नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

September 04, 2011

कम्फर्ट ज़ोन -अगर सुविधा से प्यार हैं तो शिकायत ना करके जिन्दगी को वही बेहतर बनाए


कम्फर्ट ज़ोन यानी वो जगह
जहां आप की सुविधा की हर चीज़ हो
उन चीजों को पाने के लिये आप को ज्यादा प्रयत्न भी ना करना पड़े
उन चीजों के ना होने से आप की जिंदगी में परेशानी हो
यानी जिनकी आदत आप को पड़ गयी और जिनका न होना आप को डराए

कम्फोर्ट ज़ोन में जाने के बाद उस से निकलना बहुत मुश्किल होता हैं और इस लिये उस ज़ोन में रहने के लिये आप हर प्रकार का कोम्प्रोमिज़ , सही या गलत कर लेते हैं ।

मेरा मानना हैं विवाहित स्त्रियों के लिये विवाह एक कम्फोर्ट ज़ोन की तरह होता हैं और इस में रहने के लिये वो हर सही या गलत चीज़ को मान लेती हैं और इस वजह से वो अपने ना चाहने के बाद भी बहुत सी ऐसी चीजों को करती हैं जो समाज ने उनके लिये "निर्धारित " कर दिये हैं ।

किसी विवाहित स्त्री का पति विवाह से इतर सम्बन्ध रखता हैं , स्त्री नहीं रहना चाहती पर समाज मजबूर करता हैं कहीं बच्चो का वास्ता , कहीं सामाजिक सुरक्षा का वास्ता , कहीं घर की इज्जत का वास्ता । और सबसे जरुरी आर्थिक सुरक्षा ।

मै एक ऐसी महिला को जानती हूँ जिनके पति के सम्बन्ध हैं किसी और महिला से ।
मैने उनसे पूछा आप को बुरा नहीं लगता इनके साथ एक ही बिस्तर पर सोने से ।
बोली मुझे उलटी आती हैं ।
मैने कहा आप अलग होने की क्यूँ नहीं सोचती ? क्यूँ रहती हैं
कहने लगी ये जो घर और सुख सुविधा हैं मुझे अब कौन देगा ?
मैने कहा अब तो कोर्ट से आप को रहने और खाने का भत्ता मिलेगा , आप पढ़ी लिखी हैं कुछ कमा भी सकती हैं , अभी आप महज ४५ वर्ष की ही तो हैं
कहने लगी वो सब ठीक हैं इस समय मेरा तो status हैं वो अपर मिडल क्लास का हैं जो उत्तर कर लोअर मिडल क्लास का हो जाएगा
इतनी तकलीफ उठाने से उलटी करना ज्यादा आसन हैं

एक और महिला हैं जो ऍम बे ऐ होने के बाद भी नौकरी नहीं कर पायी क्युकी बहुत पैसे वाले घर में प्रेम विवाह हुआ । आज बहुत ना खुश हैं कहती हैं सोने के पिंजरे में कैद हूँ ।
मैने कहा पहले नहीं पता था , क्या शादी से पहले पति से इस विषय में बात नहीं हुई थी ।
बोली हुई थी , उन्होने तब ही मना कर दिया था पर सोचा था बदल लूंगी उनको ।

मैने कहा अगर आप ने गलती की हैं शादी कर के और आप नौकरी करना चाहती हैं तो फिर इस शादी से निकालिये और अपनी जिंदगी जीना शुरू करिये अपने को पिंजरे से आज़ाद करिये

जवाब मिला अपनी नौकरी में इतनी सुविधा कहा मिलेगी


अगर आप किसी सुविधा जनक जगह पर हैं और उन सुविधा को नहीं छोड़ सकते हैं तो क्या बेहतर ना होगा की आप शिकायत करना छोड़ दे

