नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

November 19, 2012

धनतेरस के दिन लडकियां बेची जाती हैं, "देव उत्थानी एकादशी " को इस "बिकी हुई " कन्या का विवाह उसके "खरीदार " से

धनतेरस यानी वो पर्व जो दिवाली से पहले आता हैं और जिस दिन "खरीदना " एक परम्परा हैं .
मेवात में भी ऐसी ही एक परम्परा हैं लेकिन "खरीद " होती हैं लड़कियों की .


मेवात राजस्थान में हैं और यहाँ धनतेरस के दिन लडकियां बेची जाती हैं , ये एक ऐसी कड़वी  सच्चाई हैं अपने आप में "ह्युमन ट्रेफिकिंग " की .

अलवर , भरतपुर, धौलपुर , मेवात जिलो में दिवाली से पहले , लड़कियों की खरीद फरोख्त में इजाफा देखा गया हैं . कारण है की धनतेरस पर दलाल , इन लड़कियों को देश के अन्य राज्यों से चुरा कर , खरीद कर यहाँ लाते है और मेवात के बड़ी उम्र के पुरुष इन लड़कियों को धनतेरस पर उन दलालों से खरीद लेते हैं . धनतेरस पर दलालों को अडवांस के तौर पर कुछ रकम दे दी जाती हैं { क्युकी धनतेरस पर खरीदना शुभ होता हैं } और उसके बाद  "देव उत्थानी एकादशी " { ये शादी / लग्न के लिये सबसे शुभ तिथि मानी जाती हैं } को इस "बिकी हुई " कन्या का विवाह उसके "खरीदार " से करवा दिया जाता हैं . विवाह वाले दिन दलाल को पूरे पैसे दे दिये जाते हैं . 


अब देखिये सब कुछ हिन्दू रीति रिवाज और परम्परा को ध्यान में रख कर ही किया जाता हैं . शुभ तिथि , शुभ लगन इत्यादि . पहले कन्या की ह्त्या , फिर कन्या को बेचना , फिर उसकी शादी अधेड़ उम्र के पुरुष से करवाना यानी एक लड़की का उद्धार . 



लड़कियों को अन्य राज्यों से उठाया जाता हैं , पुलिस के अनुसार ये सब इस लिये ज्यादा होता हैं क्युकी मेवात और आस पास के जिलो में लड़कियां की संख्या लड़को के अनुपात में कम हैं 


इस प्रकार के समाचार पढ़ कर  
"मेरा भारत महान " और
 "हमारी संस्कृति बड़ी अच्छी हैं " या
" पश्चिमी सभ्यता के अनुसरण से नयी पीढ़ी बिगड़ रही हैं "

इत्यादि कितने कह सकते हैं पता नहीं पर मुझे लगता हैं हम अपनी लड़कियों के प्रति बहुत ही असहिष्णु हैं . 
हमारे लिये हमारी लड़कियां केवल और केवल एक सामान हैं 
जिसकी चोरी की जा सकती हैं 
जिसको बेचा जा सकता हैं 
जिसको ख़रीदा जा सकता हैं 
जिसको रौंदा जा सकता हैं 
पैदा होने से ही रोका जा सकता हैं 


उफ़  


 





38 comments:


  1. बहुत ही शर्मनाक रिवाज :((

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  2. ऐसी शर्मनाक परंपरा पर अविलंब रोक लगनी चाहिए. देश का प्रशासन कहाँ है? हर लड़की को मानवीय गरिमा के साथ जीने का पूरा हक़ है.

