नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

June 14, 2009

और आप मे से बहुत नया मुद्दा तलाशेगे जहाँ आप महिला को समझा सके कि क्या पहनो ताकि बलात्कार ना हो ।

सूरत मे एक १७ साल की ना बालिग लड़की के साथ तीन युवको ने गैंग रेप किया । खबरों के अनुसार लड़की पड़ने के लिये अपने हमउम्र एक लड़के के साथ शाम को जा रही थी । ३ युवको ने दोनों को जबरदस्ती कार मे बिठाया और बारी बारी तीनो ने उस बच्ची के साथ बलात्कार किया । { रंगा बिल्ला ने १९७८ मै ऐसा ही किया था पर उन्होने गीताचोपडा और संजय चोपडा को मार भी दिया था } । बलात्कार के साथ साथ पूरे काण्ड का MMS भी बनाया गया । एक ghantey के baad उस बच्ची और उसके दोस्त को पटक कर तीनो फरार होगये ।

जब रंगा बिला कांड हुआ था मै १७ साल कि थी और दिल्ली विश्विद्यालय मे पढ़ती थी । उस समय हम सब छात्राओं ने अपने अपने कॉलेज से रैली निकाली थी और हम सब लेफ्टिनेंट गवर्नर के यहाँ धरने पर गए थे । उसके बाद ही उस केस पर कार्यवाही शुरू हुई थी ।

सूरत के केस मे सूरत के पुलिस कमिश्नर के का ब्यान हैं " कि लड़की को कोम्प्रोमिसिंग पोसिशन मे पाया गया और इसलिये बलात्कार करने वालो ने पुलिस कि वर्दी मे उनसे पूछताछ की ।" खबरों की माने तो जिस समय अभियुक्तों कलो पकड़ना चाहिये था उस समय पुलिस कमिश्नर के यहाँ दावत चल रही थी
लोगो { जिसमे महिलाए ज्यादा थी } ने अपना आक्रोश तीनो बलात्कारियों को पीट कर निकला जब वो पुलिस के साथ अस्पताल से बाहर रहे थेउसके बाद ही पुलिस कमिश्नर का ट्रान्सफर किया गया

बलात्कारियों मे दो के पिता पोलिस विभाग मे ही हैं और कह रहे हैं कि अगर ये प्रमाणित हो जाए कि उनके लड़को ने बलात्कार किया हैं तो उन्हे फासी दे दो

इस केस मे हो सकता हैं MMS कि वज़ह से एक प्रमाण मिल जाए तो क्या बलात्कारी को फासी देनी चाहिये

हमेशा ये ही कहा जाता हैं लड़कियों के वस्त्र अश्लील होते हैं इस लिये बलात्कार होते हैं { अभी कानपुर ने जींस पर प्रतिबन्ध ही लगा दिया हैं कि लडकियां ना पहने } । हिन्दी ब्लॉगर समाज मे भी जब भी किसी भी ब्लॉग पर बात होती हैं तो लोग यही लिखते हैं लडकियां मानसिक बलात्कार करती हैं पुरुषों का क्युकी वो कपडे ही ऐसे पहनती हैंएक पिंक चड्ढी भेजने से सारी भारतीये संस्कृति धरातल मे चली गयी और पोस्ट पर पोस्ट आती रही कि महिलाअनैतिक होगई हैं

अब क्यूँ इतना सन्नाटा हैं इस ब्लॉग जगत मे ?क्यूँ नहीं देखा नहीं लिखता भी कुछ भी कोई भी कही अलावाऔर कुछ इस्सी एक पोस्ट देखी "रेप करोगे तो ऐसे ही पिटोगे, भीड़ ने जमकर धुना बलात्कारियों को, न्याय का नया रूप।"

