्यवसाय बनाना चाहती है। और क्यों नही??बेहद अच्छी तस्वीरें उसने खींच रखी हैं...हजारों की तादात मे...अपना ब्लॉग और वेबसाइट दोनों बना रखा है। मुझे नेटपे बैठा देख, उठ्नेका तुंरत आदेश मिल जाता है!!(अभी इत्तेफाक से बिजली है और बेटी- दामाद बाहर घूमने गए हुए हैं)!
खैर ! जब अपने नानिहालसे लौटी तो पटके दूसरे हिस्सेमेभी दर्द शुरू हो गया। उसकी दोबारा सोनोग्राफी करनेका मैंने तुंरत इन्तेजाम कर दिया। वहाँसे लौट ते हुए वो रिपोर्ट लेके हमारे डॉक्टर मित्रके पास सीधा पोहोंच गयी। उधरसे फोन करके मुझे कहा,"माँ! मुझे अपेंडिक्स का ओपेराशन करवाना होगा। डॉक्टर ने तुंरत करवाना है तो अभी एकदमसे अस्पताल पोहोंच जाओ! मै वहीं जा रही हूँ।"
मैंने कहा," बेटे, मैभी आउंगी तुम्हारे साथ। तुम बघार आके मुझे लेते जाओ।"
उसने कहा," घर तो मै आही रही हूँ। अपनी कुछ पाकिंग करूंगी तथा पहलेके रिपोर्ट्स आदी साथ ले लूंगी। पन्द्रह मिनिटों मे पोहोंच रही हूँ। आप तैयार रहिये। झटसे चलेंगे।"
मै स्नानकी तैय्यारीमे थी। मैंने कहा," बेटा मुझे कमसे आधा पौना घंटा तो लगेगाही...."
"तुम्हे इतनी देर लेने की क्या ज़रूरत है??वो इतनी देर नही रुक सकते! उन्हों ने ओपरेशन थिएटर बुक कर दिया है। एक घंटेमे मेरी सर्जरी भी तय की है!आप तुंरत निकल पडो!"
मै बोली," बेटे, मुझे बैंक सेभी कुछ रक़म निकालनी होगी...औरभी कागज़ात जो बोहोत ज़रूरी हैं, साथ लेने होंगे, मेरे अपने रहनेके लिहाज़ से कपड़े आदी रखने होंगे ...मुझे कुछ तो समय लगेगाही। तुम ऐसे करो, आगे चलो, अपना खून आदी तपस्वाना शुरू कर दो, ड्रायवर को वापस भेज दो, मै पोहोंच जाउंगी।"
बिटिया जब घर पोहोंची तो मै स्नान करके अपने कपड़े आदी रख रही थी। उसने अपनी चीज़ें इकट्ठी की और वो निकल गई। ड्राईवर लौट आया। मै रास्तेमे बैंक हो ली। अस्पताल पोहोंची तो पता चला सर्जरी का समय दोपहर ३ बजेका तय हुआ है। मेरी सांसमे साँस आयी! चलो और पूरे दो घंटे हाथमे हैं!
मैंने कमरेमे ठीकसे सामान लगा लिया। उसके टेस्ट आदी चलते रहे। शामतक सर्जरी हो गयी। रातमे बिटिया दर्दमे थी। मै जागती रही। कभी नर्सको बुलाती तो कभी उसके सूखे होंट पानी घुमाके तर करती। सुबह उसका कथीटर निकाला गया। मैंने उसे bedpan देना शुरू किया।
चार दिन पूरी सतर्क तासे गुज़ारे। कभी अजीब जगाह्पे इव लगते तो मै शिकायत लेके दौड़ पड़ती...मेरी बेटी तक्लीफ्मे है...IV बाहर हो गयी है...जहाँ डाली है वो जगह ठीक नही है...उँगली के सान्धो पे डालनेकी क्या ज़रूरत है? आदी , आदी शिकायतें जारी रहती!!माँ का दिल जो ठहरा!!