आप कहती है आप को कुछ पूरा नहीं मिला , मेरा प्रश्न है पूरे की परिभाषा क्या हैं ?
नहीं मिला ? क्या नहीं मिला ? इश्वर ने आप को माता पिता दिये , माता पिता ने आप को सक्षम बनाया , विवाह किया , सामाजिक रूप से आप सुरक्षित हैं और आर्थिक रूप से आप में से बहुत सी स्वतंत्र भी है । और" मिलने" की परिभाषा मे क्या आता है ?? सब कुछ इतने सुविधा जनक तरीके से मिला हैं आप को फिर भी आप को समाज को एक सुविधा जनक कथा नहीं दे सकी ?? क्यों ??और " मिलने " मे जो भी आता है उसे आप को "मिलना " क्यों चाहीये ? क्या उसे अर्जित नहीं करना चाहिये था आप को ?
विवाहित घराने की अन्य सद्स्याओ मै जानना चाहती हूँ की वो इस घुटन से निकालने के लिये क्या करती है ?

औरत इंसान ही हैं बशर्ते की वो ये भूल जाये की वो औरत हैं ?
भूल जाये की धूप मे उसकी चमडी काली हो जायेगी ।
याद रखे की पिता केवल उसका जनक हैं उसको दान करने का अधिकारी नहीं ,
पति उसका जीवन साथी हैं संरक्षक नहीं ,
पुत्र उसकी संतान है बुदापे की आस नहीं ।

जब तक आप के घराने की सदस्यों को ये याद रहेगा की वह औरत के आगे कुछ नहीं हैं उनके पास ऐसी एक नहीं लाखो कहानिया होगी जहां उन्हे महसूस होगा की वो बेगार की मजदूर हैं । आजाद देश मे अगर आप ख़ुद बंधुआ मजदूर की तरह रहेगे और उम्मीद करेगे की आप अपनी " सुविधा से " "कलम" से "शब्दों " के ताने बाने बुनते रहें और कोई आप को इस "बेगारी " से "स्वंत्रता " दे जाये तों आप के घराने के सदस्य बहुत ज्यादा की उम्मीद कर रहे हैं ।

"सशक्त " वह हैं जो सांचे को तोड़ कर जिन्दगी को जीती हैं । "सशक्त " वह कभी नहीं हो सकती जो एक सांचे मे बंधी रह कर घुटती है और अपनी घुटन से समाज के पर्यावरण को दूषित करती है ।

अगर सुविधा से प्यार हैं तो शिकायत ना करके जिन्दगी को वही बेहतर बनाए

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22 comments:

  1. बिलकुल सही कहा आपने. बहुत सी औरतें सुविधा के कारण ही अपनी अनचाही शादी से निकलने की कोशिश भी नहीं करतीं. अगर उनके पति के किसी और से सम्बन्ध हैं, तो उसे जानबूझकर अनदेखा करती हैं.पर सभी ऐसा सिर्फ़ आर्थिक सुरक्षा के डर से नहीं, बल्कि कुछ औरतें समाज में बदनामी के डर से भी करती हैं. अगर समाज तलाकशुदा औरत को नीची निगाह से देखना बंद कर दे तो शायद कुछ औरतें इस तरह की ज़िंदगी को छोड़ने की हिम्मत कर सकती हैं.

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  2. आपकी कुछ बातों से सहमती है और कुछ से असहमति. मुझे लगता है कि हमारा समाज अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ है कि सभी को उनकी अभीष्ट स्वतंत्रता मिल सके.
    एक और बात यह भी है कि मुझे ऐसे समाज की कल्पना भयावह लगती है जहाँ सभी इतने स्वतन्त्र हैं कि रिश्तों में कुछ भी प्रेम और समर्पण नहीं बचा रह गया है. पश्चिमी देशों को देखिये, रिश्तों को कैसा मजाक बनाकर रख दिया है उन्होंने. ज़िंदगी के प्रति इतना प्रैक्टिकल रवैया भी सतही है और यह भी व्यक्ति को एकाकी और टूटा हुआ बना देता है. देरसबेर भारत में वही सब होगा जब न तो पति पत्नी में सौहार्द रहेगा और न ही माता-पिता और बच्चों में गहरा जुड़ाव. आगेआगे देखिये होता है क्या.

