नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

November 23, 2010

लड़कियों को सुरक्षित रखने के ज्यादा अच्छा उपाय

एक सवाल है | यदि समाज में ठग अपराधी हो तो क्या किया जाना चाहिए ?
क्या हम सभी को घर के अंदर बंद हो कर रहना चाहिए ?
घर के बाहर गहने पैसे या कीमती समान नही ले कर निकलना चाहिए ?
यदि अपराधी घर के अंदर आ कर अपराध कर जाये तो फिर क्या करे ?
या अपराधी घर का ही हो तो क्या किया जाये ?
सजा अपराधी को दिया जाये उसे समाज से बाहर किया जाये या खुद घर में बंद कर या अन्य उपाय कर खुद को सजा दी जाये?
आप कहेंगे की खुद को क्यों सजा दी जाये अच्छा हो की अपराधी को सजा दी जाये कुछ ऐसा किया जाये की अपराधी अपराध करने से तौबा कर ले ना की खुद को सजा दी जाये |
पर समाज की सोच तब खुद को सजा देने जैसी हो जाती है जब कोई बात महिलाओ से जुड़ी हो |
अभी हाल में मेरा ज्ञान बढ़ा की लड़कियों के नाक कान इस लिए छिदवाए जाते है ताकि उनकी कामुकता निकाल जाये या उनके शरीर की गर्मी निकल जाये | पढ़ कर आप को हंसी आ रही होगी मुझे भी आई थी | मैं बिना कोई वेद पुराण पढ़े बता सकती हुं की ये बेमतलब की बात उनमें से किसी में भी नहीं लिखी होगी | पर इस बात से इंकार तो नहीं किया जा सकता है की समाज के आम लोगो में ये सोच है आम लोगो के दिमाग में इस तरह की बात उपजी है, क्यों | अब इसका कारण आप पूछेंगे तो वो यही कहेंगे की हमारी लड़कियाँ सुरक्षित हो वो उस "गर्मी" के कारण कोई गलत कदम ना उठाये इसलिए ये किया जाता है |
असल में ये पुरुषवादी समाज की पुरुषवादी सोच है और इसका लड़कियों की सुरक्षा से कोई मतलब नहीं होगा | यदि कोई समाज अपनी लड़कियों के सतित्व की सुरक्षा के लिए इतना फ़िक्र मंद होता तो मुझे लगता है की इससे अच्छा उपाय तो ये होता की लड़कों के शरीर में छेद कर कर के उनकी "गर्मी " निकाल दी जाती तब शायद ज्यादा लड़कियाँ सुरक्षित होती | सोचिये की दोनों कान और एक छेद नाक में करने से लड़कियाँ इतनी नियंत्रित हो जाती है तो क्यों ना सभी लड़कों के कान और नाक में दो चार छेद कर दिया जाये वो भी कुछ नियंत्रित हो जायेंगे थोड़ी गर्मी उनकी निकल जाएगी और हमारी बहन बेटिया आराम से घर से बाहर निकाल सकेंगी पहले से ज्यादा सुरक्षित रहेंगी | तीन छेदों के बाद भी किसी लड़के की गर्मी ना निकाले तो उसमे दो चार छेद और कर देने चाहिए | इस गर्मी के कारण वो कोई ऐसी हरकत कर बैठे की लोग सरे आम उसके सर में एक बड़ा छेद करने की हसरत करने लगे उससे तो यही अच्छा होगा की उनकी सुरक्षा के लिए उन में दो चार छेद और कर दिया जाये और तब तक करते रहे जब तक की उनकी गर्मी ठीक से खुद को नियंत्रित करने लायक ना निकाल जाये |
मैं यहाँ ये नहीं कह रही हुं की लड़कियों के नाक कान में छिद्र करना उन पर कोई अत्याचार है या ये काम ज़बरदस्ती की जाती है | लड़कियों के लिए ये सजने सवरने का साधन है और ज्यादातर अपनी मर्ज़ी से करती है या बचपन में घरवालों के द्वारा कराये जाने से उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती है | मेरा सवाल तो समाज की सोच पर है और इस तरह की सोच कोई पहली या आखिरी नहीं है | ऐसी सोचे समाज का लड़कियों की तरफ उसका रवैया दर्शाता है कि कैसे किसी लड़की के साथ होने वाले छेड़ छाड़ की घटना में उसे ही दोषी ठहरा दिया जाता है कभी उसके कपड़ों को कभी उसके घर से बाहर निकालने को तो कभी उसके खुली सोच को इसका कारण बताया जाता है और सजा के तौर पर उसे ही घर में बंद कर दिया जाता है | क्यों नहीं हम अपने अपने सड़को को ही सुधारने की कोई शिक्षा देते है |
ऐसा क्यों किया जाता है ? क्यों नहीं अपराध करने वाले को सजा दिया जाये क्यों नहीं उन्हें ही सुधारने का काम किया जाये ?
नहीं सुधारे तो बस दो चार छेद कर सारी गर्मी बाहर निकाल दी जाये | बोलिए क्या ये लड़कियों को सुरक्षित रखने के ज्यादा अच्छा उपाय नहीं है |

