नारी सशक्तिकरण का मतलब नारी को सशक्त करना नहीं हैं । नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट का मतलब फेमिनिस्म भी नहीं हैं । नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट का मतलब पुरूष की नक़ल करना भी नहीं हैं , ये सब महज लोगो के दिमाग बसी भ्रान्तियाँ हैं । नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट का बहुत सीधा अर्थ हैं की नारी और पुरूष इस दुनिया मे बराबर हैं और ये बराबरी उन्हे प्रकृति से मिली है। नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट के तहत कोई भी नारी किसी भी पुरूष से कुछ नहीं चाहती और ना समाज से कुछ चाहती हैं क्योकि वह अस्वीकार करती हैं की पुरूष उसका "मालिक " हैं । ये कोई चुनौती नहीं हैं , और ये कोई सत्ता की उथल पुथल भी नहीं हैं ये "एक जाग्रति हैं " की नारी और पुरूष दोनो इंसान हैं और दोनों समान अधिकार रखते हैं समाज मे । बहुत से लोग "सशक्तिकरण" से ये समझते हैं की नारी को कमजोर से शक्तिशाली बनना हैं नहीं ये विचार धारा ही ग़लत हैं । "सशक्तिकरण " का अर्थ हैं की जो हमारा मूलभूत अधिकार हैं यानी सामाजिक व्यवस्था मे बराबरी की हिस्सेदारी वह हमे मिलना चाहिये । कोई भी नारी जो "नारी सशक्तिकरण " को मानती हैं वह पुरूष से सामजिक बराबरी का अभियान चला रही हैं । अभियान कि हम और आप {यानि पुरूष } दुनिया मे ५० % के भागीदार हैं सो लिंग भेद के आधार पर कामो / अधिकारों का , नियमो का बटवारा ना करे । नारी पुरूष एक दूसरे के पूरक हैं , इस सन्दर्भ मे उसका कोई औचित्य नहीं हैं क्योकि वह केवल नारी - पुरूष के वैवाहिक रिश्ते की परिभाषा हैं जबकि नारी -पुरूष और भी बहुत से रिश्तो मे बंधे होते हैं जहाँ लिंग भेद किया जाता हैं । "नारी सशक्तिकरण " पुरूष को उसके आसन से हिलाने की कोई पहल नहीं हैं अपितु "नारी सशक्तिकरण " सोच हैं की हम तो बराबर ही हैं सो हमे आप से कुछ इसलिये नहीं चाहिये की हम महिला हैं । नहीं चाहिये हमे कोई इसी "लाइन " जिस मे खडा करके आप हमारे किये हुए कामो की तारीफ करके कहे "कि बहुत सुंदर कम किया हैं और आप इस पुरूस्कार की हकदार हैं क्योकि हम नारी को आगे बढ़ाना चाहते हैं " । ये हमारे मूल भूत अधिकारों का हनन हैं । "नारी सशक्तिकरण " की समर्थक नारियाँ किसी की आँख की किरकिरी नहीं हैं क्योकि वह नारी और पुरूष को अलग अलग इकाई मानती हैं , वह पुरूष को मालिक ही नहीं मानती इसलिये वह अपने घर को कुरुक्षेत्र ना मान कर अपना कर्म युद्ध मानती हैं । "नारी सशक्तिकरण " की समर्थक महिला चाहती हैं की समाज से ये सोच हो की " जो पुरूष के लिये सही वही नारी के लिये सही हैं । "नारी सशक्तिकरण " के लिये जो भी अभियान चलाये जा रहे हैं वह ना तो पुरूष विरोधी हैं और नाही नारी समर्थक । वह सारे अभियान केवल मूलभूत अधिकारों को दुबारा से "बराबरी " से बांटने का प्रयास हैं । "नारी सशक्तिकरण " को मानने वाले ये जानते हैं की इस विचार धारा को मानने वाली नारियाँ फेमिनिस्म का मतलब ये मानती हैं की हम जो कर रहे हैं या जो भी करते रहे हैं हमे उसको छोड़ कर आगे नहीं बढ़ना हैं अपितु हमे अपनी ताकत को बरकरार रखते हुए अपने को और सक्षम बनाना हैं ताकि हम हर वह काम कर सके जो हम चाहे और इसके लिये अब अगर समाज को बदलना है तो वह बदले अपनी वह रुढिवादी नियम जो कहते हैं
