ना जाने कितनी बार ये प्रश्न दिमाग में आता हैं की जहां नारी धन अर्जित नहीं करती वहाँ उसको अपने खर्चे के लिये पैसा कौन देता हैं ?
बहुत बार ऐसी गृहिणिया जो धन खुद अर्जित नहीं करती हैं वो उस पैसे को अपने लिये रखती हैं जो उनको तीज त्यौहार मायके से मिलता हैं ।
कुछ घर खर्च से बचा लेती हैं और पति से छुपा कर रख लेती हैं
कुछ को पति / पुत्र / पुत्री पैसा देते हैं उनके खर्च के लिये
लेकिन एक प्रश्न बार बार लौट कर आता हैं की धन अर्जित ना करने वाली नारियों के लिये उनके पति क्यूँ नहीं अलग से क़ोई खाता खोल देते हैं जो केवल उस नारी का हो ।
जोइंट खातो की परम्परा भी नयी हैं , अच्छी पहल हैं पर इस में भी एक जवाब देही बन जाती हैं
चोखेर बाली ब्लॉग , नारी ब्लॉग और जील ब्लॉग पर ये मुद्दा कई बार उठा और हमेशा एक बहस में इसका अंत हुआ , हर महिला ने चाहा की अलग पैसा मिले पर पुरुष या तो चुप रहे या उन्होने कहा की जो कमाता हैं उसको देखना पड़ता हैं जितनी चादर इत्यादि और कुछ ने जिसमे पुरुष और स्त्री दोनों हैं इसको महज एक विवाद वाली पोस्ट मान कर मुद्दे को ही ख़ारिज कर दिया ।
हमारे देश के कानून ऐसे बनाये गए हैं जिस में ये ध्यान रखा गया हैं की नारी इस समाज में दोयम हैं इस लिये उसको सुरक्षित करो । इस नज़रिये से एक कानून ऐसा हैं जहां पत्नी की मृत्यु के पश्चात उसकी संपत्ति पर उसके पति का क़ोई अधिकार नहीं हैं । पत्नी की संपत्ति पर केवल उसके बच्चो का अधिकार हैं ।
इसके उल्ट पति की मृत्यु के पश्चात पत्नी , माँ और संतान सब समान अधिकारी होते हैं उसकी संपत्ति के ।
यानी एक डर कहीं ना कहीं जरुर रहता होगा ससुराल वालो के मन में , पति के मन में , की अगर पत्नी के नाम कुछ कर दिया और पति की मृत्यु हो गयी तो जो पत्नी के नाम हैं उस पर किसी का क़ोई अधिकार नहीं होगा ।
आज भी कम उम्र में जो नारियां विधवा हो जाती हैं बहुधा मायके चली जाती हैं और कई बार दोबारा विवाह भी कर लेती हैं ऐसे में अगर वो अपने पूर्व पति की बिमा पालिसी , बैंक अकाउंट , शयेर , अफ डी इत्यादि में नॉमिनी हैं तो पति के माता पिता को कुछ भी नहीं मिलता हैं ।
पत्नी को जेब खर्च क्यूँ नहीं का प्रश्न करना जितना आसान लगा था मुझे जब मैने उसके समाधान खोजने की जगह कारण की खोज की तो मुझे इस कानून का पता चला ।
इस कानून में बदलाव की आवश्यकता हैं ताकि जो अधिकार पत्नी को हैं अपने पति की संपत्ति पर , पति को भी हो अपनी पत्नी की संपत्ति पर ।
मेरा मानना हैं की पत्नी के पति की मृत्यु हो जाने पर दुबारा विवाह करने पर जो भी पहले पति का उसको नॉमिनी होने की वजह से मिला हैं वो सब पति के घरवालो को वापस जाना चाहिये । और अगर पत्नी मायके वापस जाती हैं तो भी उसको वो सम्पत्ति जो नॉमिनी होने की वजह से "केवल उसको " मिली हैं उसको अपनी सास के साथ बराबर से बाँट लेना चाहिये अगर बच्चे नहीं हैं तो ।
सरकारी नौकरी में शायद ये प्रावधान हैं की विधवा को अगर पति की जगह नौकरी दी जाती हैं तो वो दूसरी शादी के बाद ख़तम हो जाती हैं और पेंशन पर भी अधिकार नहीं रहता { किसी के पास पूरी जानकारी हो तो बाँट दे सब से कमेन्ट में } ।
इस का एक दुष्परिणाम हैं की विधवा जो नौकरी पा जाती हैं वो दुबारा विवाह से कतराती हैं यानी उनकी जिंदगी वही रुक जाती हैं । इस विषय पर गहन चिंतन की आवश्यकता हैं ।
इस पोस्ट पर आप के कमेन्ट/ विचार और प्रश्न देख कर इस पर विस्तार से बात की जा सकती हैं ।
अंत में मै यही मानती हूँ की हर नारी कोशिश करनी चाहिये की वो धन भी अर्जित कर सके । अपना अर्जित धन ही वास्तव में अपना होता हैं क्युकी उस पर क़ोई प्रश्न चिन्ह कभी नहीं लगता । जो बेटियाँ अविवाहित हैं और उन्होने कमाना शुरू कर दिया हैं उनको घर खर्च में पैसा अवश्य देना चाहिये । जो बहू हैं और कमाती हैं यानी जो सास ससुर के साथ रहती हैं उनको भी घर खर्च में योगदान देना ही चाहिये ।
अगर हम समानता की बात करते हैं तो हमको सबसे पहले उस नियम को अपने ऊपर ही लागू करना चाहिये ।
those woman who dont earn have to understand that the money their husbands give them or deposit in their name or where ever they are nominee legally after their death the money/ property will not go to husband but only to their children .
