नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

November 14, 2010

हिंदी ब्लॉग विमर्श दिल्ली एक रिपोर्ट दो घंटे अच्छे बीते ये कम उपलब्धि नहीं हैं ।

१३ नवम्बर को दिल्ली मे हिंदी ब्लॉग विमर्श का आयोजन किया गया । मुख्य अतिथि श्री समीर लाल थे जो ब्लॉग जगत मे किसी भी नये ब्लॉगर के ब्लॉग पर सबसे पहले टिपण्णी देने वाले ब्लॉगर के रूप मे जाने जाते हैं । समीर लाल कनाडा के निवासी हैं और साधना जो उनकी पत्नी हैं के साथ दिल्ली आये हैं । {साधना मीट मे ना आ सकी थी }। मुख्य अतिथि के आने से पहले ही सब ने चाय और नाश्ता लेना शुरू कर दिया था !!!!!!!!!!! सो आप समझ सकते हैं कि कौन किस लिये आया !!!!!
शायद ही कोई नया ब्लॉगर होगा जो समीर को ना जानता हो । कह सकते हैं कि समीर कि usp उनका वो पहला कमेन्ट ही हैं जो वो हर ब्लॉग पर देते हैं । समीर का मानना हैं कि जब तक हिंदी ब्लॉग १० लाख का आकड़ा नहीं छुयेगे तब तक कमाई का जरिया नहीं बन सकते । समीर के हिसाब से हर वो ब्लॉग जो विवाद पर बना मिट गया हैं । समीर ने कहा कि ब्लॉग लेखन टिपण्णी के लिये नहीं करना चाहिये क्युकी जब तक आप को वो पहला कमेन्ट नहीं मिला था { यानी समीर का पहला कमेन्ट !!!!!! } तब तक आप जानते ही नहीं थे कि टिपण्णी क्या होती हैं । समीर चाहते हैं ब्लॉग कि संख्या बढाई जाये { ब्लॉग कि या ब्लॉगर कि ये उन्होंने साफ़ नहीं किया } ताकि लोगो को ब्लॉग पर विज्ञापन देने कि जरुरत हो । इसके अलावा समीर ने कहा वो किसी भी विवाद मे नहीं पड़ते और आज तक उन्होंने कभी भी कहीं भी किसी से भी ये नहीं कहा हैं वो किसी के ग्रुप मे हैं या कोई अनूप शुक्ल के ग्रुप मे हैं । उनके हिसाब से लोग खुद ये सब सोचते हैं

ग्रुप कि बात सतीश सक्सेना ने उठाई थी उन्होंने बताया था समीर के साथ कार मे आते समय इस बात पर काफी बात हुई { आधे घंटे का रास्ता था तो काफी बात अगर इस बात पर हुई तो फिर और बाते तो क्या ही हुई होगी !!!} क्युकी सतीश सक्सेना हमेशा "मध्यस्थ " बनने का मार्ग खोजते हैं सो यहाँ भी उन्होने वही कहा कि "बुरा मत देखो , बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो " लेकिन खुद ग्रुप कि बात और अनूप शुक्ल - समीर कि दोस्ती मे विवाद को भी उन्होने ही नये ब्लॉगर के समक्ष रखा ।
बालेन्दु दाधीच जी ने तकनीक के जरिये और फिर उसके उल्ट अपनी कविता के जरिये ब्लॉग और ब्लॉगर कि बात को , महिमा को बताया । सबसे ज्यादा समय इन्होने ही लिया परन्तु समीर कि बात सुने बिना ही समय कि कमी के कारण ये बीच मे से ही चले गए !!!!!!!

जिन लोगो ने हाल मे ब्लोगिंग शुरू कि हैं वो सब जानना चाहते थे कि पहले हिंदी ब्लॉगर कौन थे पहले हिंदी ब्लॉगर अलोक थे , चिटठा शब्द भी उन्ही का बनाया हुआ हैं और चिटठा जगत के कर्णधारो मे वो भी हैं पहली महिला ब्लॉगर पद्मजा मानी जाती हैं ये जानकारी मुझे थी सो मैने वहाँ भी बता दी

नए ब्लॉगर ये मानते हैं कि तकनीक कि जानकारी जरुरी हैं बहुत से ब्लॉगर तकनीक मे कमजोर हैं ।
हिंदी को आगे लाने के लिये ब्लॉग माध्यम नहीं हैं और इंग्लिश से परहेज करना सही नहीं हैं इस बात को डॉ टी एस दराल ने अनुमोदित किया । हिंदी से प्यार हमे हिंदी ब्लॉगर बनाता हैं लेकिन इंग्लिश और अन्य भाषाओ मे भी लिखना हमे मजबूत बनाता हैं ।
मेरे ये कहने पर कि ब्लॉग संख्या बढने के लिये सबको कोशिश करनी चाहिये कि अपनी पत्नी को प्रेरित करे सब को हंसी आ गयी और एक ने तो कहा कि उनकी पत्नी को ब्लॉग लेखन "बेफिजूल " लगता हैं । और फिर उन्होंने ये भी कहा कि अगर पत्नी भी ब्लोगिंग करेगी तो खाना कौन बनाये गा { अब इस के आगे मे उनसे क्या कह सकती थी उनकी पत्नी हैं वो खाना बनवाये या बर्तन धुलवाए , पत्निया शायद इसी लिये होती हैं } समीर ने जरुर ये कहा जिस को पसंद हो गा ब्लॉग वही लिखेगा ।


मीटिंग के बाद एक ही सवाल था मन मे कि जिस ब्लोगिंग को आप अपने घर मे "सम्मान " नहीं दिला सकते आप उसको विश्व ख्याति कैसे दिलवायेगे

मीटिंग के आयोजक बहुत ही विनर्म और शालीन थेउन्होने अपनी तरफ से सबको पूरा सम्मान दियाउनका शुक्रियाबाकी कुछ ऐसा ख़ास नहीं हुआ कि कहे कि आप नहीं आये तो आप ने मिस कियापर हां जो नहीं आये उनको हर आने वाले ने जरुर मिस किया। दो घंटे अच्छे बीते ये कम उपलब्धि नहीं हैं ।

67 comments:

  1. वाह, ये हुई जरा "हट के" टाइप की रिपोर्ट…

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  2. बहुत खूब.. ब्लॉगर्स एकता ज़िंदाबाद..