"ढोल गंवार शुद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी" सुंदर कांड दोहा ५८
हमारा ये नारी ब्लॉग इसी पहल को नेट के जरिये आगे बढाने का एक प्रयास हैं और इस लिये आप को इस ब्लॉग पर नारी की कमजोरी से लेकर नारी की उपलब्धियों तक का सफर दीखेगा । और इस ब्लॉग के सदस्यों की हर सम्भव कोशिश होगी की नेट पर हिन्दी ब्लोगिंग मे जो भी ब्लॉगर नारी के प्रति असंवेदनशील शब्दों को लिखते उनको उनकी भाषा और मानसिक भ्रांतियों से अवगत कराया जाऐ । यही एक छोटी सी पहल हैं हमारी ।
"जो हमारा मूलभूत अधिकार हैं यानी सामाजिक व्यवस्था मे बराबरी की हिस्सेदारी वह हमे मिलना चाहिये", इस से कोई इनकार नहीं कर सकता. मेरे विचार में बस यहीं रुक जाना चाहिए. अगर नारी सशक्तिकरण का मतलब नारी को सशक्त करना नहीं हैं तब नारी सशक्तिकरण जैसे शब्दों का प्रयोग ही क्यों करें जो बिना मतलब का भ्रम पैदा करते हैं.
ReplyDelete"कोई भी नारी जो 'नारी सशक्तिकरण' को मानती हैं वह पुरूष से बराबरी का अभियान चला रही हैं । अभियान कि हम और आप {यानि पुरूष} दुनिया मे ५० % के भागीदार हैं सो लिंग भेद के आधार पर कामो का, नियमो का बटवारा ना करे", ऐसा कह कर आप पुरूष को अपने अभियान के अन्दर घसीट रही हैं. पुरूष से पूर्ण रूप से स्वतंत्र अभियान क्यों नहीं चलातीं आप?
"वह पुरूष को मालिक ही नहीं मानती इसलिये वह अपने घर को कुरुक्षेत्र ना मान कर अपना कर्म युद्ध मानती हैं", इस से भी कोई इनकार नहीं कर सकता.
"इस ब्लॉग पर नारी की कमजोरी से लेकर नारी की उपलब्धियों तक का सफर दीखेगा", बहुत अच्छी बात है. इन कमजोरिओं और उपलब्धियों के लिए क्रेडिट या डिस्क्रेडिट जो भी मिलना है नारी को ही मिले.
क्यों न यह अभियान हो - एक स्वतंत्र व्यक्तित्व का निर्माण जो सामजिक और पारिवारिक व्यवस्था को पूर्णत्व प्रदान करे.
मानसिक रुप से उन्नत महिला ही सशक्त मानी जायेगी,वह आर्थिक रुप से सबल हो यह आवश्यक नही परन्तु वि्चारो मे स्वतन्त्रता अवश्य होनी चाहिये,५०% की भगीदर्री को साबित करने की आवश्यकता नही,ध्यान रहे.." नारी प्रतीक हैं शक्ति का "
ReplyDeleteमानसिक रुप से उन्नत महिला ही सशक्त मानी जायेगी,वह आर्थिक रुप से सबल हो यह आवश्यक नही परन्तु वि्चारो मे स्वतन्त्रता अवश्य होनी चाहिये,५०% की भगीदर्री को साबित करने की आवश्यकता नही,ध्यान रहे.." नारी प्रतीक हैं शक्ति का "
ReplyDeleteकाफी अच्छा आरंभ. आने वाले दिनों में हम इस चिट्ठे पर कई सशक्त लेख देखने की उम्मीद करते हैं
ReplyDeleteयह भी उम्मीद है कि पुरूष एवं स्त्री को एक दूसरे का पूरक समझ करे लेख लिखे जायेंगे.