in case of death of married man , the property is divided between his mother , wife and children equally but in case a married woman dies the property is inherrited by her children
i always recommend that woman should work and earn so that actual equality of gender prevails and dependency become obsolete
चलते चलते आप को एक किस्सा बता रही हूँ , आज से ३० साल पहले की बात हैं
एक ससुर ने अपनी सारी सम्पत्ति का वारिस अपनी बहू को बना दिया । ससुर के १ बेटा और ३ बेटी थी । लेकिन वारिस उन्होने अपनी बहू को घोषित किया बाकयदा विल बना कर । चल अचल संपत्ति में एक घर और एक फैक्ट्री थी ।
एक दिन उनकी बहू जो आज खुद ६० साल की महिला हैं और जिनके ३ विवाहित बेटे और १ तलाक शुदा बेटी हैं से बात हुई और उन से प्रश्न किया की आखिर आप के ससुर ने आप पर इतना विश्वास किया तो कैसे ।
उनका जवाब था ससुर अपनी पूरी सम्पत्ति केवल अपने पोतो {यानि बेटे के बेटो } को ही देना चाहते थे वो उस में अपनी बेटियों का क़ोई अधिकार नहीं मानते थे इस लिये उन्होने सारी सम्पत्ति बहू के नाम कर दी क्युकी बहू की सम्पत्ति पर केवल बहू और उसके बच्चो का अधिकार होगा । ससुर के मरने के बाद सास का भी अधिकार नहीं रहेगा अन्यथा उनके हिस्से का पैसा वो चाहे तो बेटियों को दे सकती थी ।
किस्सा अभी ख़तम नहीं हुआ हैं जब बहू ने अपनी बेटी की शादी की तो साल भर के अन्दर ही दामाद ने कहा की जो भी उसकी पत्नी का हिस्सा हैं वो पत्नी के नाम कर दिया जाए क्युकी क्या पता बाद में कुछ भी ना मिले ।
ऐसा नहीं किया गया तो अंत बेटी के तलाक पर जा कर हुआ ।
पिता और माँ की सम्पत्ति पर बेटी का बराबर का हिस्सा हैं पर समाज अभी भी उसको नकारता हैं कानून बनजाने के बाद भी क़ोई न क़ोई तरीका निकाल ही लेता हैं दुभात करने का ।
कुछ कानूनों को अगर बदलने का समय हैं तो कुछ को सख्ती से पालन करने और करवाने का भी समय हैं
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" जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की " "The Indian Woman Has Arrived " एक कोशिश नारी को "जगाने की " , एक आवाहन कि नारी और नर को समान अधिकार हैं और लिंगभेद / जेंडर के आधार पर किया हुआ अधिकारों का बंटवारा गलत हैं और अब गैर कानूनी और असंवैधानिक भी . बंटवारा केवल क्षमता आधारित सही होता है
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था
हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।
यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का ।
15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं
15th august 2012
१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं
15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं
15th august 2012
१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं
"नारी" ब्लॉग
"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।
" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "
हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था
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August 19, 2011
August 17, 2011
क़ोई भी किसी के जैसा नहीं हो सकता please dont compare
समानता का मतलब एक का दूसरे से compare करना समझ लिया जाता हैं ।
जो फिर कंडिशनिंग का दुष्परिणाम हैं
कितनी बार विवाहित नारी को हम ये कहते सुनते हैं
मेरे पति अपनी माँ , अपनी बहिन के लिये बहुत करते हैं मेरे लिये नहीं , इस लिये वो अच्छे पति नहीं हैं
सवाल उठता हैं की आप अपने पति को अगर किसी से मिलाना या कम्पयेर करना चाहती हैं तो आप को उसको उस पुरुष से कम्पयेर करना चाहिये जो किसी का पति हैं जैसे
आपके पिता
आपके भाई
आपके देवर
आपके नंदोई
अगर ये सब लोग अपनी पत्नियों के लिये जो करते हैं { जो आप को अच्छा लगता हैं } वो आप के पति आप के लिये नहीं करते तो निसंदेह आप के पति वो नहीं हैं जिस की छवि आप के मन में हैं या जिसकी अपेक्षा आप को हैं उनसे ।
