नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

August 19, 2011

पत्नी को जेब खर्च क्यूँ नहीं, --- क्युकी कानून सही नहीं हैं

ना जाने कितनी बार ये प्रश्न दिमाग में आता हैं की जहां नारी धन अर्जित नहीं करती वहाँ उसको अपने खर्चे के लिये पैसा कौन देता हैं ?

बहुत बार ऐसी गृहिणिया जो धन खुद अर्जित नहीं करती हैं वो उस पैसे को अपने लिये रखती हैं जो उनको तीज त्यौहार मायके से मिलता हैं

कुछ घर खर्च से बचा लेती हैं और पति से छुपा कर रख लेती हैं

कुछ को पति / पुत्र / पुत्री पैसा देते हैं उनके खर्च के लिये

लेकिन एक प्रश्न बार बार लौट कर आता हैं की धन अर्जित ना करने वाली नारियों के लिये उनके पति क्यूँ नहीं अलग से क़ोई खाता खोल देते हैं जो केवल उस नारी का हो
जोइंट खातो की परम्परा भी नयी हैं , अच्छी पहल हैं पर इस में भी एक जवाब देही बन जाती हैं

चोखेर बाली ब्लॉग , नारी ब्लॉग और जील ब्लॉग पर ये मुद्दा कई बार उठा और हमेशा एक बहस में इसका अंत हुआ , हर महिला ने चाहा की अलग पैसा मिले पर पुरुष या तो चुप रहे या उन्होने कहा की जो कमाता हैं उसको देखना पड़ता हैं जितनी चादर इत्यादि और कुछ ने जिसमे पुरुष और स्त्री दोनों हैं इसको महज एक विवाद वाली पोस्ट मान कर मुद्दे को ही ख़ारिज कर दिया

हमारे देश के कानून ऐसे बनाये गए हैं जिस में ये ध्यान रखा गया हैं की नारी इस समाज में दोयम हैं इस लिये उसको सुरक्षित करो इस नज़रिये से एक कानून ऐसा हैं जहां पत्नी की मृत्यु के पश्चात उसकी संपत्ति पर उसके पति का क़ोई अधिकार नहीं हैं पत्नी की संपत्ति पर केवल उसके बच्चो का अधिकार हैं

इसके उल्ट पति की मृत्यु के पश्चात पत्नी , माँ और संतान सब समान अधिकारी होते हैं उसकी संपत्ति के

यानी एक डर कहीं ना कहीं जरुर रहता होगा ससुराल वालो के मन में , पति के मन में , की अगर पत्नी के नाम कुछ कर दिया और पति की मृत्यु हो गयी तो जो पत्नी के नाम हैं उस पर किसी का क़ोई अधिकार नहीं होगा

आज भी कम उम्र में जो नारियां विधवा हो जाती हैं बहुधा मायके चली जाती हैं और कई बार दोबारा विवाह भी कर लेती हैं ऐसे में अगर वो अपने पूर्व पति की बिमा पालिसी , बैंक अकाउंट , शयेर , अफ डी इत्यादि में नॉमिनी हैं तो पति के माता पिता को कुछ भी नहीं मिलता हैं


पत्नी को जेब खर्च क्यूँ नहीं का प्रश्न करना जितना आसान लगा था मुझे जब मैने उसके समाधान खोजने की जगह कारण की खोज की तो मुझे इस कानून का पता चला

इस कानून में बदलाव की आवश्यकता हैं ताकि जो अधिकार पत्नी को हैं अपने पति की संपत्ति पर , पति को भी हो अपनी पत्नी की संपत्ति पर

मेरा मानना हैं की पत्नी के पति की मृत्यु हो जाने पर दुबारा विवाह करने पर जो भी पहले पति का उसको नॉमिनी होने की वजह से मिला हैं वो सब पति के घरवालो को वापस जाना चाहिये और अगर पत्नी मायके वापस जाती हैं तो भी उसको वो सम्पत्ति जो नॉमिनी होने की वजह से "केवल उसको " मिली हैं उसको अपनी सास के साथ बराबर से बाँट लेना चाहिये अगर बच्चे नहीं हैं तो

