नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

October 09, 2011

कहते हैं दहेज़ लेना और देना कानूनन अपराध हैं , क्या सच में

दो तीन दिन से टी वी पर खबर आ रही हैं की एक लड़की जिसकी शादी इस साल शायद मार्च में ही हुई थी उसको उसके ससुराल वालो ने छत से नीचे फ़ैक दिया और वो बहुत गंभीर हालत में अस्पताल में भरती हैं ।

घटना जयपुर की हैं लड़का डॉक्टर हैं लड़की भी डॉक्टर हैं । लड़की अपने माँ पिता की एक ही संतान हैं ।

लड़की के पिता का कहना हैं की लडके वाले दहेज़ की मांग कर रहे थे और ससुराल वालो ने लड़की को छत से फैकने से पहले उस से सुसाइड नोट भी लिखवा लिया था


क्या एक डॉक्टर लड़की को छत से फैकने से पहले उसके माँ पिता को ज़रा भी आभास नहीं हुआ होगा की ये होने वाला हैं ??
क्या एक डॉक्टर लड़की के विवाह में दान दहेज़ की प्राथमिकता होती हैं ??
क्या एक डॉक्टर लड़की शादी से पहले बिलकुल अनभिज्ञ रहती हैं कि उसके विवाह में क्या क्या खर्च होगा ?
लड़की कि ऐसी क्या मज़बूरी होती हैं कि वो डॉक्टर होने के बाद भी अपने विवाह के बारे में , होने वाले परिवार के बारे में आँख बंद रखती है ?
विवाह होने के बाद भी , ससुराल पहुचने के बाद और ससुराल वालो के व्यवहार को जानने के बाद क्या एक डॉक्टर लड़की इतनी लाचार हो जाती हैं अपने घर वापस ना सके और छत से फ़ेंक दी जाए ??

इस पोस्ट के जरिये क्या हम मंथन कर सकते है कि दहेज वास्तव में कौन चाहता हैं { यानी देना और लेना }

क्या वर
क्या वर के परिवार वाले
क्या वधु
क्या वधु के परिवार वाले

क्यूँ बराबर के पढ़े लिखे वर -वधु में वधु को दहेज़ में बलि बनना पड़ता हैं
और अगर दहेज़ लेना और देना कानून अपराध हैं तो क्यूँ नहीं वर , वधु और दोनों के माता पिता सब को जेल होती हैं


There is case of Lady Dr being thrown from roof top by her in-laws in Jaipur within 6 months of her marriage . Reason Dowry . The girl parents claim , they were being harassed for dowry and in laws even got a suicide note written by the girl .
I sometimes wonder do these highly educated girls don't know what expenses are being incurred on their wedding ? And to top it all when they reach the husbands house and realize something is amiss , do they never bother about their safety ?
When boy and girl are equally qualified why girls don't put their foot down at the time of marriage itself and stop their parents from spending exorbitant amount on marriage for dowry ?

Thru this post can we really discuss who is the one who wants the dowry { give or take }
the boy and his parents
the boy
the girl and her parents
the girl

And why when the girl and boy both are equally qualified its the girl who is sacrificed in the name of dowry .

Dowry is a legal offense , then why not punish bride , bridegroom and both set of parents equally and send them all to jail


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27 comments:

  1. इस कानून की सच्चाई सिर्फ़ इस बात से प्रमाणित हो जाती है कि दहेज लेने के लिए दर्ज़ होने मुकदमे का एक प्रतिशत भी नहीं है वो संख्या जो दहेज देने के लिए दर्ज़ की जाती है ।

    खुद अदालत भी मानती है कि दहेज़ प्रताडना कानून का दुरूपयोग ही अधिक किया जा रहा है । समाज का रव्वैय्या ऐसा है कि बेटी के समय दहेज़ प्रथा को कोसने वालों को बेटे के समय पलटी मार कर दहेज बटोरते खूब देखा है

