नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

November 23, 2009

लडकिया क्या पहने हमेशा इस बात पर बहस होती हैं पर पुरूष क्या देखे इस पर कोई बहस क्यूँ नहीं होती ?

लडकिया क्या पहने हमेशा इस बात पर बहस होती हैं पर पुरूष क्या देखे इस पर कोई बहस क्यूँ नहीं होती ?
आप सब लोग स्त्री के पहनावे को इतना महत्व ही क्यूँ देते हैं ?
अगर मुझे कुछ नहीं देखना हैं टी वी पर तो मै टी वी बंद कर सकती हूँ या मगज़ीन का पन्ना पलट सकती हूँ पर आप ऐसा क्यूँ नहीं कर पाये ???
लडकिया क्या पहने हमेशा इस बात पर बहस होती हैं पर पुरूष क्या देखे इस पर कोई बहस क्यूँ नहीं होती ।
जिस दिन पुरूष स्त्री को शरीर समझ कर देखना छोड़ देगा उस दिन से बदलाव आयेगा । राखी सावंत , किम शर्मा या रिया सेन केवल अपनी रोजी रोटी के लिये ऐसा करती हैं क्युकी वो जानती हैं की आप उनको छोटे कपड़ो मे देख कर उन पर लिखेगे ।

शरीर पुरूष का हो या स्त्री का कोई फरक नहीं होता । जोन इब्राहीम के कपड़े आप ने देखे हैं या शाहरुख़ को लक्स के एड मे नहाते देखा हैं ? या वो एड जिसमे पुरूष अंडरवियर का एक छिछोरा प्रदर्शन होता हैं ।

आवाज उठानी हैं तो समाज मे बढते अनाचार पर उठाये ना की शील का टोकरा हमेशा औरत के सर पर रख कर उसको ताकते भी रहे और उसमे बुराई भी ढूंढ़ ने की पुरजोर कोशिश भी करते रहे !!!!

पहनावा पुरूष और स्त्री दोनों का सुरीची पूर्ण और मर्यादित हो ना की केवल स्त्री का क्युकी समाज मे स्त्री और पुरूष बराबर हैं और उनकी ज़िम्मेदारी और भागीदारी भी बराबर हैं । गर्मियों मे अगर पुरूष बरमूडा शोर्ट्स पहन कर घूम सकता हैं तो स्त्री को भी घूमने से नहीं रोक सकता क्युकी गर्मी दोनों को लगती हैं । आप जो न चाहे दूसरा करे पहले ख़ुद ना करे ।

32 comments:

  1. नारी जब बराबरी की बात करती है तो लेडीज स्पेशल की मांग क्यो उठती है .

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  2. पुरुष प्रधान समाज में यही होगा, विडम्बना

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  3. पुरुष की नग्नता किसी स्त्री को आकर्षित नहीं करती , वह छिछोरा लग सकता है, पर स्त्री का शरीर ...........
    पुरुष गर्मी में अर्धनग्न निकल जाये , पर बराबरी में स्त्री ! निकल ही रही हैं, पर उसमें भारतीय गरीमा
    नज़र नहीं आती .
    लड़कियों के साथ सही व्यवहार हो, इसकी मांग ज़रूरी है, कपड़े शरीर ढंकने के लिए होने चाहिए.....
    फिल्म और वास्तविक ज़िन्दगी के रहन-सहन में फर्क होना चाहिए

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  4. रचना,
    आह, बडा कष्ट होता है जब पुरूष केवल लडकियों के कपडों को ही नारी मुक्ति का आन्दोलन मान लेते हैं। इतना तो लडकियाँ भी अपने कपडों के बारे में नहीं सोचती होंगी।
    इस तरीके के मुद्दों पर अधिक ऊर्जा खर्च करने के बाद भी बात वहीं की वही है। इसके बाद भी कभी कोई महाशय आयेंगे और कहेंगे She was asking for it because of her dress |

