नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

October 12, 2011

क्या हम सच में गंभीर विषयों से बच कर निकलना चाहते हैं , क्यूँ हम अनछुए विषयों पर बात ही नहीं करना चाहते

पिछली पोस्ट से बात आगे बढाते हुए
हम सब शुचिता की बात करते हैं संबंधो में , हम सब कहते है की शादी एक पवित्र बंधन हैं और भारतीये संस्कृति का प्रतीक हैं । फिर भी सदियों से विवाह से इतर सम्बन्ध बनते रहे हैं स्त्री और पुरुष दोनों के ।

हर ऐसे इतर सम्बन्ध को सदियों से छुपाया जाता रहा हैं और परिवार के नाम पर नैतिकता को नहीं अनैतिकता को बढ़ावा दिया जाता रहा हैं ।

हमेशा कहा जाता रहा हैं की परिवार सर्वोपरि हैं लेकिन उस परिवार के नियम कितने लोग मानते हैं ?? क्या बात को दबा देने से या बात को छुपा देने से गलत बात ख़तम हो जाती हैं या वो सही हो जाती हैं ?

जिन परिवारों में ये सम्बन्ध होते हैं उनके बच्चे क्या सच में अनजान रहते हैं अपने पिता - माता के बीच की अनबन से ? क्या उन पर क़ोई दूरगामी परिणाम नहीं होता हैं इन सब बातो का ??

हम एक स्वस्थ समाज की बात करते हैं पर क्या हम ने सच में एक स्वस्थ समाज का निर्माण किया हैं ?
हम कहते हैं नयी पीढ़ी बहुत मॉडर्न हो गयी हैं , उनको शादी की जरुरत ही नहीं रह गयी हैं , लिव इन रिलेशन शिप बढ़ रहा हैं , लोग बच्चा नहीं चाहते हैं । नयी पीढ़ी पाश्चात्य सभ्यता को मानती हैं ।

ये नयी पीढ़ी आयी कहां से हैं ? किसी की संतान हैं ये ? क्यूँ बन रही हैं वो ऐसी ? क्या कभी हमारा समाज इस पर विचार करता हैं ? क्या जो कुछ इन बच्चो ने पुरानी पीढ़ी को दबे ढके छुपे करते देखा हैं वो खुल कर कर रही हैं ? हम खुलेपन के विरोधी हैं और इसे पाश्चात्य सभ्यता की देन कहते हैं
लेकिन गलत काम खुले पन से हो या छुप कर हैं तो गलत ही । नयी पीढ़ी इन सब बातो को गलत मानेगी की कैसे जब आप ने किसी भी गलत काम का क़ोई सजा निर्धारण तो किया नहीं हैं । आप ने तो महज इतना कहा हैं कुछ भी कर लो पर घर की बात घर में ही रहे , तमाशा ना बने ।

यानी गलती को गलती केवल इस लिये नहीं माना जाता हैं क्युकी वो पति पत्नी के बीच की बात हैं और कोम्प्रोमैज़ से दाम्पत्य जीवन पटरी पर होता हैं क्युकी बच्चो को सुरक्षा चाहिये । यानी नैतिकता का तो क़ोई मोल ही नहीं हैं क्युकी अनैतिकता की क़ोई सजा नहीं हैं ।

जो पति या पत्नी किसी और से विवाह से इतर सम्बन्ध बनाते हैं क्या वो कभी इन लोगो पर क्या बीतती हैं सोचते हैं ? नहीं वो केवल अपने बारे में सोचते हैं और जिस से सम्बन्ध बनाते हैं उसको ही गलत कहते हैं और अपने विवाह की समस्या का जिम्मेदार मानते हैं ।
गलती दोनों पक्षों की होती हैं पर विवाहित लोग फिर अपने घर वापस जा कर "साफ़ और कुलीन " होने का नाटक कर लेते हैं और दूसरा पक्ष "नीन्दनिये " हो जाता हैं । उसके जीवन का क्या ??? उसकी मनोस्थिति का क्या ??