    वर्चुअल मित्रों से रियल लाइफ में मिलना वाक़ई यादगार होता है.. अच्छी रिपोर्टिंग की है आपने

    हैपी ब्लॉगिंग

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  3. न मैं कभी जाता हूँ, न कोई मुझे मिस करता है. यह भी अच्छा है.

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  4. मिश्र जी आपको मिस करने के लिए सिर्फ र ही हटाना होता है और इसकी जानकारी अमूमन हो नहीं पाती है। खैर ... आपकी शांति हम भंग करके ही मानेंगे। रचना जी की रिपोर्ट रस्‍साकसी जैसी है, जो बातें कुछ भुल गए, वे याद आ गईं। इसलिए ही सभी ब्‍लॉगरों की ओर से उनका दृष्टिकोण अपने अपने ब्‍लॉगों पर अनिवार्य होता है। बालेन्‍दु जी चाहेंगे तो जैसे बाकी ब्‍लॉग दुनिया वाले उनको एम वर्मा जी के ब्‍लॉग पर सुन रहे हैं, वे भी सुन सकेंगे। हम तो उनकी प्रतिक्रया की भी अपेक्षा कर रहे हैं।

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  5. ब्लाग विमर्श होना अच्छी बात है। ब्लाग अपनी बात को कहने का माध्यम है। गुटों की बात फिजूल है। ब्लागीरी में किस बात का गुट?
    हाँ वैचारिक विविधता और वैषम्य हो सकता है, लेकिन वह न हुआ तो विमर्श का अर्थ क्या रह जाएगा। हम मनुष्य मात्र में हर प्रकार की समानता स्थापित करने का लक्ष्य रखें तो ब्लागीरी निखरेगी।

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  6. रचना,

    सही रिपोर्ट प्रस्तुत की और सभी बातें सर संक्षेप में कह भी दीं. कुछ लोगों को घर से लेकर समाज , ऑफिस और फिर लेखन तक गुटबाजी का शौक होता है तो उसको हटाया नहीं जा सकता है. वैसे ये कोई अखाडा तो है नहीं की लड़ाई लड़नी है. अपने अपने ब्लॉग हैं और अपने अपने विचार फिर भी बू तो आ ही जाती है. वैसे समीर जी जयास निष्पक्ष ब्लोगर और टिप्पणीकार होना चाहिए.

    --

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  7. ब्लॉग विमर्श का आयोजन यादगार रहा। मैंने मित्रों की बातों से बहुत कुछ सीखा और सबकी सहृदयता, स्नेह तथा बेतकल्लुफी का मुरीद होकर लौटा। ज्यादा समय लेने और कार्यक्रम समापन से थोड़ा पूर्व लौटने की विवशता के लिए साथी ब्लॉगर मित्रों से क्षमा चाहता हूं। सबका आभार।

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  8. अच्छी रिपोर्ट रचनाजी..... धन्यवाद

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  9. मीटिंग के बाद एक ही सवाल था मन मे कि जिस ब्लोगिंग को आप अपने घर मे "सम्मान " नहीं दिला सकते आप उसको विश्व ख्याति कैसे दिलवायेगे ।
    kahte hai ghar ki murgi saag barabar
    aap bahar walo ko samjha sakate hai gharwali ko nahi.
    ha koie dusara samjha sakata hai .

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  10. ब्लोगर संगोष्ठी की सभी सार्थक बातों को सबके सामने रखने के लिए धन्यवाद रचना जी

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  11. Blogger sanghosthi ke madhayam se bahut achhi-achhi baaton kee bhavpurn pasututi ke liye aapka bahut aabhar

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  12. यह कैसा दुराग्रह है कि पति ब्‍लाग लिखता है तो पत्‍नी को भी लिखना चाहिए। फिर यह क्‍यों नहीं आग्रह किया गया कि जो पत्‍नी ब्‍लाग लिखती है उसका पति भी लिखे। लेखन करना क्‍या चाय बनाना है जो पति बनाए तो पत्‍नी भी बनाए या पत्‍नी बनाए तो पत्‍नी भी बनाए। लेखन एक कला है, प्रत्‍येक ब्‍लागर को यह समझना चाहिए। अच्‍छा लेखन और ऐसा लेखन जो समाचार पत्रों में स्‍थान नहीं पाता उसे हम ब्‍लाग पर देते हैं। उलजलूल कुछ भी लिखना और व्‍यापारी दृष्टिकोण से ब्‍लागिंग करने की सोच ही विकृत है। इसी सोच के रहते तो आज समाचार पत्रों और टीवी का यह हाल हुआ है। किसी माध्‍यम को तो अर्थविहीन रहने दो। व्‍यापार ही करना है तो अन्‍य क्षेत्र चुनना चाहिए। कुछ तीखा लिख दिया है, क्षमा करेंगे।

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  13. अच्छी रपट ,जब फिजूल से काम चल जाय तो 'बेफिजूल' लोग क्यों बोलते हैं :) सतीश सक्सेना जी ने ब्लागीय प्रकृति के अनुसार विषय उठाया मगर वहां अमेच्योर कम प्रोफेसनल ब्लॉगर ज्यादा थे, बात दब गयी!
    अभिनंदन उन्ही का होता है जो विवादों से सायास दूर रहते हैं ,समीक्षकों /आलोचकों की मूर्तियाँ नहीं बनती पर परवाह किसे है !

