नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

December 18, 2012

अखबार पढ़ कर मेरे मन मे तो बस इतना आया ईश्वर इसे उठा लो .

 "अखबार पढ़ कर मेरे मन मे तो बस इतना आया ईश्वर इसे उठा लो . "





आज सुबह के अखबार में लिखा था की जिस डॉक्टर ने तुम्हारा ईलाज शुरू किया हैं उस का मानना हैं की उसने अपने 20 साल के डॉक्टर के अनुभव में इतना "ब्रुटल" घायल  रेप केस का "विक्टिम" नहीं देखा हैं .


डॉक्टर का कहना हैं की वो तुमको बचने की पूरी कोशिश कर रहा हैं . लेकिन जब तुमको लाया गया था तब तक 1 किलो खून तुम बहा चुकी थी . तुम्हारे चेहरे और पेट पर किसी बहुत हैं पैन हथियार से वार कर के उनको पूरी तरह से नष्ट किया गया हैं . तुम्हारी देखभाल कर रही नर्स कहती हैं की उसके कप कपी आजाती हैं जब वो सोचती हैं की जब तक तुम होश में रही होंगी तुमने कितना दर्द झेला होगा .

आज तुमको वैन्तिलएटर पर रख कर , एंटी बायोटिक देकर तुमको जिलाने की कोशिश जारी हैं , लेकिन उसके बाद गैंग्रीन हो जाएगा ये डॉक्टर मान रहे हैं यानी शरीर में जहर फैल जाएगा और अंगो को काटना पड़ेगा .


लोग जब कोई बीमार होता हैं तो ईश्वर से प्रार्थना करते हैं की उसे बचा लो . अखबार पढ़ कर मेरे मन मे तो बस इतना आया ईश्वर इसे उठा लो . 

हम तुम्हारे लिये कुछ नहीं करसकते . हो सके तो हमें क्षमा करके जाना . जबकि इस क्षमा के लायक हम हैं ही नहीं .


40 comments:

  1. हाँ रचनाजी ...ठीक कहा आपने ....ऐसे में उपरवाले पर से भी विश्वास उठ जाता है ...क्या वह कहीं है ..है तो उसने कैसे यह होने दिया ...कहते हैं इश्वर की मर्ज़ी के बगैर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता ...फिर ऐसा कृत्य...क्या इसमें भी इश्वर की मर्ज़ी थी .....हम तो हर दुःख तकलीफ में उसीको याद करते हैं ...मगर ऐसे हादसों के बाद......:(

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  2. मन से तो यही निकल रहा है है रचना जी ,जीने के बाद भी उस दर्दनाक घटना को हर वक़्त साथ लेकर कैसे जी पाएगी ,दूसरी और मन कहता है की काश वो ठीक हो जाए ,कैसे जियेंगे माँ बाप भी ,इस घटना ने जो मन में आक्रोश और ऐसे असामाजिक तत्वों के प्रति वित्रश्ना भर दी है बयान नहीं कर सकती ऐसे कैसे जियेगी नारी ,अब जरूरत है उस दुर्गा ,रणचंडी,की जमीन पर उतरने की और ऐसे राक्षसों की गर्दने काट कर मुंडमाल पहनने की ,शीला जी कहती हैं स्ट्रांग कदम उठाएंगे ,वो देखना है क्या करेंगे ,आज इस घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है उन दरिंदों को उनके गुप्तां काटकर सरे आम फांसी पर लटकाया जाए यही मेरी मांग है तभी ऐसे लोगों को सही मेसेज जाएगा

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  3. अगर कही भगवान नाम की चीज है (जी हाँ चीज ही कहूंगा क्योंकि अगर वो कही होता तो) तो उन पापियों का अब तक सत्यानाश कर चुका होता, अफ़सोस कि भगवान नाम की चीज इस धरती पर नजर नहीं आती है तभी तो ऐसे दुराचारियों को खुली छूट मिली हुई है\

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  4. इन दरिंदों को इतनी ही दरिंदगी से खुले आम मौत के घाट उतारा जाय तो चैन मिले...