    ये सिर्फ़ मूल मुद्दों से भटकाव की बात है। असल में उन्हें पता ही नहीं है कि अगर आप समाज में खुल्लमखुल्ला छूट कर दें कि आप कुछ भी पहनें तो भी महिलाओं के बडे वर्ग को इससे कोई खास खुशी/राहत नहीं मिलेगी। क्योंकि उनके लिये ये कोई खास बडा मुद्दा नहीं है। इससे बडे मुद्दे हैं घरेलू हिंसा, सामाजिक स्वतन्त्रता और आर्थिक स्वावलम्बन।

    इस पर कुछ पुरूष पूछ सकते हैं कि जब ये मुद्दा ही नहीं है तो इतना वबाल क्यों। तो सच ये है कि ऐसे छोटे मुद्दे पर आपका दृष्टिकोण देखकर बाकी मुख्य मुद्दों पर आपकी साफ़गोई पर शक होने लगता है। बस बात इतनी सी है, जब आप इस छोटे से मुद्दे को नारी की स्वतन्त्रता से जोडकर नहीं देख सकते कि वो क्या पहने और क्या नहीं। तो क्या बाद में आप ये नहीं कहेंगे कि हमें नारी का नौकरी करने से परहेज नहीं लेकिन वो केवल टीचर की नौकरी करे। या फ़िर हम उसकी स्वतन्त्रता के हिमायती हैं लेकिन केवल उसी हद तक जब तक हम सहमत हों।

    असली मुद्दा नारी के विवेक और उसकी स्वयं की मति से किये गये फ़ैसले पर भरोसा करने का है। और जब तक ये नहीं होगा कपडॊं जैसे मुद्दे दोनो पक्षों के लिये भावनात्मक बने रहेंगे।

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  5. रचना जी नमस्कार,आपके इस लेख में मुझे कुछ विरोधाभास नज़र आता है... इसमें आपके द्वारा लिखी गई कुछ बातों से मैँ पूर्णत्या सहमत हूँ और कुछ बातों से कतई इत्फाक नहीं रखता हूँ..आपने अपने इस लेख के शुरू में लिखा कि...
    "अगर मुझे कुछ नहीं देखना हैं टी वी पर तो मै टी वी बंद कर सकती हूँ या मगज़ीन का पन्ना पलट सकती हूँ पर आप ऐसा क्यूँ नहीं कर पाये ???"...

    तो आप क्या चाहती हैँ कि राह चलते हुए किसी लड़की के पहनावे को देख कर हम अपनी आँखे बन्द कर लें?...

    लेकिन ऐसी बचकानी हरकत की ऐवज में अगर हम किसी नाली या गटर में गिर कर अपनी हड्डी-पसली तुड़वा बैठें या फिर ऊपरवाले की दया से सिर्फ हमारे कपड़े-लत्ते ही कीचड़ और गोबर से सन जाएँ..तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?..
    वो लड़की या फिर आप?... :-)

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  6. आदमी की आदम सोच बदलाव की डगर पर चल तो चुकी है। थोड़ा इंतज़ार करिए, पहनावे पर पनौतियां बंद हो जाएंगीं।

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  7. रचना,
    सही बात उठाई है आपने. बात तो पुरुषों के पहनावे और हरकतों पर भी हो सकती है, पर नहीं होती क्योंकि औरतें ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देतीं. समाज में बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिन पर बात हो सकती है, बहस हो सकती है. इससे कुछ अच्छी बातें सामने आ सकती हैं.

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  8. सच्चाई की रोशनी दिखाती आपकी बात हक़ीक़त बयान करती है।

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  9. आपने कहाँ की टी वी बन्द कर लेना चाहिए जब इस तरह नंगे दृश्य आये , बात तो आपने बिल्कुल सही कहा , परन्तु क्या ऐसा हो सकता है क्या ये आपको भी मालुम है कि नहीं । और न हो सकने का कारण भी है , क्योंकि यह प्रकृति की बनाई हुयी है , अपोजिट सेक्स के प्रति लोगो का आकर्षण बढ़ता है और इसे कोई भी नहीं रोक सकता । अब कोई कम कपड़े में डा़स करेगी और वहाँ मर्द होंगे तो तालियाँ तो बजनी है ना । आप का कहना है कि लड़किया क्या पहने इसपर विवाद क्यो होता है लड़के क्या देंखे इसपर क्यो नहीं होता । यहाँ भी बात साफ है कि लड़के वहीं देखेंगे जो लड़कियाँ दिखाँयेगी और ये सबको पता है । बात आपकी बिल्कुल सही है कि ये हिरोइनें कम कपड़े पहनती है अपनी रोजी रोटी के लिए , और जो इनको देखकर पहनती है वे क्या केरती है जरा बताईयेगा आप ? स्कूलों मे सकर्ट पहनती है लड़किया क्या वे भी रोजी रोटी के लिए है ?