जब घर आना था उस रोज़ उसके पिता मुम्बई से पोहोंचे। हालाँकि उसे अस्पताल उस दिन छोडा जाएगा इसकी मुझे ख़बर नही थी, लेकिन क्योंकि एक पलभी न उसे न मुझे वहाँ आराम मिल रहा था, मैंने डॉक्टर से गुजारिश ज़रूर की थी। मेरे पती आए तो मैंने कहा," मै घर जाके इसके लिए ढंग का सूप और पतली खिचडी बना लाती हूँ।"
मै जैसेही घर पोहोंची, खाना चढ़ा दिया, कपडों की मशीन चला दी। ये सब करही रही थी के फोन आया," उसे डिस्चार्ज मिल रहा है!"
मै खुश हो गयी। भागके उसका कमरा ठीक किया। तकिये रचाए। बिटिया घर पोहोंची तो सब तैयार था। वो पहले मेरे कमरेमे आयी। मैनेही विनती की। मुझे उसी कमरेमे सोके उसका ध्यान रखना ज्यादा आसान होगा।
वहाँ पे तकिये आदी रचाके उसे बिठाया और मै सूप और खिचडी ले आयी। जैसेही पहला कौर मुहमे गया, मेरी लाडली चींख पडी," माँ!! ये क्या है??इसमे कितना नमक पडा है!"
मैंने हैरान होके खिचडी चखी। नमक तो ठीक था!!इनसेभी चख्वा ली । इन्हों नेभी कहा,"हाँ! नमक तो ज़्यादा नही लग रहा!"
लेकिन बिटियाने खिचडी हटा दी। सूप पिया। खिचडी मे मैंने बादमे और चावल मिला दिए। कुछ देरके बाद बिटियाने कहा," मुझे मेरेही कमरेमे ले चलो। मुझे यहाँ आराम नही लग रहा"।
मै उसे वहाँ ले गयी। कई रानते उसके साथ सोती रही। अस्पतालमे अगर मेरे सोनेवाले सोफेका हल्का-साभी आवाज़ होता मेरी लाडली दहाड़ उठती ,"माँ!! आप कितना शोर करती हो! मुझे क़तई आवाज़ बर्दाश्त नही होता! आप क्यों ऐसा करती हो?"
मै खामोश रहती। कोई बात नही। अपने नैहरमे आयी लडकी है। माँ पे कुछ तो अपनी चलायेगी!!
मैंने एकदिन उसे कह दिया," बेटा इसतरह का आराम तुम्हे अमेरिकामे कोई दे सकता था? न तुम्हे बाज़ार जानेकी फ़िक्र, न घरका कोई दूसरा काम...तुम जो चाहती हो मै हाज़िर कर देती हूँ...ड्राईवर तैनात है....कपड़े धुले धुलाये, इस्त्री होके मिल जाते हैं....एक दिनमे मैंने तुम्हारे लिए दो नाईट गाऊन सी दिए...जो तुम मुहसे निकालती हो मै दौड़के उसका इंतेज़ाम कर देती हूँ...ये सुख परदेसमे तुम्हे हासिल होता?? "
इस बातका उसके पास जवाब नही था। वो मान गयी। पर जैसे कुछ ठीक हुई, हिन्दोस्तान और माँ दोनोपे टिप्पणी कसना शुरू हो गया! वैसे किडनी स्टोन को क्रश किए बिना वो भारत छोड्नाभी नही चाहती!!
और माँ का दिल जानता है की मै उसे कितना याद करूंगी जब वो लौट जायेगी....! अपनी पैठनी साडियां कटवा रही हूँ उसके कुरते सीनेके लिए, कढाई करकेभी सिलवा राहीहूँ ...! दिनरात मेरी लाडली के खिदमत मे लगी हूँ...पर कभी, कभी रातोंमे, जब कुछ बोहोत कड़वा बोल जाती है तो चुपचाप आँसू भी बहा लेती हूँ!!
जवाब खुदही सूझ गया,ये माँ का दिल है...ऑलाद कुछभी कह जाय, वो दुआ ही देगा!!सिर्फ़ अपने देशकी नुक्ता चीनी बार-बार नही सह पाती!!