अच्छा शुरुआत है. आपका लेख पढ कर लगा कि आप का सोच अलग है और जरुर कुछ अलग पढने या देखने को मिलेगा यहां. ढोल गवांर वाला कविता तो हर नारी सशक्तिकरण वाले पढते हैं. आप कुछ अलग करें तो ज्यादा अच्छा लगेगा.
ReplyDeleteNew Indian woman arrived shouldn't move on the path set by old Nari Sashaktikaran concepts. They can make men party to women empowerment.
-Sarvesh
सबसे पहले तो यह जो कहा जाता है,
ReplyDeleteढोर,गंवार,शुद्र,पशु,नारी
ये सब ताड़न के अधिकारी
इसमें ताड़न/ ताड़ना शब्द का अर्थ प्रताड़ना (castigate/ admonition) ही क्यों कहा जाता है?
ठीक है पुरूष कहते होंगे, लेकिन महिलायों की भी यही सोच रहती है, कथित प्रगतिशील महिलायों की भी!!
मात्र इसी दोहे में ही इस शब्द का अर्थ ताड़ना (detect/ guess/ divine [transitive verb] सोच कर फिर से पढ़िये।
सब साफ हो जायेगा।
लेकिन सोचे कौन?
सीधी सी बात है
Ladies first !!
"पुरूष को अपने अभियान के अन्दर घसीट रही हैं. पुरूष से पूर्ण रूप से स्वतंत्र अभियान क्यों नहीं चलातीं आप? "
ReplyDeleteसुरेश जी , बस यहीं हम गलती कर जाते हैं...नारीवाद की सोच या नारी को शक्ति देने की योजना समाज को संतुलित जीवन देने के लिए शुरू हुई... आप सोच कर देखिये.... पुरूष अपनी शिक्षा खत्म करते ही 60 साल की उम्र तक लगातार परिवार के लिए जूझता रहे ,,कमाता रहे. अपने पत्नी और बच्चों के साथ कुछ पल बिताने का वक्त ही नही पा सके ... ..और उधर स्त्री घर-गृहस्थी और बच्चों में लगी रहे..थक हार कर बदहवास सी अपने जीने को कोसती रहे...मासूम बच्चें माता-पिता दोनों के लिए ही तरसते रहें... मेरे विचार में दोनों का जीवन ही बेरंग हो जैसे....
मानवीय अधिकार पाकर स्त्री समाज में पुरूष के बराबर खड़ी होकर समाज को उन्नत रूप ही देती,,,इस सोच को पुरूष के कमज़ोर वर्ग ने अपने अहम् पर चोट की तरह लिया.. नकार नही सकते कि आज वही समस्या और विकट हो गयी क्योंकि स्त्री और पुरूष दोनों एक साथ चले ही नही.... कोई भी अभियान या सिद्दांत अच्छी सोच लेकर ही चलता है लेकिन कई तरह की भ्रांतियाँ उसे दिशाहीन कर देती हैं...
सामजिक और पारिवारिक व्यवस्था को पूर्णत्व प्रदान करने के लिए साथ साथ ही चलना होगा.