क्यूँ समाज के नियम सबके लिये बराबर नहीं हैं

पिछली पोस्ट पर नारी ब्लॉग के रेगुलर पाठक ने कहा हैं
फिर आपने बात की परिवार में शुचिता की.पर इसकी स्थापना के लिए क्या किया जाए.एक तरीका नैतिकता,मर्यादा आदि के बखान का हो सकता है लेकिन केवल इससे बात बनती तो दुनिया में अंधिकांश गलत काम कभी होते ही नही.आज भी जो लोग गलत काम कर रहे है उन्हें पता है कि ये गलत ही है पर फिर भी कर रहे है.हाँ कम्प्रोमाइज नहीं होना चाहिए.लेकिन ये विषय थोडा गंभीर हो जाएगा क्योंकि बहुत से प्रश्न इसके साथ जुडे है.इस पर व्यापक बहस की आवश्यकता है.हिंदी ब्लॉगिंग में भी शायद ऐसे प्रयास अभी तक हुए नहीं पर होने चाहिए.


क्या हम सच में गंभीर विषयों से बच कर निकलना चाहते हैं , क्यूँ हम अनछुए विषयों पर बात ही नहीं करना चाहते



अपडेट
ये दो लिंक हैं जहां मैने कमेन्ट किया हैं पाठक उन कमेंट्स पर भी अपनी राय यहाँ दे सकते हैं विषय यही हैं

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17 comments:

  1. रचना जी, आपकी इस विषय पर कल की पोस्ट भी मैंने पढ़ी थी, लेकिन टिप्पणी नहीं की क्योंकि मुझे लगता है यह विषय ऐसा है जिस पर बहस अंतहीन हो सकती है, लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकल सकता. मैं आपका स्टैंड भी नहीं समझ पायी. आप क्या चाहती हैं? पति-पत्नी एक बार एक बंधन में बंधने के बाद कभी भी किसी दूसरे के प्रति आकर्षित ना हों, ऐसा नहीं हो सकता. अगर यह सिर्फ़ आकर्षण है, तब इसे उसी स्तर पर रोका जा सकता है और दूसरा पक्ष उसे माफ कर सकता है. एक भूल माफ की जा सकती है, लेकिन जब जानबूझकर गलती की गयी हो, तो उसे माफ नहीं किया जा सकता.
    रही बात किसी विवाहित पुरुष या महिला के अविवाहित से सम्बन्ध की, तो सच में हमारा समाज इस विषय में दोहरा मानदंड अपनाता है. गलती हमेशा अविवाहित को दी जाती है कि उसने 'एक घर बर्बाद कर दिया' जबकि गलती दोनों की ही होती है.
    आजकल की पीढ़ी इस दोहरेपन को ना मानते हुए जब विवाह सम्बन्ध को ही नकार देती है, तो उसे भला-बुरा कहा जाता है.
    मैं यहाँ अपनी बात रखने से इसलिए बच रही थी क्योंकि मेरे विचार इस विषय में बहुत क्रांतिकारी हैं, जो शायद बहुत से लोगों को अच्छे ना लगें. लेकिन मैं उनलोगों में से भी नहीं हूँ, जो बातें बड़ी-बड़ी करते हैं और अपने जीवन में खुद दोहरा मानदंड अपनाते हैं, परिवार बचाने के नाम पर. मेरा ये मानना है कि स्त्री और पुरुष दोनों को विवाह तब करना चाहिए, जब उन्हें ये विश्वास हो जाए कि वो एक-दूसरे के साथ सारा जीवन बिता सकते हैं. ऐसा प्रेम-विवाह भी हो सकता है और अरेंज्ड भी. लेकिन, यदि साथ चलते-चलते कभी यह महसूस हो कि पति-पत्नी दोनों में से किसी एक को किसी अन्य से प्रेम हो गया है और वो अब इस शादी में नहीं रह सकता, तो अपने जीवनसाथी से बात करके कोई उपाय निकालना चाहिए. मैं सबंधों को ज़बरदस्ती ढोने के पक्ष में नहीं हूँ.
    आमतौर पर देखा ये जाता है कि औरतें कभी-कभी सिर्फ़ आर्थिक वजहों से संबंधों को ढोने को मजबूर होती हैं, जैसा कि आपने अपनी एक पोस्ट में जिक्र भी किया था. वो इसलिए पतियों की बेवफाई सहती हैं कि उनकी आर्थिक सुरक्षा की जिम्मेदारी उसी पर होती है. मुझे लगता है ऐसा करना गलत है.
    मुझे लगता है कि जैसे अपना जीवनसाथी चुनने का हक होता है उसी प्रकार इस सम्बन्ध से निकलने का भी अधिकार होना चाहिए. जो लोग ये सोचते हैं कि इससे परिवार टूटेगा या बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा, तो मुझे लगता है कि माँ-बाप के बीच संबंधों में तनाव का ज्यादा बुरा असर बच्चों पर पड़ता है बनिस्बत किसी एक के साथ रहने से. कुछ लोग ये मानते हैं कि इससे पुरुषों के लिए अपनी पत्नी से छुटकारा पाना आसान होगा और वो जब चाहेंगे तब उसे तलाक दे सकेंगे. तो मुझे ये लगता है कि पति तभी विवाहेतर सम्बन्ध आसानी से बनाता है, जब उसे मालूम होता है कि उसकी पत्नी उस पर भावनात्मक और आर्थिक रूप से निर्भर है और छोड़कर नहीं जायेगी. फिर क्या सिर्फ़ इस डर से कोई सम्बन्ध निभाना ज़रूरी है कि इससे दूसरे पक्ष की आर्थिक हानि होगी.
    मुझे ये लगता है कि विवाह को एक कांट्रेक्ट ना मानकर एक 'पवित्र संस्था' मानने और किसी भी दशा में 'परिवार बनाए रखने' के नाम पर ही इतनी विसंगतियाँ उभरती हैं. मेरे ख्याल से समाज में कुछ बातें अब औपचारिक रूप से स्वीकार कर लेनी चाहिए-
    १. विवाह को इतनी पवित्र संस्था ना माना जाए, कि उसका लाइसेंस लेकर किसी को भी एक से अधिक सम्बन्ध बनाने की छूट मिल जाय.
    २. विवाह को अनिवार्य संस्था ना माना जाय और अविवाहित और लिव इन में रहने वाले लोगों को भी समाज में मान्यता मिले.
    ३. परिवार की अवधारणा सिर्फ़ 'विवाह संस्था' के इर्द-गिर्द ना घूमे, दोस्त भी परिवार हो सकते हैं.
    ४. तलाक को एक जघन्य पाप ना समझा जाय और तलाकशुदा लोगों को अपराधी या बेचारा की तरह ना देखा जाय.
    लिस्ट बड़ी लंबी है. शायद मैं विषय से भटक गयी हूँ. आपने नैतिकता-अनैतिकता की बात उठायी थी. मुझे ये लगता है कि विवाह संस्था के आवरण के नीचे और परिवार के अंदर की बहुत सी चीज़ें दबा दी जाती हैं. परिवार के ही नाम पर कोई चाइल्ड अब्यूज़ और लड़कियों के साथ घर में होने वाली छेडछाड की बातों को भी दबा दिया जाता है.