37 comments:

  1. नारी ब्लॉग पे अक्सर मुझे बहुत से बेहतरीन विषय पे आवाज़ उठती सुनाई देती है. आज भी कुछ देखा तो लगा कुछ लिख जाऊं. सवाल है की समाज में ठग अपराधी हो तो क्या किया जाना चाहिए? भाई अपने सामान को ताला मार के रखो, क्योंकि आधे से अधिक समाज ठग ही है. और इस के साथ साथ समाज मैं सुधार का काम अच्छे लोगों के साथ मिल के शुरू करो. यही हल मुझे दिखाई देता है.

    नाम कान छिदवाए जाने पे कुछ कहने मैं बहुत खतरा है. मुझे तो लगता है यह कैदी बनाने की एक ऐसी कोशिश है जिसे महिलाएं भी पसंद किया करती हैं.वैसे यह जो नाम कान हैं यह Acupuncture point लगते हैं. अधिक नहीं कहूँगा समझदार को इशारा काफी हुआ करता है.,

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  2. ये लेख लिखने में समय खराब करने से ज्यादा बेहतर होता कोई ढंग का वैज्ञानिक तथ्यों वाला लेख लिखना जिसमें आप इस बात के सही वैज्ञानिक कारणों का खुलासा भी करती

    आपके लेख हर बार भारत के पुराने रिचुअल्स की मजाक उड़ाते से क्यों नजर आते हैं [अगर ऐसा नहीं है तो आप केवल ऐसे विचारों को स्थान क्यों देती हैं जिन पर हँसी आती हो ]

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  3. एक बात और कहूँगा .. ये एक सामूहिक ब्लॉग है इसलिए आपत्ति दर्ज करवा रहा हूँ और एक बिन माँगी सलाह है "व्यंग किसी के मित्र नहीं होते" उदाहरण के तौर पर द्वीअर्थी संवाद भी व्यंग भावना की ही देन लगते हैं जिन से आप , मैं , हम सब आहत होते हैं ..आगे जैसा आप ठीक सोचें .... कीजिये

    शुभकामनाएं

    [आप चाहें तो ये टिप्पणियाँ हटा सकती हैं]

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  4. गौरव जी

    लेख को एक बार फिर से ध्यान से पढ़िये मैंने कही भी किसी "भारत के पुराने रिचुअल्स" का मजाक नहीं उड़ाया है खुद मैंने भी लिखा है की ये बेकार की बात किसी धार्मिक ग्रन्थ में नहीं लिखा होगा और यहाँ ना तो मै किसी बात का वैज्ञानिक या धार्मिक विश्लेषण कर रही हु | मैंने यहाँ पर लोगों की महिलाओ के प्रति सोच और मानसिकता की बात की है आप सिर्फ उस पर ही ध्यान दे |

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  5. मासूम जी

    मै इसे बस लड़कियों के सजने सवरने का माध्यम मानती हु और उसमे कोई बिरे मुझे नहीं लगती है | कैदी वाली बात मुझे तब तक नहीं लगती है जब तक की ये जबरजस्ती ना करवाया जाये |

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  6. काश! ऐसा होता
    दुनिया से बलात्कारी और राह चलते छेडखानी करने वाले खत्म हो जाते।
    और लडकियों की ही क्यों लडकों की गर्मी भी निकाली जानी चाहिये।

    मासूम जी की "एक्यूपंचर प्वायंट" वाली बात ठीक भी हो सकती है। कोई शरीर विज्ञानी इसकी पुष्टि कर दे तो बढिया रहेगा।