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  2. अजय सब दहेज़ की बुराई करते हैं तो चाहता कौन हैं इस पर विमर्श का आग्रह हैं

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  3. जी बुराई करने से क्या होगा रचना जी । बुराई तो हम सारी चीज़ों की करते हैं , बेइमानी की , झूठ की मगर जब खुद पे बन आती है तो इंसान से आदमी बन जाते हैं ।दहेज़ जैसी रीति जो कुरीति बन गई है उसे अब पूरी तरह लोप कर देना चाहिए । युवाओं को खुद ही ये फ़ैसला करना होगा फ़िर चाहे वो अभिवावकों की बगावत की कीमत पर ही क्यों न हो , जैसे कि हमने की ।

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  4. क़ानून और प्रथा/रिवाज दोनों का ही दुरपयोग हो रहा है , ये बात अलग है निष्पक्ष ढंग से लोग मुद्दे नहीं उठाते

    मुझे लगता है की दो तरह के बुद्दीजीवी हैं
    १. हर प्रथा को जस्टिफाई करने वाले [उसके समय के हिसाब से सुधार या उसे हटाने की बात बिलकुल नहीं करते ]
    २. क़ानून को हर बात सोल्यूशन मानने वाले
    ये दोनों समस्या बढाते हैं [कम नहीं करते ]

    इसे प्रथा को रोकने को ट्राई करेंगे तो ये सुनने को मिलेगा
    -- उम्र कम है और इस आधार पर समझ भी
    -- " तुम होते कौन हो बीच में बोलने वाले " ?

    अब मेरा ओबजर्वेशन :
    मैंने अक्सर लड़के की माँ को दहेज़ लेने के प्रति बहुत ज्यादा सेंसिटिव देते पाया है

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  5. *बहुत ज्यादा सेंसिटिव पाया है

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  6. Doctor hone ke bavjood intni jakdan.....
    bahut badiya post hai..

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  7. १. चाहे लड़की कितना भी पढ़ लिख जाये, शादी उसकी पहली ज़िम्मेदारी होती है. डॉक्टर है तो क्या अपने संस्कार और परम्परों को भूल जायेगी? मैं एक साठ वर्षीया डॉक्टर को जानती हूँ - जिन्होंने कई बार अपने बेहद abusive पति को छोड़ने की कोशिश करी. घर के बढे बूढों ने समझा बुझा कर वापस भेज दिया की वो ''adjust " करे. अब वो कहतीं हैं की और नहीं सहा जाता, लेकिन काम तो उन्होंने (उनके पति ने) कभी जमने नहीं दिया (Gynecologist ) - उनकी बहन के कहने पर मैंने एक पोस्ट भी लिखी थी उनके बारे में.

    बात qualifications की नहीं होती , सिर्फ सोच की होती है. कम पढ़ी लिखी महिलाएं हिमत दिखा देती है. यदि घर पर कुछ support मिल जाये तो बहुत फरक पड़ता है. यदि support होता है तो अगले की मार पिटाई की इतनी आसानी से हिम्मत भी नहीं होती.
    मेरी कामवाली अपनी बेटी को घर ले आई थी, पहले घर लाई फिर सोचा की आगे क्या करना है. दोनों मज़े से काम करतीं थी , किसी की ज़रुरत नहीं. जो कुछ बोलते , तो उन्हें अच्छे से सुना देती थी. उसका कहना था, शादी ज़िन्दगी से ज्यादा ज़रूरी नहीं होती.

    २. यदि यह क़ानून बना दिया की दहेज़ देने वाले भी जेल जायेंगे तो कल को कोई लड़की रिपोर्ट ही नहीं लिखवायेगी. बात सिर्फ दहेज़ की नहीं होती, किसी को उत्पीडन देना गलत है, लेकिन हमारे समाज में थोड़ी बहुत मार मिटाई, कुछ ज्यादा काम करवा लेना, ठीक से खाना न देना, कपड़ों, घूमने फिरने या अपने पैसे खुद खर्च कर लेने पर रोक टोक होना - इन बैटन को तो ऐसे ही ताल दिया जाता है, की बड़े हैं, या बड़ा न सही पति परमेश्वर है, adjust कर लो.
    बाद में यह सोचना की पहले action क्यों नहीं लिया - क्या फायदा.