इसके अलावा कही भी कोई भी कुछ भी लिखता नहीं दीखावो सब जो महिला को हमेशा पाठ पढाते दिखते हैं कि क्या करो कैसे रहो क्या पहनो कैसे उठो कैसे बैठो वो सब ब्लॉगर कैसे इन मुद्दों पर बिल्कुल चुप्पी ओढ़ लेते हैं ? क्या कभी भी उनके आत्मा ये नहीं कहती कि कम से कम एक बार तो बलात्कार और बलात्कारी के ख़िलाफ़ लिखे

बस अभी दो एक दिन मे मानव अधिकार के रक्षक , न्याय प्रणाली के कर्ण हार उन बलात्कारियों के साथ उठ खडे होगी उनकी रक्षा के लिये और इस बच्ची के सम्बन्धी कहीं और बसने के लिये एक नया शहर तलाशेगे जहाँ उनकी बेटी दुबारा जिंदगी शुरू कर सके

और आप मे से बहुत नया मुद्दा तलाशेगे जहाँ आप महिला को समझा सके कि क्या पहनो ताकि बलात्कार ना होऔर कुछ यही कमेन्ट मे लिख जायेगे हर बात को संस्कृति से ना जोडे

25 comments:

  1. रचना जी..क्या कहूँ यहाँ का बरसों पुराना बना कानून आज ऐसी परिस्थियों में इतना पंगु लगा है की घिन्न हो आती है..मेरे विचार से अब एक ही रास्ता बचता है..कुछ समय पहले एक पिक्चर देखी थी जिसमें एक बची से बलात्कार करने वाले तीन बलात्कारियों को उसे माता पिता मार देते हैं...मेरे विचार से अब समय आ गया है की ऐसा ही कुछ हो...कुछा वर्षों पहले इसी तरह भरी अदालत परिसर में महिलाओं की भीड़ ने एक बलात्कारी को मार दिया था..
    नहीं मौजूदा कानूनों के अनुसार ..यदि अपराध सिद्ध भी हो जाएगा तो उसे फंसी की सजा तो नहीं ही मिलेगी..वैसे अपराध सिद्ध हो जाएगा ..इसमें मुझे संदेह है...
    मैं रोज कोई न कोई बलात्कार का मुकदमा अपनी अदालत में सुनता देखता हूँ..
    रास्ता वही ठीक है..उसके परिवार के किसी सदस्य को उन तीनो को गोली मार देनी चाइये..
    यदि मेरे साथ कल को कोई ऐसी घटना होती है तो मैं यही करूंगा..

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  2. सूरत में अपराधियों के साथ जो हुआ उससे मुझे बहुत मजा आया… कानून से तो फ़िलहाल कोई बात बनती नज़र नहीं आ रही, इसलिये भीड़ ने नागपुर जैसे काण्ड करने शुरु कर दिये हैं… यह एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन भीड़ के इस गुस्से को भ्रष्टाचारियों और कालाबाजारियों की तरफ़ भी मुड़ना चाहिये, तभी कोई सांकेतिक ही सही बदलाव आयेगा…। सोचिये क्या मनोहर नज़ारा होगा, जब कोई रिश्वतखोर सरकारी अधिकारी सड़कों पर कूटा जा रहा हो, या किसी नेता को भीड़ सड़कों पर दौड़ा-दौड़ाकर उसके कपड़े फ़ाड़ रही हो…। नाबालिग बच्चियों से बलात्कार और नशीली दवाओं का कारोबार इन्हें मैं सबसे अधिक गिरा हुआ अपराध मानता हूँ… सूरत में भीड़ ने ठीक किया… किसी को अपराधबोध पालने की जरूरत नहीं है…

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  3. Suresh Chiplunkar

    पिंक चड्ढी पर इतना लिखा पर इस पर कुछ नहीं
    केवल तमाशा देखने की चाह ना रखे इन मुद्दों
    पर भी आवाज उठाये जैसे पिंक चड्ढी के खिलाफ
    कहा था . क्या वो मुद्दा इस से ज्यादा गंभीर था

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  4. फाँसी पर चढ़ाने की कहने वाले जानते हैं कि बलात्कार के जुर्म में फाँसी नहीं दी जा सकती।