    कुछ भी हो सौन्दर्य तो बढता ही है आभूषणों से

    प्रणाम

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  7. @"लेख को एक बार फिर से ध्यान से पढ़िये"

    एक अनुरोध और है आपको इस लाइन को टाइप करने में भी टाइम वेस्ट नहीं करना चाहिए [मैं पूरे दिन में बहुत कम और बहुत ध्यान से लेख पढता हूँ ]

    @मैंने कही भी किसी "भारत के पुराने रिचुअल्स" का मजाक नहीं उड़ाया है

    यही तो व्यंग की ताकत होती है| आप तो कभी भी मजाक नहीं उडाती ... आपके लेखों के पात्र उड़ाते हैं शायद ....खैर .... मेरे कहने का आशय है "पुराने रिचुअल्स की मजाक उड़ाते से क्यों नजर आते हैं" मतलब ऐसा प्रतीत होता है "

    [अगर ऐसा नहीं है तो आप केवल ऐसे विचारों को स्थान क्यों देती हैं जिन पर हँसी आती हो]"

    लगता है आप मेरी टिप्पणिया अब भी ध्यान से नहीं पढ़ती हैं

    @यहाँ ना तो मै किसी बात का वैज्ञानिक या धार्मिक विश्लेषण कर रही हु

    आपने सामाजिक विश्लेषण तो किया है ना ?, मैंने उस पर भी ध्यान दिया है
    जैसा आपने अभी कहा :

    @मैंने यहाँ पर लोगों की महिलाओ के प्रति सोच और मानसिकता की बात की है आप सिर्फ उस पर ही ध्यान दे |

    मेरा मानना है

    युवाओं को अपनी ऊर्जा गलत फहमियाँ दूर करने में लगानी चाहिए

    अब मेरी बातों को जल्दी ही प्रवचन बता दिया जायेगा .... पूर्वाभास है:)) , खैर धन्य है वो व्यक्ति जिनकी सोच को आपने लेख में सामाजिक मानसिकता बता दिया है

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  8. Dear Gaurav

    Read the following which I found when I googled for SATIRE

    Satire is primarily a literary genre or form, although in practice it can also be found in the graphic and performing arts. In satire, vices, follies, abuses, and shortcomings are held up to ridicule, ideally with the intent of shaming individuals, and society itself, into improvement.[1] Although satire is usually meant to be funny, its greater purpose is constructive social criticism, using wit as a weapon.

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  9. Dear Gaurav
    Pl read this when i googled for DOUBLE ENTENDRE { dwiarthee }


    A double entendre (French pronunciation: [dublɑ̃tɑ̃dʁə]) or adianoeta[1] is a figure of speech in which a spoken phrase is devised to be understood in either of two ways. Often the first meaning is straightforward, while the second meaning is less so: often risqué, inappropriate, or ironic.

    The Oxford English Dictionary defines a double entendre as especially being used to "convey an indelicate meaning". It is often used to express potentially offensive opinions without the risks of explicitly doing so.

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  10. smaaj mae naari ko kyaa kyaa sehna padtaa haen gaurav agar uskae upar bina vyang kae sab likh dae to wahii hotaa haen jo aap pichchlee post mae padh chukae haen

    aap kae kaments kaa jawaab is liyae nahin daetee hun kyuki dartee hun aap kae jazbae sae jo nirantar kament par kament daetaa haen


    aap sae vinarm aagrh haen kam sae kam kuch samay post par aur kament aane dae phir samvaad karey taaki sab kaa nazariyaa dikae

    aur isko mera sneh hi smajhae

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  11. अंशुमाला जी,इस तरह की बहुत सी मान्यताऐ है जिनके कारण ऐसा माहौल बन गया है कि गलती हर हाल मे औरत की ही होती हैं।इस तरह की खोखली मान्यताओँ के चलते स्त्री खुद को ही हीन समझ लेती हैं,वही अपराध बोध से ज्यादा ग्रसित होती है ।उसे लगने लगता है कि उसके साथ होने वाली छेडछाड जैसी घटनाओँ का कारण पुरूष की वही घटिया सोच जिसमें स्त्री को मादा से ज्यादा नही समझा जाता के बजाए उसका खुद का शरीर है । लेकिन समाधान की बात तो आप तब करे न जब समस्या को समस्या माना जाए यहाँ तो सब कुछ सहज रूप मे लिया जाता है ।वैसे बहुत से पुरूष तो मानते भी है कि पुरूष प्राकृतिक रूप से ही ऐसे है।यदि ये सच है तब तो आपका सुझाया उपाय शायद काम कर जाए ।