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  5. ईश्वर कहीं है भी तो बिल्कुल शक्तिहीन है।अफसोस तो इस बात का है कि हम लोग अफसोस के सिवाय कुछ नहीं कर पा रहे।लेकिन वास्तविक न्याय की स्थापना करनी है तो मानवता के हत्यारे इन दरिंदों को तेज़ाब से नहलाने के बाद किसी कालकोठरी में बंद कर देना चाहिए।कोई और सजा इनके लिए होनी ही नहीं चाहिये।

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  6. नीचता की चरमसीमा। कहने को कुछ नहीं। केवल यही इच्छा ... इस जघन्य अपराध की एक ही सजा है मौत। वह भी सरेआम तड़फा-तड़फाकर।

    रचना जी ऐसी घटना को सुनकर भी ज़िंदा हूँ ... इसकी मुझे भी सज़ा मिले।

    इन्हीं घटनाओं के कारण ही परमेश्वर की याद हो आती है लेकिन उसपर जमता हुआ भरोसा भी उखड़ता जाता है।

    आपने जिस तरह इस घटना को लिखा उसने सीधा संवेदना को झकझोर कर रख दिया।

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  7. हो सकता है,एकाध दिनों में मोमबत्ती लेकर कोई टोली टीवी पर दिखे। थोड़ी-सी बयानबाज़ी,समवेदना और फिर सरपट भागती ज़िंदगी का बखान कि दिल्ली दिल वालों की है,ज़िंदगी फिर से पटरी पर लौट रही है। हर बड़ी घटना के बाद यही सब होता है।
    क़ानून का भय और प्रशासन की मुस्तैदी की बात जब की जाती है तो राजनेता कहते हैं कि हर किसी को तो सुरक्षा नहीं दी जा सकती।
    महानगरों की जिस मिश्रित संस्कृति पर अक्सर नाज़ किया जाता है,उसमें सबके लिए जगह कुंठा से उपजी है और वही पड़ोस से हमारे अपरिचय का कारण बनती है,हमारे भीतर उच्छृंखलता पैदा करती है। वर्तमान को लेकर शर्मिंदा और भविष्य के प्रति आशंकित हूं।

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  8. सबो को बीच चौराहे पर फाँसी मिले ..........

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  9. समाज की स्थिति अनुसार ... इनको पकड़ा जायगा ... खूब भत्सर्ना होगी ... केस भी शायद चलेगा ... बेल पे ये लोग बाहर भी आएंगे ... हो सकता है फांसी की सजा भी हो जाए १०-१२ साल के बाद इन्हें ... फिर मानवता-वाद का रोना रोने वाले लोग कहेंगे फंसी नहीं होनी चाहिए ... मामला अटका रहेगा ... जीते रहेंगे ऐसे लोग ... जय हो भारत महान ...

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  10. उफ़फ्फ़... बीच चौराहे पर, भीड़ के बीचों बीच... इन्हें ऐसी सज़ा मिलनी मिलनी चाहिये कि न ये मर पाएँ न ही ज़िंदा रह पाएँ... :(( :xxx

