नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

September 15, 2013

क्यूँ नहीं लड़की को ये अधिकार हैं की वो देख सके की और पसंद और ना पसंद कर सके अपने भावी घर को।

जब भी हमारे समाज में किसी के विवाह की बात चीत होती हैं तो आज भी "लड़की" के घर आ कर लड़की और  को "लड़के " वाले देखते और पसंद करते हैं। लड़के को भी लड़की के घर आ कर उस से बातचीत करवा कर दोनों की पसंद ना पसंद को आंका जाता हैं।  ये परम्परा सदियों से चल रही क्युकी लड़की लो "पराया धन " कहा जाता हैं।  आज कल तो विदेश में बसे लड़को से भी शादी होती हैं और परम्परा यही चलती हैं।
अभी हमारे एक मित्र जो अमेरिका में रहते हैं लेकिन हैं मथुरा के आस पास के उनका विवाह भी हुआ , मित्र ने अपनी पत्नी का वीसा भी भेजा लेकिन मित्र के माँ पिता चाहते थे लड़की जो दिल्ली के किसी ऍम अन सी में कार्य रत हैं वो पहले कुछ दिन मथुरा रहे और फिर अमेरिका जाए।  लड़की ने अपना दिया त्याग पत्र वापस कर दिया और अपने पति से कह दिया की वो मथुरा अकेली नहीं रह सकती वो , जब रहेगा वो भी रहेगी पर अन्यथा नहीं और इस लिये वो नौकरी नहीं छोड़ेगी और अमेरिका का वीसा उसे नहीं चाहिये।  ६ महीने की लड़ाई , मान मुन्नवल के बाद लडके ने दुबारा वीसा भेजा और लड़की अमरीका गयी बिना माथुर गए।  हमारे मित्र वुमन एम्पावरमेंट के समर्थक हैं लेकिन अपने समय में उनकी इच्छा यही थी की लड़की पहले उनके परिवार के साथ मथुरा में रहती लेकिन क्युकी वो समझदार हैं उन्होंने जिद्द नहीं की और अपनी शादी को डाइवोर्स से बचाने के लिये लड़की को सीधा अपने पास ही बुला लिया।


एक लड़की को अपना घर छोड़ कर जाना होता हैं लेकिन शादी से पहले लड़के वाले उसके घर आ कर उसका घर देखते हैं।  परम्परागत तरीके में लड़की विवाह से पहले अपनी होने वाली ससुराल नहीं जा सकती हैं।

जब रहना बसना दूसरी जगह लड़की को होता हैं , तो उसकी पसंद का घर हैं या नहीं ये उस को दिखा कर पूछना जरुरी क्यों नहीं समझा जाता हैं।  वर पक्ष क्यूँ कन्या पक्ष के घर आकर निरिक्षण परिक्षण करता हैं जबकि वर को तो वहां रहना बसना हैं ही नहीं।

विवाहित पुत्री अमूमन अपने माँ पिता से शिकायत करती पायी जाती हैं की घर बहुत छोटा हैं , वहाँ सुविधा नहीं हैं , वहाँ मेरे लिये जगह नहीं हैं , मेरा सामान खराब हो रहा हैं , रसोई छोटी हैं , बाथरूम कंबाइंड है या सबसे बड़ी शिकायत की विवाह के बाद भी उसको अपना घर नहीं मिला हैं वो तो सास का घर हैं और सास अपने हिसाब से उसको चलाती  हैं।  

ये सही हैं की माँ पिता वर पक्ष का घर देख कर ही शादी की बात करते हैं लेकिन उनकी अपेक्षा और उनकी पुत्री की अपेक्षाओं में अंतर होता हैं।

मुद्दे की बात सिर्फ ये है की क्यूँ नहीं लड़की को हमारी परम्पराओ ने ये अधिकार दिया हैं की वो जहां अपना घर बसाना चाहती हैं वहाँ जा कर वो देख सके की वो वहाँ बसना भी चाहती हैं की नहीं।

क्यूँ नहीं लड़की को ये अधिकार हैं की वो देख सके  और पसंद और ना पसंद कर सके अपने भावी घर को क्युकी रहना और बसना दूसरी जगह उसको हैं।

शायद आप सब को ये सब बाते बहुत छोटी छोटी लगेगी पर क्या डाइवोर्स के कारण ये सब बाते ही नहीं बन जाती हैं।
हो सकता आप कहे लड़की को तो समझोते करने ही होते हैं पर  ये समझोते अब लड़कियां नहीं करना चाहती हैं।