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  12. idhar to TIL ka TAD banaya jaa raha hai

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  13. एक बात और जब भी बात धर्म समाज या संस्कृति का नाम ऐसे मामलो मे लिया जाता है तो अक्सर ये कहा जाता है कि आपको सब नकारात्मक ही क्यो दिखाई देता है तो यह बिल्कुल वैसे ही है कि जब हम अपने शरीर के एक हिस्से मे पीडा का अनुभव करते है तो सिर्फ उसी के बारे मे दूसरो को बताते है ताकि कोई समाधान सुझाया जाए न कि अच्छे से कार्य कर रहे अंगो की तारीफ करते है ।धर्म मे बहुत सी अच्छी बाते भी है मै जानता हूँ परँतु बहूत सा विरोधाभास भी है ।और व्यवहार मे जो गलत है उसे ही ज्यादा अपनाया गया है वैसे भी धर्म या संस्कृति के नाम पर कुछ गलत होता है तो समस्या उससे है न कि खुद धर्म से ।फिलहाल ये बात स्त्री मुद्दो के संदर्भ मे कह रहा हूँ आगे जरूरी लगा तो और सपष्ट करेंगे ।

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  14. विषय तो अच्छा है, परंतु इसका प्रतिपादन दो कौड़ी का। अव्वल तो लेखिका ने यह नहीं बताया कि कौन से लोग हैं, कहां पर यह मान्यता है कि नाक-कान छिदवाने से लड़कियों की गर्मी निकल जाएगी। लेखिका का दृष्टिकोण उचित नहीं लगता। वह पुरुषों की बात पर मुंह चिढ़ाकर लिख रही हैं। इससे एक अनावश्यक द्वंद्व उत्पन्न होता है। रही बात नाक-कान छिदवाने की तो संभव है कि इससे स्त्री का स्त्रीपन-उसका सौंदर्य निखरता है, इसलिए यह प्रचलन हो। अब तो लड़के भी छिदवाते नजर आते हैं, परंतु यह बचकानापन ही लगता है। सबके पास नौ छेद हैं, चाहे स्त्री हो या पुरुष और उन्हीं का व्यवहार किया जाना चाहिए। प्रकृति ने कोई बेदभाव नहीं किया है। पुरुष का अपना सौंदर्य है, स्त्री का अपना। दोनों को अलग करने का प्रयास बेतुका है। विपरीत लिंग का ही तो सारा खेल है-सारा आकर्षण है। लेखिका का कहना है, पुरुषों में दो-चार छेद और करके उनकी गर्मी क्यों न निकाल दी जाए। सच तो यह है कि स्त्री-पुरुष दोनों में समान गर्मी होती है। फिजिकल एक्ट हों अथवा सेक्सुअल एक्ट्स-नर-नारी अपनी बनावट के अनुरूप व्यवहार करते हैं। सामाजिक जीवन में बहुत सी अंध मान्यताएं पहले भी थीं, अब नए-नए रूप में प्रचलित हो रही हैं। तथाकथित माडर्निटी ने बेड़ा ही गर्क किया है चाहे स्त्री हो या पुरुष। जहां तक स्त्री को दोषी ठहराए जाने की बात कही गई है, तो हर संभ्रात को लगता है कि नग्नता अच्छी बात नहीं। न स्त्रियों को उत्तेजक विज्ञापन बनना चाहिए न पुरुषों को। सेक्स का निमंत्रण देकर किसी घटना को बलात्कार कहने का प्रचलन बढ़ रहा है, ठीक दहेज निरोधक कानून के दुरुपयोग की तरह। आचरण प्रभावी उन्नत न होगा तो दुर्गति तय़ है। नुकसान न स्त्री का है, न पुरुष का। यह सभ्यता का नुकसान है, चाहे बलात्कार के रूप में हो चाहे बलात्कार के मिथ्या आरोप के रूप में।

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  15. hamesha se nari ki durgati ke liye purush ko jimmedar thahraya jata rahahai bahut had taq yeh sahi bhi hai kintu kuchh had taq nari khud bhi iske liye jimmedar hai .apna adhikansh samay nari shringar melaga deti hai.roz chain lut-ti hain aur tab bhi chain pahanna chhodti nahi ye kya hai.isliye purush ki taraf se dhyan hata kar yadi apna dhyan pragti path par lagaye to purane dukh bhoolne me aasani hogi aur unnati path gami hogi.