सबसे पहले रचनाजी को इस नयी पहल के लिये बधाई.यदि नारी पुरुष के बराबर सामाजिक, मानवीय,हक के लिये लड रही है तो इसमें पुरुष के अहम को चोट नहीं पहुंचनी चाहिये.किन्तु पीढी दर पीढी पुरुष ने जो महिलाओं के साथ बर्ताव अपने घर में और समाज में देखा है उस मानसिकता से वो प्राकृतिक तरीके से निजात नही पा सकता,इसी बदलाव के लिये नारी हर स्तर पर कोशिश कर रही है जिसे आज हम नारी सशक्तिकरण अभियान का नाम से जानते हैं.जरूरत सिर्फ़ नारी के सशक्त होने की नहीं है, पुरुष की मानसिकता को सशक्त करने की मुहिम भी नारी को ही चला्नी होगी.
ReplyDelete@बलबिन्दर
ReplyDeleteक्यूँ सर .....जब खाई में कूदना होगा तो ladies first,
और जब खाना खाना होगा तो पुरुष the gentleman first!
We are not talking about the position that is 1st or 2nd...ok!!
Jo baat galat hai to galat hai...wo purush aur nari dono ke liye galat hai. Purush bhi kyun kahenge?? Kisne diya hai unhe right aisa kahne ko?
Tusidasji ke dohe ko bhulkar apna dimag chalaiye ki aap kya sochte hein. Please come to the main topic.
I don't want to divert the topic so let us come to the main topic....
rgds.
@बलविंदर
ReplyDeleteशब्दों का अर्थ /अनर्थ प्रसंग से जुडा होता हैं । आगे आप स्वयम इतने ज्ञानी हैं । विषय गत कमेन्ट करते तो कुछ हमे भी आप के ज्ञान और उर्जा का फायदा होता ।
@रेवा
Ladies First जब कहा जाता हैं तो समझो कि तुमको जिन्दगी मे आगे बदने का अनुपम मौका हैं । और मेने हमेशा ladies first को first ladies समझा हैं
" जो पुरूष के लिये सही वही नारी के लिये सही हैं । " यह विचार उचित प्रतीत नहीं होता, जो पुरुष के लिये सही है वह नारी के लिये ओर जो नारी के लिये सही है वह पुरुषों के लिये सही नहीं हो सकता क्योंकि दोनों में रचनात्मक, स्वाभाविक व कार्य करने की प्रणालियों में ही मूलभूत भिन्न्तायें हैं, इसका आशय यह नही है कि नारी दोयम दर्जे की हकदार है या पुरुष मालिक है. स्रष्टि में कोई किसी का मालिक नहीं हैं किन्तु कोई किसी के समान भी नहीं है, सभी को अपनी आवश्यकता व सामर्थ्य के अनुरुप विकास के अवसर मिलने ही चाहिये. समानता के नाम पर संघर्ष से नर व नारी दोनों को ही कुछ हाथ नहीं लगने वाला दोनों एक-दूसरे के स्वाभाविक मित्र हैं प्रतिस्पर्धी नहीं. जो कुछ नारी को चाहिये वह उसे प्रसन्न्ता के साथ मिलना ही चाहिये, नारी सशक्तिकरण केवल नारी का सशक्तीकरण नहीं है, पुरुष का भी सशक्तीकरण है क्योंकि नर-नारी की शक्ति एक दुसरे के विरोध में नहीं, सहयोग में ही है और अन्ततः सहयोग में ही लगनी है.
ReplyDeleteमीनाक्षी जी, यह फ़ैसला नारी को करना होगा कि वह 'पुरूष के समान अधिकार' पुरूष के साथ चलकर अर्जित करेंगी या पुरूष से अलग एक स्वतंत्र अभियान चलाकर. परिवार और समाज एक व्यवस्था के अंतर्गत चलते है. स्त्री और पुरूष के बीच कामों का बंटवारा उन की योग्यता और सक्षमता के आधार पर किया जाता है, किया जाना भी चाहिए. यह व्यवस्था हर परिवार के लिए अलग हो सकती है. इस व्यवस्था में 'मेरे', 'तुम्हारे' की छाया में 'हमारे' की भावना दब न जाए इसका ध्यान रखना बहुत जरूरी है. एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना जरूरी है. परिवार व्यवस्थित रूप से चले तो समान अधिकार अपने आप ही आ जायेंगे.