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  3. अगर आप किसी सुविधा जनक जगह पर हैं और उन सुविधा को नहीं छोड़ सकते हैं तो क्या बेहतर ना होगा की आप शिकायत करना छोड़ दे
    ------

    इस बात से पूर्णतः सहमत हूँ.... और यह स्त्री और पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू होती है.

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  4. मैं इस बात से पूरी तरह असहमत हूँ कि कोई यदि अपने "कम्फर्ट ज़ोन " में रह रहा हो, उसके लिए कुछ (चाहे या अनचाहे) कोम्प्रमाईज़ेज़ भी कर रहा हो - तो उससे शिकायत करने का, या दुखी होने का , या वह जो भी पोजिटिव करना चाहे (जैसे लेखन) वह करने का अधिकार छिन जाना चाहिए | पूरी तरह असहमत |

    यह कुछ ऐसा है कि आप कहें कि "अरे - वह आदमी तो रोंग साइड पर ड्राइव कर रहा था - तो एक्सीडेंट में मर गया - यही होना चाहिए था | नहीं | रोंग साइड में चलने की ये सज़ा?? कानून में भी मौत की सज़ा बहुत दुर्दांत क़त्ल के लिए ही अलाउड है - साधारण क़त्ल के लिए नहीं | तो सिर्फ रोंग साइड ड्राइविंग के लिए मौत की सज़ा ???

    तो यदि कम्फर्ट ज़ोन बनाए रखने के लिए एक स्त्री कुछ कोम्प्रमाइज़ेज़ कर भी रही है, तो यह कोई ऐसा गुनाह नहीं कि जिसके कारण उससे उसका शिकायत करने का / अपना दुःख व्यक्त करने का / लिखने का / आदि बेसिक ह्यूमन राइट्स छीन लिए जाएँ यह कह कर कि यह उसके अपने निर्णय के कारण है | अगर है भी उसके अपने निर्णय के कारण - तो क्या हुआ? does this decision to compromise for family / status / children / her own self image / societal norms ....etc etc etc - make her less human than others ??? this is exactly the same old problem in another form - that is, not allowing a person the basic right to be unhappy or express oneself just because that person does not happen to match our way of thinking |

    rachna ji -आप और मैं उन खुशकिस्मत लोगों में हैं, जिन्हें पहले ही पढने लिखने के मौके मिले, और आत्म निर्भर होने के भी | परन्तु यह कहना कि आज सिचुएशन पहले से अलग है तो हर वो स्त्री जिसे अपने पति से कोई प्रोब्लेम्स हैं उसे या तो पति से अलग हो जाना चाहिए, या फिर शिकायत करना छोड़ देना चाहिए - यह दृष्टिकोण मुझे ठीक नहीं लगता | (जेनविन प्रोब्लेम्स की बात कर रही हूँ - इमेजिनरी प्रोब्लेम्स की नहीं) if a woman chooses to stay in her own hell (for whatever reasons) its completely her individual decision .. that doesnt give us the right to be judgemental and say that she has no right to complain because she chose her situation . क्योंकि - उस स्त्री ने अपने लिए यह प्रोब्लेम्स नहीं चुनी - परन्तु जब उसके जीवन में प्रोब्लेम्स आ ही गए, तब उसने दो बुरी सिचुएशंस (घर के अन्दर सफ़र करना, और अलग हो कर अकेले सफ़र करना ) में से जो कम बुरी लगी, उसे चुना |

    oh god - another long comment - but i really cant stop myself when you raise these topics ...

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  5. यदि साथ रह कर एक दूसरे की जिंदगी को नरक बना रहे हैं तो छोड़ देना बेहतर है , मगर यदि रिश्तों में सुधार की सम्भावना है तो स्वयं उस महिला , उसके परिवार और काउंसलर को एक राह दिखाने का प्रयास जरुर करना चाहिए . समस्या के भय से कुछ प्रयत्न ही नही करना या यह कह देना कि यहाँ से बाहर निकलो तभी तुम्हरी मदद होगी नहीं तो मरो तुम्हारे जहन्नुम में , भी कोई माकूल हल नहीं है ...