बस इतना ही

19 comments:

  1. बिलकुल सही कहा है आपने, जब रहना लडकी को है तो उसे न सिर्फ घर देखने का बल्कि रिश्ता पक्का हो जाने के बाद कुछ दिन रहने का भी अधिकार होना चाहिए,ताकि बाद में कोई दिक्कत न हो

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  2. यह एक सामाजिक कुरीति है जिसके खिलाफ बोलते बहुत हैं लोग लेकिन जब समय आता है तो समाज के खिलाफ जाके कुछ कर नहीं पाते क्यूँ की बिल्ली के गले में घंटी पहले कौन बांधेगा ? कहीं इस समाज सुधार के चक्कर में अपनी बेटी घर बैठी ना रह जाये इत्यादि |
    .
    बढ़िया लेख ,कोशिश जारे रखें

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - सोमवार - 16/09/2013 को
    कानून और दंड - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः19 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  4. लड़कियाँ ऐसा नहीं करेंगी।अब वो जमाना गया कि सास ससुर या दूसरे ससुरालिये खराब है तो लड़की की जिंदगी ही खराब हो जाएगी।अब तो लडकियाँ इस बात को अच्छी तरह समझती है उनसे या उनके माता पिता से पूछ कर देखिए सब यही कहेंगे कि लडका अच्छा होना चाहिए बाकियो से हमें क्या लेना देना।लडकियाँ भी लडके की कमाई,अच्छी नौकरी और उसकी शक्ल सूरत ही देखती है क्योंकि आजकल सब शादी के बाद अलग गृहस्थी बसा लेते है।कमाई होगी तो अलग घर भी बन जाएगा और सास ससुर कौनसा हमेशा बैठे रहने वाले है।और पसंद नापसंद लडके लडकियों से कोई नहीं पूछता बल्कि वो खुद इनडायरेक्टली बता देते है।और माँ बाप उसे मान भी लेते है क्योकि बाद मे फिर उन्हे ही परेशानी होती है।जो संकोच कर जाते है उन्हें परेशानी होती है।वो लडके आज भी गिने चुने है जो लड़की के घर जा उससे मिलते है वैसे भी एक दो बार मे किसीको जाना नही जा सकता।और परम्परा है कि पहले लड़की वाले ही लड़के के घर जाते है।
    @अनिता जी,लडकी इसलिए नही रहने जाएगी क्योकि उसे भी पता है कि ऐसा करने से सिर्फ वह ही नही भावी ससुरालिए भी तो उसके बारे में और जानेंगे।क्या पता कोई छोटी गलती बडी बन जाए।जबकि उन्हे बस लड़के से मतलब होता है।

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  5. कोई भी ब्यवस्था या संस्था समय के साथ बदलता रहा है..मनुष्य ही वो एक मात्र जीव है जिसमे बच्चो की परवरिश माता और पिता दोनों मिलकर करते है.. मुझे लगता है की अब इसमें भी बदलाव की जरूरत है - जैसे जानवरों में सिर्फ माँ की द्वारा ही बच्चो की सही लालन पालन हो जाता है उसी तरह मनुष्यों में भी होना चाहिए, आखिर मनुष्य तो सबसे बुद्धिमान प्राणी है. साइंस और सभ्यता ने इतनी तरक्की कर ली है की बच्चो को अब पिता की जरूरत नहीं है - इसका सीधा फायदा ये होगा की शादी या विवाह नामक संस्था की कोई भी आवस्यकता नहीं रहेगी.. आप अगर ध्यान से देखेंगे तो ये एक परिवार ही है जहाँ स्त्रियाँ सबसे ज्यादा व्यथित और प्रताड़ित हैं पहले अपने पिता द्वारा फिर अपने पति द्वारा - अगर हम ये परिवार की व्यवस्था को तोड़ देते हैं - जिसकी अब कोई प्रासंगिकता रही ही नहीं है ( नारी अब बेचारी नहीं है बल्कि अब वो भी स्वतंत्र और पूर्ण सक्षम है ) तो नारियों की स्थिति में व्यापक बदलाव आएगा. कई बुद्धिमान नारिया अविवाहित रह कर ना सिर्फ अपना स्वतंत्र जीवन का आनंद ले रही है बल्कि वो एक मिसाल कायम कर रही है बदलाव की दिशा में. नारियों की वर्तमान स्थिति के लिए पुरुष के साथ साथ वो महिलाये भी उतना ही जिम्मेवार है जो किसी पुरुष की पत्नी बनकर बिना कोई टैक्स चुकाए (क्योंकि वो कोई पैसा नहीं कमाती है) खुश रह और खुश हो रही है - ऐसी पुरुष-आश्रित नारी के वजह से ही समाज में तरह तरह की कुप्रथाओं का जन्म हुआ है. जिस तरह हमे गाय पालने की जरूरत नहीं है जब बाजार में दूध आसानी से मिल रहा हो (बिना किसी ओवरहेड के) , उसी तरह नैसर्गिक शारीरिक जरूरत की पूर्ति के लिए भी शादी की कोई जरूरत नहीं है. यकीन करिए - विवाह की व्यवस्था ही अपने आप में महिलाओं की गुलामी और बदहाली का सबसे बड़ा कारक है - आइये इसका बहिस्कार करे - जो अविवाहित हैं वो विवाह न करे , और जो विवाहित है वो तलाक ले कर एक स्वतंत्र जीवन और स्वस्थ समाज की नीव रखे. अपने बच्चो को भी शादी ना करने की सीख दे.