वही अगर
आप के पिता ने अपनी बहिन यानी आप की बुआ और अपनी माँ यानी आपकी दादी के लिये
आप के भाई ने अपनी माँ यानी आपकी माँ और अपनी बहन यानी आप के लिये
आप के देवर ने आप की नन्द यानी आपके पति की बहिन और आपकी सास यानी आपके पति की माँ
आप के नंदोई अपनी माँ और अपनी बहिन
के लिये
आप के पति से कम करते हैं यानी
जितना आप ध्यान आपके पति अपनी माँ /बहिन का रखते हैं वो नहीं रखते तो
ये आप के पति का गुण हैं अवगुण नहीं
क्युकी आप इस गुण का मुकबला उनके पति होने के कर्तव्यो से करती हैं आप को लगता हैं वो आप के लिये कम करते हैं
जबकि एक बेटे की तरह और एक भाई की तरह जो इंसान इतना सफल हैं उस इंसान को पाकर आप को खुश होना चाहिये पर अपनी कंडिशनिंग के चलते आप "पति रूप " का मिलान " भाई रूप और बेटे रूप " से कर बैठती हैं ।
अगर आप के भाई आप को उतना सम्मान नहीं देते जितना आप के पति अपनी बहिन को देते हैं तो आप को नाराज अपने भाई से होना चाहिये पर आप नाराज पति से होती हैं
एक जैसे समान हालत में कौन क्या करता हैं कम्पयेर करते समय अगर इस बात को ध्यान रखा जाये तो सोच में बदलाव आता हैं
घर में बहू काम से वापस आते ही रसोई में घुस जाती हैं पर बेटी काम से आकर अपने कमरे में जा कर आराम करती हैं क्युकी पिता का घर बेटी का नहीं हैं ये उसने बचपन से सूना हैं और बहू ने भी यही अपने मायके में सुना हैं ।
अब अगर आप बेटी को ये कहे की देखो भाभी काम कर रही हैं तो आप को यही सुनने को मिलेगा की "शादी के बाद मै भी कर लूंगी " इस लिये बेटी को ये एहसास ही क्यूँ दिलाये की ये घर उसका नहीं हैं ।
किसी का बेटा अगर कुछ करता हैं और आप की बेटी वो करती हैं तो आप कहती मेरी बेटी उसके बेटे से कम नहीं लेकिन इस कहने से आप अपनी बेटी का वजूद ख़तम कर देती हैं । बेटियों के अस्तित्व को हमेशा नकारा जाता हैं जो कंडिशनिंग का दुष्परिणाम हैं क्युकी उंची सीढी पर तुलना में आज भी क़ोई न क़ोई बेटा लोगो को दिखता हैं .
बहू बेटी जैसी हैं
दामाद बेटे जैसा हैं
बेटी बेटे जैसी हैं
इत्यादि कह कर हम केवल और कम्पयेर करते हैं क्युकी कोइ भी किसी के जैसा नहीं हो सकता
in science experiments are always done in controlled conditions only then the results are compared . we can never compare two individuals who have been bought up in totally different situations and surroundings . and we should try to break the conditioning of society to make new paths that will help us in creating better living conditions around as .
every child irrespective of the gender does a lot for their parents but not for their in laws because in laws are not parents but in the process they forget the courtesy "law" they are also your parents so you are duty bound to take care of them
treat both set of parents equally .
never compare your wifes attitude towards her inlaws with your sisters attitude towards her parents contrary see how your sister behaves with her in laws and then compare how your wife behaves with her in laws
अपनी बेटी को समझाए की आप के बुढापे में उसको आप का ख्याल रखना हैं । ये उसका अधिकार हैं और ये उसका कर्त्तव्य भी । आप उस से पूछे अपने विवाह के पश्चात वो आप का ख्याल रखना कैसे मैनेज करेगी ? अगर आप अपनी सेवा का अधिकार केवल अपने पुत्र का समझते हैं तो आप बेटी को कम प्यार करते हैं ।
अधिकार दे अपनी बेटी को बराबरी का हर कर्तव्य निभाने में भी ।
कर्तव्यो का बंटवारा भी सामाजिक कंडिशनिंग की वजह से लिंग आधारित हो गया हैं. हर बच्चे का अपने माँ-पिता के लिये कर्तव्य को जब बेटे और बेटी का कह कर अलग अलग कर दिया जाता हैं तो असमान व्यवहार का जनम होता हैं और झुकाव एक तरफ हो जाता हैं
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