11 comments:

  1. bahad maarmik lekin aaj ki janration ka sahi chairan hai.baat sachhi hai....Ma ka dil to tabhi samjh mai aata hai jab ek bachhe ko paida karne or use paalne ke baad bada kiya jaata hai...
    Manvinder

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  2. हम ने भी बहुत से बच्चों को (दोनों-लड़के और लड़कियां) जो अब इतने भी बच्चे नहीं रहे अपने मां बाप को सिर्फ़ जरुरतें पूरी करने वाली मशीन के रुप में इस्तेमाल करते देखा है, बड़ी कोफ़्त होती है जब ऐसी मां को जो बच्चों के कदमों में बिछ बिछ जाती है अकेले में आसूं बहाते देखते हैं।
    अगर आप चाह्ती हैं कि बेटी आप की कद्र करे तो जी कड़ा कर लिजीए और बिन मांगे आसानी से अपना साथ भी मत दिजीए जब तक उसे आप की कद्र नहीं पड़ती।
    वैसे आप दुनिया की बेहतरीन माओं में से एक हैं, …।:)आप की लड़की कितनी भाग्यशाली है उसे इस बात का अहसास नहीं।

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  3. मेरे भी विचार कुछ आपकी बेटी की ही तरह हैं, और मुझे इसपर कोई मलाल नहीं है. चिडिया के बच्चे तक घोंसला त्यागकर हमेशा के लिए उड़ जाते हैं. और फ़िर माँ-बाप का प्रेम तो निःस्वार्थ होता है न? और फ़िर नई पीढी से सभी को समस्या होती है.

    पहला पत्थर वही मारे जो पापी न हो.

    ummeeden nai peedhi se hi kyon? kya aap logon ne vah sab poora kar liya jiski samaj aapse ummeed karta tha?

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  4. रमण कौलJuly 26, 2008 at 11:05 PM

    बहुत अच्छा पोस्ट है। कल ही quotationspage.com नाम की साइट से यह quote पढ़ा, कुछ हास्यास्पद, कुछ गंभीर -

    There is no reciprocity. Men love women, women love children, children love hamsters.

    यानी: "इस दुनिया में सिले की उम्मीद ही मत करो। मर्द औरत से प्यार करता है, औरत बच्चों से, और बच्चे हैम्स्टर्स से - या यूँ कहें कुत्ते बिल्लियों से, गुड़ियों से, खिलौनों से।"

    क्या आप सच्चे दिल से कह सकती हैं कि आप के माता पिता को आप से वही शिकायत नहीं है जो आप को अपने बच्चों से है? यदि हाँ तो मैं आप के साथ हूँ।

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  5. बच्चो को एक उम्र के बाद बड़ा मान ले . उनको अपने निर्णय ख़ुद लेने दे और उन निर्णय को लेने के सुख और दुःख दोनों उठाने दे . बच्चो पर आपने अधिकार को छोड़ना भी सीखे ताकि बच्चे अपने जिन्दगी जी सके और आप अपनी . आप अपनी दुःख की ख़ुद जिमेदार हैं सवाल आप के कर्तव्य का नहीं हैं सवाल हैं की जो आप कर रही हैं वो आप क्यों कर रही हैं क्या आप बाध्य हैं ये करने के लिये या आप इस लिये कर रही हैं क्योकि आप को लगता हैं ये करना ही सही हैं और क्योकि सब माता पिता करते हैं मै भी करू ?? आप की बेटी एक निहायत खुदगर्ज और मतलबी लगती हैं . हाँ देश के प्रति अआप के जज्बे कोई मेरा सलाम मै भी अपने देश के प्रति यही जज्बा रखती हूँ .

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  6. आपके प्यार मे कमी नही है, और इत्मीनान रखे, आपकी बेटी भी आपको उतना ही प्यार करती है.
    अमेरिका मे रहने के बाद, घर आदमी/औरत प्यार की ही खातिर जाते है.
    पर बहुत सी चीज़े, और ज़रूरी चीज़े, जो अमेरिका मे बिना सोचे मिलती है, उनके लिये भारत जाकर बडी जद्दोज़हद करनी पडती है. और इससे खीज़ होती है. कुछ दिन रहने पर आदत पड जाती है.

