नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

हिन्दी ब्लोगिंग का पहला कम्युनिटी ब्लॉग जिस पर केवल महिला ब्लॉगर ब्लॉग पोस्ट करती हैं ।

यहाँ महिला की उपलब्धि भी हैं , महिला की कमजोरी भी और समाज के रुढ़िवादि संस्कारों का नारी पर असर कितना और क्यों ? हम वहीलिख रहे हैं जो हम को मिला हैं या बहुत ने भोगा हैं । कई बार प्रश्न किया जा रहा हैं कि अगर आप को अलग लाइन नहीं चाहिये तो अलग ब्लॉग क्यूँ ??इसका उत्तर हैं कि " नारी " ब्लॉग एक कम्युनिटी ब्लॉग हैं जिस की सदस्या नारी हैं जो ब्लॉग लिखती हैं । ये केवल एक सम्मिलित प्रयास हैं अपनी बात को समाज तक पहुचाने का

15th august 2011
नारी ब्लॉग हिंदी ब्लॉग जगत का पहला ब्लॉग था जहां महिला ब्लोगर ही लिखती थी
२००८-२०११ के दौरान ये ब्लॉग एक साझा मंच था महिला ब्लोगर का जो नारी सशक्तिकरण की पक्षधर थी और जो ये मानती थी की नारी अपने आप में पूर्ण हैं . इस मंच पर बहुत से महिला को मैने यानी रचना ने जोड़ा और बहुत सी इसको पढ़ कर खुद जुड़ी . इस पर जितना लिखा गया वो सब आज भी उतना ही सही हैं जितना जब लिखा गया .
१५ अगस्त २०११ से ये ब्लॉग साझा मंच नहीं रहा . पुरानी पोस्ट और कमेन्ट नहीं मिटाये गए हैं और ब्लॉग आर्कईव में पढ़े जा सकते हैं .
नारी उपलब्धियों की कहानिया बदस्तूर जारी हैं और नारी सशक्तिकरण की रहा पर असंख्य महिला "घुटन से अपनी आज़ादी खुद अर्जित कर रही हैं " इस ब्लॉग पर आयी कुछ पोस्ट / उनके अंश कई जगह कॉपी कर के अदल बदल कर लिख दिये गये हैं . बिना लिंक या आभार दिये क़ोई बात नहीं यही हमारी सोच का सही होना सिद्ध करता हैं

15th august 2012

१५ अगस्त २०१२ से ये ब्लॉग साझा मंच फिर हो गया हैं क़ोई भी महिला इस से जुड़ कर अपने विचार बाँट सकती हैं

"नारी" ब्लॉग

"नारी" ब्लॉग को ब्लॉग जगत की नारियों ने इसलिये शुरू किया ताकि वह नारियाँ जो सक्षम हैं नेट पर लिखने मे वह अपने शब्दों के रास्ते उन बातो पर भी लिखे जो समय समय पर उन्हे तकलीफ देती रहीं हैं । यहाँ कोई रेवोलुशन या आन्दोलन नहीं हो रहा हैं ... यहाँ बात हो रही हैं उन नारियों की जिन्होंने अपने सपनो को पूरा किया हैं किसी ना किसी तरह । कभी लड़ कर , कभी लिख कर , कभी शादी कर के , कभी तलाक ले कर । किसी का भी रास्ता आसन नहीं रहा हैं । उस रास्ते पर मिले अनुभवो को बांटने की कोशिश हैं "नारी " और उस रास्ते पर हुई समस्याओ के नए समाधान खोजने की कोशिश हैं " नारी " । अपनी स्वतंत्रता को जीने की कोशिश , अपनी सम्पूर्णता मे डूबने की कोशिश और अपनी सार्थकता को समझने की कोशिश ।

" नारी जिसने घुटन से अपनी आज़ादी ख़ुद अर्जित की "

हाँ आज ये संख्या बहुत नहीं हैं पर कम भी नहीं हैं । कुछ को मै जानती हूँ कुछ को आप । और आप ख़ुद भी किसी कि प्रेरणा हो सकती । कुछ ऐसा तों जरुर किया हैं आपने भी उसे बाटें । हर वह काम जो आप ने सम्पूर्णता से किया हो और करके अपनी जिन्दगी को जिया हो । जरुरी है जीना जिन्दगी को , काटना नही । और सम्पूर्णता से जीना , वो सम्पूर्णता जो केवल आप अपने आप को दे सकती हैं । जरुरी नहीं हैं की आप कमाती हो , जरुरी नहीं है की आप नियमित लिखती हो । केवल इतना जरुरी हैं की आप जो भी करती हो पूरी सच्चाई से करती हो , खुश हो कर करती हो । हर वो काम जो आप करती हैं आप का काम हैं बस जरुरी इतना हैं की समय पर आप अपने लिये भी समय निकालती हो और जिन्दगी को जीती हो ।
नारी ब्लॉग को रचना ने ५ अप्रैल २००८ को बनाया था

June 27, 2012

नारी के वक्ष उसका सौंदर्य नहीं , नारी का जीवित होना उसका सौन्दर्य हैं , विमर्श का विषय ये होना चाहिये .

