नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

February 17, 2013

मुक्ति का कमेन्ट

पिछली पोस्ट पर मुक्ति ने ये कमेन्ट देना चाहा था पोस्ट नहीं हो पाया
उनकी इच्छा अनुसार इसको पोस्ट के रूप में विचारों के लिये यहाँ दे रही हूँ
2013/2/17 आराधना चतुर्वेदी <a@gmail.com>
बड़ी मेहनत से ये टिप्पणी लिखी. तीन बार कोशिश की, पब्लिश नहीं हुयी. आप कर दीजिए. या पोस्ट के रूप में डाल दीजिए-

मैं लोगों से यही बात बार-बार कहना चाहती हूँ कि इस लड़के की समस्या को एक व्यक्ति की समस्या की तरह न लेकर समाज की एक प्रमुख समस्या की तरह लिया जाय. लाख बातें होंगी, जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि गलती लड़के की है और उसे इसका खामियाजा भुगतना होगा. लेकिन ऐसी परिस्थिति आयी क्यों? इस पर विचार करना होगा क्योंकि मेरे आसपास बहुत से ऐसे उदाहरण हैं, जहाँ लड़के-लड़कियाँ अपने इस तरह के बेमेल विवाह को निभाने के लिए मजबूर हैं. प्लीज़ इस समस्या को व्यापक रूप में देखें. इसे अगर बिन्दुवार देखें, तो यह एक केस इतने मुद्दे उठाता है-
- दहेज की समस्या- हम इसके लिए सिर्फ लड़के वालों को दोषी नहीं मान सकते. लड़की के माँ-बाप भी उतने ही दोषी हैं क्योंकि अक्सर ये देखा जाता है कि जिसके पास थोड़ा ज्यादा पैसा होता है, वो उसके द्वारा "अच्छा लड़का" खरीद लेना चाहता है. ऐसे में कई बार ये नहीं देखा जाता कि लड़की लड़के में मेल है या नहीं. ये सोचा जाता है कि शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा.
- अरेंज्ड मैरिज- ऐसी शादियाँ गाँवों में आज भी होती हैं, जिसमें बिचौलिया एक-दूसरे पक्ष को बहुत सी बातें नहीं बताता. उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों में लड़की वाले लड़का देखने जाते हैं, तो वह उसके गाँव से उसके 'घर-दुआर, ज़मीन-जायदाद' के बारे में पूछ लेते हैं, लेकिन अक्सर लड़के वाले ये सब बातें अच्छी तरह नहीं जान पाते. क्योंकि पहली बात, तो आज भी लोग "किसी तरह लड़की की शादी हो जाय" ये सोचकर बहुत सी बातें छिपा जाते हैं. जबकि अब परिस्थितियाँ पहले जैसी नहीं रहीं. पहले अक्सर ऐसा होता था कि लड़का बाहर नौकरी करता था और उसकी पत्नी गाँव में रहती थी या घर में भी रहती थी, तो बाहरवालों से बात तक नहीं करती थी. 
अगर लड़का-लड़की माँ-बाप पर इतना भरोसा कर रहे हैं कि अपना जीवनसाथी उन्हें चुनने के लिए कह रहे हैं, तो उन्हें भी पूरी तरह से देख-सुनकर शादी करनी चाहिए. मैं आपको अपना उदाहरण बताती हूँ. मेरा भाई मुझसे एक साल छोटा था. इंजीनियर था और बड़ा शर्मीला. बाऊ ने तो हमलोगों को पूरी छूट दे रखी थी अपना साथी खुद ढूँढने की, लेकिन ये मेरे भाई के बस की बात नहीं थी. तो उसने ये ज़िम्मेदारी मुझ पर छोड़ दी क्योंकि मैंने साफ कह दिया था कि मुझ पर मेरी शादी के लिए ज़ोर न डाला जाय. चाहे तो भाई शादी कर ले. अब भाई की डिमांड वही थीं, जो ऊपर वाले केस में भाई साहब की हैं. उन्हें स्मार्ट, अंग्रेजी बोलने वाली, पढ़ी-लिखी, कम से कम साढ़े पाँच फुट की (क्योंकि भाई छः फुट का था) देखने में आकर्षक (सांवली-गोरी से कोई ज्यादा मतलब नहीं) और दुबली-पतली लड़की चाहिए थी. (दहेज, हमारे यहाँ कोई मुद्दा नहीं था क्योंकि मैंने कह दिया था कि दहेज नहीं लिया जाएगा) अब समस्या ये थी कि हमारे यहाँ लड़के वाले लड़की वाले के यहाँ नहीं जाते, 'देखहरू' आते हैं, लड़की की ओर से. खैर, हम बस लोगों से लड़की का बायोडेटा और फोटो ले लेते थे.लड़की से मिलना हमने तब तय किया जब ये पक्का हो गया कि लड़की भाई द्वारा बताए गए मानकों पर सही उतरती है. पहले मैं लड़की से मिली और जब आश्वस्त हो गयी, तब भाई से कहा कि वो भी मिलकर पक्का कर ले कि लड़की उसके लायक है कि नहीं. बाद में मुझे दोष न दे कि उसमें ये कमी है या वो कमी है. मुझे बड़े पापड़ बेलने पड़े भाई की शादी करवाने में. खैर, लड़की भाई को पसंद आ गयी और शादी हो गयी. बाद में लड़की का व्यवहार हमलोगों के प्रति बदल गया, लेकिन मैं इस बात से संतुष्ट थी कि पति-पत्नी में सामंजस्य बना था.
यहाँ मेरा कहना ये है कि आज के ज़माने में जब लड़का या लड़की अरेंज्ड मैरिज करने को तैयार होते हैं, तो घरवालों की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है. उन्हें ठीक से जाँच-पड़ताल करके शादी करनी चाहिए.