    जैसे नल मे 24 घंटे, गर्म और ठन्डा पानी मिलता है, 24 घंटे बिज़ली, धूल नही होती, खाना-पानी साफ-सुथरा मिलता है. और बिमार होने पर चीज़े एक व्यवस्थित ढंग़ से सबके लिये, काम करती है. जान-पहचान के बिना भी. काफी हद तक किसी भी पहर मे लोग सुरक्शित है. औरतो के प्रति छेडखानी नही है, भले ही किसी भी तरह की वेश भूषा हो.

    मै अमेरिका मे रहती हूँ, और शायद मेरी कुछ बाते भी मेरे परिवार के दूसरे लोगों का दिल दुखाती होंगी. पर उनसे मेरा प्यार कम नही है.
    दो साल पहले मै अपने तीन साल के बेटे को लेकर एक शादी मे गयी थी, घर कई लोगों से भरा था, और जो भी मेरे बेटे को देखता, उसके गाल नोचने लगता. वो छोटा बच्चा दर्द से और इस व्यवहार से बहुत डर गया, और अपने कमरे से बाहर आने को राज़ी नही हुया. अंत मे मुझे कहना पडा कि "मेरे बच्चे को कोई न छूये". सो उसे लगातर अपने साथ रखना पडा और लोगों को जो भी उसे एप्रोच करते उन्हें कहना पडा.
    बहुत से रिस्तेदारो को ये बात बूरी लगी, पर एक निरीह छोटे बच्चे के साथ उसकी मा नहीं खडी होगी तो कोन होगा?
    इसी तरह उसे, बज़ार की मिठाई, खाना-पीना, सब कुछ मुझे सोच समझ कर देना पडा, और उसका इंतेज़ाम करना पडा. अब अगर प्यार से दादी-नानी, किसी मिठायी का टुकडा उसके मुह डाले तो मना करना पडा.

    ऐसा नही है, कि मेरा बच्चा दूसरे बच्चो से बढकर है, पर तीन हफ्ते मे इतनी बडी यात्रा, और अचानक से एक अलग महौल के साथ बच्चे का शरीर सम्भल नही पाता. एड्जस्ट होने के लिये समय लगता है, और फिर वापस एक लम्बी यात्रा.

    अमेरिका मे छोटे बच्चे को लोग बिना हाथ धोये नही छूते, पर अगर यही बात आप बाहर से आये किसी व्यक्ति को कह दो भारत मे, कि पहले हाथ धो ले, फिर बच्चे को पकडे तो माता-पिता बुरा मान जाते है.

    इसी तरह से मुझे किसी भी अनाम-सनाम रिश्तेदार के गन्दे पैर छूने से भी आपत्ति है.

    कुछ इस तरह से भी देखे, तो आपको अपनी लडकी से शिकायत नही होगी, और आपका रास्ट्र-प्रेम भी धक्के से बच जायेगा.