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  2. इन अनछुए विषयों पर न केवल बात होनी चाहिए, बल्कि व्यक्ति के ईमानदार बनने की परिस्थितियां समाज में पैदा की जानी चाहिएं। एक बच्चा सच बोलने पर सजा पाता है,लेकिन वही बच्चा देखता है कि दूसरा बच्चा झूठ बोलने से बच गया। बस यहीं से सभी कानूनों का टूटना शुरु हो जाता है। किसी भी सच्चे व्यक्ति को समाज में प्रताड़ित या दंडित किया जाता रहेगा तब तक लोग ईमानदार नहीं हो सकते। अपने साथी के साथ ईमानदार व्यक्ति वही हो सकता है,जो स्वयं के प्रति ईमानदार हो। व्यक्ति-व्यक्ति के लिए ऐसी परिस्थियों का निर्माण करना होगा कि वह समाज में एक निर्भयमुक्त समाज बना सके। इसके लिए परिवार,स्कूल,कॉलेज स्तर पर दोहरे मापदंडों को खत्म करना होगा। हमें हर स्तर पर एक ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि व्यक्ति के वास्तविक चेहरे को सम्मान की दृष्टि से देखा जाए। एक चोर, यदि स्वीकार करता है कि चोर होना उसका निर्णयगत फैसला है, तो उसे सजा नहीं बल्कि उसे सम्मानित किया जाए उसके सच बोलने पर और उसके वैसा होने की स्वीकारोक्ति पर। ऐसे व्यक्ति-व्यक्ति के लिए उसके होने के निर्णय को सम्मान जब तक हम नहीं देंगे, हम समाज से दोहरे मापदंडों को नहीं हटा सकते।