सरकारी नौकरी में शायद ये प्रावधान हैं की विधवा को अगर पति की जगह नौकरी दी जाती हैं तो वो दूसरी शादी के बाद ख़तम हो जाती हैं और पेंशन पर भी अधिकार नहीं रहता { किसी के पास पूरी जानकारी हो तो बाँट दे सब से कमेन्ट में }

इस का एक दुष्परिणाम हैं की विधवा जो नौकरी पा जाती हैं वो दुबारा विवाह से कतराती हैं यानी उनकी जिंदगी वही रुक जाती हैं इस विषय पर गहन चिंतन की आवश्यकता हैं

इस पोस्ट पर आप के कमेन्ट/ विचार और प्रश्न देख कर इस पर विस्तार से बात की जा सकती हैं


अंत में मै यही मानती हूँ की हर नारी कोशिश करनी चाहिये की वो धन भी अर्जित कर सकेअपना अर्जित धन ही वास्तव में अपना होता हैं क्युकी उस पर क़ोई प्रश्न चिन्ह कभी नहीं लगता जो बेटियाँ अविवाहित हैं और उन्होने कमाना शुरू कर दिया हैं उनको घर खर्च में पैसा अवश्य देना चाहिये जो बहू हैं और कमाती हैं यानी जो सास ससुर के साथ रहती हैं उनको भी घर खर्च में योगदान देना ही चाहिये
अगर हम समानता की बात करते हैं तो हमको सबसे पहले उस नियम को अपने ऊपर ही लागू करना चाहिये



those woman who dont earn have to understand that the money their husbands give them or deposit in their name or where ever they are nominee legally after their death the money/ property will not go to husband but only to their children .

in case of death of married man , the property is divided between his mother , wife and children equally but in case a married woman dies the property is inherrited by her children

i always recommend that woman should work and earn so that actual equality of gender prevails and dependency become obsolete


चलते चलते आप को एक किस्सा बता रही हूँ , आज से ३० साल पहले की बात हैं
एक ससुर ने अपनी सारी सम्पत्ति का वारिस अपनी बहू को बना दिया ससुर के बेटा और बेटी थी लेकिन वारिस उन्होने अपनी बहू को घोषित किया बाकयदा विल बना कर चल अचल संपत्ति में एक घर और एक फैक्ट्री थी
एक दिन उनकी बहू जो आज खुद ६० साल की महिला हैं और जिनके विवाहित बेटे और तलाक शुदा बेटी हैं से बात हुई और उन से प्रश्न किया की आखिर आप के ससुर ने आप पर इतना विश्वास किया तो कैसे
उनका जवाब था ससुर अपनी पूरी सम्पत्ति केवल अपने पोतो {यानि बेटे के बेटो } को ही देना चाहते थे वो उस में अपनी बेटियों का क़ोई अधिकार नहीं मानते थे इस लिये उन्होने सारी सम्पत्ति बहू के नाम कर दी क्युकी बहू की सम्पत्ति पर केवल बहू और उसके बच्चो का अधिकार होगा ससुर के मरने के बाद सास का भी अधिकार नहीं रहेगा अन्यथा उनके हिस्से का पैसा वो चाहे तो बेटियों को दे सकती थी

किस्सा अभी ख़तम नहीं हुआ हैं जब बहू ने अपनी बेटी की शादी की तो साल भर के अन्दर ही दामाद ने कहा की जो भी उसकी पत्नी का हिस्सा हैं वो पत्नी के नाम कर दिया जाए क्युकी क्या पता बाद में कुछ भी ना मिले

ऐसा नहीं किया गया तो अंत बेटी के तलाक पर जा कर हुआ
पिता और माँ की सम्पत्ति पर बेटी का बराबर का हिस्सा हैं पर समाज अभी भी उसको नकारता हैं कानून बनजाने के बाद भी क़ोई क़ोई तरीका निकाल ही लेता हैं दुभात करने का


कुछ कानूनों को अगर बदलने का समय हैं तो कुछ को सख्ती से पालन करने और करवाने का भी समय हैं

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16 comments:

  1. नमस्कार....
    बहुत ही सुन्दर लेख है आपकी बधाई स्वीकार करें

    मैं आपके ब्लाग का फालोवर हूँ क्या आपको नहीं लगता की आपको भी मेरे ब्लाग में आकर अपनी सदस्यता का समावेश करना चाहिए मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब आप मेरे ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँगे तो आपकी आगमन की आशा में........