    आप लोग हमेशा द्वी अर्थी बातें करती है । कभी ये सूना है आपने कि किसी मर्द का बलात्कार हुआ है , शायद नही सूना हो , कभी आपने सोचा कि बलात्कार का शिकार हमेशा औरते ही क्यों होती है । क्योंकि पुरुष औरतो की अपेक्षा ज्यादा कामुक होते हैं और पुरुषो में सहनशिलता भी कम होती है । मैं मानता हूँ कि यहाँ इस प्रकार की घटना मानवता को शर्मसार करती है और पुरुष वर्ग भी इसका दोषी है , परन्तु क्या पुरुष वर्ग ही बस दोषी है इन सब घटनाओं के पिछे ? इन सबको दावत देती है छोटे और कम कपड़ो मे लड़कियाँ , । एक तरफ कम कपड़ो मे चलना कामुकता को बढ़ाना , वहीं दूसरी तरफ अगर कोई घटना होती है तो उसका विरोध प्रदर्शन भी करती है । रचना जी उम्मीद करता हूँ कि आप मेरी बातो को अन्यथा नहीं लेंगी ।

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  10. हमारी टिप्पणी कहाँ गयी?

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  11. मुझे याद आ रहा है कि कुछ वर्षों पहले आस्ट्रेलिया में एक मुकदमा दायर किया गया था । इस याचिका में कहा गया था कि पुरुष जिस तरह से शरीर का उपरी हिस्सा खुला रख के समुद्री तट पर घूमते हैं समानता के कारण महिलाओं को भी वही अधिकार मिलना चाहिए । कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी ...कई कारणों में से एक ये भी था कि पुरुष और महिला को इश्वरीय रूप से ही अलग अलग शारिरिक संरचना मिली हुई है ....। एक पिक्चर के बारे में सुना था .....शीर्षक था ...a man can't be raped ....कहानी कुछ ऐसी थी कि नायिका अपने बलात्कार का बदला लेने की कोशिश करती है ...किंतु अंतत: बलात्कार तो महिला का ही होता है ॥

    हां रही बात नजरिये की ...तो ये सब संस्कार हैं ....जो कुछ आने वाली पीढी को मिल रहा है वही पलट कर सामने आ रहा है ....कुल मिला के सारा माहौल ही उस तरह का लिजलिजा सा बना दिया गया है ...।

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  12. शॉर्ट वगैरह पर टोका टोकी और रोकना तो अब गाँवों में भी खत्म हो रहा है। नई पीढ़ी को लोग नहीं रोकते, पुरानी अपने संस्कारों तले दबी है सो उसे न तो जरूरत है और न वो इस बारे में सोचती है। मैं अपवादों की बात नहीं कर रहा।
    रही बात देखने की तो कि पुरुष की नजर अधिक प्रगल्भ रहती है और नारी की गोपन। विपरीत लिंग के सौन्दर्य से प्रभावित सभी होते हैं। नजर हटा लेना तो संस्कार के हिस्से और परवरिश के माहौल से आता है। कुछ हटा लेते/ती हैं कुछ नहीं।
    आप बात एक तरह की मानसिकता की कर रही हैं जिसे या तो अश्लीलता ही नजर आती है या नारी एक भोग का सामान। वह तो निन्दनीय है ही।

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  13. मैं रश्मि प्रभाजी से पूर्णतया सहमत हूँ ...मुक्ति और आजादी चाहिए हम नारियों को भी मगर ...किससे ...वस्त्रों से ...?
    कदापि नहीं ....आजादी हमारे विचारों में होनी चाहिए ...अफ़सोस की तथाकथित आज़ादी की दिशा हम नारियां स्वयं ही बदल रही है ...