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  3. आपकी पिछली पोस्ट और इस पोस्ट पर मेरी टिप्पणी में व्यक्ति से अभिप्राय: है इंडिविजुअल; फिर चाहे वह पुरुष हो या स्त्री।

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  4. मुक्ति जी की टिपण्णी से सहमत हूँ | कुछ और जोड़ना चाहूंगी कि ऐसा नहीं है कि विवाह के बाद किसी अन्य के प्रति आकर्षण होता ही नहीं या होना ही नहीं चाहिए ये सहज मानवीय प्रकृति है जो सभी में होती है किन्तु उसे आकर्षण तक ही सिमित रखना चाहिए उसे आगे नहीं बढ़ना चाहिए | हर नैतिकवान चाहे वो विवाहित हो या अविवाहित हो वही पर खुद को नियंत्रित कर लेता है या वो होता ही क्षणिक है जो खुद ही ख़त्म हो जाता है , किन्तु जैसा कि मुक्ति जी ने कहा नैतिक रूप से गिरा व्यक्ति मौका और परिस्थति को देख उसके आगे बढ़ता चला जाता है | ऐसे विवाहेतर संबंधो में यदि जीवनसाथी दुसरे को लेकर गंभीर है तो उससे अलग हो जाना ही सही है किन्तु ज्यादातर इसे अहम् का सवाल बना कर जीवनसाथी से अलग नहीं होते है कि " वो मुझे कैसे छोड़ सकता है ये मेरा अपमान है " , या आर्थिक कारणों से या एक दुसरे से बदला लेने के लिए या मेरा/ मेरी नहीं हुई तो दुसरे का भी नहीं होने दूंगा/ दूंगी | और चारित्रिक रूप से ख़राब जीवन साथी को व्यक्ति अपने हिसाब से सजा दे सकता है किन्तु घूम कर बात वही आ जाती है जहा पत्नी के लिए आर्थिक रूप से पति पर निर्भर होने और समाज का दबाव काम करता वही पति पर भी सामाजिक दबाव और अहम् आड़े आता है |

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  5. आपका यह विचारोत्तेजक लेख मौजूदा समय को समझने के लिए अत्‍यंत उपयोगी है!

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  6. रचना जी,
    मुझे मुक्ति जी द्वारा बताया गया दूसरा बिंदू सबसे महत्तवपूर्ण लगता है.लेकिन समाज ये बात किसीके सिखाने से सीख जाएगा ऐसा मुझे नहीं लगता.बल्कि इस संबंध में सोच तभी बदलनी शुरु होगी जब ऐसे थोडे बहुत उदाहरण धीरे धीरे सामने आते रहेंगे.धर्भ का हमारे सामाजिक जीवन पर ज्यादा हावी होना भी एक कारण है वर्ना इतना टाईम नहीं लगता.पोस्ट में आपने कहा कि नई पीढी विवाह से परहेज कर रही है,मुक्ति जी ने भी ये बात कही यानी सामाजिक दबाव अब कम होने लगा है या कहें कि लोग इसकी परवाह अब पहले जितनी नहीं करते.तलाक,प्रेम विवाह या अविवाहित रहने के बढते मामलों से भी लगता है कि 'लोग क्या कहेंगे' वाली चिंता अब कम की जाती है.महिलाओं का आत्मनिर्भर होना भी एक कारण है.ऐसे मामले जैसे जैसे बढते जाएँगे लोग इन्हें सामान्य मानने लगेंगे और इन्हें स्वीकारेंगे ही जैसे अब महिला का नौकरी करना पहले जितनी असामान्य बात नहीं मानी जाती हालाँकि अभी खास बदलाव नहीं हुआ.तो बस असली समस्या तो सामाजिक दबाव ही है विवाहेतर संबंधों को सहने और अविवाहितों से भेदभाव के पीछे.लेकिन हाँ ये काम अपने आप और धीमे गति से होगा.आप लोग ज्यादा कुछ नहीं कर सकते देखिये अभी तो मुक्ति जी भी कह रही हैं कि ऐसी चर्चा का कोई अंत ही नहीं है और न कोई परिणाम निकलने वाला है.शायद आपको विश्वास न हो पर मैं कल टिप्पणी में इसे गंभीर विषय की जगह अकादमिक बहस का विषय लिखना चाहता था उस समय मुक्ति जी का नाम ही मेरे ध्यान में था और इसी ब्लॉग पर आप दोनों का एक वार्तालाप भी.लेकिन मैं ये सोच रहा था कि यदि ये हमेशा अकादमिक बहस का विषय ही बना रहा तो आम लोगों से तो हमेशा दूर ही रहेगा.