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  16. @ तारकेश्वर गिरी जी

    यदि तिल का ताड़ बनना होता तो इस पर एक लंबा लेख लिख दिया जाता और पुरुषों को दुनिया जहान की बाते सुना दी जाती | पर उद्देश्य बस इतना था कि लोगों का ध्यान इस तरह कि सोच पर भी जाये |



    @ तदात्मानं सृजाम्यहम् जी

    प्रतिपादन छोटा और केवल एक ही विषय पर इसीलिए रखा गया ताकि कोई वो ना कहे जो ऊपर गिरी जी ने कह दिया मैं बात को लंबा खींचने के बजाये सिर्फ मुद्दे तक ही रखना चाहती थी |

    रही बात मान्यता कहा की ये कोई मान्यता है ही नहीं , ये सिर्फ पुरुषवादी सोच है और मैंने लेख में साफ लिखा है की ये सिर्फ सोच है मान्यता नहीं | ये सोच मैंने काफी साल पहले यूपी में सुनी फिर मुंबई में भी सुनी शब्द ज़रूर थोड़े अलग थे जैसे गर्मी निकलना और नियंत्रित रहना मैं कभी इन शब्दों का ये मतलब नहीं निकाल पाई थी | जब एक ब्लॉग पर उन का मतलब साफ लिखा गया तो मुझे भी समझ आया की ओह तो इन शब्दों का ये मतलब है | उन ब्लॉगर ने भी यही बात कही थी की ये बे मतलब की बात है और मैं भी यहाँ यही कह रही हुं |

    आप को ये कहने की जरुरत ही नहीं है की@ "नाक-कान छिदवाने की तो संभव है कि इससे स्त्री का स्त्रीपन-उसका सौंदर्य निखरता है" आप शायद कह रहे है मै तो साफ कह रही हु की ये केवल सजना सवरना ही है मै तो इसे धर्म से भी नहीं जोड़ रही हु और ना ही इस पर आपत्ति उठा रही हु |
    @सच तो यह है कि स्त्री-पुरुष दोनों में समान गर्मी होती है। फिजिकल एक्ट हों अथवा सेक्सुअल एक्ट्स-नर-नारी अपनी बनावट के अनुरूप व्यवहार करते हैं।

    जी हा मै भी यही मानती हु और पुरुष के नाक कान छेदने की बात करना केवल एक व्यंग्य है कि यदि लड़कियों कि सुरक्षा का सवाल है तो उनकी ही गर्मी निकाल दी जाये |

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  17. लेख लिखने का अर्थ बस इतना है की समाज में ऐसी सोच भी प्रचलित है थोड़े ही सही पर लोगों के मन में ऐसी बाते है | ये एक सोच है कई अन्य विषयों पर भी कई लोगो की ऐसी ही सोच है और यही थोड़े थोड़े लोग मिल कर बहुत ज्यादा लोग बन जाते है | कोई किसी विषय पर तो कोई किसी विषय पर महिलाओ के लिए इस तरह की सोच रखता है उन्हें घर से बाहर निकालने से रोकने के लिए उन्हें अपने नियंत्रण में रखने के लिए | मै भी ये बात नहीं मानती हु की नारी पर सारे अत्याचार पुरुष ही करता है या वो ही जिम्मेदार है मैंने हमेसा व्यवस्था समाज की बात की है | ये कुछ ऐसे मुद्दे है जो कभी भी सामने नहीं आते है और समाज के अन्दर ही अन्दर फैलाते रहते है और आने वाली पीढ़ी को भी अपने गिरफ्त में ले लेते है | ये लेख ऐसे मुद्दों को सामने लाने के लिए है बस इससे ज्यादा कुछ नहीं |

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  18. ठीक है .... काफी इतंजार हो गया ......