    आपका ब्लागर मित्र
    नीलकमल वैष्णव "अनिश"

    इस लिंक के द्वारा आप मेरे ब्लाग तक पहुँच सकते हैं धन्यवाद्
    वहा से मेरे अन्य ब्लाग लिखा है वह क्लिक करके दुसरे ब्लागों पर भी जा सकते है धन्यवाद्

    MITRA-MADHUR: ज्ञान की कुंजी ......

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  2. मेरा हमेशा से ही यह मानना है कि पत्नी हमेशा पति से ज्यादा मेहनत करती है, इसलिए पति की आय में पत्नी का भी उतना ही हक़ होता है जितना पति का... इसलिए मैं हमेशा अपनी पत्नी को उसका हिस्सा देता हूँ और कभी भी उसका हिसाब लेने की नहीं सोचता... क्योंकि वोह उसकी आय है, जैसे चाहे खर्च करे....

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  3. बहुत ही सुन्दर लेख.

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  4. अच्छी पोस्ट है - मैं कानूनी पहलू के बारे में अधिक नहीं जानती |
    मैं अक्सर कही जाने वाली इस बात से सहमत नहीं हूँ कि "यदि बराबरी चाहिए - तो दोनों ओर से हो , कानून ठीक नहीं है" क्योंकि आप ने ही इसकी वजह भी लिखी है - "हमारे देश के कानून ऐसे बनाये गए हैं जिस में ये ध्यान रखा गया हैं की नारी इस समाज में दोयम हैं इस लिये उसको सुरक्षित करो । इस नज़रिये से एक कानून ऐसा हैं जहां पत्नी की मृत्यु के पश्चात उसकी संपत्ति पर उसके पति का क़ोई अधिकार नहीं हैं । पत्नी की संपत्ति पर केवल उसके बच्चो का अधिकार हैं । " तो असलियत में स्थिति यह है कि समाज में स्त्री की स्थिति आज भी - सच में ही - दोयम है | तो उसके प्रोटेक्शन के लिए ज़रूरी है कि दो अलग अलग क़ानून हों | उदाहरण मैंने अपनी महिला मुक्ति वाली पोस्ट में ( http://ret-ke-mahal-hindi.blogspot.com/2011/04/women-lib.html )दिया था कि - हम लोग जो अपने पति जितना ही या उनसे अधिक भी क्वालिफाइड हैं, बराबर या अधिक भी कमा रही हैं - फिर भी यदि घर में काम वाली छुट्टी ले तो बर्तन कपडे धोने के बारे में पति करे यह सोच तक नहीं बना पाते !!!

    तो जब स्थितियां अलग हैं, तो क़ानून अलग ज़रूरी हैं ही | यदि पत्नी की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पति और ससुराल वालों में भी बराबरी से बटेगी - तो एक समस्या तो यह होगी कि संपत्ति के लालच में , आज से भी अधिक स्त्रियों को जला कर आदि मार दिया जाएगा !! क्योंकि आखिर स्थिति तो यही है ना कि शादी के बाद औरत ही पति के घर में रहने जाती है, पति तो आता नहीं पत्नी के यहाँ रहने, तो सीधी सी बात है कि स्थिति उस कि ही कमज़ोर होगी जो अपने घर को छोड़ कर नयी जगह गया हो |