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  6. एक महाशय अपने घर में बिना ताला लगाये ही, शायद जल्दी में थे बाजार को चले गए.. जब वो वापस आये तो उनके घर में चोरी हो चुकी थी.. वो काफी दुखी हुए लेकिन उनके पड़ोसियों ने उनके साथ सहानुभूति दिखाने के साथ साथ उन्हें ताला न लगाने की बात और आदत के लिए उनको नसीहत देते हुए कहा की "शर्मा जी ताला तो हम अपने घर पे ही लगाते हैं , चोरो के घर पे नहीं" .. इतना सुनना था की शर्मा जी आग-बबूला हो गए.. और अखबारों का हवाला देते हुए कहा की चोर तो बैंको जैसे जगह में भी जब चोरी कर लेते हैं, और पिछले साल तो वर्मा जी के यहाँ भो तो चोरी हुई थी जो एक नहीं चार चार ताला वो भी गोदरेज वाला लगाने के बाद ही कही जाते थे.. तो हमारे ताला लगाने या न लगाने से क्या होता !!! लेकिन हां मेरे घर में चोरी होने से ये तो पता चल ही गया की लोग चोर को कम दोषी मान रहे हैं और ताला ना लगाने के कारण मुझे भी/ ही दोषी मान रहे हैं. ऐसी मानसिकता वाले लोगों की वजह से ही चोरी की घटना घटने के बजाये बढ़ते ही जा रही है. आइये हम सब मिलकर चोरो की मानसिकता को बदले और उनकी भी मानसिकता को बदले जो ताला न लगाने वाले को भी ही दोषी/ बेवकूफ मानते हैं. आईये हम ट्रैफिक नियम का पालन करना बंद करे क्योंकि जो ट्रैफिक नियमो का पालन करते हैं दुर्घटना तो उनके साथ भी होती है ..हम अपने घर के बालिग़ नौकरों का मोबाइल फ़ोन चेक करते रहे की कहीं वो पोर्न तो नहीं देखता है - क्या वो पोर्न की एक्टर के साथ बलात्कार कर सकेगा ?? फिर क्यों हम उसके प्राइवेट लाइफ में दखल दे - क्या अधिकार है हमारा ?? मोरल पोलिसिंग की क्या जरूरत है? आपको ये डर क्यों है की पोर्न देख कर उसकी वासना भड़क सकती है और चूँकि उसकी पत्नी उसके साथ नहीं है तो ऐसी स्थिति में वो कही अपनी हवस की पूर्ति के लिए कोई अपराधिक कदम ना उठा ले जिसका खामियाजा आपको उठाना पड़े. कोई सिनेमा के रुपहेले परदे पे कामोत्तेजक द्रश्य देख उत्तेजित हो जाता है तो इसमें किसका दोष है ? जबकि कोई सिनेमा के परदे से एक्ट्रेस को निकाल कर बलात्कार तो नहीं कर सकता - लेकिन हम सेंसर बोर्ड बनाकर सिनेमा पे अंकुश लगाने का काम करते हैं .. कोई कम कपडे में स्त्री को देख कर उत्तेजित हो जाता है और फिर उसके हवस की शिकार कोई और स्त्री भले ही वो पूरी ढकी क्यों न हो अगर हो जाए तो इसमें कम कपडे वाली स्त्री का कोई भी दोष नहीं हुआ की नहीं हुआ.. क्या हम किसी एक्ट्रेस को ये अधिकार नहीं देते हैं की वो अपने मर्ज़ी के कपडे पहन कर फिल्मो में काम करे. किसी सर्वे में ये आया था की छोटे कपडे के तुलना में साड़ी और सलवार-कुर्ते पहनी ज्यiदा महिलाओं के बलात्कार हुआ तो हम अगर ज्यादा से ज्यादा छोटे कपडे पहने तो बलात्कार में उतना ही कमी आ जायेगा. क्या सनी लियॉन, पूनम पाण्डेय या शर्लिन चोपड़ा के साथ कोई बलात्कार हुआ है ? नहीं ना ..अगर कोई इनके हरकतों या हॉट चित्रों से उत्तेजित होता है तो इसमें इन खुबसूरत बालाओं का कोई दोष नहीं है बल्कि दोष सिर्फ और सिर्फ उसका है जो अपने शरीर में उत्तेजना अनुभव करता है - आइये हम मर्दों को होर्मोन्स का इंजेक्शन देकर उसके उत्तेजना पर रोक लगाये और पूनम पाण्डेय को स्त्री स्वतंत्रता का एक प्रतिक माने...