ReplyDelete(यहाँ अधिकार शब्द अधिकार और जिम्मेदारी दोनों के लिए प्रयोग हुआ है)
पति ने पत्नी से कहा :-
ReplyDelete"ढोर,गंवार,शुद्र,पशु,नारी
ये सब ताड़न के अधिकारी"
इसका अर्थ समझती हो ये समझाऊँ.
पति ने जवाब दिया
"इसका अर्थ तो बोल्कुल ही साफ है
इसमे एक जगह मैं हूँ चार जगह आप है"
सिर्फ़ यही रास्ता है.
बाकी तो पति पत्नी या स्त्री पुरूष जो भी कहें दोनों का जीवन की सफलताओं पर, असफलताओं पर अच्छे पर, बुरे पर समान अधिकार हैं. ये दोनों एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक है. एक के बिना दूसरा अधूरा है.
मेरा यही मानना है.
सभी मित्रो से निवेदन हैं कि "नारी और पुरूष एक दूसरे के पूरक हैं " ये सन्दर्भ केवल पति पत्नी के लिये ही होता पर नारी सशक्तिकरण जब हम बात करते हैं तो हम नारी का रिश्ता नारी से , पुरूष से और समाज से तीनो को लेते हैं । पुरूष के रूप मे पति भी हैं , बेटा भी , पिता भी , दोस्त भी , प्रेमी भी , गुरु भी । और आज कल कि नारी अविवाहित भी हैं और अकेली अपने काम करने मे सक्षम भी सो " नारी सशक्तिकरण " उस नज़रिये से देखे जहाँ नारी लीक से हट कर काम करना चाहती हैं और करती भी हैं ।
ReplyDeleteजहाँ तक पति पत्नी के सम्बन्ध हैं मेरा मानना भी यही हैं कि इस जगह नारी और पुरूष एक दूसरे को अगर पूर्णता नहीं देते तो वह शादी ही अधूरी हैं और ऐसे संबंधो को निभाना या ना निभाना एक ही बात हैं ।
आप के वक्तव्य की कुछ पंक्तियों ने सोचने पर विवश कर दिया है। पहले आप कह रही हैं- 'नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पावर्मेंट का मतलब फेमिनिस्म भी नहीं हैं।'
ReplyDeleteफिर आप कह रही हैं- ' "नारी सशक्तिकरण" को मानने वाले ये जानते हैं की इस विचार धारा को मानने वाली नारियाँ फेमिनिस्म का मतलब ये मानती हैं की हम जो कर रहे हैं या जो भी करते रहे हैं हमे उसको छोड़ कर आगे नहीं बढ़ना हैं अपितु हमे अपनी ताकत को बरकरार रखते हुए अपने को और सक्षम बनाना हैं ताकि हम हर वह काम कर सके जो हम चाहे और इसके लिये अब अगर समाज को बदलना है तो वह बदले '
इस दूसरे कथन में आप ने नारी सशक्तिकरण और फेमिनिज्म को एक जैसा कर दिया है। वस्तुतः फेमिनिस्म एक पुराना शब्द है जो नारी आंदोलन के लगभग डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास को समेटता है, जिस में इस ने अनेक रूप, धारण किये हैं। अनेक धाराएँ रही हैं। उसी तरह जैसे भक्ति आंदोलन और आजादी के आंदोलन की अनेक धाराएँ रही हैं। अब इन रूपों, धाराओं में भेद करने के लिए हर रुप को अलग से चीन्हने के लिए एक नए नाम की आवश्यकता होती है। उसी तरह नारी सशक्तिकरण भी नारीवाद की ही एक धारा है।
आगे आप कहती हैं-
"नारी सशक्तिकरण " पुरूष को उसके आसन से हिलाने की कोई पहल नहीं हैं