    दूसरी बात यह कि यदि बच्चे छोटे हैं - तो अक्सर देखा गया है कि पति दूसरा विवाह करने में देर नहीं करते - जबकि स्त्री अक्सर पूरा जीवन अकेली ही बच्चों की देख रेख में काट देती है जहाँ पुरुष अधिकतर सेल्फ डिपेन्देन्त होता है (तो बच्चे उसे , स्त्री अक्सर कमा नहीं रही होती , तो उसके सर्वाइवल के लिए ज़रूरी है कि उसके पास पैसा हो जो बच्चों का नहीं खुद का हो - आगे जाकर बच्चे माँ को कितना देखें यह कोई नहीं जानता | तो यदि माँ की मृत्यु हो जाए, तो बच्चे अक्सर दादा, दादी , पापा, और अक्सर सौतेली माँ के साथ ही रहते हैं | तो यदि माँ की संपत्ति बच्चों के नाम हो भी, तो गार्डियन पिता ही होने के नाते वही सम्हालता है, तो ऐसा नहीं कि उनके हाथ से निकाल गयी हो संपत्ति !! आखिर बच्चे उसके भी तो हैं ही ना? पर बच्चों के लिए एक फाइनेंशियल सेक्युरिटी रहती है, क्योंकि उनके अपने नाम पर पैसा होता है|

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  5. रचना जी
    आप से सहमत हूं की महिलाओ को जेब खर्च नहीं दिये जाते है पर ज्यादातर महिलाए घर के लिए मिले खर्च से अपने लिए कुछ बचा लेती है या फिर अपनी जरूरते उनमे से ही पुरा कर लेती है उन्हें अलग से पैसे लेने की जरुरत ही नहीं पड़ती है | महिलाओ में आज भी अपने नाम से बैंक अकाउंट खोल कर बचत करने की आदत कम है , कुछ बिल्कुल ही बचत नहीं करती तो कुछ बचत के पैसे घर पर ही रखती है जो जरुरत पड़ने पर घर में ही काम में आता है | पर इस बात से सहमत नहीं हूं की यदि पत्नी को पति के मृत्यु के बाद कुछ मिला है तो दूसरा विवाह करते समय उसे लौटा दिया जाये इससे तो वही परेशानी होगी की महिलाए दूसरा विवाह करने से बचेंगी | जरुरी नहीं है की जिससे विवाह किया है वो आर्थिक रूप से सक्षम हो या फिर पति ने अपने बच्चो के लिए उसके नाम किया हो , जिम्मेदार व्यक्ति अकेले माँ बाप के लिए भी पहले से ही कुछ कर के जाता है |

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  6. आप ने जो ये नई जानकारी दी है की पत्नी की संपत्ति पति की नहीं होती है क्या सही है क्या कानून ऐसा ही है ??

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  7. अंशुमाला
    और अन्य पाठक
    मैने अपनी तरफ से सही जानकारी दी हैं लेकिन अगर ये गलत हैं तो आप से आग्रह हैं सही जानकारी यहाँ जोड़ दे

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  8. बहुत ही सुंदर लेख लिखा आपने /बहुत सी बातें आपने बताई जिन पर ध्यान देना चाहिए /औरतों के लिए समाज को अपनी सोच बदलने की बहुत जरुरत है/सार्थक लेख के लिए बधाई आपको /


    please visit my blog.link is
    http://prernaargal.blogspot.com/.thanks

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  9. ऐसा किस कानून में है कि पत्नी की संपत्ति का उत्तराधिकारी पति नहीं होगा?
    बहुधा स्त्रियों के वस्त्र ही ऐसे हैं जिन में जेब होती ही नहीं है। शायद इस लिए कि वे जेब खर्च न मांग लें।
    हम तो जितना पैसा आता है पत्नी को दे देते हैं, हमें जेब खर्च उन से लेना पड़ता है।

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  10. दिनेश जी
    अभी एक महिला का निधन हुआ
    उनके बैंक में जो भी पैसा उनके नाम से था उसके लिये मृत्यु प्रमाण पत्र के साथ केवल उनके बच्चो के हस्ताक्षर लिये गए पति के नहीं जबकि क़ोई नॉमिनी नहीं था
    बैंक अधिकारीयों से ही इस बात की जानकारी मिली हैं

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  11. I give whole lot of money to her on every first of month.