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    1. प्रभात
      आप सीधे सीधे लिख सकते हैं की आप लड़कियों को बुरके में रखने , ताले में रखने के पक्ष में हैं , घुमा कर लिखने से मुद्दा बदल नहीं जाता हैं।
      संविधान और कानून को किनारे रख कर ब्यान देना हमारी फितरत हैं और बहुत से लोग तो ये मानते ही नहीं हैं की लड़कियों को संविधान और कानून समान अधिकार देता हैं

      आप का ये कहना की ताला ना लगे तो चोरी होगी , आप वजाइना पर ही ताला क्यूँ नहीं लगवा देते ।

      आप जैसो को सोच ही स्त्री अधिकारों की कभी बात होने ही नहीं देती

      और आप तो खुद ही पर्दे में हैं
      क्या सनी लियॉन, पूनम पाण्डेय या शर्लिन चोपड़ा के साथ कोई बलात्कार हुआ है ? नहीं ना

      please read more newspapers

      bipasha basu was molested and rakhi had to take her case to woman cell
      casting couch has forced many actress to leave the profession

      you have very little knowledge and that also is typical conditioned one

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    2. रचना,
      सीधे सीधे बात लिखना और समझना मेरे वश में नहीं है क्योंकि मेरी जानकारी काफी कम है, और किसी के जानकारी के स्तर को तुरंत ही भांप लेना और जग जाहिर करना ये तो सिर्फ आपके जैसों ज्ञानी के ज्ञान का परिचायक है. आपके ज्ञान का एक परिचय आपके इन लिखे वाक्यों से भी हुआ है - "क्या आप को ये नहीं दिखता ये सब बच्चे इस दुनिया में कैसे आये हैं , कितनी विवाहित महिला यौन हिंसा और रोज बलात्कार का शिकार होती हैं और जिसका परिणाम ये बच्चे होते हैं। एक एक घर में ६ -६ बच्चे कैसे पैदा होते हैं जहां पुरुष काम ही नहीं करता हैं और रोज अपनी बीवी का बलात्कार करता हैं।" http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2013/09/blog-post.html
      जहाँ तक ताले की बात है मैंने तो लोगों को सिर्फ और सिर्फ अपने घर में ही ताला लगाते देखा है ना कि किसी और के घर में. तो आप बिलकुल ही निश्चिन्त रहें कि मेरा कोई भी इरादा किसी और के घर में ताला लगवाने का नहीं है. मैं तो यही मानता हूँ कि ताला चोरों के घर में ही लगना चाहिए ताकि चोर अपने घर से ही ना निकल सके चोरी करने के लिए. आपका ध्यान मेरी इस बात पे भी जाना चाहिए था कि मैंने मर्दों को होर्मोंस के इंजेक्शन लगाने कि बात कही है ताकि उनमे उत्तेजना आये ही ना. आपने गाय के male child (बछड़ा) को बधिया (castration ) कर बैल बनाते और इस तरह सांढ़ बनने से रोकते हुए देखा ही होगा , क्यों नहीं हम उसी तरह का उपाय मर्दों पे भी करें , इस से उनकी मानसिकता में भी बदलाव आएगा जैसे एक बैल सांढ़ के तुलना में काफी शांत होता है और वो किसी का rape भी नहीं करता. हाँ मुझे इस बात कि चिंता जरूर होती है अपने बच्चों को ले कर कि कभी कोई आकर मेरे १६ साल के बेटे को अपनी बेटी (या पत्नी/ बहिन) के गर्भवती होने का जिम्मेवार न ठहरा दे और कानूनी कारवाई के पचड़ो में फंस जाऊं सो मैंने अपने बेटे के अंडरवियर में ताला लगाने की कोशिश जरूर कर रहा हूँ और ये उम्मीद जरूर करता हूँ की आपको इस बात में कोई परेशानी नहीं होगी. आपने महान नारीवादी लेखक माधुरी बनर्जी की लिखी एक बेस्ट selling बुक - "Losing My Virginity and Other Dumb Ideas " तो पढ़ी ही होगी..