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  11. हाँ , ऐसी जघन्य और अमानवीय अत्याचार की कोई मिसाल नहीं , अपना मन काँप जाता है क्योंकि हममें से कितनों की बेटियां उस शहर में रह रही हैं और इस बेटी के लिए रचना ने सही कहा है, वो मानसिक और शारीरिक यंत्रणा को उसने कैसे सहन किया ? अब उसको बताने और सुनने की क्षमता किसी नारी में बची हो शायद ही ? हम संसद में अपने लाभ के विधेयक लेकर जंग लड़ रहे हैं और इस मानवता के दुश्मनों के कामों को लेकर किसी को चिंता नहीं है क्योंकि उन्हें और उनके बच्चों को तो कानूनी सुरक्षा हासिल होती है। अब एक जंग हमें छेड़नी होगी कि ऐसे नराधम लोगों के लिए सिर्फ एक सजा हो कि उनके अंग को काट दिया जाय . जिससे ये एक मिसाल बने ऐसे नराधम लोगों के लिए और भविष्य में इस काबिल ही न रहें इस जंग का ऐलान हमें ही करना होगा . मानवाधिकार से लेकर महिला आयोग तक आवाज उठानी होगी। उन बहरों को तभी कुछ सुनाइ देगा नहीं तो संसद में देश को बेचने और जाति और धर्म पर बांटने का काम ही बखूबी हो रहा है।

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  12. सुन्दर लेखनी !!!

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  13. डॉक्टर के अनुसार अब वह होश में है, लेकिन स्तिथि अभी भी क्रिटिकल है. यदि किसी की जान जानी ही है, तो उन लोगों की जानी चाहिए जिनकी वजह से वोह इस हालत में है.

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  14. मैं कुछ कह सकने की हालत में नहीं हूँ. शाक्ड हूँ.

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  15. यहाँ जिंतने लोग अंग काटने की सलाह दे रहे हैं एक बार आग्रह हैं की पूरी खबर विस्तार से पढ़े . उस लड़की के साथ एब्नार्मल सेक्स किया गया है . उसके जेनाईटल में कोई बहुत धार वाली चीज़ डाल कर उसके प्राइवेट पार्ट में जखम किये गए हैं

    मुझे तो लगता हैं की अंग काट देने से समस्या का निदान हैं ही नहीं क्युकी तब एब्नार्मल सेक्स होने की ज्यादा गुंजाइश रहेगी
    प्रोनोग्रेफि नेट के जरिये बहुत बढ़ गयी हैं इस लिये सबसे पहले सरकार को इसे प्रतिबंधित करना होगा और उसके बाद रेप करने वाले को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट से फांसी का प्रावधान होना चाहिये

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    1. he bhagwan ... : ( kya aisaa hai ???? yah news to maine nahi padhi thee

      ufff ye internet .... :(

      haan - faansi kaa praavdhaan to hona hi chaahiye , vah bhi fast track court me |

      par durbhaagya se , ham vah desh hain - jahaan kasaab kee faansi par bhi log "daya" aur "insaaniyat" kee baatein kar ke mahaan bante hain .... :(

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    2. रचना जी रेप करने के बाद उसको मारने के लिए सबूत मिटाने के लिए ये न्रशंसता की गई हैवानियत की पराकाष्ठ है ये
      उनको तो ऐसी ही सजा देनी चाहिए तडपा तडपा कर मरना चाहिए वो भी पब्लिकली

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    3. Inbox
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      Shilpa Mehta

      16:24 (52 minutes ago)

      to me

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      नहीं राजेश जी - यह सबूत मिटने को नहीं किया गया ।

      डॉक्टर्स कह रहे हैं - उसकी आँतों को जो नुक्सान हुआ है - वह इसलिए की -
      यह बहुत बुरा है लिखने के लिए - लेकिन रचना सही कह रही हैं । उसके भीतर
      रोड डाले गए और इतने जोर से खींचे गए कि साथ ही अंतडी बाहर निकल आई ।

      गिरफ्तार हुए एक व्यक्ति ने कहा है कि उसने "देखा" की
      "रोड के साथ रस्सी जैसी कोई चीज़ (जो शायद उसकी अंत थी) बाहर आई" - और
      उसने अपने साथी को उसे बाहर खींचते देखा

      : ( : ( : (

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  16. : ( : (
    पता नहीं यह क्यों होता है, होता रहता है, होता रहता है .....। और बस हम ऐसे ही विवश :(

    बलात्कार करने वाले इंसान होते हैं क्या सचमुच ?