-तीसरी बात, लड़की की शिक्षा-दीक्षा- आज भी गाँवों में लड़के को बाहर भेज दिया जाता है पढ़ने के लिए और लड़कियों को नहीं. और अपेक्षा ये की जाती है कि लड़की की शादी ऐसे लड़के से हो कि वो उसे शहर में अपने साथ रखे. लड़की बेचारी तो आज भी गाय है, उसे जहाँ कह दिया जाता है कर लेती है शादी. लेकिन लड़के ‘स्मार्ट’ लड़की चाहते हैं. यहाँ ये बात कहना चाहती हूँ कि यू.पी. बिहार से आये लड़कों को महानगरों में पली-बढ़ी लड़कियाँ पसंद नहीं आतीं. उन्हें अपने जैसी लड़की ही चाहिए होती है, जो हो तो छोटे शहर या गाँव की लेकन उसकी शिक्षा-दीक्षा अच्छी हुयी हो और उसे पहनने-ओढ़ने, बोलने-चालने का ढंग मालूम हो. मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी को कि ऐतराज होना चाहिए कि लड़का ऐसी इच्छा क्यों कर रहा है क्योंकि बाहर पढ़ी-लिखी लड़कियाँ भी किसी कम पढ़े-लिखे लड़के से शादी नहीं करना चाहेंगी. और मेरे आस-पास ऐसी भी लड़कियाँ हैं, जिन्होंने दिल्ली में रहकर सिविल की तैयारी की है और अब उनकी अपने माँ-बाप से डिमांड है कि लड़का न सिर्फ सिविल की नौकरी कर रहा हो, बल्कि उसने दिल्ली में ही तैयारी की हो.
चौथी बात, माँ-बाप और बच्चों के बीच संवादहीनता और वैचारिक मतभेद- आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि आज भी शादी जैसे महत्त्वपूर्ण निर्णय के मामले में लड़का या लड़की का बोलना ‘बेशर्मी’ समझा जाता है और अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनना अपराध. अपने छोटे शहर या गाँवों से महानगरों में पढ़ने आये बच्चों का मानसिक स्तर अपने माँ-बाप से कहीं ज्यादा अलग हो जाता है, वहीं माता-पिता अपने आस-पास के परिवेश से पूरी तरह जुड़े होते हैं. माँ-बाप बच्चों के लिए अपने समुदाय में साथी ढूँढते हैं और बच्चे अपने जैसे मानसिक स्तर वाला. एक बात और बता दूँ, आज भी दोनों परिवारों में लेन-देन की क्या बात हुई, कितना दहेज लिया गया और उसका क्या हुआ, इसके बारे में न लड़के को पता होता है ना लड़की को. और अगर अरेंज्ड मैरिज होती है, तो दहेज तो लिया-दिया जाता है, ये एक कड़वा सच है. मेरे भाई की शादी में जबकि मैंने दहेज लेने से साफ मना कर दिया था, तब भी लड़की के माँ-बाप और बाऊ के बीच कुछ बात हुयी और उन्होंने कुछ पैसे नगद दिए. ये बात अलग है कि उसे लड़का-लड़की के एकाउंट में बराबर-बराबर जमा कर दिया गया. 
आज भी मेरे कुछ साथी अपने माँ-बाप से इस मुद्दे पर लड़ाई लड़ रहे हैं कि उन्हें अपने मनपसंद अंतरजातीय साथी से ब्याह करने दिया जाय. माँ-बाप अपनी जिद पर अड़े हैं कि इससे उनकी बदनामी होगी. शायद आपको बुरा लगे जब मैं ये कहूँ कि माँ-बाप अगर बच्चे को महानगर में दस साल रखकर पढ़ा सकने के लिए तैयार हो जाते हैं, तो अंतरजातीय विवाह के लिए क्यों नहीं? लेकिन फिलहाल इस मुद्दे को बाद के लिए रखते हैं. 
अभी मैं एक दूसरे दोस्त के बारे में लिख रही हूँ, जिसने माँ-बाप के कहने पर आँखें मूंदकर उनकी पसंद की हुयी लड़की से शादी कर ली. माँ-बाप ने दहेज के लालच में उसकी शादी एक ऐसी लड़की से करा दी, जो दिमागी रूप से बहुत कमज़ोर है. शादी के बाद जैसा कि होता है लड़का अपनी पत्नी को दिल्ली ले आया. एक साल दोनों साथ रहे, लेकिन कुछ ठीक नहीं हुआ. लड़की कुछ समझती ही नहीं थी. लड़के को मैं व्यक्तिगत रूप से जानती हूँ कि वो बहुत ही केयरिंग, औरतों का सम्मान करने वाला, इमोशनल और प्यारा सा बन्दा है. अगर उसकी लड़की से नहीं पटी तो इसका सीधा समत्लब है कि लड़की 'उसके लायक' थी नहीं, हालांकि मुझे ये बात कहना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता. हम कहने को कह सकते हैं कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा, लेकिन कब? लड़का मेरी उम्र का है. तैतींस साल की उम्र में वो लड़की को ट्रेंड करना शुरू करेगा, तो बच्चे कब होंगे? और परिवार कब शुरू होगा? अब मैं बता दूँ कि जो हुआ उसमें लड़के की कोई गलती नहीं थी. लड़का लड़की को घर छोड़ आया. लड़की ने ससुराल वालों के साथ रहने को मना कर दिया और मायके वाले तलाक देने को तैयार नहीं हैं. हमारे यहाँ  माहौल ऐसा नहीं है कि लड़के वाले जो चाहे कर ले. ऐसे मामलों में लोग बिना जाने सुने लड़की वालों के पक्ष में हो जाते हैं. लकड़ी वाले बहुत धनी और दबंग हैं. तलाक नहीं होगा और लड़का दूसरी शादी नहीं कर सकता. दोनों की ज़िंदगी चौपट, तो इसमें कौन ज़िम्मेदार है?
मैं माँ-बाप से पूछती हूँ कि आप बच्चों को अपनी मर्ज़ी से शादी करने देंगे नहीं, शादी करते समय उनकी पसंद को तवज्जो नहीं देंगे और उनके लिए उनके लायक जीवनसाथी ढूँढेंगे नहीं. जिससे शादी कर देंगे, चाहेंगे कि वो साथ निभाए. क्या बच्चों की अपनी कोई मर्ज़ी नहीं? उन्हें आपने खुले आसमान में छोड़ दिया अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए, तो वापस फिर परम्परा, जाति, समुदाय, रीति-रिवाज के बंधनों में क्यों डाल रहे हैं? और कम से कम उन बच्चों की ज़िंदगी पर तरस खाइए, जिन्होंने अपनी जिंदगी का इतना बड़ा निर्णय आपके हाथों में सौंप दिया है. 