    बाकी शिल्पा जी से सहमत हूँ !

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  6. पुरुष अधूरा है और नारी अपूर्ण। नारी अक्सर संतान से पूर्णता का अनुभव कर लेती है। पुरुष के अधूरापन उस की दृष्टि से ओझल हो जाता है। वहीं ये दुर्घटनाएँ घटने लगती हैं।

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  7. धन्य रे भारतीय समाज -उसके पास इन व्यर्थ की बातों के लिए वक्त है घुटन है .....और जीवन को बर्बाद करते रहने की विचित्र सी स्थिति है -शादी कोई जरुरी है क्या? वे जो शादी करते हैं वे आम लोग होते हैं कभी भी ख़ास नहीं! उनसे मानवता की बेहतरी की दिशा में कभी भी उम्मीद नहीं की जानी चाहिए भले ही कुछ अपवाद वहां हों ! एकला चलो रे !
    मुझे इन सब फालतू नारीनुमा सुबकियों में तनिक भी रूचि नहीं है !

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  8. shilpa
    when a woman is chosing then she needs to understand that what ever she has chosen has its own consequneces

    we cant just chose and crib we have to be ready to bear the consequences

    its not question of human right its question of "being self centered always "

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    Replies
    1. hi rachna - i m glad u wrote that "completed 6 years " post on your poetic response blog - i came back to this blog due to that post. thanks :)

      1. i agree, when we make a choice - we have to take the consequences. we can't eat our cake and have it too.

      2. i also agree that cribbing is a negative thing - which may get you fake sympathies and fake friends - but nothing else.

      3. but i DO NOT AGREE that a woman has no right to be happy/ unhappy, or express herself just because she is unhappy due to her own wrong decision - it is a basic human need to have emotional ups and downs, and to express oneself.

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    2. How many woman after cribing and crying about a wrong desicion TRY AND START THEIR LIFE AGAIN ??
      very few , because they fear the society , they dont want to give up the comfort etc
      In case they dont have the courage to start the life again they need to stop cribing

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    3. you are right - they do not.

      cribbing is a negative attitude, doing somethings to change things is a step that has to be taken, which requires effort, which they do not want to put in. may be it is inertia, fear, laziness or just plain selfishness.

      i sometimes feel some women (not all - just some of them) are actually GLAD that they have a reason to crib - they actually enjoy being the center of attention. sounds strange - but i really feel so.

      Delete
  9. nishant

    the indian society and culture is even worse then western society

    the only difference is that we do it under closed doors and they do it openly

    woman in india have a safe heaven { they are too conditioned also } much better then other places because of marriage yet they keep cribing but the moment u ask them to find a solution like a job { even without walking out on marriage } they dont want to do

    we should not crib we should make effort and realise every effort takes time and pain

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  10. vani

    agar kisi kewal aansu behane aatey haen to uski samsyaa nahin aadat haen

    yae hamarey yahaan ki vivahit mahila kaa kadva sach haen ki jahaan 4 baethgi wahaan pati , saas susur aur apnae jeevan kaa rona rona shuru ho jaataa haen

    jindgi sabki hi mushkil haen aur vivahito kae paas to itnae rishtey haen phir bhi wo itni pareshaan hotii haen kabhie

    un single mahila / purush ki soch kar daekhiyae aap ko laegegaa aap bahut takdeer vaali haen


    counceller sae miliyae , peasaa dijiyae aur nidaan payeae kyuki jab rishto kae hotae huae itni samsyaa haen to paese sae hi rishtaa ho behatar nahin haen kyaa

    kam sae kam pesaa hogaa to councillar kae paas to jaa saktee haen koi vivahitaa aur iskae liyae paesaa kamana bhi padaegaa

    yaani duniya gol haen sashktikarna sae behtar kuchh nahin haen yae ghar mae rehane vaali sab jaantee haen par maantee haen