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  3. बहुत ही घिनोना और शर्मनाक है आज के स्वतंत्र भारत में |पूर्व राष्ट्रमाता भी तो राजस्थान की हैं और सुना है वकील भी क्या वह ऐसा कोई क़ानून नहीं पास करवा सकी

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  4. "मेरा भारत महान " और
    "हमारी संस्कृति बड़ी अच्छी हैं " या
    " पश्चिमी सभ्यता के अनुसरण से नयी पीढ़ी बिगड़ रही हैं "
    Non sense! Reeti rivazo me koi ek aadh flaw ho to nazarandaaz karke ya badal ke apnaya jaye... lekin jis tarah ki cheeze jaanne ko mil rahi hai.. beemari se zyada kuch lagti nahi mujhe humari sanskriti.. kuch log bakhubi isse apna ullu seedha kar rahe hai.. aur baki sab anddhe hain..! aur prashn uthane wale to paagal kehlaate hi hain.

    हम अपनी लड़कियों के प्रति बहुत ही असहिष्णु हैं .
    I agree. :(

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    1. aur prashn uthane wale to paagal kehlaate hi hain.

      very true rashmi , you have seen how i have been targetted time and again on personal level just because i try to raise questions that make people think

      thanks

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  5. बुरे कामों की सफलता के लिए भी पञ्चांग देखना ऐसे दुराचारियों की ज़रुरत होती होगी ...
    संस्कृति के नाम पर जुआ, भाँग एक ज़माने से चला आ रहा है ...लेकिन लड़कियों की खरीद-फरोख्त, धन की देवी लक्ष्मी के नाम पर ...???
    बहुत ही घृणित है यह। ऐसे कृत्यों के पर्दा फाश के लिए महिला संगठनों और मिडिया कर्मियों को मुहीम चलाना होगा, हर हाल में।
    इतना जानती हूँ कि हरियाणा और पंजाब में झारखण्ड की बहुत लडकियां बेचीं गयीं हैं। बल्कि एक लड़की हमारे मोहल्ले की भी ऐसी ही बेचीं गयी थी, जो लगभग 20-22 साल के बाद अपने घर आई थी, 3 साल पहले। उसकी कहानी भी लिखूंगी बहुत जल्द।
    जागरूक करने वाली पोस्ट के लिए आभार।

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  6. आपने समाज का एक काला चेहरा और काली परंपरा को उजागर किया हैा यह भारत देश के एक हिस्‍से का दर्द है, तमाम हिस्‍सों से समय- समय पर इस तरह की अमानवीय परंपराओं व स्थितियों के बारे में सूचनाएं आती हैं लेकिन इस देश के रहनुमा व समाज के सफेदपोश जाने क्‍यों ऐसी स्थितियों से आंख चुराते हैं, यह देश का दुर्भाग्‍य हैा

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  7. लिखते हुए मन दुखता है मगर इस देश में भी समाज सेवा , धर्म , संस्कृति ,परंपरा के नाम पर बहुत कुछ अशोभनीय , घृणास्पद भी होता है .

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  8. मेवात क्षेत्र का कोई रहने वाला इस पर ज्यादा प्रकाश डाल सकता है, हम जैसों के लिये ये बात अजूबा ही है।

    अगर आपको लगता है कि इस प्रकार के समाचार पढ़कर कोई भी कहता होगा कि ’मेरा भारत महान " और "हमारी संस्कृति बड़ी अच्छी हैं " या " पश्चिमी सभ्यता के अनुसरण से नयी पीढ़ी बिगड़ रही हैं "’ ये आपकी गलतफ़हमी है। आप देश-संस्कृति को महान बताने वालों को नारी विरोधी\नारी उत्पीड़क सिद्ध कर रही हैं, जाने में या अनजाने में - you must be knowing it better.

    कुछ कूढ़मगज़ लोग अगर इन पवित्र माने जाने वाले दिनों की आड़ लेकर ऐसा कर भी रहे हैं तो क्या उसके लिये संस्कृति को जिम्मेदार बताया जाये क्योंकि धनतेरस पर कुछ खरीदने की परंपरा रही है? बतायेंगी आप कि किस धर्मगुरू, किस धार्मिक पुस्तक में लड़कियों की खरीदारी की वकालत की गई है?