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24 comments:

  1. शादी में बच्चों की सहमति अनिवार्य शर्त होनी चाहिए।

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  2. सहमति मतलब सहमति..बिना किसी इमोशनल दबाव के..

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  3. आप को ये टिप्पणी उसी पोस्ट पर लगानी चाहिए थी या उस पोस्ट को इस में भी सम्मिलित करना चाहिए था। जिस से विमर्श आरंभ होता।
    मुक्ति ने समस्या के सामाजिक कारण बताए हैं जिन से समस्या उत्पन्न होती है। फिर वे उस के विधिक समाधान के लिए पहुँचते है। ऐसी परिस्थितियों में होना तो ये चाहिए कि दोनों पक्ष जल्दी से जल्दी शर्तें तय कर के विवाह विच्छेद कर लें। ये विवाह विच्छेद सहमति से हो सकता है उस में भी आवेदन प्रस्तुत करने के छह माह बाद विवाह विच्छेद की डिक्री पारित होगी। यदि सहमति न बने तो न्यायालय को चाहिए कि वह त्वरित गति से मुकदमे का फैसला छह माह में कर दे। क्यों कि इसी तरह बुरे वैवाहिक जीवन व दो जीवनों को बरबाद होने से बचाया जा सकता है।
    समस्या ये है कि हमारे यहाँ पर्याप्त संख्या में परिवार न्यायालय नहीं हैं जिस के कारण ये मुकदमे बरसों झूलते रहते हैं। दूसरी समस्या न्यायाधीशों के एटीट्यूड की है। वे भी उन सभी सामाजिक बीमारियों से ग्रस्त हैं जिन से हमारा समाज है। मजिस्ट्रेट और जज खुद दहेज के आरोपों में पकड़े जाते हैं। न्यायाधीशों पर उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालयों के पूर्व निर्णयों का दबाव भी रहता है।
    एक बात और है कि न्यायालय केवल कानून के मुताबिक निर्णय दे सकते हैं। वे कानून की व्याख्या कर सकते हैं लेकिन उसे बदल नहीं सकते। कानून में बदलाव भी जरूरी है। वह विधायिका ही कर सकती है।
    हमारे यहां समाज में अनेक स्तर हैं और अलग अलग समाजों में परंपराएँ अलग अलग हैं। सब को एक कानून से नहीं हाँका जा सकता। हालांकि धर्मों के हिसाब से पर्सनल लॉ अलग अलग है लेकिन प्रत्येक धर्म में भी अनेक स्तर और फिरके हैं। इस कारण से अलग अलग कानून का होना भी उपयोगी सिद्ध नहीं हो रहा है। इन मामलों में कानून इतना होना चाहिए जो सब मामलों पर लागू हो सके उस के आगे की स्थिति को न्यायाधीशों पर परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेने के लिए छोड़ देनी चाहिए।
    परिवार न्यायालयो में न्यायाधीश विशेष रूप से प्रशिक्षित और अनुभवी भी होने चाहिए।