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  14. बड़ी कसी हुई रिपोर्ट है और "जरा हट के" तो है ही

    पहला पेराग्राफ कोई पढ़ ले तो पूरा पढ़े बिना ना माने :)

    @पत्निया शायद इसी लिये होती हैं }
    आपके लेख की ये लाइन कुछ गैर जरूरी सी लगी

    @जिस ब्लोगिंग को आप अपने घर मे "सम्मान " नहीं दिला सकते आप उसको विश्व ख्याति कैसे दिलवायेगे ??

    हाँ प्रश्न तो एक दम सही है. बात वही है की किसी भी कांसेप्ट [भाषा,धर्म,जेंडर] के फोलोवर कैसे हैं उस पर भी उस कांसेप्ट का भविष्य या सोशल इमेज निर्भर करता है ... इस दुनिया में मोटे तौर पर दो तरह के लोग होते हैं एक जो सभी काम सीरियसली लेते हैं दूसरे जो कुछ भी सीरियसली नहीं लेते :)

    कभी कभी सोचता हूँ ... क्या दृश्य होता यदि ब्लोगर बनाने के लिए कोई एक्जाम पास करना होता ना की योग्यता के नाम पर केवल ब्लागस्पाट और वर्डप्रेस पर अकाउंट होना

    ब्लोगिंग पर मेरे विचार
    01 "चाहे जो भी करो ... दिल से"
    02 [जो शायद मुझे भी सीखना है ] क्वानटीटी में नहीं क्वालिटी में यकीन होना चाहिए ..पोस्ट के मामले में तो ख़ास तौर से
    03 हर लेख जरूरी रेफरेंस के साथ होना चाहिए

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  15. बहुत सुन्दर और सारगर्भित रिपोर्ट ...
    वाकई दो घंटे तो मिनटो में बीत गये.
    और फिर आपसे साक्षात भला और कहाँ हो सकता था.

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  16. और हाँ ..

    04 जहां तक हो उसी विषय पर लेख हो जिस की जानकारी कुछ लम्बे समय से हो

    05 कमेन्ट में विषयांतर लगे तो हटाये जाने चाहिए

    ये वाले भी हटाये जा सकते हैं :)

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  17. अजित गुप्ता जी आज भी हजारो ऐसी महिला हैं जो घर मे रहती हैं और वहाँ कंप्यूटर सारा दिन खाली पडा रहता हैं जब तक शाम को पति आ कर उस पर काम नहीं करता । उन सब महिला को अगर कंप्यूटर चलाना सखा दे उनके पति तो एक श्याद भारत मे कोमौटर क्रांती का जोर होगा
    ये हमारा अहम् हैं कि हम कहते हैं "लेखन करना क्‍या चाय बनाना है" यानी चाय बनाना एक निकृष्ट काम हैं और लेखन एक ऊँचा काम ।
    ब्लॉग से हम घर बैठी स्त्रियों मे कंप्यूटर के प्रति रूचि जगा सकते हैं और पति पत्नी के बीच संवाद का एक नया आयाम भी ला सकते हैं ।

    ये मेरा दुराग्रह नहीं हैं एक सोच हैं अपने साथ औरो को भी आगे ले जाने कि

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  18. उन सब महिला को अगर कंप्यूटर चलाना सखा दे उनके पति तो एक श्याद भारत मे कोमौटर क्रांती का जोर होगा
    please read as
    उन सब महिला को अगर कंप्यूटर चलाना सिखा दे उनके पति तो एक शायद भारत मे कंप्यूटर क्रांती का जोर होगा

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  19. .
    .
    .

    रचना जी,

    आप उन चंद लोगों में से हैं जो ब्लॉगिंग के माध्यम की सही समझ रखते हैं... दर असल ब्लॉग विमर्श या ब्लॉगर चिंतन गोष्ठी जैसी कोई चीज नहीं होती... इस आयोजन को आप समीर लाल जी के सम्मान में दी गई टी पार्टी कह सकती हैं... ब्लॉगिंग एक वर्चुअल स्पेस का प्लेटफार्म है, जिसका USP यही है कि आप यहाँ पर अपने मन की लिख-कह सकते हैं... बिना किसी वर्जना या लिहाज के... अच्छा ब्लॉगर स्वयं अपने प्रति निर्ममता की हद तक ईमानदार होता है... हमें पाठक नहीं मिल रहे हैं, हिन्दी में काफी कम ब्लॉग हैं और हिन्दी ब्लॉगिंग से कमाई की संभावनायें कहीं नहीं दिखती... यह सब बातें सही हैं, पर मुझे नहीं लगता कि संगोष्ठी, सम्मेलनों या चाय पार्टियों से यह स्थिति बदलेगी... हम में से अधिकतर अत्यधिक भावुक लोग हैं और हमारी पोस्टें व ब्लॉगवुड में हमारा व्यवहार भावुकता व व्यक्तिगत संबंधों से चालित होता है (कभी-कभी आपका भी, मैं स्वयं तो कुसूरवार हूँ ही)... सबसे बड़ी बात यह है कि ज्यादातर ब्लॉगर ही पाठक व टिप्पणीकार भी हैं... टिप्पणियों में अधिकाँश अधिकतम ब्लॉग पोस्टों में हाजिरी लगाना ही ध्येय मानते हैं...

    कुल मिलाकर हिन्दी ब्लॉगिंग अभी तक वह ताकत, वह ईमानदारी नहीं पा पाई है जिस से इसे विश्व-ख्याति या अपने ही घर में सम्मान मिल पाये... अभी काफी समय लगेगा हमें वह स्तर पाने में... और यह भी हो सकता है कि हिन्दी ब्लॉगिंग भी हिन्दी साहित्य की तरह ही कभी भी विश्व स्तरीय न हो पाये... आपस में ही उलझे रह जायें हम सब.... :(


    ...