    दिये गये लिंक में लड़कियों के हवाले से बताया गया है कि ’they were lured to Bharatpur on the pretext of a religious fair'
    In my view, it itself invites a debate. Why it is so easy to lure these girls in this era?

    Anyway, title of this post is quite catchy.

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    1. Lure the Girl is used in the report to simply signify the fact that when a person in position tries to use the position to make someone do something then its luring , and this report is about woman but human trafficking also involves male children and their plight is still unsaid and ignored because the percentage is less in comparison to girls


      the title is catchy so that people may understand the gravity of the situation .

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    2. @
      अगर आपको लगता है कि इस प्रकार के समाचार पढ़कर कोई भी कहता होगा
      -------
      मैने कहा हैं इस प्रकार के समाचार को पढने के बाद कितने कह सकते हैं

      मैने ये कहीं नहीं कहा की इस प्रकार के समाचार को पढ़ कर लोग कहते हैं

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    3. when we talk of word 'lure', you mean about what it simply signifies,
      when we talk of 'समाचार को पढ़ने के बाद...’, one should focus on what you said and not what it signifies.
      That's simply great.

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    4. this is because what i wrote was in hindi and what the link says is in english and both languages are totally different

      lure if expressed in hindi will have different meanings but if translated in hindi will have a different meaning which may be just one from the different meanings

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    5. रचना जी,
      आपसे बहस में मैं तो क्या कोई भी नहीं जीत सकता, आपके पास आपके हर प्वाईंट का जवाब है। न ही मैं आपसे शीर्षक हटाने की बात कर रहा हूँ न पोस्ट बदलन की। मैं सिर्फ़ पोस्ट पर अपना मत व्यक्त कर रहा हूँ और सहज जिज्ञासा। अच्छा नहीं ही लगेगा, बेशक मत छापियेगा।
      यहाँ चलन ऐसा है कि कोई कह दे कौआ कान ले गया तो हम अपना कान नहीं चैक करेंगे, कौये के पीछे भाग लेंगे और कहने वाला अगर थोड़ा सा रसूखदार हो फ़िर तो सवाल उठाना भी लठैती और पता नहीं क्या क्या समझ लिया जाता है। शायद इसीलिये सुन्दर, अति सुन्दर, या फ़िर शर्मनाक, दर्दनाक जैसे कमेंट करना सेफ़गेम मान लिया जाता है। या फ़िर हम आपस में कितना भी लड़ते झगड़ते रहें, विश्वास इतना जबरदस्त है कि आँख बंद करके सामने वाले की बात मान लेते हैं। ऊपर के लगभग सारे कमेंट्स देख लीजिये। मैं कहता हूँ, मेरे लिये ये जानकारी एकदम अजूबी है। कमेंट करने वाले कितनों ने ये सब अपनी आँखों से देखा है या सुना भी है? लेकिन कमेंट्स में दर्दनाक, शर्मनाक हो रहा है। यहाँ तक मुझे भी कुछ गलत नहीं लगता, गलत कुछ हो रहा है तो उसका विरोध होना ही चाहिये। लेकिन मुझे जिस बात से परेशानी है वो इस अपकर्म को रीति रिवाज, परंपरा, संस्कृति का हिस्सा मान लेने से है। ब्लॉग लिखना शुरू करने के बाद कुछ(बेशक एक दो ही) युवा मित्रों के कमेंट्स या मेल्स के जरिये जब मैंने ये जाना कि मेरी कही बात पर वो आंख मूंदकर विश्वास करते हैं तो मुझे इस बारे में विशेष रूप से सतर्क होना पड़ा कि कहीं मेरी कही किसी हल्की बात से उनके व्यक्तित्व में कोई कमी अपना घर न बना ले। कौन किसको अपना रोल मॉडल मान ले, कुछ नहीं कह सकते। उदाहरण के लिये नन्हीं लेखिका आपकी बहुत बड़ी प्रशंसक है,(& I had been a big fan of a scholar like her from the very beginning after going through her profile) मुझे विश्वास है कि बहुतों की तरह वो भी आपको नारी मामलों में आदर्श के रूप में देखती होगी। आज की टिप्पणी में उस स्कॉलर लड़की का यह कहना कि ’beemari se zyada kuch lagti nahi mujhe humari sanskriti.. kuch log bakhubi isse apna ullu seedha kar rahe hai.. aur baki sab anddhe hain..!’ ऐसी ही बातों पर आधारित होगा।