    हाँ, लोग कहेंगे कि लड़कियाँ/औरतें ये पहनें, वो पहनें।

    लेकिन मैं कहता हूँ कि अब इन्हें वह पहनना चाहिए जो मर्दों? की निगाहों को रोक सके। क्यों कि कपड़ों की दीवार तो उन्हें रोक नहीं पाती।

    समाज कानून और लेखों से नहीं बदलता। वह बदलता है एक जुटता की ताकत से महिलाएँ उसे बुनें और पहनें।

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  5. रचना जी,
    पिंक चड्डी और यह, दोनों मुद्दे एकदम अलग हैं। और मैंने कोई दो-चार लेख नहीं लिखे थे पिंक चड्डी पर, सिर्फ़ एक ही लिखा था, जिस पर बवाल खड़ा हो गया था। बलात्कार और बलात्कारियों का विरोध तो पहले ही कर चुका हूँ, अब और क्या करूं?

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  6. निर्दोष लड़की का सब कुछ लुट गया उसके बाद बलात्कारी पीटे भी तो क्या ? लड़की का भविष्य धूमिल हो गया ! आप लड़की के लिए दुखी नहीं हो क्या यह हंसी मजाक का घटनाक्रम है जो आपको 'मजा' आया सुरेश चिपलूनकर ? लड़की आपके परिवार की होती और उसकी इज्जत लुट जाती फिर बलात्कारियों को पीटा जाता ! क्या तब भी आप कह सकते थे मजा आया ?

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  7. दिनेशराय द्विवेदी @ लेकिन मैं कहता हूँ कि अब इन्हें वह पहनना चाहिए जो मर्दों? की निगाहों को रोक सके। क्यों कि कपड़ों की दीवार तो उन्हें रोक नहीं पाती। to kyaa lohe ke kapade pahane ?
    समाज कानून और लेखों से नहीं बदलता। matalab kanun hata do ? jo like us ko kort me ghaseet lo ? aur aap balatakari ka mikadam lad use bari karado ? vah vah sirafire vah

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  8. ashok kumar
    अगर आप रोष मे भी किसी की बेटी , बहिन या
    पत्नी का अनिष्ट हो ऐसा लिखते हैं तो आप
    मानसिकता बदले क्युकी हर महिला अपने आप
    मे संपूर्ण हैं . महिला , नारी किसी की संपत्ति
    नहीं हैं की आप अगर Suresh Chiplunkar से रुष्ट हैं तो उसकी बेटी के लिये अनिष्ट की कामना करे . संवाद ऐसा करे की दूसरा मजबूर हो जाये आप की बात , आप का नजरिया देखने के लिये .

    मै Suresh Chiplunkar से उनकी बेटी के प्रति दिये गए
    ashok kumar के कमेन्ट के लिये खेद व्यक्त करती हूँ
    और सभी पाठको से निवेदन करती हूँ
    नारी को सम्पति समझ कर इस ब्लॉग पर
    कमेन्ट ना करे

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  9. Anonymous मित्र नाम के साथ लिखे ये मंच खुल कर नारी
    के प्रति सदियों से हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज
    उठाने का . आप मुक्त हो कर लिखे और नाम के
    साथलिखे ताकि संवाद हो