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  8. हो सकता है कुछ लड़कियां भी दहेज़ को अपना हक़ समझती हों, क्योंकि ज़्यादातर उन्हें अपने माता पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता. या सिर्फ लालच में. पर ज़्यादातर लड़के के माँ बाप और लड़के भी, इसे अपना पारंपरिक हक समझते हैं. यानि, "यह तो समाज का नियम है! "

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  9. मानसिकता और सोच की बात है। दहेज न लेने-देने के अलावा ऐसे लोगों से सामाजिक संबंध भी तोड़ना चाहिए जो दहेज लेते हैं।

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  10. Instead of writing a long comment, I would like to put this link here.

    http://rewa.wordpress.com/2008/12/21/dowry-and-bride-go-hand-in-hand/

    I feel proud when I say I have not given dowry for my marriage. I was very strict about it and I have told my parents that I would not marry with a person who demands dowry. They understood my feelings well and supported me. "Kathni aur karni" mein difference hone ke karan hi dowry jaisi issue samaj se nahi ja pa rahi hai.

    Regards.

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  11. मुझे तो लगता है कि माँ बाप ही ज्यादा दोषी होते है जो बेटियों को हर हाल में ससुराल में ही रहने के लिए और सब कुछ सहने के लिए मजबूर करते है |

    कितनी लड़किया है जो दहेज़ के बिना विवाह करना चाहती है किन्तु कर नहीं पाती क्योकि कोई तैयार ही नहीं होता है जो होता है वो उस लड़की के योग्य नहीं होता है विवाह के लिए और इस चक्कर में परिवार और भी परेशान होता है |

    जी हा कई बार माँ बाप बेटियों से कुछ बाते छुपा लेते है जब वो ये जानते है कि बेटी इस बात का विरोध करेगी और कई बार तो माँ बाप झूठ बोल कर बेमेल विवाह तक करा देते है बिना बेटी को पूरी जानकारी दिए क्योकि जानते है कि बेटी को बताया तो यो राजी नहीं होगी |

    लड़किया कितनी भी पढ़ी लिखी हो जाये सभी का दबाव पति के साथ रहने के लिए ही होता है चाहे वो कैसा भी हो यदि वो उसका साथ छोस दे तो माँ बाप भी बेटी का साथ नहीं देते है |

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  12. मैं अंशुमाला से सहमत हूँ.

    "लड़किया कितनी भी पढ़ी लिखी हो जाये सभी का दबाव पति के साथ रहने के लिए ही होता है चाहे वो कैसा भी हो यदि वो उसका साथ छोड़ दे तो माँ बाप भी बेटी का साथ नहीं देते है | "

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  13. दहेज़ मज़बूरी में ही नहीं,फैशन में भी दिया जाता है। इस प्रकार प्राप्त राशि और सामग्री कमज़ोर ही नहीं,मज़बूत आर्थिक स्थिति वालों को भी अच्छी लगती है। दहेज के कारण शादी ठुकराने या बारात वापस करने की घटनाएं भी कमज़ोर आर्थिक स्थिति वाले वधू पक्ष की ओर से ही देखी जाती हैं। अन्यथा तो नेताओं और उद्योगपतियों के बच्चों की शाही शादी के चर्चे पहले पन्ने पर होते हैं। हमारे समाज में दूसरा विवाह सहज नहीं है और परित्यक्ताओ अथवा तलाकशुदा लोगों का जीवन और भी दुष्कर होता है। इसके कारण ही,सब जानते हुए भी माता-पिता लड़की का साथ नहीं दे पाते और पहले विवाह को ही हर हाल में बचाने पर ज़ोर दिया जाता है। सामाजिक ताना-बाना ऐसा है कि लड़कियां भी दहेज साथ ले जाने पर अधिक सुरक्षित महसूस करती हैं खुद को। लाखों वर और उनके माता-पिता जेल जा चुके हैं। वधुओं और उनके माता-पिता के जेल जाने के मामले बिरले ही होते हैं। दहेज कानून के दुरूपयोग पर सुप्रीम कोर्ट तक चिंता जता चुका है।