      मैं यह जानना चाहता हूँ कि
      - किस किस ब्लॉगर ने यह सब अपने आसपास देखा सुना है?
      - किस ग्रंथ, धार्मिक पुस्तक में इस रीति-रिवाज या परंपरा का पालन करने को कहा गया है?
      - कौन सा धर्म या समुदाय इसे सही ठहराने की कोशिश कर रहा है?

      ऐसे सवाल उठाने के खतरे बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। बड़े खतरे के बारे में जैसा कि ऊपर कमेंट में कहा ही जा चुका है - aur prashn uthane wale to paagal kehlaate hi hain.

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    6. संजय जी
      आप के मत का सम्मान करते हुए ही कह रही हूँ

      मै कोई रोल मॉडल नहीं हूँ
      अपने से कम उम्र लड़कियों से दोस्तों की तरह बात करती हूँ और उनके मन में क्या हैं वो यहाँ लिखती हूँ , यहाँ से पढ़ कर अगर उनमे से किसी को भी लगता हैं उनकी आवाज यहाँ हैं और इसलिये वो इस ब्लॉग पर अपना मत देती हैं तो ये इस ब्लॉग की सार्थकता ही हैं की वो आगे आने वाले पीढ़ी के मनोभावों को समझता हैं
      आप के लिये ही नहीं मेरे लिये भी ये खबर एक अजूबा ही थी , इतने पवित्र दिन इतनी घटिया हरकत , यही सोच कर पोस्ट और शीर्षक दिया की जो मुझे नहीं पता शायद औरो को भी ना हो , इसी विषय पर मेरे अलावा भी एक ब्लॉगर ने पोस्ट दी हैं लेकिन एक भी कमेन्ट नहीं था ???
      दिया हुआ लिंक एक न्यूज़ हैं और मेरी पोस्ट उस पर आधारित हैं नाकि उसका ट्रांसलेशन हैं .
      भारतीये संस्कृति में सब कुछ छुपा कर करने की परम्परा हैं कितना भी गलत क्यूँ ना हो हम संस्कृति के नाम पर धूल को बाहर निकलने की जगह कालीन के नीचे दबा कर सुंदर कालीन को देखने के शौक़ीन हैं . अपनी संस्कृति में भी कुछ खराब खोज कर उसको ऊपर ला कर उसमे सुधार की कोई भी सम्भावना हो तो कह दिया जाता हैं नयी पीढ़ी भारतीये नहीं पश्चिमी सभ्यता को देखती हैं
      @
      मैं यह जानना चाहता हूँ कि
      - किस किस ब्लॉगर ने यह सब अपने आसपास देखा सुना है?
      - किस ग्रंथ, धार्मिक पुस्तक में इस रीति-रिवाज या परंपरा का पालन करने को कहा गया है?
      - कौन सा धर्म या समुदाय इसे सही ठहराने की कोशिश कर रहा है?


      मेरी पूरी पोस्ट का विषय धर्म नहीं हैं , मेरी पोस्ट का विषय हैं की इस गंदे काम को करने वाले भी उन दिनों मे काम करते हैं जो दिन "शुभ" माने जाते हैं और ये ही बात लिंक मे भी हैं . आप ने पोस्ट को धर्म रीति रिवाज से जोड़ा हैं मैने नहीं .

      और अभी जो दो लडकियां शिव सैनिको की क्रोध का शिकार हुई हैं वो किस धर्म का पालन करते हुई हैं ??????