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  11. mai nishant or shilpa dono ki battoein se kafi had tak sehmat hu, , mujhe aadmiyo ke dil ke bare mei nahi pata ke wo kis tarah ki soch rakhte hai , but as a woman , as mother, as a daughter , as a sister mera maan na yahi hai ki agar kisi rishte ko bachaya jaa sake to usko bachane ki kosish karna galat nahi hai , ha agar mere sath aisa ho ke mera husband mujhe dhoka de to mera aakhri nirnay talak hi hoga, par kai sarri aisi nariya aisi nahi hoti , meri ak frined ke papa hai 22 yrs ke baad sare ghar walo ko pata lag gaya hai uske papa ke extra maritial affair ke bare mei , meri friend nd uske bhai bhabhi ne apne papa ka ghar chod dia hai but uski mom nahi chod paa rahi hai , samaj ke dar se, wo sirf unke sath rehti hai but unke beech koi conversation nahi hoti (halaki uske papa ne maffi maang li hai par risshto mei madhurta sayad kabhi na aaye) , mai is situation mei na hi apni dost na hi uski mummy ko galat manti hu

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  12. बिलकुल ठीक कहा, इस कम्फर्ट ज़ोन से निकलना आसान नहीं होता, न निकलने की घनी चाह होती है।
    वैसे भी परिवर्तन लाने के लिए कष्ट तो उठाना ही पड़ता है, लेकिन फिर बादलों के पार सूरज चमकता हुआ मिलता है।

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  13. thanks varsha at least you have understood what i am saying

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  14. कई महिलाएँ जो शिक्षित है और हर तरह से आत्मनिर्भर है वो भी कई बार अपने वैवाहिक जीवन में धोखेबाजी और उत्पीडन को सहती रहती है.कम से कम उन्हें इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए कडे कदम उठाने चाहिए.वर्ना आप इंतजार किस बात का कर रहे है,समाज का रवैया भी तभी बदलेगा जब कुछ लोग पहल करेंगे.
    लेकिन आपकी बात हर परिस्थिति में लागू नहीं होती.कई बार विवाहित जीवन में तनाव के चलते संबंध कटु हो जाते है.ऐसे में कुछ स्त्री पुरुष संबंध सामान्य होने का इंतजार करते है तो कुछ अपनी तकलीफों को दूसरों से बाँटते है.लेकिन इन्हें ये कहना कि आप शादी तोड क्यों नहीं देते तो बिल्कुल वैसे ही है जैसे खटमलों को मारने के लिए खटिया ही जला डालने की सलाह देना.समस्याएँ हर तरह के संबंधों में आती है और अविवाहित भी अपनी समस्याएँ दूसरों से शेयर करते है.हाँ ये मैं मानता हूँ कि यदि कोई महिला या पुरुष अपनी समस्या दूसरे के सामने रखते है तो उन्हें हर तरह की प्रतिक्रिया के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि सबके सोचने का ढंग अलग अलग होता है.आपको दूसरे पर केवल इसलिए गलत बताने का हक नहीं कि आपको मनमाफिक जवाब नहीं मिला.

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  15. राजन
    यहाँ बात शादी तोडने की नहीं हुई हैं बात हैं की जिस किसी भी कारण से लोग कोम्फोर्ट ज़ोन से बाहर नहीं आना चाहते तो उनको शिकायत ना करके उस जगह को बेहतर बनाना चाहिये . अगर किसी ने भी शादी की हैं तो उसके सुख और दुःख दोनों मिलेगे लोग दुःख से भागना चाहते हैं और सुख के मोह को छोड़ना नहीं चाहते हा अपनी समस्या जो की वास्तव में समस्या है ही नहीं उसको सबसे बताते हैं और निदान देने पर वापस कम्फर्ट ज़ोन में ही रहना पसंद करते हैं