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  12. देखिए जी यह सब सोच का प्रतिफल है।

    हम तो महीना लगते ही रुपये लाकर उनके हाथ में धर देते हैं। और अपने लिए जेब खर्च मांग लेते हैं।
    यह एक पहलू है।

    एक फ़ायदा यह है कि हम तो हो गए मुक्त महीने भर की खिचिच-खिचिर से।

    दूजे अपनी तो आदत है फालतू के खर्च करते रहने की। सो वे उस पे अंकुश लगा देती हैं।

    तीसरे वक़्त ज़रूरत पर, उनका दिल तो आखिर महिला वाला ही है, आपनी अंटी से निकाल कर दे देती हैं, कि यह कुछ है रख लो, लेकिन अगले महीने वापस कर देना। लेकिन अगला महीना आते ही मांगना भूल जाती हैं (शायद याद रहते भी नहीं मांगतीं)।

    एक पहलू यह भी है कि हमने तो जमीन उनके नाम से खरीदने के लिए अग्रीमेंट करवा लिया, पर क़ानूनी अड़चन सामने आ गई को पत्नी के नाम की जमीन पर मुझे लोन नहीं मिलेगा।

    इसका समाधान ढूढ़िए।

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  13. महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता होनी चाहिए , वो चाहे पति की कमाई से हो , या खुद की !

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  14. रचनाजी
    कानून के बारे में तो मै ज्यादा जानती नहीं ,विचार भी महत्वपूर्ण है की महिलाओ का अपने खर्च के लिए अपना खाता या अलग से जेब खर्च मिलना चाहिए |यहाँ मै अंशुमाला जी की बात से सहमत हूँ की हर महिला अपने घर खर्च में अपने लिए कुछ न कुछ बचा ही लेती है बीसी या किटी पार्टी के जरिये भी महीने की बचत कर उस पैसे को अपने ऊपर खर्च कर लेती है |जो महिलाये नौकरी नहीं करती है वे |फिर ये तो सबकी अपनी अपनी घर की परिस्थिति ,खर्च करने की आदत ,अपनी जरूरी जरूरते या गैर जरुरी जरुरतेपर निर्भर करता है |समय के साथ साथ जरूरते ज्यादा बढने लगी है और आज ज्यदातर महिलाये खुद कमाती है पर फिर भी अपने स्वभाव अनुसारही बचत और खर्च करती है |
    और जिन्हें स्वयम खर्च के लिए घर के पुरुष पैसा नहीं देते थे वे भी कैसे न कैसे अपने लिए घर खर्च से जुगाड़ कर लेती है |एक उदहारण दूंगी मेरी एक ताई सास थी जिन्होंने कभी बाजार नहीं देखा था |ताउजी जनपद ऑफिस में काम करते थे बहुत सिमित आय पर अपना पैत्रक मकान और तीन चार किरायेदार थे तो किराया भी मिल जाता था ताउजी ही सारा सामान बाजार से लाते जिसमे कपड़े तक शामिल होते सादिया अदि भी छोटे शहरों में एक सुविधा थी दुकान से साड़ी का गठ्ठर आजाता साड़ी पसंद कर ली जाती | गहनों आदि का कोई रोल ही नहीं था जो एक बार शादी में मिल गए सो मिल गये |पर ताईजी का जब स्वर्गवास हुआ तो उनकी बहुओ को उनकी पेटी से कई नई साड़ियाँ ,ओर पुष्य नक्षत्र में ख़रीदा हुआ कुछ ग्राम सोना भी मिला जो वो अपने अड़ोसी पड़ोसी और किरायेदारो से मार्फत मंगा लेती थी |और उलटे जो पुरुष सारी तनखाह पत्नी को देते है वो कभी भी अतिरिक्त अपने लिए नहीं जुटा पाती |

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  15. आर्थिक आज़ादी औरत को हर हाल में खुद हासिल करनी है..चाहे वह नौकरी करे या न करे......
    परिवार के पालन पोषण में घर में रहने वाली औरत की भूमिका किसी तरह से भी नौकरी करने वाली औरत से कम नहीं आँकी जा सकती..आत्मविश्वास की कमी हो तो नौकरी करने वाली औरत की आर्थिक आज़ादी भी किसी काम की नहीं रहती...

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  16. मैं इस बात से सहमत हूं कि महिलाओं को आर्थिक तौर पर मज़बूत होना चाहिे, अगर वो नौकरी नहीं करती तो भी पति की कमाई पर उनका अधिकार होता है और घर के रोज के कामों का हिसाब बना दो तो वो कमाई तो कई जगह पति की कमाई को भी पार कर जाएगी।

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