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    7. @ भारतीये संस्कृति में सब कुछ छुपा कर करने की परम्परा हैं कितना भी गलत क्यूँ ना हो हम संस्कृति के नाम पर धूल को बाहर निकलने की जगह कालीन के नीचे दबा कर सुंदर कालीन को देखने के शौक़ीन हैं .

      चलो धर्म न सही, 'भारतीय स्ंस्कृति' कहते है. धूल और कचरा घर मेँ सर्वत्र फैला सा नही है, तब यह भी एक विवेक है कि हम अपने धूल कचरे को प्रदर्शनीय न बनाएँ, ढिंढोरा पीट पीट कर जगत को नही दिखाते कि हम कचरे मेँ उठते बैठते है प्रमाण चाहिए तो आओ देखलो, दूसरा यह भी सावधानी की बात है जग यह धारणा न बना ले कि हमारे यहाँ सफाई नही होती, हम अतिथि के आने के पूर्व ही कालिन के नीचे दबा देते है, क्योंकि हम अच्छे से जानते है कालिन तले बची धूल भी साप्ताहिक, मासिक या फिर वार्षिक विशेष सफाई मेँ साफ कर ली जाएगी. किंतु दूसरो को धूल दिखाने सफाई की निन्दा करने मात्र से घर साफ तो नही हो जाएगा.

      कहने का अभिप्राय मात्र इतना है कि हमारी सँस्कृति से निन्दा, घृणा और ढिंढोरक अवगुण प्रदर्शन से सांस्कृतिक समस्या का समाधान तो नही होना है, उलट बुरा यह होगा कि हमारी संस्कृति निन्दनीय बनकर जग तो जग, हमारे स्वय के लिए घृणित अवश्य हो जाएगी.

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    8. उलट बुरा यह होगा कि हमारी संस्कृति निन्दनीय बनकर जग तो जग, हमारे स्वय के लिए घृणित अवश्य हो जाएगी.




      सबकी अपनी सोच हैं , आप को जो सही लगेगा आप वही कहेगे , मुझे जो लगेगा सही मै उस तरह बदलाव की और अग्रसर होना चाहूंगी . और मै खुद हिन्दू हूँ , भारतीये संस्कृति का हिस्सा हूँ , आज भी हिन्दुस्तान में ही , हूँ गाव देहात में दरिया बनवाती हूँ और वहाँ भी हर संभव कोशिश करती हूँ की उनको संखा कर उनकी पत्नी और बेटियों को भी उनके बराबर में बिठा सकूँ , आज उन गाव देहात के लोग अपनी बेटियों को दूर दराज होस्टल में रख कर पढ़ा रहे हैं और उन मे से बहुत से तो हिन्दू भी नहीं हैं लेकिन आप से क्या बहस करनी क्युकी विषय पर एक भी टिपण्णी ना करके विषय से इतर टिपण्णी पर प्रति टीप हैं आप की .

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    9. लेकिन आप से क्या बहस करनी क्युकी विषय पर एक भी टिपण्णी ना करके विषय से इतर टिपण्णी पर प्रति टीप हैं आप की .

      बात आपकी शतप्रतिशत सही है यह चलती चर्चा मेँ प्रतिटिप्पणी ही है.भारतीय संसकृति मेँ नारी मूल्योँ पर आपके प्रयास निश्चित ही उल्लेखनीय है किंतु मेरा आशय इन उत्तम प्रयासो के बीच उस ओर ध्यान दिलाना था जिसमेँ संस्कृति से बुराई हटाने के उत्साह मेँ आलोचना की अति न हो जाय कि पूरी संस्कृति ही निन्दा का पर्याय बन जाय. गलत प्रथाएँ अवश्य दूर होनी चाहिए किंतु संस्कृति गौरव अक्षुण्ण भी रहे.