    @रचना दीदी,

    आपकी दी गयी डेफिनिशन वाली टिप्पणियाँ नहीं पढ़ रहा हूँ, मैं बस इतना जानता हूँ अगर किसी दुर्जन के मन में व्यंग भाव आता होगा तो उसके लिए अक्सर द्वीअर्थी संवाद हथियार बन जाते होंगे| किसी सज्जन के मन में व्यंग करने की इच्छा होने पर मुझ जैसे अल्पज्ञानियों का ज्ञान वर्धन ही होता है (अक्सर तथ्यों द्वारा)
    [सज्जनता के सबसे उत्तम उदाहरण के तौर पर आदरणीय अमर कुमार जी, सुज्ञ जी, प्रवीण शाह जी की टिप्पणियाँ पढ़ी जा सकती हैं]
    @ .... wahii hotaa haen jo aap pichchlee post mae padh chukae haen
    पिछली पोस्ट की एक दिशा थी (एक से ज्यादा नहीं ) ..... सन्दर्भ था और आप गौर करें मैंने वहां सिर्फ एक टिप्पणी की है इसका क्रेडिट लेखिका (आपको) जाता है ... सभी लोगों ने वहां सोचा ज्यादा लिखा कम |
    @.... jawaab is liyae nahin daetee hun kyuki dartee hun aap kae jazbae sae jo nirantar kament par kament daetaa haen
    दीदी, यहाँ "जज्बे" की जगह आप "पागलपन" भी लिख देती तो भी मैं बुरा नहीं मानता |मैं तो टिप्पणी प्रकाशित ना होने पर भी बुरा नहीं मानता सिर्फ लेखक/लेखिका तक अपनी बात पहुंचाना ही मेरा मकसद होता है इसीलिए हटाने का ऑप्शन भी साथ में लिखता हूँ

    इस वाक्य.....
    @ aur isko mera sneh hi smajhae
    और इस वाक्य में बहुत फर्क है ना.....
    @ लेख को एक बार फिर ध्यान से पढ़िए
    [मैं तो वैसे भी शुभकामनाएं दे कर चला ही गया था ]

    अब टिप्पणी टुकड़ों में नहीं कर रहा हूँ , अब तो ठीक हैं ना :)

    सस्नेह

    गौरव

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  19. @सभी धर्म में विश्वास या समझ या दोनों न रखने वालों से अनुरोध

    जिस बात [धर्म/संस्कार] को आप मानते या जानते नहीं है उसे अपने व्यंग में शामिल ना करें और करें तो कुछ सकारात्मक तथ्य भी लिख दें. गूगल तो सभी के घर पर ओपन होता है
    [इससे आप व्यंग करने के साथ साथ अपने देश के लिए भी अच्छा काम कर देंगे और लेख संग्रह योग्य हो जाएगा और उसके साथ आपके विचार भी ]
    जिस समाज की आप बात कर रहे हैं उसके युवा [ स्त्री पुरुष दोनों ] तो अब पता नहीं कहाँ कहाँ छिदवाने लगे हैं , महानगर में रहने वाले बेहतर जानते होंगे | संस्कृति भी स्त्री की तरह ही है, अपने ही व्यंगो से अनजाने में उसे धराशाही ना करें, उस संस्कृति नाम के गुब्बारे की हवा तो वैसे ही बहुत से लोग निकाल रहे हैं और वही एक गुब्बारा है जो हम सब को बचा सकता है |

    बस यही निवेदन है ..... आगे जैसा आप चाहें

    ~~~~~~शुभकामनाएं~~~~~~~~

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  20. उई माँ ये तो मेरी कही बात पर ही विचार हो रहा है........

    भाइयों नाक कान छिदवाने के पीछे के मनोविज्ञान कि बात मैंने ही शुरू कि थी और ये मानसिकता किसी दुसरे ग्रह कि नहीं बल्कि अपने समाज कि है. थोडा समाज के अलग अलग वर्गों में विचरण करें आपको आसानी से ऐसी बातें करते लोग मिल जायेंगे. वैसे मेरे ब्लॉग पर दी गए टिप्पणियों को ध्यान से पढ़े तो भी बहुत जगहों पर आपको इस मानसिकता का समर्थन करते इशारे मिलेंगे.

    वैसे मैं किसी बेनामी कि इस टिप्पणी के लिए तैयार हूँ जिसमे वो कहेगा कि बेटा जिस समाज में तू विचरता है वही होती होंगी ऐसी बातें अपने यहाँ नहीं होती.