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  10. आपसे सहमत हूं।ये बहुत गंभीर समस्या है और हर रोज़ बढती जा रही है।लोगो मे बलात्कार शब्द के खिलाफ़ आक्रोश का ज्वालामुखी धधक रहा है और जैसे सूरत मे फ़टा है वैसा ही हर जगह फ़टना चाहियें।नागपुर म्र भी एक ऐसी ही वहशी गुण्डे के खिलाफ़ महिलाओ ने अपना गुस्सा भरी अदालत मे उसे पीट-पीट कर जान से मार कर उतारा था।सभी महिलायें गांव की भुक्तभोगी थी और कानून के हाथो से फ़िसल कर बाहर आने की आशंका से उन्होने कानून को अपने हाथों मे लिया था।भीड का कोई चरित्र नही होता लेकिन अगर वो कानून अपने हाथ मे ले तो ये साबित हो जाता है कि पानी सर से ऊपर निकल गया है।रहा सवाल कपड़ो का तो सिर्फ़ बकवास है,छोटी-छोटी अबोध बच्चियो को क्या आप पुरे कपड़ो मे लपेट देंगे।कुकर्मी तो उन्हे भी नही छोड़ते।यंहा एक गैंग रेप ऐसा हुआ था जिसमे मोटरसाईकिल से घर लौट राहे दंपती को रोक कर पत्नी का पति के सामने बलात्कार किया गया।वो भद्र महिला तो साड़ी पहने हुये थी अब साड़ी से ज्यादा शालीन वस्त्र और कया पहना जा सकता है।ये समस्या कपड़ो की नही मानसिक विकृतियों की है जो कानूनी दांव पेंचो की भुल्भुलैया मे और तेजी से पनप रही है।इस पर अंकूश लगाने के लिये कठोर कानून और उससे भी कठोर सज़ा की ज़रूरत है,कपड़ो पर बहस कर एक दूसरे के कपड़े फ़ाडने से कुछ होने वाला नही।मै सूरत की जनता को सलाम करता हूं जो उन्होने अपने यानी समाज के मुजरिम(यंहा भी कानूनी लोचा है,उन्हे मुजरिम तब तक़ नही कहा जा सकता जब तक़ जुर्म दर्ज ना हो जाये)को अपने हाथो से कुछ तो सबक सिखाया।ये सबक और कड़ा होना चाहिये ताक़ि ऐसा करने से पहले कुकर्मी जनता की अदालत की सज़ा से कांप उठे। हो सकता है मै कुछ ज्यादा लिख गया हूं।कोई बात अगर किसी को बुरी लगी हो एडवांस मे क्षमा मांग लेता हूं।मैने जो कहा वो मेरे दिल की बात है,दरअसल मैने पत्रकारिता के शुरुआती दिनो मे अदालत बीट मे काम करते हुये अधिकांश कुकर्मियो को सबूतो के अभाव मे,अपराध प्रमाणित नही पाये जाने पर,संदेह का लाभ देते हुये रिहा होते देखा है।बहुत पीड़ा होती थी,ऐसा लगता था कि खुद पीट दूं। और शायद सूरत मे भी लोगो के मन मे वैसा ही कुछ रहा होगा।एक बार फ़िर इस बात से सहमत हूं कि हम लोगो ने,कम से कम मै अपने बारे मे तो कह सकता हूं इस मामले मे नही लिख कर एक अपराध ही किया है।दायित्व को याद दिलाने के लिए आभारी हुं।

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  11. Anil Pusadkar
    कमेन्ट के लिये समय निकालने के लिये थैंक्स
    कुछ जरुर लिखे इन व्यथित करने वालो मुद्दों पर
    क्युकी
    ना जाने क्यूँ जब भी कहीं कुछ वीभत्स गतिः होता
    हैं हिंदी ब्लॉग समाज
    कुते और बिल्ली की शादी
    मे व्यस्त दिखता हैं
    .

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  12. कपड़े? क्या बकवास है. जब बाप ही बेटी का बलात्कार करता है तब ऐसा कहना ही मूर्खता है.


    ऐसा न सोचें कि किसी ने नहीं लिखा....पोस्ट नहीं कर पाया. आज कोशिश रहेगी.