    आप सही कह रही हैं - उन लोगो को सजा हो न हो - इस "विक्टिम" को तो यंत्रणा ही झेलनी है जीवित रह कर भी :(

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  17. वे हिंसक पशु हैं :(

    पीड़ित लड़की जिस यातना से गुज़री है उसकी कल्पना भयावह है :(

    मुझे इन बर्बर अपराधियों के परिजनों और अधिवक्ताओं की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा है :(

    क्या वे पीड़ित के पक्ष में खड़े होंगे ?


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  18. हे भगवान उस बच्ची की हालत सोच कर रोना आ रहा है | यही हाल रहा तो लोग और डरेंगे बेटी पैदा करने से | ऐसे लोगों को जब तक सजा नहीं मिलेगी अपराध बढते रहेंगे |

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  19. यह पांचो व्यक्ति अलग अलग परिवारों से जुड़े हैं और इनमें से किसी के मन में उस बच्ची के प्रति कोई दया नहीं आई !हमारा समाज इन्ही परिवारों का प्रतिनिधित्व करता है ...
    लडकियां वाकई असुरक्षित हैं , इस मानसिकता के बीच ...
    देश में सबको पता है कि शीघ्र न्याय पाना कितना मुश्किल है, क़ानून का भय केवल कमजोरों को हो सकता है, अपराधियों को बिलकुल नहीं ! पुलिस से उनके सम्बंध उनकी रक्षा करने में अक्सर सफल होते हैं ! समय के साथ इस बेचारी बदनसीब को इतिहास बना दिया जाएगा !
    शर्म आती है इस सभ्यता पर ...

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  20. घिन आती है ऐसे कुकर्मियों से | ईश्वर उस लड़की और उसके घर वालों को शक्ति दे |

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  21. जो सचमुच 'पुरुष' होते हैं, ऐसा घटिया काम नहीं करते है ...नपुंसक ही करते हैं ऐसा काम। अपनी नपुंसकता की जोर आजमाईश के लिए स्त्री से बढ़ कर बढ़िया शिकार और कौन हो सकती है भला ...?
    मैंने पहले भी कहा है, बलात्कारियों की सजा फाँसी नहीं होनी चाहिए, जो भी बलात्कारी पकड़ा जाए, उसका लिंग काट कर उसके सामने ही जला कर राख कर देना चाहिए ...फिर उसके दोनों हाथ काट देना चाहिए, और फिर उसे छोड़ देना चाहिए आज़ाद, बाकी का जीवन जीने के लिए।

    भारत बेसिकली कापुरुषों का देश है ...आज तक ऐसा क्यों नहीं होता कि किसी महिला का बलात्कार हुआ और पुरुषों ने उस अपराधी को पकड़ने में सहायता की, या फिर उसे पकड़ कर सज़ा दी। क्या बजह है की ऐसे हादसों में पुरुष वर्ग हमेशा चुप रहता है (मैं पुरुषों की टिप्पणी की बात नहीं कर रही हूँ) सही मायने में कभी भी मैंने नहीं सुना कि किसी बलात्कारी को पुरुषों ने धर दबोचा हो या फिर उसे पकड़ कर सबके सामने ले कर आये हों।

    मुझे न दुःख हो रहा है, न ही विषाद, न ही उस अभागिन युवती के जीवन के लिए प्रार्थना करने की इच्छा है, इस समय बस इतना चाहती हूँ, कि कुछ देर के लिए मेरे हाथों में कोई ऐसी शक्ति आ जाए कि मैं उन कमीनों को अपने मन माफिक सजा दे सकूँ और उस सज़ा का सरे आम प्रसारण करवा दूँ ताकि हर बलात्कारी बस देख कर ही दहशत से वहीँ मर जाए ...काश ऐसा हो जाए !