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  20. प्रवीण शुक्रिया कमेन्ट देने का ब्लॉग लेखन मुद्दों का लेखन हैं । अगर मुद्दे खोज ले और उनपर लिखे तो पाठक जरुर आयेगे और हिंदी ब्लोगिंग हम सब इस लिये करते हैं क्युकी हिंदी भाषा मे अपनी बात कहना सबसे आसान हैं । इस से हिंदी का कोई उत्थान नहीं होता हैं । हिंदी को उत्थान कि जरुरत नहीं हैं जरुरत हैं हमे ये समझाने कि हम हिंदी भाषा जानने वालो के लिये लिख रहे हैं और वही हमारे पाठक हैं । साहित्य कि रचना यहाँ संभव ही नहीं हैं क्युकी साहित्य रचा नहीं जाता हैं रच जाता हैं । मैने वहा भी यही कहा कि परिवार को हटा दे ब्लॉग से और ब्लॉग के बाहर निकल कर परिवार बनाए । ये गोष्ठियां आपसी सौहार्द के लिये सार्थक हैं उस से ऊपर अभी तो कुछ नहीं । लेकिन ये आपसी सौहार्द अगर आप को अपने मुद्दे से अलग हटाता हैं तो बेकार हैं क्युकी फिर ये टाइम पास हैं और कुछ नहीं । जब तक हम ब्लोगिंग को टाइम पास के लिये मानेगे तब तक इसकी मेहता को किसी को नहीं समझा सकते ।

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  21. thanks to all those who found time to comment here

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  22. मैं रचना जी से इस बात पर सहमत हूँ कि यदि सभी गृहिणियों को कम्प्युटर चलाना आ जाए तो क्रान्ति आ जाए, पर शाशवत प्रश्न वहीं रहेगा कि अगर गृहिणियाँ लिखेंगी तो खाना कौन बनाएगा?
    रचना जी की रिपोर्ट अच्छी लगी. समीर जी से मिलने का मेरा भी मन था, पर कुछ परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हैं मेरी, इसलिए नहीं आ पायी.

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  23. बिना लाग लपेट के बहुत अच्छी रिपोर्ट। ब्लागर्ज़ एकता बनी रहे यही दुआ है। बधाई।

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  24. मैं चाय बनाना निकृष्‍ट काम नहीं कह रही हूँ, अपितु सरल काम बता रही हूँ। यदि मेरी टिप्‍पणी पर ऐतराज है और उसे काटना ही आवश्‍यक है तो उसे हटा दीजिए। टिप्‍पणी का अर्थ होता ही यह है कि सभी की राय उक्‍त विषय पर आए, ना कि लेखक उस पर बहस करे। कोई प्रश्‍न किया जाए तो उसका उत्तर देना तो जरूरी है लेकिन अनावश्‍यक बहस पैदा करने से तो कोई टिप्‍पणी करेगा ही नहीं।

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  25. विषय पर बहस हो ब्लॉग इसीलिये होता हैं ऐसा मेरा मानना हैं । बहस को विवाद समझना गलत हैं । आप को जो सही लगा अपने कहा । मुझे जो सही लगा मैने जवाब दिया । ना आप गलत हैं ना मै फरक बस हमारी सोच मे हैं । ब्लॉग पर लेखक तुरंत अपनी बात कह सकता हैं यही ब्लॉग कि ताकत हैं ।

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  26. बहुत अच्छी रिपोर्ट। ब्लागर्ज़ एकता बनी रहे , बधाई।

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  27. आपने बहुत अच्छी रिपोर्ट प्रस्तुत की । धन्यवाद ।

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  28. बहुत ही अच्छी रिपोर्ट है |रचनाजी की बात से सहमत हूँ |दिन भर टी. वि .देखने के लिए समय निकल सकती है महिलाये जोकि काफी पढ़ी लिखी होती है और आज कल नेट भी रहता ही है तो क्यों नहीं अपने विचार रख सकती है कम्प्यूटर पर |गृहिणियो के पास खाना बनाने के आलावा भी काफी समय होता है जिसका सदुपयोग कर सकती है | किसी जमाने में सरिता ,मनोरमा आदि पत्रिकाओ में लेख लिखे जाते थे की गृहिणिया कोई रचनात्मक काम करे जिससे उनका अकेलापन दूर हो |आज कितनी गृहिणिया स्वेटर बनाती है ?या कोई सर्जनात्मक काम करती है ?क्योकि बाजार में आसानी से सब उपलब्ध है |
    ब्लागिग एक ऐसा माध्यम है या कम्प्यूटर ऐसा माध्यम है जिससे वास्तव में विचारो के द्वारा क्रांति लाइ जा सकती है |

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  29. रपट बढ़िया हैं ....कुछ प्रश्न अनुत्तरित हैं ......सो उनके उत्तर खोजने की कोशिश को खारिज किया जाना ठीक नहीं !

    पर

    कुछ लोग इसे नेट्वर्किंग भी मान रहे तो इसमें कोई विशेष आपत्तिजनक भी नहीं!