    वर-वधू के मन में अपने विवाह के प्रति उमंग,उत्साह और उल्लास का एक अलग संसार होता है,मगर दहेज के इस कुचक्र में उन भावनाओं की ओर किसी का ध्यान नहीं होता। महिलाओं की आर्थिक सम्पन्नता से कहीं ज्यादा,अंतर्जातीय विवाह इसका समाधान प्रतीत होता है।

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  14. @ कुमार राधारमण
    यह point ध्यान देने योग्य है.
    "...महिलाओं की आर्थिक सम्पन्नता से कहीं ज्यादा,अंतर्जातीय विवाह इसका समाधान प्रतीत होता है। "

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  15. मुझे लगता हैं अगर किसी लड़की के साथ वो होता हैं तो इस डॉ लड़की के साथ हुआ हैं तो कहीं ना कहीं उसके माँ पिता इसके लिये जिम्मेदार हैं और सबसे पहले सजा का प्रावधान उनके लिये ही होना चाहिये . कोई मेरी बात को कितना भी निर्ममता से भरा हुआ क्यूँ ना कह ले लेकिन लड़की के माता पिता जबरन अगर अपनी लड़की को मरने के मजबूर करते हैं तो वो मर्डर की तरह ही हैं

    किसी को इतना लाचार करना की उसके लिये जीने के सब रास्ते ही बंद कर दिये जाये इस से पैदा होते ही मार देना ज्यादा बेहतर विकल्प हैं कम से हलाल की तरह बलि के लिये तो नहीं तैयार किया जाता हैं

    और वो लडकिया जो पढ़ लिख कर भी शादी करते समय अपने माँ पिता से बात नहीं करती कहीं ना कहीं गलत हैं क्युकी वो एक सामजिक सुरक्षा कवच की तरह शादी का इस्तमाल करती हैं

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  16. अब मेरा ओबजर्वेशन :
    मैंने अक्सर लड़के की माँ को दहेज़ लेने के प्रति बहुत ज्यादा सेंसिटिव देते पाया है

    gaurav
    bilkul sahii observation haen
    par kyun is par bhi likhae

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  17. manoj

    bilkul jin parivaaro me bahu ko maraa jaataa haen unka hi nahin , un parivaaro kaa bhi bahishkaar ho jo apni beti ko martae daekhtae haen

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  18. "लड़किया कितनी भी पढ़ी लिखी हो जाये सभी का दबाव पति के साथ रहने के लिए ही होता है चाहे वो कैसा भी हो यदि वो उसका साथ छोड़ दे तो माँ बाप भी बेटी का साथ नहीं देते है | "

    kyun nahin phir kam sae kam wo ladkiyaan jo padhii likhi haen aur kamatii bhi haen apnae liyae avaaj uthaati dikhae

    marnaa , marna aur aatmhaya ko jo majboor hotii haen unko samaj ki galti sae jyadaa apni galti daekhni hogi

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  19. दहेज कानून के दुरूपयोग पर सुप्रीम कोर्ट तक चिंता जता चुका है।
    ji haan yae ab ek tool bantaa jaa rahaa haen ladkae waalo ko sabak sikhane kae liyae aur gaehun kae saath ghoon bhi pees raahaa haen

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  20. यदि यह क़ानून बना दिया की दहेज़ देने वाले भी जेल जायेंगे तो कल को कोई लड़की रिपोर्ट ही नहीं लिखवायेगी.

    once we have some kind of law against people who give dowry then only some change will come
    how and when but we need one
    we need to make the parents of girls value their daughters

    they educate their daughters and make them ready for slaughter

    daughter and slaughter some rythem ,

    seema khatam hogyii haen ab sehansheeltaa ki ??