    @ मिथिलेश दुबे जी ...
    स्त्रियाँ अगर पुरुषों द्वारा प्रताड़ित होती हैं तो निश्चित रूप पुरुष वर्ग ही दोषी है ... क्या पूरी तरह भारतीय वस्त्रों से सुसज्जित लड़कियां प्रताड़ित नहीं होती है..??
    पाशविक प्रवृति के पुरुष प्रताड़ना के लिए सिर्फ स्त्रीलिंग का चयन करते हैं ...उनके लिए वस्त्र , व्यवसाय या उम्र कोई मायने नहीं रखती ...आशा है की आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे ...हमारी लडाई पुरुषों की पाशविक वृत्ति है ...पुरुषों से नहीं ...

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  14. हमारी लडाई पुरुषों की पाशविक वृत्ति से है ...पुरुषों से नहीं ...

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  15. @ राजीव जी,

    लड़कियों को देख कर आँखें बंद करने की जरूरत नहीं होती है. लेकिन नजर डालने और उसको लगातार घूरने में फर्क होता है. फिर घूरने वाले सयंमित कपडे वाली लड़कियों को भी नहीं छोड़ते हैं. माँ अपनी बेटियों के साथ होती है और वे पलट पलट कर उनको घूरते हुए चले जाते हैं. मैं कभी उन लड़कियों को आधे कपड़ों में नहीं देखा है. लेकिन घूरने वालों को लगातार देखा है.
    प्रवृत्तियों पर अंकुश लगने की जरूरत है. हम अपनी बहन और बेटी के लिए दूसरे की नजरें सहन नहीं कर सकते फिर दूसरे की बहन और बेटी को क्यों घूरते हैं. बेटी बाप के साथ जा रही है और लोग कमेन्ट करते हैं. "लौंडिया बहुत अच्छी लिए जा रहा है",
    "इसको को कहाँ से मिल गयी?"
    फिर भाई के साथ जाने वाली लड़कियों तो कितने फिकरे सुनती हैं. कौन किससे साथ जा रहा है? इसमें आपको क्या परेशानी है? यहाँ आप किस को दोष देंगे?
    संयम की जरूरत किसको है? इसका निर्णय करके तो आप सभी बता सकते हैं. अगर मेरी पेश किये गए एक भी उदहारण गलत हों तो बतलाइए और दलील दीजिये इसमें कहाँ लड़कियाँ दोषी हैं?
    रहा सवाल कीचड़ में गिरने और कपड़े सन जाने का तो ऐसे लोग अपनी दृष्टि में भले से साफ कपड़ों से सुसज्जित समझते रहें, मानसिकता के कीचड़ से तो वे मुक्त हैं ही नहीं.

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  16. आपका आलेख पढ़ा.... समानता. आज़ादी इन सब बातों की आवश्यकता हैं हम नारियों को...परन्तु.....यह समानता और आज़ादी बौधिक, मानसिक, सामजिक स्तर की हो......विचारों की , अभिव्यक्ति, शिक्षा, नौकरी...इत्यादि.....की हो....
    मैं कम कपड़ों की पाक्ष्धर नहीं हूँ.....जोन अब्राहम निकर पहन कर खुले बदन घूम रहे हैं इसलिए मैं या मेरी बेटी भी. ऐसी ही पोशाक में आ जाएँ ये नहीं होगा....और यह होना भी नहीं चाहिए....
    आप घर में ताला क्यूँ लगाती हैं इसलिए न की चोर को दूर रखा जा सके.....आप घर खुला छोड़ दें और चोरी हो जाने पर यह शोर मचाएं की चोर को चोरी नहीं करनी चाहिये थी..सर्वथा बेजा है.....दूसरों को ऐसा मौका ही क्यूँ देना.....की वो कुछ भी बुरा कर सकें....जबकि उनकी कोई gurantee नहीं है.....अभी पुरुष समाज पूरी तरह नहीं बदला है...यह नहीं की है की अच्छे पुरुष हैं ही नहीं....हैं और बहुत हैं....अपने घर में अपने आस-पास ही बहुत मिलेंगे जो हर मायने में अच्छे हैं...लेकिन सड़क पर चलते हुए इस बात की gurantee नहीं ली जा सकती ...ऐसे कपडे पहन कर घर बैठना एक बात और सड़क पर निकलना है तो इसकी प्रतिक्रिया के लिए भी तैयार रहना चाहिए ......मेरी नज़र में यह तो सरासर बेवकूफी है.....
    हम खुद ही सोचे क्या...अपने उधरी जंघा और खुले वक्ष लेकर अपने पिता के समक्ष हम जा पायेंगे.... बिलकुल नहीं.....इसलिए.....मुझे आपकी बात से इत्तेफाक नहीं है..