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  13. धन्यवाद संजय संभव हो तो लिंक कमेन्ट मे
    यहाँ भी जोड़ दे

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  14. रचना जी, अशोक कुमार की तरफ़ से खेद व्यक्त करके आपने बड़प्पन का परिचय दिया है, हालांकि इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि "कमेण्ट को समझे बगैर टिप्पणी करने वाली प्रजाति अथवा भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों की प्रजाति इनमें से ही कोई लगते हैं ये अशोक कुमार साहब", क्योंकि मेरी टिप्पणी में ऐसे ही सरकारी कर्मचारियों के प्रति रोष था और शायद इससे अशोक कुमार को गुस्सा आ गया होगा।

    @ अशोक कुमार - यदि मेरे परिवार की बेटी के साथ ऐसा कुछ होगा तब मैं बलात्कारी को सिर्फ़ पीटूँगा नहीं, पहले उसकी आँखें निकालूंगा और लिंग काटूंगा, भले ही इससे बलात्कृता स्त्री को न्याय मिलता हो या न मिलता हो…। शायद अब आपकी मोटी बुद्धि में आया हो कि "बलात्कार को रोकना असम्भव है, लेकिन उसकी सजा ऐसी होना चाहिये कि वह एक नज़ीर बने…"

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  15. Suresh Chiplunkar

    आप को बहुत लोग पढ़ते हैं आप इन मुद्दों पर
    भी विस्तार से लिखे ताकि बात आगे पहुचे .

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  16. बलात्कार जैसे घृणित कायॆ करने वालों को कठोरतम सजा मिलनी चाहिए। यह अलग बात है कि समाज में अराजकता न फैले इसके लिए कानून ही यह सजा दे तो ज्यादा बेहतर। लेकिन यह दुष्कृत्य समाज में इस कदर रोष पैदा करता है कि दोषी पीटे जा रहे हैं, मार डाले जा रहे हैं। संदेश साफ है व्यवस्था जो काम नहीं करेगी, उसे समाज करेगा।
    एक दिक्कत और है। बलात्कार पीड़िता को आज भी समाज अच्छी नजरों से नहीं देखता। इस नजर को भी बदलने की कोशिश होनी चाहिए। कुछ साल पहले की बात है पटना में एक वकील के दो बेटों ने दशहरा की रात एक छात्रा से बलात्कार किया था। अखबारों में इस दुष्कृत्य की खबर के साथ यह भी छपा था कि लड़की की मां रोते-रोते यह कह रही थी कि अब मेरी बेटी से शादी कौन करेगा? दूसरी ओर बलात्कार करने वाले लड़के के बाप की चिंता थी कि वह अपने बेटों को गिरफ्तार होने से कैसे बचाए? मतलब जिसके साथ अन्याय हुआ, उसकी और उसके मां-बाप की चिंता लोक-लाज की थी। खुद मां मान रही थी कि दुष्कृत्य की शिकार उसकी बेटी पर कलंक लग चुका है। और जिसने अपराध किया, उसके बाप की चिंताएं अलग थी। उसे इस बात की चिंता नहीं थी कि इस जघन्य अपराध के बाद समाज में वह कैसे जिएगा।
    बात सिफॆ लड़की के मां-बाप की नहीं है। बलत्कृत लड़की के बारे में पूरा समाज ही इसी नजरिये से सोचने लगता है। इस हद तक की उसकी शादी तक में दिक्कत हो जाती है।
    कोई मजबूत व्यक्ति किसी कमजोर व्यक्ति के ऊपर जुल्म करता है तो समाज के सभी लोग कम से कम मन से उसके साथ होते हैं, जिसके साथ जुल्म हुआ। हम ऐसा नहीं करते कि तुम्हारे साथ तो जुल्म हो गया अब हमारा तुमसे कोई रिश्ता नहीं रह सकता? पिटे हुए, सताए हुए व्यक्ति के साथ कैसा रिश्ता? फिर यहां हमारा नजरिया क्यों बदल जाता है?
    दरअसल, हमने लड़की के साथ शील को जोड़ दिया है, इज्जत को जोड़ दिया है। बड़ी अजीब सी बात है कि लड़की के साथ बलात्कार होते ही उसकी इज्जत लुट जाती है। यह पूरा मामला किसी कमजोरी के चलते उसे सताने का ही तो है। सवाल यह है कि जिसके साथ जुल्म हुआ, अत्याचार हुआ, उसकी इज्जत कैसे लुट सकती है? इज्जत तो उसकी खत्म होनी चाहिए, जिसने अपराध किया, गलत काम किया। यह कैसे हो सकता है कि गलत काम करने वाले की इज्जत तो बनी रहे, उसकी इज्जत लुट जाए, जिसके साथ गलत हुआ। यह कैसी इज्जत है भई?
    जरूरत इसी इज्जत और शील की परिभाषा बदलने की है। मानना होगा कि बलात्कार तमाम अपराधों के बीच एक जघन्य अपराध है, जिसका-इसका इज्जत, शील, कुल और मान-मरयादा से कोई लेना देना नहीं है।
    बलात्कारियों को पीट न सके, मार न सकें तो उसका सामाजिक बहिष्कार तो किया ही जाना चाहिए। साथ ही बलात्कार की शिकार बच्ची, युवती को पूवॆवतॆ स्नेह और सम्मान मिले, समाज इसका भी ख्याल रखे तो शायद हालात कुछ बदलें।