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    1. द्विवेदी जी, मैं दरअसल ये बात भी रखना चाहती थी, लेकिन फिर सोचा कि बात दूसरी ओर न चली जाय. मसलन तलाक के दुरूपयोग आदि पर. लेकिन आपने बात पूरी कर दी.
      मैं इस बात को शादी (अरेंज्ड मैरिज) से जोड़ना चाहती हूँ. असल में हमारे देश में तलाक की प्रक्रिया, चाहे वो परस्पर सहमति वाला तलाक हो, बहुत जटिल और दीर्घकालीन है. दूसरी बात, तलाक आज भी एक घृणित और वर्जित कार्य समझा जाता है. माता-पिता इस बात का फायदा उठाते हैं. वो सोचते हैं कि एक बार शादी हो जाय तो लड़का-लड़की किसी न किसी तरह "निभा" ही लेंगे. ये बात सुनने में अटपटी ज़रूर लगेगी. लेकिन सच है. इस बात की ओर मेरा ध्यान मेरे पिताजी ने दिलाया था ऐसे ही 'निभाते जाने' की बात को लेकर.
      मैं ये बात कहना नहीं चाहती, लेकिन सच है कि लड़की के माता-पिता इस बात का खूब फायदा उठाते हैं और किसी न किसी तरह शादी करवा देने के पक्ष में होते हैं. उन्हें नहीं मालूम होता कि ऐसा करके वे दो जिंदगियां बर्बाद कर रहे होते हैं.
      मैं लड़की के माता-पिता से ये कहना चाहूँगी कि अपनी लड़की को बोझ समझकर उतारने के बजाय सोच-समझकर शादी करें और यदि लड़का-लड़की शादी से खुश न हों, तो उसे तोड़ने में भी संकोच न करें. छोटी-छोटी बातों पर "घर तोड़ने" के पक्ष में मैं भी कभी नहीं रहती, लेकिन जब बात इस स्तर तक आ जाए, तो तलाक लेने में कोई बुराई नहीं है.
      और लोगों से भी कहूँगी कि तलाक को लेकर अपनी मानसिकता बदलें प्लीज़. बहुत से पति-पत्नी तो सिर्फ 'समाज के डर' से अलग नहीं होना चाहते. रोज़-रोज़ के तनाव से अलग रहना बेहतर है. कोई भी किसी रिश्ते को आसानी से तोड़ना नहीं चाहता, लेकिन जब साथ रहना दूभर हो जाय, तो सम्बन्ध तोड़ने में कोई हर्ज नहीं है.

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    2. मुक्ति जी

      तलाक के खिलाफ मै भी नहीं हूँ , किन्तु तलाक तो वहा होना चाहिए जहा पति पत्नी के बीच समस्या का कोई समाधान ही न हो , जिस केस के बारे में हम बात कर रहे है वहा तो समस्या का समाधान है , फिर वहा भी तलाक की बात क्यों की जाये । लड़की को अंग्रेजी नहीं आती या वो उससे कोई और नौकरी करना चाहता है या उसके बोलने चालने का ढंग सही है नहीं है वो सारी चीजे तो सुधारी जा सकती है , बदली जा सकती है , फिर तलाक की बात क्यों की जाये । व्यक्ति समय के साथ बदलता है सिखता नए मौहोल में ढलता है । कल को वो दूसरी शादी करे और फिर पत्नी जरुर से ज्यादा ही आधुनिक हो तो क्या फिर कहेंगी की उसे फिर से तलाक ले लेना चाहिए और तब तक शादी और तलाक का सिलसिला जरी रखना चाहिए जब तक की उसे उसके मन की पत्नी न मिल जाये , क्या विवाह बस एक सम्पूर्ण और अपने मन की ही जीवन साथी के बिना नहीं हो सकता है । और आप ने सोचा है की जिस आसानी से आप तलाक की बात कर रही है उससे लड़की के जीवन पर क्या सर होगा । जिस सामजिक परिवेश से लड़की आ रही है वहा तलाक के बाद उसकी दूसरी शादी बहुत ही मुश्किल हो जाएगी , आज भी समाज में विधवाओ की शादी तो फिर भी एक बार हो जाये किन्तु जिस लड़की को पति तलाक दे उसका विवाह बहुत ही मुश्किल होता है या फिर होता है तो अपनी आयु से बहुत बड़े दो चार बच्चो के पिता से होता है ( मेरे रिश्ते की एक बहन की और एक मौसी की हुई है अपने से दुगने आयु के पुरुषो के साथ )। जबकि लडके का विवाह में इतनी अड़चन नहीं आती है और ज्यादातर तो उनका विवाह अविवाहित लड़कियों से फिर से दहेज़ ले कर हो जाता है ।कितनी बार ऐसा भी हुआ है की आप किसी को बरसों से जानते हो आप का लम्बा अफेयर हो उसके बाद भी शादी के बाद पति पत्नी में नहीं पटती है झगड़े होते है , एक दुसरे में कमिया दिखाई देती है , फिर क्या कहेंगी की विवाह किस तरह किया जाये । कोई भी व्यक्ति सम्पूर्ण नहीं होता है हम सभी अधूरे है और एक दुसरे की सोच को इच्छाओ को पूरा नहीं कर सकते है , और अंत में आप को दुसरे की गलतियों , अयोग्यताओ के साथ ही स्वीकार करना होता है । आप इसे समझौता कह सकती है , लेकिन ये हर रिश्ते में होता है चाहे वो हमें जन्म के साथ मिले रिश्ते हो या हम मित्र , पडोसी पति पत्नी के रूप में अपने मन से चुने गए , यदि आप सम्पूर्णता के चाह रखे है हर कुछ बिलकुल आप के मन का हो ये सम्भव नहीं है और यदि आप की ये सोच रही तो आप जीवन में विवाह क्या कोई भी रिश्ता नहीं निभा पाएंगे , ये बात सभी को समझना चाहिए ।
      उसके बाद भी कहती हूँ की हा तलाक होना चाहिए यदि पति पत्नी में से किसी के बारे में विवाह के पहले बहुत बड़ा झूठ बोल गया हो या विवाह के बाद दोनों में नहीं पट रही है , या दोनों में से किसी का किसी any से सम्भन्ध बना गया है और वो इस रिश्ते को ख़त्म करना चाहते है , तो बिलकुल तलाक दे कर अलग हो जाना चाहिए , किन्तु हर बात में तलाक का कोई मतलब नहीं है ।