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  7. आपके लेख की कुछ बातें विचित्र हैं। लगभग ३८ वर्ष पहले मेरा भी ऐपैन्डिसाइटिस का औपरेशन हुआ था। उस जमाने में ही मुझे उसी दिन उठकर बैठने को व चलने फिरने को कहा गया। आपकी बिटिया को कुछ अन्य परेशानियाँ भी रही होंगी। मुझे ध्यान नहीं कि यह औपरेशन ऐसा तकलीफदेह होता है कि किसी को माँ या किसी अन्य पर चिल्लाने की आवश्यकता पड़े। मैं तो आराम से हस्पताल के जनरल वार्ड में अकेली रह लेती थी, जबकि मैं १४ साल की ही थी। औपरेशन से पहले का समय जब दर्द होता है अधिक तकलीफदेह रहा, परन्तु किसी पर चिल्लाने से दर्द कम तो नहीं होता।
    मैं बेटी भी हूँ और दो बेटियों की माँ भी। न तो माँ पर चिल्लाने की सोच सकती हूँ न ही बेटियों का मुझपर चिल्लाने की! किशोरावस्था में बेटियाँ थोड़ा परेशान कर सकती हैं परन्तु बड़ी हो जाने पर तो वे सदा माँ की ही सहायता करना चाहती हैं। आज वे मुझसे कुछ भी काम करवाना पसन्द नहीं करतीं। बच्चों के लिए जो भी बन पड़े कीजिए परन्तु जब वे बड़े होकर भी माँ से बचकानी हरकतें करें तो उन्हें बढ़ावा देना गलत है। और आप क्यों उसके कपड़े सिलवाने, सिलने को इतनी चिन्तित रहती हैं? कपड़े इतने भी महत्वपूर्ण नहीं !
    एक बात और , मुझे आश्चर्य है कि जब बेटी की तबीयत खराब हो आप स्नान, तैयार होने आदि की चिन्ता में लगी रहीं। कहीं यही तो उसकी झुँझलाहट का कारण नहीं?
    वैसे यह आपका मामला है परन्तु जब ब्लॉग पर आ गया तो कहना ही पड़ा।
    घुघूती बासूती

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  8. bacche chahe ladki ho yA ladka is tarah ka laad jayda uchit mujhe to sahi nahi lagta ..bacche sab pyaare hote hain par wah bhi mata pita ki takleef ko samjhe ...aap ek acchi maa hai koi sahq nahi ..par is tarah yun bacche jab karte hain to uske jimmedaar bhi ham khud hi hain

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  9. Yahan poochhe gaye sabhi sawalonke jawab to de nahi paungi...han, us sawal ka ki betiki tabiyat kharab hote huebhi mai snan aadi me kyon lagi rahi, is baatka uttar dena chahti hun. Jab mai snanke liye gayi to mujhe uski sarjaryke baareme nahi pataa tha!!Uska phone attend karnr mai snangruhse baahar nikalee thi.so jayaz hai ki mai jaldeeme kyon na ho snan to poora karteehi!Jis aur taiyyareeka ullekh hai wo koyi mera saz-singaar nahi tha. wo to asptaalke liye awashyak cheezen jama karnrki taiyyaree thi!
    Uski suvidhake liye nity seeni padee. jo readymade mil rahee theen wo sab transparent thee...isliye mujhe apnee sadiyan tatha krte kaatke seena pada.Mai in sab kaamonki shkayat nahee kar rahi hun...kripaya is baatko dhyanse samajhe. Mai sirf itna kehna chaah rahi thi ki bharatme jo use ek support system mila wo Americame mil nahi saktaa tha.
    Raha takleefke sawal, to han, mai khud bohot takleef seh sakti hun,bitiya utnee nahi. maibhi zara hairan thi lekin phir yebhi yaad tha ki use kidni stonebhi dard de raha hoga.
    Han chidiya ghosala chhod ud jaatee hai...isi vishaype mere do lekh blog pe maujood hain..."Khali haath shaam aayi hai" tatha," Ja ud jaare Panchhee". gar samay ho to zaroor padhiyega.
    Nahi mujhe,aajbhi unse koyi ummeed nahi. mai binaa kisee ummeedkehi mujhe jo karna hota hai karti hun...han insaan hun, kabhi uskaa anya logonke samne zorse daant dena zaroor akhartaa hai, lekin mai in baatonko ghanton galese lagaye nahi rakhti. Meri beteeme bohot se gunbhi hain...yahan sawal sirf ye utha tha ki bharat jaisa support system amreecame milhi nahi sakta. is sachko to nakara nahi jaa sakta.
    Phir kabhi kuchh aur baaten mulaqaaten hongee. Aap sabheeka dhanyawad!

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  10. .

    कुछेक विसंगतियों को छोड़..
    सच के बहुत ही क़रीब है, यह रचना ।


    ख़ैर इतना तो चलता ही है..

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