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  17. ..और हां, यह वाकई दुखद है कि चिट्ठाचरचा जैसे मंच पर इतने महत्वपूणॆ विषय की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। ..हो सकता है इसकी चरचा से चिट्ठाचरचा का मजा खत्म हो जाता।

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  18. जब भी भीड़ इस प्रकार से अपना न्याय देती है,चाहे उनके लात घूँसे तथाकथित अपराधियों के शरीर पर पड़ते हैं परन्तु असली चोट न्याय व्यवस्था पर ही होती है। प्रत्येक बार लज्जा से सिर उस ही का झुकना चाहिए। जब सभ्रान्त लोग भी इस तरीके से सहमत होने लगें तो समझ लेना चाहिए स्थिति इतनी चिन्ताजनक है कि अब लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम भी शायद हमारी न्याय प्रणाली को नहीं बचा सकेगा।
    जिस देश में न्याय की आशा ही लोगों को न रह जाए वहाँ सड़कें,स्कूल,हस्पताल आदि बनाना भी बेमानी है। जीने की बुनियादी आवश्यकताओं में रोटी, कपड़ा और मकान हो सकते हैं किन्तु सामाजिक प्राणी की तरह जीने के लिए न्याय भी बुनियादी आवश्यकता है। जिस समाज मे व्यक्ति न्याय की अपेक्षा न रख सके वह समाज समाज कहलाने का अपना अधिकार खो देता है। हमारे देश में यही हो चुका है।
    स्त्री का तो आत्मसम्मान से जीने का अधिकार या तो था ही नहीं या बहुत पहले ही छिन चुका है परन्तु अब समाज को भी समाज कहलाने का अधिकार नहीं रहा है। वैसे जहाँ आधी जनसंख्या अधिकारहीन हो वह पहले भी समाज था इस बात में शक है।
    आइए,मिलकर अफ़सोस करें।
    घुघूती बासूती
    जहाँ तक कपड़ों की बात है तो गुजरात में किस्सा उल्टा है। यहाँ पुरुष भी नंग धड़ंग नहीं घूम सकते। यहाँ मैंने कपड़ों को लेकर पुरुषों की पिटाई का किस्सा सुना है। यह किस्सा फिर कभी। अभी चर्चा गम्भीर ही रहनी चाहिए।
    मैं पहले भी कह चुकी हूँ कि नवजात बच्ची से लेकर कब्र में पैर लटकाई बुढिया किसी के भी साथ बलात्कार हो सकता है। कपड़ों का इससे कोई सम्बन्ध नहीं है। कपड़ों की बात करना उस मानसिकता को दर्शाता है जो समझती है कि पुरुष एक असंयम्मी पशु है जिसका स्वयं पर कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसा सोच न केवल स्त्री अपितु पुरुष का भी अपमान करता है।
    घुघूती बासूती

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  19. आदरणीय रचना जी,,
    सादर नमस्कार..वैसे तो मैं आपके इस पोस्ट पर अपनी टिप्प्न्नी पहले ही दे चुका हूँ..मगर अभी अभी देखा की आपने मेरी एक पोस्ट आ जिक्र किया जो अनावश्यक था ...और shaayad आपकी नजर में निरर्थक भी..आपने बिलकुल ठीक ही समझा वैसे भी वो व्यंग्य है...