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  22. कल टीवी पर जब लड़की की चोटों के बारे में हालत बताई गई थी तो उसी से अंदाजा लग गया था की ये न केवल रेप केस है बल्कि दरिंदगी की हदे भी पार की गई है । मै नहीं समझ पा रही हूँ की उसके लिए क्या दुआ करू, मै चाहती हूँ की उसे कम से कम उसे अपने शारीरिक दर्द से छुटकारा मिल जाये लेकिन मौत से नहीं । एक स्त्री और एक बेटी की माँ होने के कारण ये घटनाये डराने के साथ रुला भी देती है ।

    मै यहाँ कई बाते कहना चाहूंगी पहली की लोगो को पता ही नहीं है की मर्ज क्या है और दवा क्या करना है , सारे माननीय लोग बार बार फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की बात कर रहे है समझ नहीं आता की वो ये कहना चाहते है की हा जुर्म हो जाने दीजिये हम सजा जल्द से जल्द दिला देंगे , प्राथमिकता तो ये होनी चाहिए की हम आगे से जुर्म को होने ही नहीं देंगे , सड़को पर पेट्रोलिंग बढ़ाएंगे , और अपराधियों में पुलिस कानून के प्रति डर पैदा करेंगे , जिससे जुर्म हो ही नहीं , इस तरह तो अपराधी अगली बार ये सोचेगा की अपराध तो करो पर पकडे न जाओ । किन्तु उम्मीद किससे करे जब अपराध रोकने वाले पुलिस ही कुछ समय पहले एक स्ट्रिंग में कहते है की बलात्कार केस पुलिस तक लाने वाली लड़किया पैसे और फायदे के लिए ये करती है , तो सोचिये की अपराध कैसे रुकेगा , कोई भी कानून बन जाये कोई फायदा होने वाला नहीं है , जब तक पुलिस को सोच ये रहेगी ।

    दूसरा समाज की सोच है लडकिय के प्रति आज भी जब छेड़ छाड़ और बलात्कार के लिए कही न कही उन्हें ही दोषों करार दे दिया जाता है कभी उनके कपड़ो पर कभी उनके रात में घुमने पर ( देखिएगा इस केस में भी कुछ लोग मिल जायेंगे हर पिछले केस की तरह कहेंगे की लड़की इतनी रात को अपने पुरुष मित्र के साथ घूम ही क्यों रही थी ) ये बाते अपराधियों को अपराध करने के लिए और बढ़ावा देती है और लड़कियों को और डरा देती है । समाज का एक व्यक्ति भी , एक भी व्यक्ति यदि किसी भी तरीके से .01% भी बलात्कारी को उसके अपराध के लिए कम गलत बताता है तो वो व्यक्ति एक नए बलात्कारी को जन्म देता है , और वो व्यक्ति भी इस तरह के अपराध का भागीदार होता है , इस लिए लोगो को अपना बड़ा गन्दा मुंह खोलने से पहले सौ बार सोचना शुरू करना चाहिए , की वो जो कह रहे है उसका क्या परिणाम हो सकते है ।

    तीसरे ये बात सोच कर मन और भी डर जाता है की जिस बस में और उसके ड्राइवर ने ये किया है वो स्कुल के छोटे बच्चो को स्कुल ले जाता था , पुलिस को तो ये भी देखना चाहिए की कही उन बच्चो के साथ तो कोई शोषण नहीं हो रहा था ।

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    1. agree anshumala ji .. those children who were travelling in this bus regularly need to be asked / counselled , it is a very worrying possibility....

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    2. i agree with the whole comment anshumaala ji , all the three points ...