      विषय पर विचार रखना चाहता था किंतु निर्दोष प्रथाओँ का नाम लेकर उनमेँ कुरितियोँ का उल्लेख है. जल्दबाजी से सही या गलत कहना या तो निर्दोष त्यौहार का विरोध हो जाता है (क्योँकि नामांकन उन त्यौहारो का हुआ है) या फिर किसी क्षेत्र विशेष की कुरीति आलोचना से साफ बच जाती है.

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    10. रचना जी,

      हालाँकि मैं खुद को इस काबिल नहीं समझता लेकिन आप से प्राय: सम्मान(:)) पाता ही रहा हूँ, धन्यवाद पहुँचे।

      आपकी पोस्ट और आपके ब्लॉग की सार्थकता निर्विवादित है।

      @ दिया हुआ लिंक एक न्यूज़ हैं और आपकी पोस्ट उस पर आधारित हैं नाकि उसका ट्रांसलेशन हैं:
      ज्ञानवृद्धि करवाने के लिये फ़िर से धन्यवाद।

      @ पूरी पोस्ट का विषय - धर्म, रीति-रिवाह वगैरह वगैरह:
      जी, जरूर मैंने ही जोड़ा होगा। धर्मान्ध लोग ही ऐसा करते हैं, आप जैसे उदार सम्यक दृष्टिकोण वाले ऐसा नहीं करते।

      @ और अभी जो दो लडकियां शिव सैनिको की क्रोध का शिकार हुई हैं वो किस धर्म का पालन करते हुई हैं ?????? :
      औरतों के मामले खुद औरतें ही निबटायें, जबसे यह उद्घोष सुना है तबसे मेरी भी सोच कुछ बदल गई है। सोचता हूँ, शिवसैनिक भी अपने मामने खुद ही निबटायें।

      विलंब के लिये खेद है।
      Hope you won't find it personally targeted upon you.

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    11. प्राय: सम्मान(:)) पाता ही रहा हूँ,
      good u felt so

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  9. rachna ji - please change the title of your post -

    it seems to convey that the definition of dhanteras and dev uthani ekadashi is selling and human trafficking of girls.... while the post just conveys that it is being done in a particular area

    it is NOT THE DEFINITION of these two festivals - and blog is a universally read source of info - which will be there even after 200 years - so it should not convey such mis-concepts about our sacred festivals - while actually it is NOT the way of celebrating these festivals

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    1. it seems to convey that the definition of dhanteras and dev uthani ekadashi is selling and human trafficking of girls....

      madam
      exactly that is what the reports want to convey that on these 2 specific days this is done in keeping with the so called indian tradition

      the definition of the days has been clearly marked in bold in the posts

      how sacred are our festivals ??? let people know 200 hundred years from now that somewhere some one made a post from a news paper cutting to highlight the plight of woman who were bought and sold .

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    2. rachna ji -
      @dhanteras: it is the day when shri dhanvantari emerged out of the churning of the ocean, and related things are celebrated.

      @dev uthani ekadashi
      - before the navraatris start, there is a 15 days period "mahaalaya or pitru paksh" which is the period when we do shraadhas etc for departed souls. the administrator of this period is the administrator of the pitars kingdom - the yama (yamdev)

      after devuthani ekadashi, the devas again wake up and the period of weddings etc begins according to the hindu religious calender.
      ------------------


      are you the same rachna ji who objected to my objection on killing goats on eid saying that we should not insult "religious" sentiments on "their festivals" ?

      while killing goats IS THE ORDAINED prampara on eid, selling and buying girls is NOT THE ORDAINED PARAMPARA in hindu culture, it is a wrong thing, against hindu beliefs... hinduism does NOT condone such acts as you are trying to say.... or you are also so called "secular" and think it is ok to insult hindu sentiments - just the muslim sentiments are a taboo ?

      I REPEAT - SOME PEOPLE MAY BE DOING SELFISH AND WRONG THINGS IN THE NAME OF FESTIVALS, BUT THIS IS NOT THE TRADITIONAL MEANING OF DHANTERAS OR DEV ATHAVAN EKADASHI ... and i in my personal capacity as a hindu oppose the way you are trying to misrepresent the meaning of our festivals.