उस किताब को पढने के बाद और अपने आस पास के घटते घटनाओं को देखने सुनने के बाद मुझे तो यही लगता है की अपने बेटों के अंडरवियर में ताला लगाने का वक़्त जरूर आ गया है. मेरे एक colleague को नर्सरी में पढने वाले उसके बेटे के स्कूल से एक दिन बुलावा आया.. जब वो स्कूल गया तो उससे उसके बेटे की शिकायत की गयी की उसने एक साथ पढने वाली लड़की के साथ उसने कोई गलत हरकत की है. ऐसा शिकायत दरअसल उस बच्ची के माता पिता ने स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन से की थी. जब बच्चे और बच्ची से विस्तार में पूछा गया तो पता चला की उस बच्चे ने उस बच्ची को फीमेल-टॉयलेट में जाने का रास्ता दिखाया था. इस जमाने में एक नर बच्चा भी मर्दों की गिनती में आ गया है. अभी हाल ही में कांग्रेस के एक बड़े नेता, कोई सिंघवी की एक MMS सारे टीवी चैनल वालों ने दिखाया जिसमे वो किसी काफी पढ़ी लिखी महिला के साथ अन्तरंग पलों में थे लेकिन फिर भी लोगों ने उनको नहीं बख्शा - when 2 consenting adults were doing it in a private place why so much hue & cry? लेकिन उस महिला का नाम भी सामने नहीं आया - जबकि उस विडियो में ये बात आ रही थी के ये सब कुछ के बदले सिघवी साहब उस महिला वकील को जज बनवाने का भरोसा दे रहे थे...लोग अपने प्राइवेट लाइफ में कुछ भी करे लेकिन जब बात पब्लिक हो जाती है तो कानून और समाज अक्सर ही मर्दों के खिलाफ हो जाता है. एक नहीं हजारों इस तरह की घटनाए हमारे आसपास घट रही हैं, सब कोई जॉन अब्राहम की तरह लकी तो नहीं है की उनकी बिपासा उन पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज ना करे??

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    3. last line should be read as: - सब कोई जॉन अब्राहम की तरह लकी तो नहीं है की उनकी बिपासा उन पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज ना करे??

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    4. रचना,
      आपने लिखा है "पुरुष काम ही नहीं करता हैं और रोज अपनी बीवी का बलात्कार करता हैं।" http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2013/09/blog-post.html --
      देश के हजारों खदानों में जी-तोड़ मेहनत मजूरी करने वाले लाखों मर्द, देश के दुर्गम सीमाओं पर खून-पसीना बहाने वाले अनगिनत मर्द, रेलवे ट्रैक के रख रखाव करते हजारों हज़ार मर्द, सीवर और मेनहोलों में घुसकर जानलेवा और घिनौना काम करते अनगिनत मर्दों को आपने अपने बीवी का बलात्कारी बताया है (मुझे तो अब तक जानकारी थी की ये सारे मर्द अपने बीबी बच्चों को पालने के लिए ये सब काम करते हैं, लेकिन मेरी जानकारी जो कम ठहरी !!!)तो आप ही बताईये की अब इसका उपाय क्या है?? सबको बैल ना बना दिया जाए..
      हां मैं फिर दुहराता हूँ की मैं अपने growing बेटे (male child ) के अंडरवियर में ताला लगाने की कोशिस जरूर कर रहा हूँ. और हां मेरे अंडरवियर के ताले का चाभी मेरे बीबी के पास है. दुसरे ताला लगाते है या नहीं इस बात से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है. जब तक समाज में रावण और सूर्पनखा हैं, मुझे ताला (लक्ष्मण रेखा) की जरूरत महसूस होती रहेगी. रचना और रचना जैसी नारियां रावणों को मारने/ बिंधने में लगी तो हैं पर वो सबको ही रावण बता रही हैं और सुर्पनखाओं के existence को ही नकारने की प्रवृति है .. ये ठीक भी तो है - जो सूर्पनखा को पहचानेगा रावण तो वही होगा ...