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    3. अंशुमाला जी आपके उठाये गए सारे बिंदु विचारणीय है क्योंकि सब ठीक हैं। लड़कियाँ जो आज नौकरी कर रही हैं , अपने कार्यस्थल से छूट कर आते आते अँधेरा हो जाता है और जब वे अपने साथ किसी और सदस्य के रखते सुरक्षित नहीं है तो फिर अकेले कहाँ तक सुरक्षित हैं? दिल्ली ऐसे शहर में हजारों लड़कियाँ बहार से आकर पढाई और नौकरी कर रही हैं। सामाजिक सुरक्षा के लिए कानून व्यवस्था उचित होनी चाहिए और पुलिस की भूमिका भी . फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट घटना के बाद का उपाय है और ऐसे अपराधों पर अंकुश के उपाय जरूरी है

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    4. @सारे माननीय लोग बार बार
      फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की बात कर
      रहे है समझ नहीं आता की वो ये
      कहना चाहते है की हा जुर्म
      हो जाने दीजिये हम सजा जल्द
      से जल्द दिला देंगे
      ऐसा तो कोई नहीं कह रहा ।आप यदि नारी ब्लॉग का ही अर्काईव चैक करें तो ऐसी कई पोस्ट मिलेंगी जिनमें इस तरह की चर्चा खूब हो चुकी है कि कैसे इस अपराध को रोका जाए।वो एक अलग विषय है।आपकी बात मानी जाए तो फिर वो कानूनी प्रावधान भी खत्म करने पड़ेंगे जिनमें बलात्करी की सजा की बात की गई है और केवल पुलिस की ही मुस्तैदी की बात की जाए।यहाँ पोस्ट और टिप्पणियों में केवल इस केस की बात हो रही थी इसलिए सजा की बात की.बाकी आपकी सभी बातें सोचने को मजबूर करने वाली हैं।

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    5. राजन जी मै यहाँ ये कहना चाह रही हूँ की संसद में बैठ कर जी लोग ये कह रहे है, उन्हें इसे कहने की जरुरत नहीं है उन्हें ही तो ये करना है , ये काम तो उन्हें काफी पहले ही कर देना चाहिए , दुसरे इस केस की बात करे या दिल्ली में आय दिन हो रहे चलती गाडियों में गैंग रेप की तो ये साफ है की रात में वहां की सड़के पूरी तरह से अपराधियों के लिए छोड़ दी गई है क्या दो घंटो तक ये सब होता है और एक भी पुलिस पेट्रोलिग वैन की नजर उस पर नहीं जाती है एक भी पुलिस बिट के सामने से वो बस नहीं गुजरती है , इस तरह का हर केस पूरी तरह से पुलिस कानून व्यवस्था की नाकामी का है , और जिसको दुरुस्त करने का ठीक रखने का काम ही इन माननीय लोगो को करना है , उन्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए उनके लिए प्राथमिकता कानून व्यवस्था सुधारने की होनी चाहिए जब उनकी प्राथमिकता कोर्ट होगा तो कानून व्यवस्था कैसे सुधरेगी , नतीजा देखिये नोयडा में एक और केस हो गया क्योकि ऐसे केसों के लिए लापरवाह पुलिस वालो को कोई सजा ही नहीं मिली , और ये माननीय लोग पुलिस के खिलाफ कुछ करेंगे भी नहीं क्योकि दोनों का चोली दामन का साथ है , शिला जी भी मोर्चा न्याय के लिए नहीं बल्कि दिल्ली पुलिस को अपने अंतर्गत लेन के लिए निकाल रही थी , ।

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  23. प्रिय रचनाजी व नारी ब्लॉग के मेरे सभी संवेदनशील भाई-बहन ,