    कुछ भी कहने से पहले कुछ बातें स्पष्ट कर दूं...इस घटना ने मुझे भी बहुत आंदोलित किया..और आज समाज में घट रही ऐसी घटना करती ही हैं..किसी भी इंसान को करेंगी...मगर क्या ये जरूरी है की हर कोई सिर्फ इसी बात पर लिखे..आपने मेरी पोस्ट का जिक्र किया...तो क्या करूँ मैं इस घटना में भी व्यंग्य लिखूं...
    अब दूसरी बात की तरफ चलते हैं..क्या एक यही वो इकलौती घटना थी जिस पर पूरे ब्लॉगजगत को
    ....लिखना चाहिए था..अपनी लिखने की काबिलियत..शैली..और स्वभाव .से अलग होकर भी..मैं बलात्कार को विषय बना कर एक विस्तृत आलेख लिख चुका हूँ जो कम से कम उन्नीस समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था..उसमें मैंने ये जिक्र भी किया था की नेशनल क्राईम रिकोर्ड ब्यूरो के अनुसार देश में आज हर दो मिनट में एक बलात्कार की घटना हो रही है..आपको ये घटना इसलिए दिखाई दी क्यूंकि ..मीडिया ने तुरत फुरत में इसे दिखाया..
    इससे अलग के बात ..आप दूसरों से अपेक्षा कर रही है की वे सब इस विषय पर कुछ न कुछ लिखें..हालांकि मैंने भी ये कोशिश की थी की कोई ऐसा मंच बनाया जाए ..एक विषय चुन कर उस पर vichaar-विमर्श हो ..बहस हो...मगर मुझे जल्दी ही लगा ये ब्लॉग जगत है और यहाँ सबका अलग अलग अंदाज ,मिजाज ,,शैली..विषय ..है...अब आप ही बताइये रेडियो नामा वाले युनुस भाई ..ब्लॉग टिप्स वाले आशीष भाई ..क्या सब इसी विषय पर लिखें...हाँ ये हो सकता है की टिप्प्न्नी करें...मगर क्या यही करें.जरूरी तो नहीं..
    आप खुद ही बताइए न ..कितना लिखा है आपने खुद ने..और फिर शिकायत ये की सब किसी कुत्ते बिल्ली की शादी में व्यस्त है...
    आप बड़ी हैं..कहने का ..आदेश करने का..डांटने का पूरा हक़ है आपको..यदि आप यही चाहती थी की लोग इस पर लिखें तो ..क्या ये उचित नहीं होता की उनसे अनुरोध किया जता..
    रही बात इस घटना की. बलात्कार की. या औरतों से जुडी हुई घटना की..तो अव्वल तो अफसोसनाक रूप से आपके इस बहस का हिस्सा ज्यादातर पुरुष ही बन गए हैं...किन्तु यदि महिलाएं बनती भी तो ...क्या होता...चौबीस bघंटे के लिए आपकी पोस्ट पहले पन्ने पर टंगी होते वो अभी भी है...

    मैं बताता हूँ की आपको क्या ऐसा करना चाहिए की आपकी बात सार्थक हो....आप सभी महिला ब्लोग्गेर्स se कहें की किसी भी एक दिन चुनकर ..कहीं भी एकत्र हों..इस विषय पर अपनी अपनी बात रखें....ये मेरी जिम्मेदारी है की मैं कैसे उसे मीडिया के सामने लाता हूँ..यदि दिल्ली में रख सकें..तो प्रिंट के साथ एलेक्त्रोनिक्म माध्यमों में भी....ताकि सबको पता चल सके की ब्लोग्गेर्स इस विषय पर क्या कहते सोचते हैं....