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  7. @राजन, आपकी इस बात से सहमत हूँ कि ऐसे विषयों को अकादमिक-बहस के क्षेत्र से बाहर समाज में लाना पड़ेगा और इसके लिए कुछ उदाहरणों को सामने लाना होगा. रचना जी का आभार कि उन्होंने इस मुद्दे को उठाया.

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  8. मुक्ति / राजन
    नारी ब्लॉग पर आम भाषा और गैर अकादिमिक बहस से इतर समाज के उन अनछुए पहलु जिन पर आम आदमी क्या सोचता हैं चाहता हैं की बात होती हैं . बुद्धिजीवी वर्ग बहस में इतना उलझ जाता हैं की किताबो और संदर्भो से अलग अलग मुद्दों पर बात होती हैं पर वो बाते नहीं होती जो जिन्दगी में किताबो से इतर होती हैं
    किस्सा , कहानी , कविता सब में कुछ ना कुछ आंदोलित करता हैं पर अपने नाम से सीधे सीधे कहना , ज़रा मुश्किल हैं क्युकी जैसा मैने एक बार पहले कहा की अगर मैं इन मुद्दों पर बात करना चाहती हूँ तो मै फेमिनिस्म से इतर बात कर रही हूँ पर मुझे नारी वादी का टैग दिया जाता हैं क्युकी वो एक धारा हैं और कोई भी बोलती नारी महज इसलिये फेमिनिस्ट हो जाती हैं क्युकी वो बोल रही हैं .

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  9. @मुक्ति / अंशुमाला

    हो सकता हैं मेरे लिखने में, मुद्दा सही उभर कर नहीं आया हैं कारण हैं की मुझे इंग्लिश में लिखना बेहतर विकल्प लगता हैं और हिंदी में उतनी सही तरीके से मेरी बात नहीं पहुच पाती हैं या ये भी हो सकता हैं मेरे अपने विचार ही गड्ड मड्ड हो गए हो .

    ख़ैर अजित जी के ब्लॉग पर एक दम्पत्ति को लेकर जो बहस चली और उन्होने जिस प्रकार से उस लेख में इस बात पर जोर दिया की परिवार बचाना जरुरी हैं चाहे शादी में शुचिता हो या ना हो
    और उससे पहले भी अनेक जगह इस बात को ही और दिया जाता हैं की गलत को स्वीकार कर लो , परिवार को बचा लो और सब ढका मुंदा रहे तो ठीक हैं

    ये सब आम जिन्दगी में इतना कोमन हैं कारण कोई भी हो

    पर मुझे इस तथ्य में बड़ा भ्रम लगता हैं क्युकी जब कोई मोरल हम खुद फोल्लो ही नहीं करते तो अपने बच्चो से हम सही रास्ते पर चलने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं .

    हम क्यूँ नहीं विकल्पों की बात करना चाहते हैं , हम कहते हैं तलाक इस लिये बढ़ रहे हैं क्युकी लडकिया सशक्त होगयी हैं , सही हैं पर इस मे इतना हल्ला क्यूँ अगर गलत को गलत कहा जाए और ऐसे व्यक्ति से अलग हो कर कोई अपना जीवन शुरू करे तो क्या गलत हैं

    हम कहते हैं दहेज़ गलत हैं पर अपने समय में सब अपने माँ पिता के पीछे छुप जाते हैं
    हम कहते हैं कन्या को मरना पाप हैं पर करते है उअर उस से भी भयानक हम कन्या का दान आज भी करते हैं परम्परा के नाम पर और कोई कन्या खुल कर विरोध तो दूर इस पर बात भी नहीं करती

    जितनी महिला बोलती हैं वो सब शादी के समय नहीं बोलती हैं या पहले बोलती हैं या बाद में
    सिर्फ अकादमिक बहस के लिये