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  21. कभी कभी लड़कियां दहेज़ के लेने के लिए खुद हाँ करती हैं,
    क्योंकि उनका मानना होता है के ये पिता के संपत्ति में से उनका हिस्सा है |

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  22. .
    .
    .

    क्या दहेज जैसी कोई समस्या पश्चिम के देशों में या विकसित विश्व में है?... मात्र परंपरा के नाम पर हमारे यहाँ इसके जिन्दा रहने का एकमात्र कारण है 'लालच'... हमें हरामखोरी की आदत सी है... बिना कोई विशेष श्रम किये यदि विवाह जैसे मौके पर एकमुश्त ऐशोआराम के सारे सामान,जेवर और पैसे भी मिल जाते हैं तो यह शॉर्टकट सभी को सहज लगता है व सभी उसे परंपरा के नाम पर जस्टीफाई करने लगते हैं... कुछ लड़कियाँ अपने विवाह के मौके पर माता-पिता से लड़-झगड़ कर ज्यादा से ज्यादा दहेज ससुराल ले जाने के जुगाड़ में भी रहती हैं... दहेज की यह परंपरा हम सभी को अपना असली चेहरा दिखाता निर्मम आईना है...

    मुझे तो जल्दी ही कुछ भी बदलने की उम्मीद नहीं दिखती... यह प्रथा उन समाजों में भी पैर पसार रही है जहाँ इसका प्रचलन नहीं था... पर मैं गलत भी हो सकता हूँ, क्योंकि मुझे अन्ना के आंदोलन में भी एक बेईमान, हरामखोर, दोगली कौम को झकझोर कर सीधे रास्ते पर चलाने का माद्दा नहीं दिखता, जबकि कई इसके प्रति आश्वस्त हैं।



    ...

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  23. प्रवीण शाह से सहमत |
    इसे बदलने के लिए तो युवाओं को खुद पारिवारिक बंधन तोड़कर आगे आना होगा ज
    और माँ बाप की इच्छा के विरुद्ध जाकर विवाह करना होगा |
    पर तब वही माँ बाप और समाज उस संतान को भारतीय परम्परों की दुहाई देंगे |
    हमारे समाज को स्वतंत्र सोच वाले युवा पसंद नहीं , उसे वही पसंद हैं , जो आँख बंद कर
    माँ बाप की आज्ञा मानते रहे और पीढ़ी दर पीढ़ी बिना सोचे समझे परमपराओं और कुरीतियों को आगे बढ़ाते रहें |
    इसका नुक्सान आज साफ़ दिखाई देता है, बिना सोचे समझे हम पश्चिम जगत की बुराइयां तो अपना रहे हैं,
    मगर उनकी अच्छाइयों की और देखते तक नहीं |

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  24. अगर लड़की आत्मनिर्भर है जैसा की इस केस में है की वो डॉक्टर है अपने पैरो पर खड़ी है तो.... अगर खुद उसके अपने माता पिता भी ससुराल में ज्यादती बर्दाश्त कहने को कहते हैं तो उसे उनकी भी खिलाफत करनी चहिये ..... सुसाइड नोट लिखवाने और छत से फेंक देने की घटना का क्रम बहुत पहले शुरू हुआ होगा ...यह सब एक दिन में नहीं होता ...सच कहूँ तो एक पढ़ी लिखी समझदार लड़की को शादी के बाद गिनती के दिनों में ही समझ आ जाता है पति और परिवार किस हद तक जा सकते हैं......? जहाँ तक दहेज़ लेने और देने की बात है दोनों पक्ष बराबर के दोषी हैं..... कई बार अच्छे पढ़े लिखे कमाऊ लड़कों को खुद दहेज़ लेने की पड़ी रहती है ..... जीवन साथी कैसी होगी इसकी नहीं ... अरे कमाती है दहेज़ नहीं तो क्या ज़िन्दगी भर तनख्वाह लाएगी ऐसी बातें भी की जाती हैं.... यानि की हर हाल में लड़की पैसा लाये..... यहाँ मैं नौकरी के खिलाफ नहीं हूँ ...पर सोचती हूँ की जब शादी ही पैसे की सोच से की जा रही है और वो लड़की किसी वजह से नौकरी न कर पाए .... किसी दुर्घटना की शिकार हो जाये ..अपनी मर्जी से कुछ समय घर पर रहना चाहे ..तो....?