    आपकी इस पोस्ट पर अपेक्षित टिप्प्न्नी नहीं आयी तो तिप्प्न्नियों का मनोविज्ञान जहां तक मैं समझता हूँ ..की ये भी है की आप जितना दूरों को पढेंगे...उतना ही दुसरे आपको पढ़ते हैं...
    एक आखिरी बात ..एक बार किसी पोस्ट पर आपने मेरे व्यंग्य पर टिप्प्न्नी की थी की ऐसे व्यंग्य घटिया मानसिकता का परिचायक है..प्रतुत्तर में सभी ब्लोगों पर दी गयी टिप्प्न्नी को मोडरेशन के माध्यम से हटा दिया था ...कृपया इसके साथ ऐसा न करें...

    आपने कहा जो मन में है लिखें.....मैंने लिख दिया...यदि कुछ ज्यादा कह गया तो छोटा समझ कर क्षमा करेंगी...यही उम्मीद है.....

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  20. main apna phone no. bhee likh raha hoon..pata nahin kya soch kar..ho saktaa hai ki ye theek na ho magar fir bhee...9871205767..

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  21. ajay मेने आप के ब्लॉग पर कुछ नहीं कमेन्ट किया
    क्युकी वो आप का निज का ब्लॉग हैं
    चर्चा मंच हैं जहां हम वहाँ हुई चर्चा पर कमेन्ट
    करते हैं .
    आ़प पूर्णता स्वतंत्र हैं अपने ब्लोग्पर कुछ भी लिखने
    के लिये उसी तरह मे स्वतंत्र हुई चर्चा के मंच
    पर क्या सही लगता हैं उस पर कमेन्ट करू

    और हिंदी ब्लोगिंग को परिवाद से मुक्त ही रखे
    ताकि बात कहने मे संकोच ना हो

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  22. ummid hai ki is baar apraadhiyon ko vo dand milega jo bhavishya me aisi ghrinit ghatnaaon ko rokne me madadgar hoga..
    pablic jaag gayi hai aur prashaasan bhi pablic ki bhaavnaaon ko samajh chuka hai ....
    hum is sharmnaak ghatnaa ki kadi bhartsnaa karte hain

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  23. bahut hi rachnatmak blog h. is mudde par nari ke paksh ke sath hu.

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  24. इस प्रकार के घृणित अपराध को पिंक चड्डी के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है? समझ से बाहर है. क्या ब्लोगिंग जगत में सकारात्मक विषयों का अभाव है? मेरा विचार है इस प्रकार की चर्चाएं करके हम बलात्कार का वातावरण ही बना रहे है. कानूनों और ब्लोगिंग से बलात्कार नहीं रुकेंगे. दिमागी सफ़ाई की जरूरत है और हम गन्दगी फ़ैला रहे हैं.

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  25. लिखना चाहिए था..अपनी लिखने की काबिलियत..शैली..और स्वभाव .से अलग होकर भी..मैं बलात्कार को विषय बना कर एक विस्तृत आलेख लिख चुका हूँ जो कम से कम उन्नीस समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था..उसमें मैंने ये जिक्र भी किया था की नेशनल क्राईम रिकोर्ड ब्यूरो के अनुसार देश में आज हर दो मिनट में एक बलात्कार की घटना हो रही है..आपको ये घटना इसलिए दिखाई दी क्यूंकि ..मीडिया ने तुरत फुरत में इसे दिखाया..
    क्या लेखक व चर्चायें करने वाले बलात्कार से दूर रह पा रहे हैं? क्या लेखों से बलात्कार रोके जा सकते हैं? क्या बलात्कारी ब्लोग पढ़कर बलात्कार करते हैं? जो सावधान हो जायगा और इस दुष्कृत्य से अपने आप को दूर कर लेगा.

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