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  21. @विचारी जी

    क्षमा चाहूँगा , यहाँ भी उत्तर दे रहा हूँ मुझे लगता है
    आपकी कही बात पर नहीं आपके मित्र की कही बात पर विचार हो रहा है
    दूसरी बात ये है की

    इस लेख में ये पंक्ति है
    @अभी हाल में मेरा ज्ञान बढ़ा की लड़कियों के नाक कान इस लिए छिदवाए जाते है
    ...और आपके लेख में भी
    @इस विषय में मेरे एक मित्र ने मुझे बड़ी रोचक बात बताई.

    जब आप दोनों लेखकों का ज्ञान [और मेरा भी ]अभी अभी बढ़ा है तो मैं कैसे मान लिया की ये समाज की मानसिकता है , आप लोग अभी तक इसी समाज का तो हिस्सा थे ना ? :) .... रही जानकारी की कमी की बात तो वो तो पुरुषों के स्वास्थ्य के प्रति भी समाज में उतनी ही है जितनी स्त्रियों के स्वास्थ्य विषय में

    [इस कमेन्ट के लिए क्षमा चाहता हूँ पर ये बात भी सोचने वाली है ना !]

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  22. मेरे पिछले कमेन्ट में

    "तो मैं कैसे मान लिया की ये समाज की मानसिकता है "

    को ये पढ़ें

    "तो मैं कैसे मान लूं की ये समाज की मानसिकता है"

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  23. @ गौरव जी

    आप के लिए क्या कह सकती हुं पहले ही कह चुकी हुं की इस पोस्ट को किसी संस्कार से या धर्म से ना जोड़े मैं लेख में लिख चुकी हुं | बाकी आप की मर्ज़ी आप अपनी इच्छा से कुछ भी समझने के लिए स्वतंत्र है | अब जबकि खुद दीप जी ने कह दिया है की ये उनके विषय को ही आगे बढाया है तो एक बार उनकी आखरी पोस्ट पढ़ लीजियेगा |


    @ दीप जी

    बिल्कूल मेरे मुह से भी यही निकला था जब मैंने आप की ये पोस्ट पढ़ी थी क्योकि इस बारे में मैंने काफी पहले सुन रखा था पर कभी भी उन शब्दों का मतलब निकालने की जहमत नहीं उठाई थी पर जब आप ने साफ लिखा तो दिमाग का बल्ब जल गया | यु पी तो नहीं जा सकी पर यहाँ मुंबई में तुरंत उन शब्दों के बारे में पूरी जानकारी ली तो उन्होंने भी वही बात कही जो आप ने लिखी थी | तब समझ में आया की वह ये बात तो पूरे भारत में प्रचलित है बस खुल कर सामने नहीं आती है |

    आप ने बिल्कूल सही कहा हम शायद किसी और ही ग्रह में रहते है जहा हमें ऐसी बाते सुनने को मिलती है और कुछ लोगों को ये सब ना कभी दिखाई देता है और ना कभी सुनाई देता है | धन्यवाद दीप जी |

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  24. @ गौरव जी

    आप मेरी उस जवाब को पढ़िये जो मैंने तदात्मानं सृजाम्यहम् जीको दिया है आप को समझ आ जायेगाकी क्यों मैंने ये कहा है कि मेरा ज्ञान अभी बढ़ा है | सुन पहले से रखा था पर कभी उन शब्दों को वो मतलब नहीं निकाल पाई थी मतलब अब पता चला है | यदि मुझे इसका अर्थ अब पता चला है तो इसका मतलब ये तो नहीं की ये बात पहले समाज में थी ही नहीं |

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  25. Great post and the resistance from some readers reflects that the post brings a new perspective for an issue that affects everybody in the society.

    In addition, girls who hardly go out or wear modern clothes are also molested and abused. The solution is not to keep girls inside the house but to bring a positive change in the society as whole. People need to respect women and know their own moral limitations.

    Excellent post! Thanks so much.

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  26. ओहो अंशुमाला जी, आपने पुरुषवाद, समाज और धर्म को जोड़ा ही ऐसे है की कोई विद्वान ही समझ पायेगा ... व्यंग की दिशा तो सही हो, इसी पुरुषवादी समाज में पुरुषों के स्वास्थ्य के बारे में भी भ्रांतियाँ है और वो भी एक से बढ़ कर एक | इसमें पुरुषवादी समाज कहाँ बीच में आ गया ?? या शायद किसी भी मामले में अल्पज्ञानी को ही पुरुष कहा जाता हो ?
    एक मनो वैज्ञानिक सा तरीका है| एक अँधेरी सी डिजाइन वाला कार्ड दिखा कर पूछा जाता है, "बताओ, आपको इसमें क्या नजर आ रहा है"? सामने वाले को वही नजर आता है जो वो सोचता है| नजर तो किसी की कमजोर नहीं होती ये बात अलग है की दिमाग में चल क्या रहा है ?