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  25. नहीं - दोनों की सजा बराबर नहीं हो सकती - क्योंकि दोनों का जुर्म एक बराबर नहीं है | एक ने लिया है - लालच के कारण - दूसरे ने दिया है - सामाजिक दबाव / मजबूरी के कारण | और कर्म को पाप और पुण्य कर्म खुद नहीं बनाता, उसके पीछे की वजह भी देखी जानी ज़रूरी होती है |

    * क्या वनवास में दशरथ, कैकेयी और मंथरा - तीनो की गलती बराबर नहीं है ? सजा बराबर ?
    * क्या देवकी के ६ पुत्रों की हत्या में कंस और वासुदेव (जिन्होंने ब्याह के समय वचन दिया था कि देवकी को जीने दो, बच्चे मैं खुद तुम्हे दे दूंगा) दोनों की हाँ नहीं थी ?
    * क्या अग्नि परीक्षा के होने के लिए राम और सीता दोनों को blame किया जाता है ?
    * क्या रिश्वत देने और लेने वाले - दोनों को एक सजा होती है ?

    नहीं - स्वार्थ के कारण किये गए जुर्म, और मजबूरी में हुए जुर्म दोनों की सजा बराबर नहीं होती | manslaughter में भी किसी की जान गयी, और purposeful premeditated murder में भी - दोनों की सजा एक नहीं है |

    मैं जानती हूँ कि यह कहा जाता है कि जुर्म करने वाला और सहने वाला - दोनों बराबरी के अपराधी हैं - पर मुझे यह गलत लगता है |

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  26. अपने देश में सिर्फ़ दस प्रतिशत लोग ही दहेज के भूखे होंगे, बात वहाँ बिगडती है जब लडकी वाले अपनी हैसीयत से ज्यादा परिवार देखते है, अगर-अगर लडकी वाले अपने से कम गरीब/पैसे वाले घरों में शादी करे तो ये समस्या नहीं आयेगी, सामाजिक दबाव/मजबूरी का कारण तो एक बहाना भर ही है, दहेज भी रिश्वत का ही एक रुप है जो हमारे समाज में है, दहेज रुपी भ्रष्टाचार की बदौलत लडकी वाले अपने से बडे घरों में रिश्ते की जुगाड लगा लेते है। जरा अदालत में जाकर देखिए वहाँ आपको/सभी को जितने भी मुकदमे मिलेंगे 95 प्रतिशत फ़र्जी है, कही किसी का अहम, कही किसी का नखरा, रिश्तों के बीच आ जाता है। जो सीधे अदालत जा पहुँचता है वहाँ भी जबरदस्ती समझौता कराने की कोशिश की जाती है। जरा गौर करो इस बात पर कि दहेज शादी के वक्त माँगा जाता है या बाद में, जब लडके वाले को पता होता है कि लडकी वाले की हैसियत ही नहीं है देने की तो वो भला क्यों माँगेगा, लेकिन आपसी विचार ना मिलने से साल-दो साल बाद दहेज के मुकदमे (जो एकदम झूठे होते है) ठोक दिये जाते है, जिसके बदले लडके वालों से उल्टा मोटा पैसा माँगा जाता है दहेज मुकदमे की आड में, जरा एक बार आँकडे देख लो कि जिला कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक कितने दहेज के मुकदमे गये होंगे। आखिर में एक बात दहेज लेना व देना दोनों बराबर के जुर्म है भ्रष्टाचार रिश्वत का रुप है।

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