 अभी कुछ देर पहले मैने वंदना जी की एक कविता पढी 
कविता नारी देह को लेकर हैं , नारी के वक्ष  का कैंसर के दौरान  निकाल दिया जाना यानी नारी देह का खंडित होना , नारी सौंदर्य का खंडित होना . कविता के ऊपर एक और लिंक दिया हैं जो कविता जी के ब्लॉग का हैं जहां एक लेखिका ने कुछ कविताओं पर आपत्ति उठाई हैं जहां  ब्रेस्ट कैंसर के कारण वक्ष को निकलवा चुकी महिला पर शरीर खंडित होने जैसी बात कह कर उनका उपहास उड़ाया गया हैं

वंदना जी ने अपनी तरफ से ज्यादा बेहतर शब्दों को रख कर बात कहने का प्रयास किया हैं . और पूछा भी हैं क्या बात इस तरह नहीं कही जा सकती थी ?? मुझे उनकी कविता का थीम ही गलत लगा , कविता कैसी हैं सवाल ये नहीं है क्युकी वो एक रचनात्मक क्रिया हैं पर कविता किस थीम पर हैं ये जरुर सोचने की बात हैं 


कैंसर पर विजय पाना एक उपलब्धि हैं पढना हो तो आर अनुराधा की किताब पढ़े ,
शरीर का एक अंग अलग करने से शरीर खंडित होगया , ये कौन सी सोच हैं ????
क्या स्त्री महज एक शरीर मात्र हैं आज भी ??
लोगो की यही सोच कैंसर विजेताओं को जो शल्य चिकित्सा करवा चुकी हैं , मजबूर करती हैं की वो कृत्रिम वक्ष लगाए या पेडिद ब्रा का इस्तमाल करे जो बेहद दर्दनाक होता हैं .

एक तरफ हम लोग हैं जो औरत की खंडित सौंदर्य / शरीर पर कविता लिख रहे हैं और दूसरी तरफ हैं जोदी  जैक्स जिन्होंने अपने दोनों वक्ष निकवा कर कैंसर पर विजय पाई . उन्होने "टॉप लेस " स्विमिंग के लिये अर्जी देकर अपने लिये इसकी परमिशन ली क्युकी उनके अनुसार स्विम सूट पहनने से दर्द होता था . अब वो बाकी सब कैंसर विजेताओ को लिये भी इस परमिशन को लाने की मुहीम चलवा रही हैं .

बीमारी से ज्यादा बीमारी पर विजय की बात करनी होगी ना की विजय से हुए शरीर के बदलाव की बात करनी चाहिये  और ये तो कभी भी ना कहे की कितनी मानसिक तकलीफ हुई होगी उस महिला को जिसने शल्य चिकत्सा से कैंसर से ग्रसित वक्ष को निकलवा दिया . आप का एक गलत कदम / कविता / कहानी किसी कैंसर पीड़ित महिला को शल्य चिकित्सा से रोक भी सकता हैं . 

मेरे पड़ोस में एक महिला को ब्रेस्ट कैंसर हुआ उसके माता पिता नहीं थे , उसके सास ससुर ने बिना एक मिनट की देरी किये उसको शल्य चिकित्सा करने की प्रेरणा दी और उसके पति ने रात दिन एक करके उसकी सेवा की . महिला की उम्र महज 35 साल हैं . आज 5 साल बाद वो बिलकुल ठीक हैं और आराम से अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं .

नारी के वक्ष उसका सौंदर्य नहीं , नारी का जीवित होना उसका सौन्दर्य हैं , विमर्श का विषय ये होना चाहिये .


Please dont discuss beauty , body when life is at stake . There is nothing better then to live . Such poems and articles may dissuade a patient from going for breast removal as they worry about social acceptance  .http://www.breastcancerindia.net/


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54 comments:

  1. बेशक आपकी बात सही है मगर हर नारी मे वो जज़्बा नही होता रचना जी ………सिर्फ़ कुछ ही ऐसी साहसी नारियाँ होती हैं मगर बाकि की आम नारी के मन पर कैसा प्रभाव पडता है , वो कैसा महसूस करती होगी ये तो शायद वो भी ना बता पाये और ये ही बात आखिर मे मैने भी लिखी है ………और मैने सौन्दर्य के दृष्टिकोण से नही लिखी मैने तो मातृत्व और नारीत्व के दृष्टिकोण से लिखी है क्योंकि वो नारी के शरीर का एक अंग है और वक्ष के अलावा यदि दूसरा कोई भी अंग किसी का भी हटे तो ऐसा ही वो फ़ील करेगा और शायद दूसरा उसे उतना सटीक व्यक्त भी ना कर सके …………बस कुछ संवेदनायें ही हम प्रस्फ़ुटित कर सकते हैं मगर उस गहराई तक नही पहुँच सकते जो एक अंगभंग होने पर महसूस होती हैं ।