    क्यूँ नहीं कोम्प्रोमैज़ की जगह मोरल / शुचिता की बात होती हैं

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  10. इन अनछुए विषयों पर न केवल बात होनी चाहिए, बल्कि व्यक्ति के ईमानदार बनने की परिस्थितियां समाज में पैदा की जानी चाहिएं। एक बच्चा सच बोलने पर सजा पाता है,लेकिन वही बच्चा देखता है कि दूसरा बच्चा झूठ बोलने से बच गया। बस यहीं से सभी कानूनों का टूटना शुरु हो जाता है। किसी भी सच्चे व्यक्ति को समाज में प्रताड़ित या दंडित किया जाता रहेगा तब तक लोग ईमानदार नहीं हो सकते।


    मनोज भारती
    आप के कमेन्ट अपने में सम्पूर्ण हैं सो इस पर कुछ नहीं जोड़ना चाहती

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  11. रचना जी

    निचे दी टिप्पणी में आप की बात और खुल कर स्पष्ट रूप में सामने आई है | जैसा राजन जी ने कहा की समय बदल रहा है बदलाव आ रहा है भले ही धीरे धीरे जैसे जैसे नारी शसक्त होगी आर्थिक रूप से आत्म निर्भर होगी और सबसे जरुरी बात उसमे जब आत्मविश्वास आयेगा तो कोई भी वैवाहिक जीवन में सुचिता ख़त्म होने के बाद उसमे रहना नहीं चाहेगी और पुरुष भी इससे बाहर निकलना ही ठीक समझेगा या तो परिवार ही टूटेंगे या फिर परिवार की सुचिता ख़त्म करने वालो को ही सुधारना होगा |

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  12. ek mahatwpoorn vishya par sarthak vimarsh ke liye
    is manch ka abhar.......

    'imandari'.........'nachiketa'.....jaisa sabse se pramukh........bakiya, sab waham-ahan aur kuch bhi
    nahi....

    pranam.

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  13. पोस्ट में आपने कहा कि नई पीढी विवाह से परहेज कर रही है,


    राजन ये मैने नहीं कहा हैं ये मैने केवल कोट किया हैं , लोग आज कल यही कहते हैं नयी पीढ़ी के लिये

    लेकिन वो कौन से कारण हैं जो नयी पीढ़ी को शादी जैसे सुरक्षित आयाम से विमुख कर रही हैं क्या वो केवल पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण हैं या नयी पीढ़ी शादी के अलावा ऑप्शन इस लिये खोज रही हैं क्युकी हमारे यहाँ शादी को मजाक बना दिया गया हैं , दहेज़ , शादी से इतर यौन सम्बन्ध , बहु को जलना , दामाद को बिना गलती के दहेज़ मुकदमो में फसाना इत्यादि

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  14. लोग अनछुए विषय पर इसलिए बात नही करना चाहते हैं, क्यूंकी कुछ तथाकथित लोग खुद को काफ़ी सभ्य मानते हैं! उन्हे ऐसा लगता है की बात करने मात्र से ही उनके सफेद चरित्र पर काले छाले पर जाएँगे. लेकिन सही मायने में यही लोग समाज में हो रहे हर ग़लत बातों की लिए ज़िम्मेदार हैं!

    मैं फिर कहूँगी, कौन खुद को सभ्य कहते हैं यहाँ? सभ्यता अगर वाक़ई में एक खेल है तो वेश्या वृति में लगी लड़कियाँ एक खिलौना है! ये मत कहिए की हमारे घर में ऐसा नही होता है तो हम सभ्य हैं. क्यूंकी हमारा समाज भी एक परिवार है और इसी परिवार की लड़कियाँ उसमे उसमे उलझी हुई हैं. जो भी परिवार को बचाने के लिए किसी वोमेन को कहते हैं की अपने पति परमेश्वर को माफ़ कर दो, क्यूंकी पूरी ज़िंदगी बची है. तो उन सबको मैं यही कहना चाहूँगी, की हम भी ज़िंदगी अपने तरीकों से जीना सीख लिया है, और ना भी सीखें हैं तो ठोकर खा - खा कर सीख ही लेंगे हैं! और इसमे ऐसे हरकत करने वालों की कोई जगह नही है.