मैं आप की इस बात से सहमत नहीं। सारे विश्व में मानव समाज में पुरुष प्रधानता का बोलबाला है। सारे अधिकार और शक्तियाँ प्रधानता से पुरुषों ने हथियाए हुए हैं। अब नारियाँ सशक्त हो कर अपने नैसर्गिक अधिकारों पर कायम होना चाहती हैं तो पुरुषों के कब्जे जबरन हथियाए हुए अधिकार तो निकलने ही हैं। तब उन का आसन तो हिल ही रहा है। वे क्यों न चिंतित हों? इन हथियाए हुए अधिकारों से वंचित होने से बचने के लिए। और वे यह मान भी लें कि नारियाँ उन के नैसर्गिक अधिकार कभी न कभी तो वापस पा ही लेंगी तो भी वे अधिक से अधिक काल तक उन हथियाए हुए अधिकारों का उपभोग करने की कोशिश क्यों न करें। हर प्रभू वर्ग यही करता है, कर रहा है और करता रहेगा। इस कारण टकराव तो अवश्यंभावी है। और आसन भी हिल ही रहा है।
आप ने लिखा-
अपने घर को कुरुक्षेत्र ना मान कर अपना कर्म युद्ध मानती हैं। यहाँ कर्म के साथ युद्ध शब्द को बदल कर क्षेत्र कर दें। हालाँकि मैं ने उसे क्षेत्र ही पढ़ा है।
और अन्त में मैं तुलसीदास की इस चौपाई- ढोर गंवार शुद्र पशु नारी। सकल ताड़न के अधिकारी।। इस चौपाई में शब्द ढोर न हो कर ढोल है, क्यों कि पुनः पशु शब्द का प्रयोग है, तुलसी ऐसा नहीं कर सकते। फिर इस चौपाई के कथन को उन्हों ने अपनी कथा में समुद्र से विनम्रता पूर्वक अपनी धृष्टता के लिए क्षमा करने के लिए कहलवाया है। यह तुलसी का अपना विचार नहीं था। ऐसे अवसर पर कोई भी अपराधी कहेगा कि बुरा होना मेरा स्वभाव था, उसी के वश मुझ से यह हुआ जिसे मेरी धृष्टता या अपराध समझ लिया गया। इस कहावत को तुलसी ने उस अर्थ में नहीं कहा जिस में बलविन्दर जी सुझा रहे हैं। बल्कि यह उक्ति एक कहावत के रूप में भाषा में उस समय भी प्रचलित थी जब तुलसी मानस की रचना कर रहे थे। उस समय घोर सामंती, चातुर्वर्ण्य़, समाज अस्तित्व में था और स्त्री की स्थिति समाज में शूद्र, पशु और गंवार जैसी ही थी। तुलसी ने इसे जानबूझ कर उपयोग किया था। और इस उक्ति से तुलसी के समय के समाज और उस से नारी की अवस्था का पता लगता है। यह तुलसी के साहित्यकार की सफलता है।
मेरा यह मनाना है कि स्त्री और पुरूष दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं ..दोनों का दूसरे के बगैर अस्तित्व नही है ..पर जहाँ एक स्त्री या एक पुरूष अपने अहम् को अपने रिश्ते से बढ़ कर मानते हैं गड़बड़ वहीं शुरू होती है ,,..नारी मुक्ति का मतलब पुरूष से छुटकारा पाना तो कभी नही है मेरे ख्याल से ..बस यदि दोनों के विचारों को अस्तित्व को समान माने तो यह बहस पैदा ही नही होगी ..
ReplyDeletestree Purush ek doosare ke poorak hain .Ranjuji ki is bat se main sahmat hoon. har bat ka hal vivad ya zagde se nahi nikalta. bina zagda kiye bhi hum apane adhikar manwa sakte hain. Nari ko na to pair ki dhool hi hona chahiye na Aank ki kirkiri.
ReplyDeleteAsha
please help me
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