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    3. पश्चिम में डिवोर्स रेट बहुत हाई है।
      अगर पूरब और पश्चिम में तुलना करें, तो एक बहुत बड़ा फर्क है, पश्चिम की स्त्री बहुत मजबूत है, और पूरब की स्त्री कमजोर। तो कहना ये पड़ता है, शादी को बचा कर रखने में स्त्री का ही सबसे बड़ा हाथ रहता है।
      पुरुष आधिपत्य तो नकारना, फ़ाइनाइशियल स्वतंत्रता पाना, सामानता का अधिकार पाना, ये सब ठीक है, लेकिन स्त्रियों में असहिष्णुता में वृद्धि होना गलत है। विवाह में ' पहले मैं, मुझे और मेरा ' नहीं चलता। ऐसा न हो की महिला शक्ति, महिलाओं के दिमाग में घुस जाए और प्रतिशोध के रूप में तलाक़ हो। जो आज कल देखने को मिल रहा है। फिर शादियाँ कपडे बदलने के जैसे होंगी, तू नहीं और सही और नहीं और सही, और अंत में बच्चे पशो-पेश में भी रहे और फुटबाल भी बन जाएँ। :(

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    4. मेरा कमेंट नहीं छपा पता नहीं क्यूँ फिर से डाल रही हूँ।

      पश्चिम में डिवोर्स रेट बहुत हाई है। अगर पूरब और पश्चिम में तुलना करें तो एक बहुत बड़ा फर्क है, पश्चिम की स्त्री बहुत मजबूत है, और पूरब की स्त्री कमजोर। तो कहना ये पड़ता है शादी को बचा कर रखने में स्त्री का ही सबसे बड़ा हाथ रहता है। पुरुष आधिपत्य तो नकारना, फ़ाइनाइशियल स्वतंत्रता पाना, सामानता का अधिकार पाना, ये सब ठीक है, लेकिन स्त्रियों में असहिष्णुता में वृद्धि होना गलत है। विवाह में ' पहले मैं, मुझे और मेरा ' नहीं चलता। ऐसा न हो की महिला शक्ति, महिलाओं के दिमाग में घुस जाए और प्रतिशोध के रूप में तलाक़ हो। जो आज कल देखने को मिल रहा है। फिर शादियाँ कपडे बदलने के जैसे होंगी, तू नहीं और सही और नहीं और सही, और अंत में बच्चे पशो-पेश में भी रहे और फुटबाल भी बन जाएँ। :(

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    5. मेरा कमेंट नहीं छपा पता नहीं क्यूँ फिर से डाल रही हूँ।
      there is a time difference , you posted your last comment at 12.17 am
      i could not log in before today morning so could not check the spam

      no commented will be deleted unless abusive or which downgrades the status of woman in general

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  4. मुक्ति ,
    तुमने जो भी लिखा है, वो सारी बातें समाज में व्याप्त हैं। पर ये दूर कैसे होंगीं ?? जिनके पास इफरात पैसे हैं वे तो पैसे देकर अपनी बेटी के लिए अच्छा वर खरीदना चाहेंगे ही . उन्हें हम दोष नहीं दे सकते। दोष तो बिकने वाले का है।
    जब तक लड़के बिकते रहेंगे, उनके कई खरीदार आसपास मंडराते रहेंगे।
    और शादी ब्याह में दोनों ही पक्षों से खूब झूठ बोला जाता है, लड़के वाले अपनी प्रॉपर्टी बहुत बढ़ा चढ़ा कर बताते हैं। जिन प्रॉपर्टी को अपनी बताते हैं, कई बार वह साझे की होती है। लड़के की तनख्वाह भी ज्यादा बताते हैं। कई बार क्वालिफिकेशन भी। अगर अपने तौर पर लड़की वालों ने छानबीन नहीं की तो वे भी धोखा खाते हैं।

    लड़के माता -पिता के ऊपर शादी की जिम्मेवारी सौंप तो देते हैं ,पर खुलकर अपनी पसंद नहीं बताते। जो लड़के बता देते हैं, उनके माता -पिता को लड़की ढूँढने में भी आसानी होती है और लड़के को कोई शिकायत भी नहीं होती।

    @ छोटे शहर या गाँव की लेकन उसकी शिक्षा-दीक्षा अच्छी हुयी हो और उसे पहनने-ओढ़ने, बोलने-चालने का ढंग मालूम हो .