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  30. सबसे आखिर में आने में एक फायद ये होता है कि पोस्ट पर पहले ही काफी कुछ कहा जा चूका है | सबसे पहले इस बात का जवाब दे दू कि पत्निया ब्लोगिंग करेंगी तो खाना कौन बनाएगा तो मै बता दू कि मै खाना भी बनाती हु एक तीन साल कि बेटी की पूरी देखभाल भी करती हु और ब्लोगिंग भी करती हु और ब्लॉग जगत में काफी महिलाए ऐसा करती है मुझे नहीं लगता है की ब्लॉग लिखने में ये कोई समस्या है | दूसरी बात रही की लिखने का सहूर किसको है तो ये बात भी जग जाहिर है की ब्लॉग जगत में ऐसे लोगों की संख्या काफी है जो ना तो पत्रकार है और ना ही साहित्य से जुड़े है फिर भी वो बहुत अच्छा लिखते है जबकि मै खुद एक समाचार पत्र में इतने साल लिखती रही हु फिर भी यदि साहित्य की दृष्टि सेदेखा जाये तो वो काफी निम्न कोटि का होगा | क्या पता कितने लोगों में लिखने का गुण हो पर ये सब हमारे लिए नहीं है ये हमारे किस कम का या ये करने की हमारी आयु नहीं रही सोच कर ये करते ही नहीं | उन्हें कम्पुयूटर और ब्लॉग की जानकारी तो दीजिये जिसको अच्छा लगेगा वो खुद उसको आगे बढायेगा और जिसे नहीं वो खुद पीछे हट जायेगा चाहे वो पति हो या पत्नी या की हमारे मित्र और बच्चे | यदि हिंदी ब्लोगरो की संख्या बढ़ानी है तो ये करना ही होगा |

    एक बात जो मुझे सबसे गलत लगती है वो है ब्लोगिंग को किसी नियम कायदे में बाधना आप की भाषा साहित्यक नहीं है आप ना लिखे आप का विषय अच्छा नहीं है आप बहुत नकारात्मक है या सकरात्मक है आप की हिंदी अच्छी नहीं है आप अच्छे मुद्दे नहीं उठाते है आप समय बिताने के लिए लिखते है आप आप बहस नहीं करते आप बहस ज्यादा करते है आदि आदि आदि | हम क्यों ब्लोगिंग को किसी बंधन में बाधना चाहते है | हर व्यक्ति अपने कारणों से ब्लोगिंग शुरू करता है यदि आप को वो नहीं पसंद है तो आप उस ब्लॉग पर मत जाइये पर किसी पर कोई बंधन मत लगाइये कम से कम एक माध्यम तो छोड़ दीजिये जहा व्यक्ति थोडा स्वतंत्र हो कर कुछ कह सके | हा व्यक्ति स्वअनुशासित रहे तो ज्यादा अच्छा रहेगा |

    लम्बी टिप्पणी के लिए रचना जी माफ़ कीजियेगा | मै ना तो किसी से पूरी तरह सहमत हु और ना ही किसी से पूरी तरह असहमत |

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  31. अजित गुप्ता जी से सहमत हूँ .रचना जी अभिव्यक्ति व्यक्तिगत होती है और स्वप्रेरित .कई महिला ब्लोगर हैं जो बहुत सोद्देश और मुद्दों पर लिखती हैं .जरूरी नहीं की उनके पति भी ब्लॉग लिखें .और हो सकता है की उन्हें ब्लॉग लेखन ' बेफजूल ' भी लगता हो .

    और मैं तो ब्लॉग भी लिखता हूँ और चाय भी बना लेता हूँ ,दोनों ही सहज और आसान लगते हैं क्योंकि सोद्देश आनंद होते हैं :) .

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  32. @ सभी से

    मैं एक बात स्पष्ट करना भूल गया था, ब्लॉग [web + log] वैसे होने को तो निजी अनुभवों की डायरी ही है और इस पर इस रूप में कोई नियम जैसा कुछ नहीं होना चाहिए लेकिन.... ये तब तो नियमों बंधनी ही चाहिए जब आप बेहद संवेदनशील मुद्दे उठाने लगें जो किसी अन्य वर्ग की भावना को विचलित करने की क्षमता रखते हों [क्योंकि यहाँ आपकी ये डायरी आपकी अलमारी में नहीं होती .... हर उम्र हर देश हर धर्म हर जेंडर का पाठक /पाठिका पढता/पढ़ती है ]
    अक्सर इन्ही मुद्दों पर लेखक /लेखिका की परिपक्वता की कमी या जानकारी की कमी [या दोनों] बाधा बन जाती है क्योंकि कईं बार लेख का विरोध लेखक/लेखिका द्वारा बर्दाश्त नहीं किया जाता | अगर आप गौर करें तो एक दम शांत रहने वाले व्यक्तिगत अनुभवों वाले ब्लॉग अलग ही नजर आते हैं उन पर कोई विवाद पैदा ही नहीं होता [सामने परिस्थितियों में ]

    [ये कमेन्ट मेरे पिछले कमेन्ट का हिस्सा ही माना जाये ]

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  33. उन पर कोई विवाद पैदा ही नहीं होता [सामने परिस्थितियों में ]

    को यह पढ़ें


    उन पर कोई विवाद पैदा ही नहीं होता [सामान्य परिस्थितियों में ]

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  34. एक अलग कोण से...एक अलग सोच के साथ लिखी गई रिपोर्ट...
    आलोचना से ही सुधार की गुंजाईश बनती है ...
    उम्मीद है इस बार आपकी या हमारी नज़र से जो-जो कमियां रह गयी थी इस आयोजन में...उन्हें अगले आयोजन में आपस-में मिलकर सुधार लिया जाएगा...
    आपने मीटिंग में जैसा कहा कि..."हम सबको अपने-अपने घरों में घर के बाकी सदस्यों को भी ब्लॉग बनाने के लिए प्रेरित करना चाहिए"
    तो इस बारे में मेरा कहना ये है कि हम किसी को रास्ता तो दिखा सकते हैं लेकिन चलना तो उसे खुद ही पडेगा ...तभी वो अपनी तयशुदा मंजिल या मुकाम पर पहुँच पाएगा...
    वैसे आजकल ये एक चलन और चल निकला है कि आप अपने बच्चों के नाम से ब्लॉग बनाएँ और उसे खुद ही ऐसे अपडेट करते रहे जैसे वो सारी बातें खुद बच्चा ही अपनी सोच...अपनी समझ से लिख रहा है :-)

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  35. राजीव तनेजा said (वैसे आजकल ये एक चलन और चल निकला है कि आप अपने बच्चों के नाम से ब्लॉग बनाएँ और उसे खुद ही ऐसे अपडेट करते रहे जैसे वो सारी बातें खुद बच्चा ही अपनी सोच...अपनी समझ से लिख रहा है :-)

    बिलकुल सही. वैसे तो इसमें कोई बुराई नहीं है कि अपने प्यारे बच्चों की बातें ब्लौग पर पेश की जाएँ पर उन्हें ऐसे पेश करना जैसे बच्चे ने ही उसे पोस्ट किया है, यह बात अजीब लगती है. उनपर टिपण्णी देनेवाले भी इस प्रकार लाड़ उमड़ते हैं जैसे बच्चा ही उन टिप्पणियों को पढने बैठा होगा.