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    3. yes i am the same rachna , who said highlight the problems of our own religion and belief rather then focus on others

      we all who are followers of hindu religion do know that what day signifies so no issues abosulutely


      my post is about woman being sold on dhantaeras and being married to old man latter it has nothing to do with religion and any woman will stand with the post rather than oppose it

      MY LAST TAKE ON YOUR COMMENT , YOU CAN HIGHLIGHT THE ISSUE AS YOU WANT BECAUSE THAT IS WHAT THE BLOG IS ALL ABOUT

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    4. agreed!!
      title must be changed......
      though the content and information is right ... its spreading a wrong message for our culture.....

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    5. i agree meenakshi ji.

      the content information is welcome - actually it is shocking as i already said in my previous comment.

      what i am requesting is the change in the title - which seems to show it as a method/ custom followed/ accepted by all hindus on the said festival days, while actually it is not so.

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    6. Shilpa ji ki maang se sahmat hun...

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  10. यह सीधे सीधे समाज का असहिष्णु रवैया है महिलाओं के प्रति।संस्कृति आदि की बात करने से विषय भटक जाता है।इसलिए मेरा मानना है कि इससे बचा जाना चाहिए ।
    और ये मेवात हरियाणा का एक जिला है ।

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  11. Rachna ji,
    Mr. Sanjay has hit the hammer on the head. Any translation must keep the very authenticity and the basic soul of the article, irrespective of the language.

    About the title of your article, I too agree, this must be changed. This is unnecessarily giving an odd impression, to the world that this distorted ritual or whatever you may call it, is being practiced by every Hindu on these auspicious days, whereas this is just an exception. You must limit your Title to these particular places.

    Thanks

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    Replies
    1. i have not translated any article , my answer to sanjay was because he compared my post to the link . the link used the word in english "lure" which i have not used any where in my writing

      as regards title , what you also have failed to see that this is like a custom followed in those areas as the report says so i have higlighted the fact in my post which you also nailed in your first comment

      its time to wake up and i use this blog to shake our sensibilities

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    2. as regards title , what you also have failed to see that this is like a custom followed in THOSE AREASas the report says so i have higlighted the fact in my post which you also nailed in your first comment


      Rachna ji,

      Exactly your words THOSE AREAS,is the operative word. Please just introduce a minor correction in your Title. Here is my humble suggestion, if you feel like accepting it.

      मेवात, अलवर, भरतपुर, धौलपुर में धनतेरस के दिन लडकियां बेची जाने और "देव उत्थानी एकादशी " को इन "बिकी हुई " कन्याओं का विवाह उनके "ख़रीददारों " से होने की ख़बर ....

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    3. ada ji - exactly the same as i wanted to suggest - but no point doing it - because the blog owner is not ready to listen or understand that because of a few miscreants, she is blaming a whole community and their beliefs. :(

      it will just result in a lot of mutual mud throwing - so i resign and withdraw... this is the reason i usually keep away from here... though i do like the content and feel it useful, yet ..

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    4. the first 2 lines of the post itself say the areas and then there is break in the post and then reader needs to go furthur .

      if technology is given to highlight the issue the way the blog writer wants but the readers are not willing to understand the technology then its their own own problem

      few miscreants !!! it reminds me of kiran bedi who in heat of moment said something like rapes are given more importance !!!

      even if its one single miscreant its happening and its not the blog post owner who is a investigating


      many like you chose to keep away shlipa so no issues at all

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    5. rachna ji - @ few miscreants !!! it reminds me of kiran bedi who in heat of moment said something like rapes are given more importance !!!
      - as i already said, i am not interested in participating in a mud slinging competetion - with anyone - including yourself. hence u can say what u like about me - all the best.

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  12. यही तो अफ़सोस है कब बदलेगी सोच

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