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July 04, 2009

पत्नी की नौकरी या बेटी को पढाने का साक्ष्य क्यूँ चाहिये अपनी सोच को सही साबित करने के लिये ?

ऐसा क्यूँ होता हैं की जब भी हम किसी के साथ वैचारिक मतभेद पर बात करते हैं तो तुंरत सुनाई देता हैं ,

" देखिये मै दकियानूस नही हूँ , मै उनमे से नहीं हूँ जो नारी को समान नहीं मानते या नारी का सम्मान नहीं करते । मेरी तो पत्नी भी नौकरी करती हैं , और मेरे एक बेटी भी भी जिसे मै पढ़ा भी रहा हूँ " ।

पत्नी की नौकरी या बेटी को पढाने का साक्ष्य क्यूँ चाहिये अपनी सोच को सही साबित करने के लिये ?

9 comments:

संजय बेंगाणी said...

एक पुरूष के लिए बहुत मुश्किल होता है, यह बताना कि वह महिला अधिकार विरोधी नहीं है. आप ही बताए जब आरोप लगे तो वह क्या सबूत दे? जरूरी नहीं कि हर एक की पत्नि बाहर काम करे ही. या फिर जो बाहर काम करती है वह घर आ कर मार खाए ही नहीं. कई बार शारिरीक के ज्यादा मानसिक कष्ट अधिक भोगती है महिलाएं. मगर पुरूष जो अच्छे बच्चे है वे क्या सबुत दे? (क्यों दे?)

Shiv Kumar Mishra said...

ऐसा साक्ष्य देने की ज़रुरत तो कभी नहीं पड़नी चाहिए. कभी पड़ी भी नहीं.

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

रचना जी, हमारी टिप्पणी को अन्यथा लेने की जरूरत नहीं क्योंकि हम देख रहे हैं कि महिलाओं से सम्बन्धित मुद्दे पर हमारी टिप्पणी को कुछ गलत अर्थों में देखा जा रहा है।
पुरुष को साक्ष्य देने की आवश्यकता इस कारण से पड़ती है ताकि कुछ अति आधुनिक महिलावादी लोग उसे दकिया नूसी नहीं वरन् महिला विरोधी न साबित कर दें।
पिछले दिनों बात उठी कि स्त्री स्त्री की विरोधी है और उसके लिए सास, ननद, जिठानी को उदाहरण बनाया गया। इस बात पर महिलाओं के कुतर्क कि यह इस कारण होता है क्योंकि इनके केन्द्र में पुरुष है, पति है।
क्या वाकई महिलाओं के प्रत्येक शोषण के एि पुरुष ही जिम्मेवार है?
लोग क्या कहते हैं ये उन्हें साबित करने की जरूरत है जिनको लोग कुछ देते हों। पति-पत्नी के बीच का मामला वही निपटायें तो बेहतर।
वैसे हमारे भी एक बेटी (पत्नी भी एक ही है) हमें कोई जरूरत नहीं किसी को कोई साक्ष्य देने की खास तौर से उन महिला समथ्ज्र्ञकों को जो सिर्फ इसी जुगाड़ में रहतीं हैं कि कौन (महिला-पुरुष) क्या कर रहा है?

रचना said...

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
ये एक वैचारिक पोस्ट मात्र हैं क्युकी मेरा मानना
हैं की पत्नी की नौकरी या बेटी की शिक्षा दोनों
एक आम काम हैं और इन बातो को तर्क मे ला कर
कोई बात नहीं प्रोवे या दिस्प्रोवे होती हैं आप का कोई भी कमेन्ट इस पोस्ट का आधार नहीं
हैं . इस पोस्ट का आधार हैं वो वार्तालाप जो कई
बार होता हैं बहुत से मित्रो से , जो ब्लॉगर भी
नहीं हैं

डा.राष्ट्रप्रेमी said...

वैसे एक कहावत है 'प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं' अतः मै तो वैचारिक विमर्श में बहुत अधिक प्रमाणों की आवश्यकता महसूस नहीं करता.

पतिनुमा प्राणी said...

हा हा।
जब महिला साक्ष्य मांगती है कि "घर में माँ बहन नहीं है क्या?" तब?

Dr. Amar Jyoti said...

दकियानूस होना या प्रगतिशील होना आचरण से ज़ाहिर होता है न कि सबूतों के विज्ञापन से। वैसे भी सभी कामकाजी महिलाओं और पढ़ने वाली लड़कियों के परिवारों के पुरुष दकियानूसी नहीं ही होंगे ऐसा कैसे कहा जा सकता है। और अन्तिम बात- सबूत किसे दिया जाय और क्यों?

डा.राष्ट्रप्रेमी said...

जब हम किसी विशेष क्षेत्र में कमजोर पड़ते हैं , तो विभिन्न प्रमाण जुटाकर अपने आप को ताकतवर प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं.

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

यही व्यथा है.. शेष टिप्पणियाँ खुद स्पष्ट करती हैं