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  36. बहुत अच्छी रिपोर्ट ...
    और पत्नियों को भी कम्प्यूटर सिखने और ब्लॉग लिखने को प्रेरित करने का बहुत अच्छा सुझाव ...
    ये विचार तुच्छ है कि वे भी ब्लॉगिंग करेंगी तो खाना कौन बनाएगा ...खाना बनाते हुए , घर संभलते हुए भी गंभीर नहीं तो हलके फुल्के तरीके से वे अपनी बात रख पाने में सक्षम हैं ...
    शुरू में ज्यादा समय देने पर कामकाज प्रभावित होता है , मगर धीरे धीरे संतुलन हो जाता है ...ब्लॉगिंग अपनी बात कहने का बहुत ही सरल और सहज माध्यम है , गृहिणियों को भी इसे अपनाना चाहिए ...
    बहुत अच्छा विचार !

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  37. अच्छा लगा रिपोर्ट पढ़ कर...

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  38. @उन्हें ऐसे पेश करना जैसे बच्चे ने ही उसे पोस्ट किया है, यह बात अजीब लगती है.

    निशांत जी ,

    आप ये लिखते वक्त जिस भी ब्लॉग के बारे में सोच रहें हों एक बार उस लेखक /लेखिका की जगह पर आ कर सोचेंगे तो अजीब नहीं लगेगा या कम लगेगा | ये आज की भागदौड़ की जिंदगी में बच्चे की भावनाओं पर ध्यान केन्द्रित तो करता ही है साथ ही परिवार नाम की एजेंसी की मजबूती के लिए फायदेमंद भी हो सकता है

    @ उनपर टिपण्णी देनेवाले भी इस प्रकार लाड़ उमड़ते हैं जैसे बच्चा ही उन टिप्पणियों को पढने बैठा होगा.

    संभव है बच्चा पोस्ट न लिखता हो पर क्या ये संभव नहीं की टिपण्णीकर्ता की [लाड़ से भरी,स्नेह में डूबी ] टिपण्णी उसकी मम्मी या पापा उसे पढ़ कर सुनाये और वो सुन कर अपनी मुस्कान बिखेर दे

    मेरे ख़याल से ऐसे ब्लॉग बढ़ने चाहिए क्योंकि फर्क देखा जाना चाहिए जब आप किसी ऐसे ब्लॉग पर बच्चे की [शायद ] लिखी बातें पढ़ते हैं और फिर जो महसूस करते हैं और दूसरा जब आप किसी अतार्किक और संदर्भहीन लेख को पढ़ते हैं तब जो महसूस करते हैं | "तर्क" दोनों में में नहीं हो शायद ....लेकिन "फर्क" है |

    इस दुनिया में बहुत कुछ अजीब है जो अब हम नोटिस भी नहीं करते ..... ये कथित "बाल ब्लोगिंग" बेहद सामान्य सी और लाभदायक मानवीय भावना है

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  39. मैं ऐसे सभी माता पिता को मेरी ओर से धन्यवाद देता हूँ [जो बच्चों के लिए भी ब्लॉग लिखते है ]

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  40. मुख्य अतिथि के आने से पहले ही सब ने चाय और नाश्ता लेना शुरू कर दिया था !!!!!!!!!!! सो आप समझ सकते हैं कि कौन किस लिये आया !!!!!

    मतलब ...पक्का चाय नाश्ता करने ही आये होंगे... मीटिंग का तो बहाना था :)

    मै जल्दी में हूँ ...कल सुन्दर रिपोर्ट और टिप्पणियाँ फिर से पढता हूँ...

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  41. रचना जी,
    सारगर्भित रिपोर्ट के लिये आभार...
    किसी भी मुद्दे को देखने और समझने का प्रति व्यक्ति का अपना एक कोण होता है...यह बात तो टिप्पणियां पढ कर ही महसूस की जा सकती है...किसी ने फ़ोटो, किसी ने बहस और किसी ने चाय नाश्ते को मुख्यता प्रदान की है..
    सबसे बडी बात यह है कि हम सब एक दूसरे से आमने सामने मिल पाये जो शायद हम अपने पडोसी से भी नहीं मिल पाते (समयभाव). किसी एक उद्देश्य के लिये, एक आवाज पर एकत्रत होना ही बहुत बडी उपलब्धि है.

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  42. @ गौरव भाई, मैंने बच्चों के लिए ब्लौग लिखने को गलत नहीं माना है. मेरा भी मन करता है कि मैं अपने नन्हे-मुन्नों की बातें ब्लौग पर डालूँ पर उन्हें मैं एक पिता के रूप में ही लिखूंगा. मैं उन्हें लिखकर यह नहीं दिखाऊँगा जैसे मेरे बच्चे ने ही वह सब लिखा है. इसमें खटकने वाली कोई बात नहीं है. मैं भी 'बच्चों' के ब्लौग पर कभी-कभार जाता रहता हूँ.