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  17. अतिसुन्‍दर, आपके लेख में समाज को बदल देने वाली शक्ति है, ऐसी लेखनियों से प्रभावित होकर हमारे MAHASHAKTI मित्रों ने लिखी है पोस्‍ट
    “ नारी ” तू हैं बड़ी महान
    http://mahashaktigroup.bharatuday.in/

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  18. रचना जी ,
    आपने बहुत ही अच्छा लिखा है इसमे संदेह नही , लेकिन कुछ जगहों पर मै आपसे सहमत नही हूँ, हमारे समाज को अपने देखने का नजरिया बदलना जरूरी है ये तो सच कहा आपने, लेकिन हमे ये भी नही भूलना चाहिये की भगवन ने स्त्री और पुरूष को बनते समय उसमे कुछ शारीरिक परिवर्तन भी किए है उन शारीरिक परिवर्तन को ध्यान रखते हुए बस्त्रो का चुनाव अवश्यक है ये हमे कभी भूलना नही चाहिए।

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  19. ada aap ek extreme ki baat kar rahee haen aur mae normal sitautions mae samntaa ki baat kar rahee hun

    aap ki soch mae ladki ki suraksha uska apna daaitav haen maeri nazar mae yae ek samajik prakriya honi chahiyae jaesae neeraj ne kehaa haen

    neeraj rohila ka kament padhey jarur

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  20. अनिल कांत जी इसमे सही क्या हैं जरा बताईयेगा , हम समझ नहीं पाये ।

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  21. @नीरज

    जरा भारत आईये और देखिए कि कहाँ पहुच चूका है हमारा भारत । जो भारत आपने देखा है शायद अब वो ना रहा । आपको न पता कि कैसे लगता है कि कपड़े मु्द्दा नहीं है , ये शायद आपकी व्यक्तिगत सोच होगी । एक बात तो आपको जरुर मानंनी होगी वह ये कि अगर महिलायें ज्यादा कपड़े में रहती हैं तो इससे उनकी ही सुरक्षा में बढोत्तरी होती है । जैसा आपको मालुम होगा की खूली तिजोरी पर नजर सबकी होती है , वही मसला यहाँ भी है । कम कपड़े पहनना मतलब कामुकता को आमत्रणं देना सरीखा है । यही कारण है कि आये दिंन बलात्कार , और छेड़खानी की घटना सूननें को मिलती है ।

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  22. रचना जी,
    मैंने भी सामाजिक समानता की ही बात की है....
    हम क्यूँ कपड़ों की समानता के लिए अपना समय गवां रहें हैं...जबकि वो समानता हो ही नहीं सकती है ...इसका एक मात्र कारण है हमारा शरीर....
    सामाजिक समानता के मुद्दे न जाने कितने हैं उनपर बात हो ....यह तो भटकाव ही लग रहा है......

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  23. सर पर आँचल ना रखने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि नग्नता की सीमा पार कर जाएँ........कंधे से कंधा मिलाकर चलने का
    अर्थ इतना बेकार निकाला गया है कि मर्यादा का अतिक्रमण हो चला........सिगरेट लड़के, शराब लड़के तो लडकियां क्यूँ नहीं????
    तो इन कुतर्कों के आधार पर खुलेआम बुजुर्गों का अपमान हो ही रहा है, साथ ही भारतीय संस्कृति लुप्त होती जा रही है !
    बौद्धिकता के नाम पर हर बंधन से लोग आज़ाद हैं.......
    बात थी स्त्री की पहचान, uske सम्मान,दहेज़-प्रथा के अंत की, उस के क़दमों के संतुलन की, शिक्षित स्तर की.........यहाँ तो मामला
    है कि जो गंदी गालियाँ झोपड़पट्टी में दी जाती थीं,उसे आज की आधुनिक लड़कियों ने अपनी आधुनिकता में शामिल कर लिया है.....
    बाल-विवाह, सती-प्रथा, दहेज़-ह्त्या का क्या यह जवाब है !