    "हम खुलेपन के विरोधी हैं और इसे पाश्चात्य सभ्यता की देन कहते हैं"

    हम खुलेपन की इश्लीए विरोधी हैं, क्यूंकी यह भी दोहरी नीति अपनाते हैं. अंदर कुछ और और बाहर कुछ और. और ऐसे लोगों को मैं एक साँप से कम नही मानती हूँ. अज्ञेयजी ने ठीक ही लिखा है:

    साँप !
    तुम सभ्य तो हुए नहीं
    नगर में बसना
    भी तुम्हें नहीं आया।

    एक बात पूछूँ–(उत्तर दोगे?)
    तब कैसे सीखा डँसना–

    विष कहाँ पाया?
    ~अज्ञेय

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  15. रचना जी,
    पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण और विवाह में आई विकृतियाँ दोनों ही इसका कारण है.लडके और लडकियों की सोच में भी अंतर हैं.यदि इस पर बहस करें तो महिलाएँ शादी की कमियों को इसका कारण बताऐंगी और दूसरा पक्ष पश्चिमी संस्कृति को जबकि दोनों ही सही है लेकिन इसके बाद सवाल ये होना चाहिये कि क्या विवाह में नैतिकता बनी ही रहती है पर इस पर कोई बात नहीं करता.क्योंकि यहाँ ज्यादातर बहस महिलाएँ ऐसी और पुरुष वैसे पर ही अटक जाती है इससे आगे महिला और पुरुष दोनों ही एक दूसरे को नहीं बढने देते.फिर भी यहाँ बात होनी चाहिये पर कोई निष्कर्ष निकलेगा इसकी उम्मीद कम ही है.और आप बचने की कितनी ही कोशिश कर लें यदि आप इस पर चर्चा आरंभ करती है तो आपको बुद्धिजीवियों वाले विषयों पर लौटना ही पडेगा बस आपकी भाषा थोडी सरल होगी.क्योंकि जैसा कि मैंने पहले ही कमेंट में कहा कि धर्म भी इन सब बातों से जुडा हुआ है.जैसे आपने कन्यादान की बात की वह भी ऐसा ही विषय है ये प्रथा खत्म हो भी जाएँ तो किसीको कोई नुकसान नहीं है लेकिन फिर भी लोग विरोध कर रहे है कारण वही है,धर्म.इसीलिए आम आदमी ऐसे विषयों को एकदम से नहीं पचा पाता जो अभी अकादमिक बहस का विषय बने हुए है.लेकिन फिर भी इन पर बात होनी चाहिये ताकि ये विषय आम आदमी से अलग थलग न रहें पर ज्यादा उम्मीद रखना सही नहीं.और जहाँ तक बात है विवाहेतर संबंधों में माफी की तो मैंने पिछली ही पोस्ट में ही कहा था कि दूसरा पक्ष ही इसका फैसला करे.और जैसे जैसे महिलाएँ आत्मनिर्भर होती जाएँगी विवाह से बाहर आने का ही विकल्प चुनेंगी लेकिन सभी ऐसा करें ये जरुरी नहीं अभी तो पश्चिम में भी कई पति पत्नी एक दूसरे को माफ कर देते है जबकि वहाँ सामाजिक दबाव नहीं होता इसलिए उनका हम कुछ नहीं कर सकते.बस आम राय बनाने का प्रयास कर सकते है कि क्या सही है और क्या गलत.

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  16. rachna this discussion is unending - jitne log utne views....

    I am for individual decision. If husband and wife want to separate/stay together /person wants to remain unmarried / has a relation outside marriage (pre or post marital)/ etc - FOR ANY REASON - it has to be an individual decision, and the analysis of right and wrong depends on the individual circumstances... the + or the - results have to be equally accepted by the individual!!!

    Problem is - WHY the insistance to convert the views of the whole society ? After all society is a group of individuals. The rules of society are not formulated by some external being - they are the majority opinion - and each member of this "majority" is an individual at the end of the day. His/ her opinion is equally important as your / my opinion. I don't understand this insistence to try to find general solutions to every issue, which i find all around me in almost all self professed intellectuals / mentors of the society (Pls don't misunderstand - i am not talking abt u ). I had written an essay on this - wt i will post the link if i can find it.

    BTW - do u kno that both ur links are opening at ghughooti baasooti and none at ajit ji's post?
    If the wife wants to separate if she feels her husband cheated and doesn't want to forgive him - it is HER DECISION. Equally - if she wants to forgive and forget the whole thing and stay with him again - it is once again HER individual decision. WE HAVE NO RIGHT TO PRESSURIZE IN EITHER DIRECTION OR BE JUDGEMENTAL !!!!

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  17. http://ret-ke-mahal.blogspot.com/2011/01/changing-perceptions.html

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