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  43. @प्रिय निशांत भाई,

    मैं ये नहीं कह रहा की आप इसे गलत मान रहे हैं ये तो आपने पहले ही स्पष्ट कर दिया है ना [अपनी टिपण्णी में ]

    अब .. ये आपका दृष्टिकोण है की आप अपने बच्चे की बात पिता की तरह ही लिखना चाहते हैं और यह भी सुन्दर बात है उतनी ही जितना की बच्चा बन कर लिखना [शायद ये ज्यादा कठिन काम हो ]

    मेरे विचार मूल रूप से आपकी कही इस बात पर केन्द्रित थे

    @ ... जैसे बच्चे ने ही उसे पोस्ट किया है, यह बात अजीब लगती है

    क्योंकि इसमें अजीब कुछ भी नहीं है | इससे तो एक बार फिर से अपने ही बच्चे का बचपन जीने, भावनाएं समझने, अपनापन देने का मौका मिलता है |

    एक दृश्य की कल्पना करते हैं

    पोते ने जिद की दादा जी से की उसे घोड़े की सवारी करनी है | दादा जी ने कुछ सोचा और मुस्कुराते हुए बच्चे को अपनी पीठ पर बैठाया और घोड़े की तरह हिनहिनाने लगे | ये देख कर वहां मौजूद सभी लोग अपने चेहरे पर निर्मल मुस्कराहट नहीं छिपा पा रहे थे | ये ऐसा ही कुछ है .. एक दम सामान्य

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  44. @निशांत जी ,गौरव जी ,
    मनुष्य की सृजनात्मक अभिव्यक्ति के कई शेड्स हैं ,लोगों की सृजनात्मकता के विभिन्न आयाम हैं इसीलिये .कुछ मान बाप अपने बच्चों के प्रति अधिक फोकस /केन्द्रित होते हैं और यह भी मानवीय गुण ही है ..वैसे मुझे भी व्यक्तिगत तौर पर यह प्रवृत्ति अजीब लगती है मगर जहाँ भी सृजन के नए आयाम हों उसे स्वीकार करना चाहिए ...बालोन्मुख ब्लॉग लेखन का यह नया पहलू भी चर्चा में आने से इस पोस्ट की सिग्निफिकेंस बढ़ गयी !

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  45. sabhie kaa shukriya comments kae liyae ek report aur dungi lekin apnae dusrae blog par yahaan link dae dungi taaki jisnae subscribe kiyaa haen wo aagey wahaan padh kar kuch ubhare prashno kae uttar dae sakey to dae

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  46. यह बात एक दम सही है जब ब्लॉग को घर में ही जगह न दिला सके तो विश्व विख्यात कैसे बनायेगे।अच्छी रिर्पोट है।

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  47. रिपोर्ट "सरस" रही.

    पत्नि से लाख कोशिश के बाद भी ब्लॉगिंग न करवा सका. कौन कहता है मर्द मनमर्जि का करवा लेते है? :)

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  48. बड़े रोचक ढंग से रिपोर्टिंग...अच्छी लगी.


    _________________
    'शब्द-शिखर' पर पढ़िए भारत की प्रथम महिला बैरिस्टर के बारे में...

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  49. आपकी रिपोर्टिंग सबसे अलग और मजेदार लगी, आभार

    प्रणाम स्वीकार करें

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  50. बढ़िया रपट, सही सवाल

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  51. http://mypoeticresponse.blogspot.com/2010/11/blog-post_16.html

    vimarsh yahaan kar saktey haen

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  52. रचना जी बधाई इस बात के लिए आपने यह रपट लिखकर कुछ महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न उठा दिए हैं। मुझे लगता है कि इन सवालों पर लगातार चर्चा होती रहनी चाहिए।
    ब्‍लाग केवल संख्‍या बढ़ाने के लिए नहीं बनाए जाने चाहिए। मुझे लगता है अभी भी हिन्‍दी में इतने ब्‍लाग हैं कि उन्‍हें पढ़ने के लिए आप पूरा दिन चाहिए।

    मुझे यह बात समझ नहीं आती कि खाना बनाने या चाय बनाने को या घर के काम को जरूरी काम क्‍यों नहीं समझा जाता। उसे वही दर्जा क्‍यों नहीं दिया जाता जो नौकरी करने को दिया जाता है।

    रचना जी मैं आपकी इस बात सहमत हूं कि ब्‍लाग वास्‍तव में विमर्श का मंच बनना चाहिए। केवल अपनी अपनी बात कहकर चल देने से काम नहीं चलेगा। ब्‍लाग लेखक एक बात कहता है,यानी विमर्श के मुद्दे देता है। लोग उस पर टिप्‍पणी करते हैं, कोई और आकर उसकी टिप्‍पणी से सूत्र पकड़कर बात आगे ले जाता है। यह होना चाहिए। क्‍योंकि यह स्‍कूल या कॉलेज की वादविवाद प्रतियोगिता नहीं है। जहां दो पक्ष अपनी बात कहते हैं और बस बात खत्‍म हो जाती है।

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  53. निशांत‍ मिश्र जी ने जो बाल ब्‍लाग लेखन का जो सवाल उठाया है,मैं उनकी बात से सहमत हूं। बल्कि कुछ समय पहले मैंने ऐसे ही एक चर्चित बाल ब्‍लाग पर जाकर बिलकुल यही बात कही थी। वहां उस ब्‍लाग के चाहने वाले मुझ पर पिल पड़े थे।
    हममे से बहुत से लोग इस बात पर विचार नहीं करते हैं कि इस तरह की ब्‍लागिंग से बच्‍चों पर क्‍या असर पड़ता है। आप उनकी स्‍वाभाविक अभिव्‍यक्ति को अचानक ही कुचल देते हैं। केवल ब्‍लाग ही नहीं सामान्‍य जीवन में बहुत से लोग यही गलती करते हैं।