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  24. bilkul ada yahii neeraj ne kehaa haen aur yahii maenae bhi mana haen ki kapdo ki baat par baar baar behas hotee haen taaki saamajik samantaa ki baat par naa ho

    2007 sae hindi bloging mae hun aur har haftey ek aadh post aa jaatee haen naari ko kyaa pehnaa chahiyae .

    narri ko kyaa pehnaa chahiyae yae behas kaa mudaa hi kyun hona chahiyae ?? aur meri post
    पहनावा पुरूष और स्त्री दोनों का सुरीची पूर्ण और मर्यादित हो ना की केवल स्त्री का क्युकी समाज मे स्त्री और पुरूष बराबर हैं और उनकी ज़िम्मेदारी और भागीदारी भी बराबर हैं ।
    khatam issi baat par hotee haen

    rashmi

    jab bhi kisi ko dabaya jata haen to jab wo azaad hota haen to azadi ek lavae ki tarah nikaltee haen
    kitni sadiyon sae aurat ko bataya jaa rahaa haen yaea karo yae nahin karo so ab har koi apni marzi ki baat karna chahtaa aur aesa aur badhega agar ham sabkae liyae ek saa nazariya nahin rakahe gae

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  25. जैसा आपको मालुम होगा की खूली तिजोरी पर नजर सबकी होती है , वही मसला यहाँ भी है ।
    mithilesh
    jab tak aap is soch ko maantey rahegaea ki aurat ka shaeer ek teejori haen aur loota jaa saktaa haen tabtak aap jyadaa kapdo ki paervi kartey raheygaea

    aurat ko baar baar yae yaad dila kar tum hara sheel loot saktaa haen ham jo sheel loottaa haen usko kuchh yaad nahin dilaatey
    kabhie purusho ki is kamjori par likhae jo aurat kae shareer ko teejori maanta haen aur lootnae kaa adhikaar rakhtaa haen

    apnae blog par likhae taaki behs kaa ek dusra nazariyaa aayae
    aurat aur uska sharer aur usko kyaa pehnaan haen yae to ham sab sadiyon sae sun rahey haen

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  26. Samanta ki maang jarur hai per agar जोन इब्राहीम short ya topless bahar nikalte hai to kya hum bhi uska anusaran karenge ? nahi n... Baad maryaada ki hai yaha na ki samanta ki...
    ha aawaz jarur uthani hai, per anacchar per na ki kya pahne ya kya na pahne ki samanta per...!

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  27. bahut badhiya prasn kiya hain aapne jab purush khud hi kuchh dekhna nahi chahenge to streeyo ko kya pahanna hain kya nahi is par bahas swayam khatm ho jayegi

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  28. raajiv taneja

    is blog par ham sab apnae samay mae sae samy nikal kar wo likh kar lanaa chahtae haen jo sadiyon sae stri bhugat rahee haen

    yahaan kae aalekho mae aap ko majaak ka put nahin milaegaa

    aap ki baat ko ham ek serious discussion ki tarah lena chahtey haen kyuki hamara yae samay serious baato kaa haen

    moderation lagana jarurii haen taaki apshabd bas mujhtak email sae aayae aur sadsyaa tak naa jaaye

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  29. जान अब्राहम क्या कोई महापुरुष है जिसकी चर्चा की जा रही है

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  30. पहनावा पुरूष और स्त्री दोनों का सुरीची पूर्ण और मर्यादित हो ना की केवल स्त्री का क्युकी समाज मे स्त्री और पुरूष बराबर हैं और उनकी ज़िम्मेदारी और भागीदारी भी बराबर हैं ।

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