    यह कैसे पता चलेगा ? शिक्षा -दीक्षा के बारे में पता लगाया जा सकता है पर पहनने-ओढ़ने, बोलने-चालने का ढंग ?? ये सब समय के साथ ही आता है। छोटे शहरों में जींस-टॉप पहनना , नियमित पार्लर जाना, नए ढंग का हेयर कट ,इन सबका प्रचलन ज्यादा नहीं है। तो लड़की धीरे धीरे ही सीखेगी, इसके लिए लड़कों में धैर्य होना चाहिए। अक्सर होता भी है।

    अपने दोस्त का जो उदहारण दिया है, ऐसे केस भी होते हैं पर यह आम नहीं है। मेरी भी पहचान के एक व्यक्ति हैं जिनकी तीन बेटियों में से एक बेटी बहुत कमजोर दिमाग की थी। पर उसे उसके माता -पिता, बहनें सब बहुत प्रोटेक्ट कर के रखतीं। कॉलोनी वाले भी बस इतना ही जानते थे कि वह बहुत स्लो है। उसने शायद दसवीं भी पास नहीं की थी। और झूठ बोलकर उसकी शादी कर दी गयी। पंद्रह दिनों में ही ससुराल वाले सब समझ गए। दोनों पक्षों में गरमा गर्मी तो हुई पर फिर समझौता कर लिया। लड़के वालों ने एक एक चीज़ लौटा दी, तलाक हो गया। लड़के की दूसरी शादी भी हो गयी , लड़की अपने पैरेंट्स के पास है। ऐसे उदाहरण भी हैं। अगर लड़की के माता-पिता इतना बड़ा झूठ बोलते हैं तो फिर उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ता है। और हमेशा इतना बड़ा झूठ नहीं बोला जाता।

    पिछली पोस्ट पर मैंने टिप्पणियों में बहुत कुछ लिख ही दिया है।
    तुमने जिनका उल्लेख किया है, ये सारी बुराइयां समाज में हैं। अब सोचना ये है कि इसमें बदलाव कैसे आएगा ? पुरानी पीढ़ी अपने आप तो नहीं बदलेगी , वह तो चाहेगी ही कि जो परंपरा चलती आ रही है, वह चलती रहे। इसलिए बदलाव का प्रयत्न नयी पीढ़ी को ही करना होगा।
    लड़के अब शर्म छोड़ें, अपनी पसंद खुलकर बताएं, शादी से पहले लड़की से मिलें, अगर रिश्तेदार उन्हें बेशर्म कहते हैं तो सुन लें, ज़िन्दगी भर अनचाही शादी निभाने से बेहतर है थोड़ी देर के लिए बेशर्मी का खिताब ओढ़ लिया जाए। दो चार दस लड़के ऐसी पहल करेंगे तो फिर ये रिवाज ही बन जाएगा।
    और लड़के थोडा धैर्य और संयम से भी काम लें, छोटे शहरों से आयी लड़कियों से एकदम से उम्मीद न लगाएं कि वो आते ही महानगर के रंग में रंग जायेगी।
    लडकियां तो जैसा भी पति मिले निभा ही लेती हैं, इसलिए अगर लड़के परेशान हैं, उन्हें लगता है वे बेमेल शादी नहीं निभा पायेंगे तो पहल उन्हें ही करनी पड़ेगी।

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    1. दीदी, कोशिश तो नयी पीढ़ी को ई करनी पड़ेगी. पर कभी-कभी माँ-बाप से लड़ना बहुत मुश्किल हो जाता है. मेरे सामने दो पीढियाँ लड़ते-लड़ते हार गयीं. अब उम्मीद उन बच्चों से है, जिन्हें हमारी पीढ़ी पैदा करेगी.

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  5. मैं यही चाह रहा था।जो बात पिछली पोस्ट पर नहीं हुई वो अब यहाँ हो सकती है।पिछली पोस्ट पर जिस तरह से कुछ बातें लडकों के लिए कही गई वह एकतरफा है या वो बस आधा सच है ।खैर जिस तरह मुक्ति जी ने कहा कि कुछ गलती लडकी पक्ष की भी होती है तो इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता पर इतना जरूर कहूँगा कि जो मजबूरी या समस्या आप लडकी की बता रहे हैं वैसी ही कुछ हद तक लड़कों की भी होती है ।हाँ लड़कियों की ज्यादा गंभीर होती है।खैर अभी और कमेंट आने देते हैं।