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    5. आपने bolywood के कास्टिंग couch की बात की है लेकिन कुछ bolywood एक्ट्रेस का कुछ और ही विचार हैं
      for your reference:

      http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2010-01-19/news-interviews/28129056_1_lady-luck-couch-film-industry

      There is no casting couch in the Hindi film industry. There are a lot of misconceptions about the glamour world. You have to be part of it to know things. The fact is, only wannabes spread nasty rumours about the casting couch. There are so many of them wanting to make it big in the industry and they are even willing to pay any price to get there. When they fail to make it, they badmouth directors and producers. - Ishitta Sharrma, A Bolywood Actress

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    6. कानून और समाज अक्सर ही मर्दों के खिलाफ हो जाता है

      because woman has been oppressed for lon due to gender bais the law was made so that the woman feel protected
      amd when man know that they can be punished by law even if they are consenting adults then WHY DO THEY TAKE SUCH A RISK

      is it worth it ????

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    7. ये रिस्क नहीं बल्कि सुर्पनखाओं को ना पहचान पाने की कमजोरी है ...

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    8. प्रभात सिन्हा जी की टिप्पणियों में बैल-सांढ वाले जिक्र से यह प्रसंग ध्यान आ गया -

      "They smiled at each other and the silence between them was filled for a few moments by the lowing of cattle. Their calls were gentler now that the frenzy of the day had passed. It was Annie who first felt the need to speak. She looked at the bulls lazing in the last of the sunshine.

      'Who'd be a cow when you could lie around like these guys all day?' she said.

      Tom looked at them and nodded. 'Yep. They spend all summer making love and winter just lying around and eating.' He paused, considering something as he watched them. 'On the other hand, not too many of them get to do it. Get born as a bull and you've got a ninety-nine percent chance of getting castrated and served up as a hamburger. On balance, I reckon I'd choose being a cow.'"

      (from 'The Horse Whisperer' by 'NICHOLAS EVANS')

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  9. बात बलात्कार की जब भी होगी पुरुष और स्त्री के स्तर पर ही होगी। नाबालिग क्या कर सकते हैं आज कल दिख ही रहा हैं। क्या सिर्फ आज ही होता हैं , नहीं आज जो होता हैं वो दिखता भी हैं मीडिया की वजह से।
    नारी ब्लॉग पर आप को नारी हित ही दिखेगा और उसको पुरुष का अहित अगर आप समझना चाहते हैं तो वो आप अधिकार हैं जो कानून और संविधान ने आप को दिया हैं
    आप नारी ब्लॉग को ध्यान दे पढ़ रहे हैं इसके लिये शुक्रिया

    हां इस पोस्ट पर बलात्कार जैसी कोई बात नहीं हैं कमेंट्स यहाँ क्यूँ आ रहे हैं

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  10. नारी का हित पुरुष के अहित में ही छिपा है ऐसा अब व्यापक तौर से कुछ लोग बताने और मानने लगे हैं, क्योंकि परिवार/ विवाह को पुरुष ने अपने ही हित में बनाया है - इसलिए पुरुष और परिवार का अहित करना नारी के उत्थान के दिशा में एक संपूर्ण कदम है.. बलात्कार की घटनाएं तो एक उत्प्रेरक का काम कर रही है इस दिशा और प्रयाश में. आइये बलात्कार और बलात्कारियों की आड़ में सारे पुरुषो को रावण बताये. और कोई सुर्पनखाओं की ओर देखने की जुर्रत ना करे.

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    1. There is a post on shupnakha on this blog it self

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