    मैं तो हर काम लोजिक से करने का ही प्रयास करता हूँ इसीलिए मैं अपने ब्लॉग का नाम my2010ideas रखा ताकि मुझे याद रहे की मैं सिर्फ एक साल के लिए ब्लोगिंग के मंच से जुडा हूँ| जब लोग तथ्यात्मक लेख से ही बहुत कम मात्रा में सुनते है और ना के बराबर अप्लाई करते हैं तो व्यंग लिखने का क्या सोशल इम्प्रूवमेंट होगा आप मुझसे बेहतर जानती हैं

    खैर ....छोडिये ये सब बातें .. इस वाली बात पर हँसियेगा मत .... मैंने इस लेख के हेडिंग को पढ़ कर इसे "मुक्ति जी" का लिखा लेख समझ लिया था, आश्चर्य के सागर में गोते लगाते हुए मैंने दो बार पढ़ कर बाद में आपका नाम देखा | अब इसके बाद मेरी प्रतिक्रियाएं आपको काफी हद तक समझ में आ जायेंगी | मैं भी गृह शान्ति में लगा हुआ हूँ इसीलिए आपके लेख पढने या आपके ब्लॉग पर जाने से बचता हूँ इस बार हेडिंग ने भ्रमित कर दिया :)
    [पढने के बाद मैं खुद को प्रतिक्रिया देने से नहीं रोकता .. आगे से पहले लेखिका का नाम पढूंगा ... बस ]

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  27. इस विषय पर एक साइंटिफिक लेख जल्दी ही प्रकाशित करने का प्रयास रहेगा [हो सका तो इस सन्डे] , मैं अगर इस पर कोई लेख लिखता हूँ तो उम्मीद है आप अपने विचारों से अवश्य अवगत करवाएंगी |

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  28. http://my2010ideas.blogspot.com/2010/11/blog-post_25.html

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  29. jahan tak aisi manyata ka sawal hai yah hamare samaj me vyapt hai......
    naak kaan chhidwana, payal pahanna, sindoor lagana har cheez ka prayog aisa mana jata hai kamukta ko niyantrit karta hai
    yadi yah sach hai to purushon ko bhi inke prayog ke liye badhava diya jana chahiye....isse samaj nishchit roop se aur sabhya aur susanskrit banega
    achchhi parampara ka vyapak istemal ho. sirf ek varg ko hi isse labhanvit kyun kiya jaye?

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  30. विचार शून्य जी को विचारी जी ना कहे इस विषय पर उनकी पोस्ट यहाँ हैं http://vichaarshoonya.blogspot.com/2010/11/blog-post_20.html

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  31. रचना दीदी,
    ये नाम मेरा बनाया हुआ नहीं है ... संभवतया अपनेपन की भावना में लिखा हुआ कहीं पढ़ा था तब से मैंने भी अपना लिया , क्षमा चाहता हूँ .. मैं तो हमेशा मानसिकता पर ही गौर करता आया हूँ | पाण्डेय जी से भी क्षमा

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  32. नारी का जो सम्मान और हक है उसे अवश्य मिलना चाहिए , और उसकी इज्ज़त का सम्मान तथा रक्षा किया जाना चाहिए और इसका आरंभ हम सभी को अपने घर अपने मोहल्ले से करना चाहिए
    dabirnews.blogspot.com

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  33. आज की अधिकाँश नारी ( जो अपने को अधिक पढ़ा लिखा समझती हैं )
    अपने ऊपर किये हुए हर ज़ुल्म का ठिकड़ा पुरूषों पर ही फोड़ना अपना अधिकार समझती है , जबकि एक नारी की सबसे बड़ी दुश्मन अगर कोई है तो वो खुद नारी है,
    जिसका उदहारण हम लड़की के पैदा होने से लेकर उसके विवाह तक देख सकते हैं

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  34. I really enjoyed reading all this... :)

    Great post... aur comments ke to kya kehne !

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