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  6. रचना जी और मुक्ति जी

    जो मुद्दे आप दोनों उठा रहे है वो सभी सही है किन्तु हम बात एक व्यक्ति की समस्या पर कर रहे है जिसने हमसे एक उपाय माँगा है तो हमारी जिम्मेदारी है की हम जहा उस लडके को उसकी समस्या का समाधान बताये वही ये भी बताये की वो कहा पर गलत है । सभी ने एक सुर में उससे कहा की जो विद्रोह इंकार वो आज कर रहा है उसे वो विवाह के पहले ही कर देना था दोनों की जिन्दगिया बर्बाद नहीं होती , किसी ने उससे ये नहीं कहा की जैसी भी हो पत्नी शादी निभाओ। पहले रचना जी आप बता दे की हमें करना क्या है किसी व्यक्ति की समस्या का हमें समाधान देना है या उसकी समस्या एक किनारे रख हमें उससे जुड़े सामजिक मुद्दों पर बहस करनी है । यदि आप चाहती है की हम उससे जुड़े सामाजिक समस्या पर बात करे तो आप को ये नहीं लिखना चाहिए की लड़का अब क्या करे , आप उस केस को एक उदहारण के तौर पर रखती और दोनों पक्षों की बात रखती और फिर कहती की एक सामजिक रुढी ने दो जीवन बर्बाद कर दिए , फिर हम उस सामजिक समस्या पर बात करते ।

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    1. अंशुमाला
      ये पहला ईमेल हैं जो पोस्ट किया हैं , बहुत से हैं क्रम से करुँगी . दूसरा पक्ष किसी भी समस्या का तब तक पता चल ही नहीं सकता जब तक हम किसी को व्यक्तिगत रूप से ना जानते हो . किसी की समस्या का निदान देने के उसको सामाजिक व्यवस्था भी बतानी ही होती हैं और उस व्यवस्था से जुड़ी बाते और परेशानी ताकि उसको समझ आये वो अकेला / अकेली नहीं झेल रहा हैं .
      नारी ब्लॉग पर पोस्ट पढ़ कर ही इस व्यक्ति ने अपनी बात कहीं , क्या अपनी बात / परेशानी बांटना इतना आसान हैं , नेट पर आसान इस लिये हैं क्युकी वो हमको जानता नहीं हैं और हम से कह कर उसकी ईमेज नहीं बिगड़ सकती हैं जो किसी जान कार के साथ बाँट कर होती , या हो सकता हैं वो जानना चाहता हो उसके जैसी समस्या कितनो के साथ हैं

      सबने उसको कहा वो अपनी पत्नी को के साथ निभाने की बात सोचे उसको सुधारे इत्यादि इत्यादि , क्युकी यही एक सोची समझी व्यवस्था हैं जो आज की पीढ़ी की विवशता जैसी हो गयी हैं

      मुक्ति नयी पीढ़ी की हैं और उनको लगता हैं ये समस्या व्यापक हैं लेकिन समाधान उतना आसान नहीं हैं जितना लग रहा हैं .
      किसी भी पोस्ट को लिख कर हम अपनी बात रख देते हैं और पाठक अपनी सोच से उसको समझते हैं . समस्या का निदान सामाजिक कुरीतियों पर बात करके मिल भी सकता हैं या जैसा राजन ने कहा दूसरी पोस्ट बन जाने से उसपर और भी बात की जा सकती हैं

      और हो सकता किसी की समस्या भी ऐसी ही और वो इस चर्चा को पढ़ कर खुद ही अपनी मनोस्थिति को सही कर सके

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    2. @ सबने उसको कहा वो अपनी पत्नी को के साथ निभाने की बात सोचे उसको सुधारे इत्यादि इत्यादि , क्युकी यही एक सोची समझी व्यवस्था हैं जो आज की पीढ़ी की विवशता जैसी हो गयी हैं

      मैंने पहले ही ये बात मुक्ति जी को दिए जवाब में लिखा है आप के लिए भी लिखा रही हूँ



      तलाक के खिलाफ मै भी नहीं हूँ , किन्तु तलाक तो वहा होना चाहिए जहा पति पत्नी के बीच समस्या का कोई समाधान ही न हो , जिस केस के बारे में हम बात कर रहे है वहा तो समस्या का समाधान है , फिर वहा भी तलाक की बात क्यों की जाये । लड़की को अंग्रेजी नहीं आती या वो उससे कोई और नौकरी करना चाहता है या उसके बोलने चालने का ढंग सही है नहीं है वो सारी चीजे तो सुधारी जा सकती है , बदली जा सकती है , फिर तलाक की बात क्यों की जाये । व्यक्ति समय के साथ बदलता है सिखता नए मौहोल में ढलता है । कल को वो दूसरी शादी करे और फिर पत्नी जरुर से ज्यादा ही आधुनिक हो तो क्या फिर कहेंगी की उसे फिर से तलाक ले लेना चाहिए और तब तक शादी और तलाक का सिलसिला जरी रखना चाहिए जब तक की उसे उसके मन की पत्नी न मिल जाये , क्या विवाह बस एक सम्पूर्ण और अपने मन की ही जीवन साथी के बिना नहीं हो सकता है ।

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    3. मै तलाक की बात ही नहीं कर रही हूँ . व्यवस्था मै सुधार तब संभव होगा जब हम २५ वर्ष की आयु के बाद अपने बच्चो को उनके निर्णय उन्हे खुद लेने होंगे इस पर जोर देगे .