    ओह ! समाज की इस घटना ने संपूर्ण भारतीय समाज को हतप्रभ कर दिया है ,आज सभी को वो बिटिया अपनी बिलकुल अपनी ,उसका दर्द अपना व उसका परिवार अपना परिवार लग रहा है। भावनात्मक रूप से हम एक मंच पर अनायास जुड़कर एक हो गए हैं . आज हम सभी अनजान-अपरिचित लोग भी एक होकर उस बेटी के लिए एक परिवार के परिजनों की तरह बेहद बेचैन हो उठे हैं .
    स्वतंत्र भारत में क्या इतना असुरक्षित हो गया है हमारा परिवार या हम ,कि लग रहा है यहाँ कोई कानून या उसका कोई डर ही नहीं रहा .
    क्यों कुछ गिने-चुने नीच - पाशविक कृत्य + मानसिकता वाले लोगों को ने दूसरों को यूँ भयभीत कर दिया है।
    समाज का हर परिवार काँप उठा है ,पर सोचना ये है कि इन समस्याओं का समाधान + निदान क्या हो या होना चाहिए। क्या केवल हमारे आक्रोशित विचारों या गुस्से का इजहार कर देने से इस भयावह हादसे या ऐसे कार्यों का कुछ निष्कर्ष निकलने वाला है .
    ऐसे बलात्कारियों को तो फांसी की सजा देना आसान मौत होगी ,उनको तो वो सजा मुनासिब होगी जो वे जिंदगी भर झेलें.
    आज तो ऐसे कानून या सजा की जरुरत है कि उनके जैसे और अपराधिक मनोवृति वाले लोगों को सदैव भय बना रहे की किसी बच्ची या महिला शक्ति के तरफ आँख उठाकर भी देखा तो ------क्या हश्र हो सकता है।
    आवश्यकता है हम सभी को एकजुट होकर आवाज उठाने की ,साथ ही सभी की सहमति से इतने जघन्य अपराध के लिए सजा तय करने की। अब हमारे समाज में ऐसी स्थिति नहीं रह गई है कि हमें केवल नाराजगी ,भयभीत या क्रोध दिखाने से कार्य होगा .किसी कठोर से कठोर त्वरित कार्यवाही(ACTION )
    अमल में लाने के लिए केवल प्रयत्नशील ही नहीं ,इस मकसद के लिए अड़ जाना होगा .ऐसे घ्रणित कार्य का सर्व सम्मति ऐसा दंड निर्धारित किया जाये .हमें एकजुट होना ही होगा ताकि अपराधी अपराध करने के या कुछ भी कदम उठाने के पहले से ही डरे।
    गंभीरता से इस पहलू पर सभी मिलकर आवाज उठायें व अब तो निर्धारित करना ही होगा कि किस तरह की सजा इन आधुनिक राक्षसी कृत्य वालों को मिलना चाहिए।
    हमें हमारे देश में एक भयमुक्त समाज बनाने के लिए एकजुट होना ही होगा ,जहाँ हम व हमारे परिवार अपनी बेटी व बेटे को एक सा माहौल व शिक्षा देने में हिचक न करें।

    अलका मधुसूदन पटेल ,लेखिका-साहित्यकार

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  24. सजा, फाँसी मिले

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  25. मेरे हिसाब से ऐसी दुर्घटना का कुछ समाधान संभवतः.ये हो सकता है.......
    ..१. नेताओं की सुरक्षा पर मिलने वाली पुलिस को तत्काल हटा दिया जाए...
    .एवं उनकी सुरक्षा व्यवस्था निजी हाथों में सौंप दी जाये...
    २. कम से कम दिल्ली में शराब पूर्णतः बंद किया जाये..
    ३. फास्ट ट्रेक कोर्ट बनाया जाये...
    बाकि मानसिकता बदलने के प्रयास किये जाने चाहिए..मेरा व्यक्तिगत मत है कि "इंसान की फितरत कभी नहीं बदलती"....बस मौके के तलाश में रहती है....सो हमें प्रभावी समाधान चाहिए...

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  26. please friends - click this link (or copy the link and paste it in your URL - and sign the petition for fast track hearings of not just this case but for all such gang rape cases.

    http://www.change.org/petitions/union-home-ministry-delhi-government-set-up-fast-track-courts-to-hear-rape-gangrape-cases#

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  27. Kuch nahi keh sakti.. vishwas hi uth gaya hai puri tarah.. :'(

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