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  54. जो लोग यह नहीं मानते कि ब्‍लाग में गुट नहीं हैं,वे लगता है आंख मूंदकर बैठे हैं। ब्‍लाग में गुट हैं। और मेरे विचार में गुट होना बुरी बात नहीं है। हां गुटबाजी बुरी बात है। गुट विचार को लेकर बनना चाहिए न कि व्‍यक्ति को लेकर। यह भी सही है कि गुटबाजी हो रही है। ब्‍लाग में हुआं हुआं करने की प्रवृति दिखाई देती है। इससे उबरना होगा।

    हो सकता है कई साथियों को बुरा लगे लेकिन मुझे लगता है कि इस तरह के ब्‍लाग सम्‍मेलन तो जरूर होते रहें पर उनका विज्ञापन जिस तरह से किया जाता,उससे बचना चाहिए। मुझे लगता है यह विज्ञापन बाजी ब्‍लाग की गंभीरता को कम करती है। और ब्‍लाग की यह दुनिया तो है ही ऐसी कि व्‍यक्ति को यहां सशरीर उपस्थि‍ति होने की जरूरत ही नहीं । यहां विचार महत्‍वपूर्ण हैं। और फोटो और तस्‍वीरें तो हम यहां भी देख ही सकते हैं।

    ReplyDelete
  55. http://mypoeticresponse.blogspot.com/2010/11/blog-post_4511.html

    आभासी दुनिया मे करे क्या ब्लॉग विमर्श ???

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  56. @आप उनकी स्‍वाभाविक अभिव्‍यक्ति को अचानक ही कुचल देते हैं।

    राजेश जी ,
    कृपया इस बारे में अपने विचार थोड़े विस्तार से बताएं

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  57. @taaki jisnae "subscribe" kiyaa haen

    रचना दीदी,
    यहाँ "सबस्क्राइब" करने से क्या आशय है ?
    क्या ये कोई ब्लॉग मेम्बरशिप कंसेप्ट है ?

    मतलब "नॉन मेम्बर्स" भी कमेन्ट कर सकते हैं ना !

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  58. Gaurav
    Those who have commented and also subscribed to get all the future comments via email .

    this a google techniq and i am sure u have subscribed here as you are replying to all the comments

    and thanks for your valuable comments

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  59. हिंदी ब्लॉग जगत मे आदित्य का ब्लॉग ही पहला "बेबी ब्लॉग " हैं इसको गूगल ने एक बार ही लाईट भी किया था और मे उसको देख कर ही उस ब्लॉग पर गयी थी। इंग्लिश मे ऐसे ब्लॉग पेहले से थे
    रंजन का मकसद अपने बच्चे कि हर मेमोरी { बड़े होने कि कला कह ले } को सुरक्षित रखना था । उन्होने उसकी तस्वीरो के जरिये हिंदी ब्लॉगर के साथ अपने बच्चे को इस तरह बाटा कि आज आदित्य के साथ एक आत्मिक जुड़ाव हो गया हैं । रंजन अब ब्लॉग को पुस्तक का रूप भी दे रहे हैं और मै उस ब्लॉग पर आदित्य कि बुआ कहलाने मे आत्मिक सुख महसूस करती हूँ उसके बाद बहुत से और ब्लॉग भी बने हैं जैसे जादू , चुलबुली . आप यहाँ भी देख सकते हैं http://mypoeticresponse.blogspot.com/2009/08/blog-post_994.html#comments

    बच्चे बनकर लिखना आसान नहीं हैं और ना ही उन पर कमेन्ट करना पर कुछ नया था और ब्लॉग जगत नया उसको अपनाया अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता इस को ही कहते हैं हैं

    मुझे हमेशा गलत लगता हैं जब बच्चे बहुत ज्यादा ब्लोगिंग करते हैं खुद यानि दिन मे दो दो पोस्ट आ रही हैं क्युकी वो समय कि बर्बादी हैं । २५ वर्ष तक कि आयु पढ़ लिख कर जीविका कमाने कि होती हैं । बाकी अभिभावकों से ज्यादा अच्छा शायद ही कोई उनके लिये सोच सके हां इन ब्लॉग का फ्यूचर क्या होगा ये आदित्य , जादू और एनी के ऊपर हैं ।हो सकता हैं उनको ये सब अच्छा ही ना लगे और वो सार्वजनिक स्थल से इसको हटाने का आग्रह करे क्युकी ये "इन्वेज़न ऑफ़ पराईवैसी" भी हैं । !!!!! रंजन पढ़ रहे हो तो इस पर बेहतर कह सकेगे

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  60. मेरा सौभाग्य है रचना दीदी की आपको मेरे विचार ठीक लगे,
    @Those who have commented and also subscribed to get all the future comments ...
    अच्छा अच्छा .. समझा :) शायद रोमन हिंदी देख कर मेरी समझ की बेट्री पावर डाउन होने लगती है :))
    @this a google techniq ...
    हाँ .... लगभग हमेशा ही फोलो अप कमेंट्स पर सबस्क्राइब करता हूँ

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  61. जानकारीपरक पोस्ट के लिए आप बधाई की पात्र हैं

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  62. रिपोर्ट अच्छी लगी !
    विचार विमर्श की गोष्टियाँ ज्यादातर ऐसी ही होती हैं !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  63. बहुत ही अच्छी प्रस्तुति है॥

    एक नजर इधर भी :-

    एक अनाथ बच्चे और उसे मिली एक नयी माँ की कहानी जो पूरी होने के लिए आपके कमेन्ट कि प्रतीक्षा में है कृपया पोस्ट पर आकर उस कहानी को पूरा करने में मदद करने हेतु सभी मम्मियो और पापाओ से विनती है ॥

    http://svatantravichar.blogspot.com/2010/11/blog-post_18.html

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  64. अच्छी चीजों का स्वागत होना चाहिये..

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  65. गुणी लोग बैठे और बढ़िया विमर्श हुआ , बड़ी अच्छी बात है...

    हम भी आकांक्षा रखते हैं कि सार्थक ब्लोगिंग अधिकाधिक हो...

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