      परिवार की परिभाषा को समझना होगा , पहले अगर अभिभावक निर्णय लेते थे तो वो साथ रहते थे और नव दम्पत्ति की आपसी असमंजस की स्थिति कम होती थी

      अब नव दम्पति को अलग रहना होता हैं तो कम से कम अपना जीवन साथी मन माफिक चुनने का अधिकार तो उनको मिलना चाहिये

      जब वो खुद चुनेगे तो उसका परिणाम भी खुद उठाने के लिये बाध्य होगे

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  7. ज़माना कोई भी हो, नया या पुराना, रिश्तों में समझौता करना ही पड़ता है।
    अगर ऐसा नहीं होता तो पश्चिम में सब अपनी पसंद से ही शादी करते हैं, माँ-बाप का कोई दखल नहीं होता इसमें फिर भी रिश्ते टूटते हैं, और बहुत टूटते हैं, आखिर क्यूँ ???
    आपकी अपनी पसंद की नौकरी हो या अपनी पसंद की शादी, या अपनी पसंद को कोई भी रिश्ता, समझौता चाहिए ही चाहिए, इससे आप भाग नहीं सकते हैं। चाहे आपके 36 के 36 गुण मिल जाएँ, दो इंसान एक जैसे हो ही नहीं सकते।
    tricks of the trade is समझौता, ये शाश्वत सत्य है।

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    1. मैं आज की पीढ़ी की और आज के ही ज़माने की तस्वीर दिखा रही हूँ, इससे ज्यादा नया ज़माना फिलहाल कोई नहीं है।
      एक स्टेटिस्टिक है, बिना माता-पिता के दखल, अंकुश, और बिना दहेज़ के डिमांड की, अपनी पसंद (कई वर्षों की डेटिंग के बाद) की शादी जो पश्चिम में होती है, जिसमें अगर लड़का 30 वर्ष से कम है और लड़की भी 30 वर्ष से कम है, तो इस शादी के सफल होने के चांस 50% से भी कम होती है।

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  8. मेरे दो कोमेंट्स स्पैम में गए हैं :(

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    अनुराधा (मुक्ति) जी से दस साल बड़ा यानी एक पीढ़ी पहले का होने पर भी मैं सिर्फ और सिर्फ एक बात कहूँगा कि एक कमाऊ,पढ़ा-लिखा और बालिग लड़का बिना किसी अगर-मगर के अपने विवाह संबंधी किसी भी फैसले के लिये पूरी तरह से जिम्मेदार है... माँ-बाप के सामने झेंपना-शर्माना, इमोशनल दबाव, दुनियादारी आदि आदि सब दो कौड़ी के सस्ते बहाने हैं...मैंने आज तक की अपनी ४३ साला जिंदगी में केवल और केवल कापुरूषों, मक्कारों और दोगलों को ही इस तरह के बहानों की ओट में छुपते देखा है, भद्र-पुरूष ऐसा नहीं करते (और जितना मैं मुक्ति जी को जान पाया हूँ, मुझे पूरा भरोसा है कि वह मुझसे इत्तेफाक रखेंगी)... अगर शादी में दहेज लिया गया तो वह दहेज लोभी है, अगर उसे कोई कम काबिल लड़की भिड़ा दी गयी तो जरूर उसने अपनी आँखें व कान बंद रखने की कीमत वसूली होगी... और अगर लड़के ने गलत निर्णय लिया ही है तो जिंदगी के अन्य गलत निर्णयों की तरह ही उसे इस की कीमत भी अदा करने के लिये तैयार रहना होगा... और कीमत है जीवनसाथी से अपनी अपेक्षाओं को थोड़ा नीचे लाना और समझौता-एडजस्टमेंट के लिये तैयार रहना...

    To sum up... ' There is no point in passing the buck, because the buck stops at the groom.'



    ...

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  10. बात यह नहीं है उसे क्या करना चाहिए था ...समस्या यह है की अब वह क्या करे ..साँप छछूंदर की इस हालत में ..उससे न थूकते बन रहा है न निगलते बन रहा है .....
    हमारी समझ से उसे अपनी तरफ से कोशिश करनी चाहिए की वह अपनी पत्नी को वैसा बनाने का प्रयास पूरी निष्ठा से करे जैसा वह उसे बनाना चाहता है ..उसकी बातों से लगा की उसके एफ्फर्ट्स में अभी कमी थी .....उसे इस बात का महत्त्व समझाए....उससे मिलने वाली ख़ुशी और संतोष से अवगत कराये ...उस बदलाव से उनके अपने जीवन में उगे संत्रास...दिफ्फ्रेंसस कैसे ख़त्म हो सकते हैं इस बात का अहसास कराये .....जब वह स्त्री ..उसकी पत्नी इस बात की अहमियत को समझ जाएगी ...वह स्वयं अपनी तरफसे भी पूरी निष्ठा से प्रयत्न करेगी अपने आप को बदलने की ...बशर्ते वह भी उस व्यक्ति के साथ एक सुखी जीवन व्यतीत करने में रूचि रखती हो ..अन्यथा यह पूरी एक्सरसाइज बेकार है ....या इस में सहमती न हो तो दोनों डाइवोर्स ले लें

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  11. सहमति के आधार पे बना रिश्ता ही सही होता है ... किसी के दबाव में न ऐसे रिश्ते करने चाहियें ओर न करवाने चाहियें ... इस दिशा में नई पीड़ी यानी युवाओं को ही पहल करनी होगी ...

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