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  16. और हाँ राजन कम्फोर्ट ज़ोन से बहार आने का मतलब केवल शादी तोडना नहीं हैं , शादी करने से पहले सोचना और फिर शादी के बाद भी अपने लिये सजग रहना और कुछ प्रयतन करना की आर्थिक रूप से सक्षम हो भी कम्फोर्ट ज़ोन से बाहर आना होता हैं पर इस सब में तकलीफ है

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  17. इंसान (पुरुष और नारी) दोनों को ही शादी के बाद एक रेखा तो खीचनी ही चाहिए,
    की इस के पार होने पर वो कड़े कदम उठाएगा |
    जैसे, की कई लडकिया और लडके veg होते हैं ,और शादी के बाद अपने
    पार्टनर और उसके दोस्तों के जोर डालने पर वो नॉन veg हो जाते है |
    उसी तरह अपने पार्टनर के दूसरे इंसान से शारीरिक सम्बन्ध बनाने की बात है,
    या मार पिटाई की बात है | और भी बातें हो सकती होंगी ?
    क्या कदम उठाये उसकी डिग्री अलग अलग हो सकती है, तरीके अलग अलग हो सकते हैं,
    पर उठाना जरूर चाहिए |
    यदि हम एक इन्सान के रूप में अपना वजूद मानते हैं, अपनी इज्जत करते हैं, तो जरूर उठाना चाहिए |
    नहीं तो हम अपनी ही नजरों में गिर जाएँगे , और उससे बुरी कोई चीज़ नहीं |

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  18. देर से आने का कोई रंज नहीं होता क्योकि पोस्ट के साथ साथ टिप्पणियाँ भी सोच में इज़ाफ़ा करती है... यकीनन सुविधा में रह कर रोने की 'आदत' ही होती है..अपने आसपास अपने करीबी रिश्तेदार और मित्रों में कुछ उदाहरण ऐसे हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं...एक परिवार है जिसमें माता-पिता अपने बड़े घर में अकेले रहते हैं...चारों बच्चे शादीशुदा हैं...दोनो बेटे अपने अपने परिवार के साथ दूसरे शहरों में रहते हैं...घर परिवार समाज की कोई ज़िम्मेदारी नहीं..बेटों ने अपनी अपनी पत्नियों के नाम घर किए हुए हैं... एक हाउस-वाइफ है दूसरी नौकरी छोड़कर हाउस वाइफ बन चुकी है अपनी सुविधा से...आपसी तालमेल की कमी...रोना-धोना..शिकायतें हज़ारों..बच्चों पर उसका बुरा प्रभाव अनदेखा किया जाता है..जिसे देख कर यही बात मन में उठती है कि रोने की बजाए ज़िन्दगी को बेहतर बनाने की सोची जाए तो कितना अच्छा हो....

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  19. देर से आने का कोई रंज नहीं होता क्योकि पोस्ट के साथ साथ टिप्पणियाँ भी सोच में इज़ाफ़ा करती है... यकीनन सुविधा में रह कर रोने की 'आदत' ही होती है..अपने आसपास अपने करीबी रिश्तेदार और मित्रों में कुछ उदाहरण ऐसे हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं...एक परिवार है जिसमें माता-पिता अपने बड़े घर में अकेले रहते हैं...चारों बच्चे शादीशुदा हैं...दोनो बेटे अपने अपने परिवार के साथ दूसरे शहरों में रहते हैं...घर परिवार समाज की कोई ज़िम्मेदारी नहीं..बेटों ने अपनी अपनी पत्नियों के नाम घर किए हुए हैं... एक हाउस-वाइफ है दूसरी नौकरी छोड़कर हाउस वाइफ बन चुकी है अपनी सुविधा से...आपसी तालमेल की कमी...रोना-धोना..शिकायतें हज़ारों..बच्चों पर उसका बुरा प्रभाव अनदेखा किया जाता है..जिसे देख कर यही बात मन में उठती है कि रोने की बजाए ज़िन्दगी को बेहतर बनाने की सोची जाए तो कितना अच्छा हो....

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