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    1. वंदना जी
      उसी आम नारी की सलामती की बात करिये , उनकी हौसला अफजाई की बात करनी होगी , उनको समझाना होगा की उनको शरीर नहीं जीवन से जुड़ना हैं , उनको बताना होगा की सौंदर्य जीवन से हैं शरीर से नहीं ,
      ये गोरा , काला , नाटा , मोटा इत्यादि सब हमारे बनाये हुए सौन्दर्य के पैमाने हैं और शल्य चिकित्सा से अंग भंग होता हैं और उस से मानसिक पीड़ा होती हैं , इस सोच से ऊपर उठ कर move on move ahead and live as nothing happened

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    2. बीमारी का उपचार तो इंसान करायेगा ही जीवन तो उसने जीना ही है हर हालत मे मगर उसके साथ उसकी भावनायें हमेशा जुडी रहती हैं । क्या किसी भी मनुष्य का कोई अंग कट जाता है बिमारी या किसी और वजह से वो जीना छोड देता है ? नही ना…………मगर उस अंग का पर्याय तो ढूंढता ही है किसी का पैर कट जाता है तो उसे नकली पैर लगाना पड्ता है मगर समाज के लिये नही अपनी जरूरत के लिये मगर वास्तविक अंग के ना होने से जो पीडा वो महसूस करता होगा वो शायद कोई नही समझ सकता और मैने उसी ओर इंगित किया है ना कि मैडिकली कहा है और जीवन मे सम्पूर्णता कौन नही चाहता अधूरेपन के साथ जीना उसकी मजबूरी हो जाता है मगर उसे हम कहें कि तू कभी महसूस ही मत कर तो ऐसा होना संभव नही है कभी ना कभी ख्याल तो उसे जरूर कसक पैदा करेगा ही.

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    3. वंदना, मैं नहीं जानती, आपने स्तन कैंसर को कितने करीब से देखा है। लेकिन निश्चित रूप से मैं रचना से सहमत हूं और आपनी कविता (स्त्री पक्ष से) महिलाओं के लिए डीमॉरलाइजिंग है, जबकि पुरुषो को महान बताती है। वास्तविकता निश्चय ही इसके उलट है (अपवाद होंगे शायद)। किसी स्त्री का एक स्तन चला जाए तो वह वात्सल्य, मातृत्व इत्यादि 'सुखों' से वंचित नहीं हो जाती। वह कीमो आदि के बाद भी मां बन सकती है और स्तनपान के लिए दूसरा स्तन होता ही है। वैसे भी कितनी ही स्त्रियां एक बार भी अपनी संतानों को स्तनपान नहीं करवा पातीं, तो क्या वे मां नहीं रहती।

      दरअसल मुझे लगता है कि यह सारी समस्या महिमामंडन की, अतिरेक की है। मां का महिमामंडन, फिर इस बीमारी का और उससे होने वाले 'नुकसान' का। क्यों नहीं इसे भी एक बीमारी की तरह देखा जा सकता? इसका भी इलाज है, समस्याएं हैं और इसके साथ भी जीवन है। क्या दूसरी सैकड़ों बीमारियां इसी तरह अनिश्चित भविष्य वाली नहीं होती? क्या सिर्फ इसलिए कि पुरुषों को अपने खेल के 'खिलौने' में कुछ कमी हो गई लगती है, यह बीमारी इतनी बड़ी समस्या बन जाती है?

      दरअसल समस्या है, तब, जबकि इस बीमारी की पहचान, जांच, निदान, इलाज से लोग एकदम नावाकिफ हैं, सुविधाएं एकदम कम हैं और इसका खर्च इतना ज्यादा है कि आम आदमी इसके बारे में नहीं सोचना चाहता। क्यों नहीं इन मुद्दों पर भी कोई रचनाकार सोचता और अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति से लोगों को इसके बारे में सचेत, जागरूक बनाता?

      और अगर आपको लगता है कि आप किसी बीमार महिला के दिल का काल्पनिक हाल बयान कर रही हैं, तो यह आपकी 'दया' की भावना के कारण है, जिसकी किसी को जरूरत नहीं है। इस तरह आप किसी को उकसा भी रही हैं कि इस तरह सोचो। यह गलत है। साहित्य का एक मकसद होता है। वह एक समानांतर समाज खड़ा करने में योगदान करता है। प वह समाज सकारात्मक हो, न कि नकारात्मक- यह जिम्मेदारी रचनाकार की जरूर होती है।

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    4. @ आर. अनुराधा जी ये एक आम बीमारी होती जा रही है आजकल महिलाओं के बीच और जहाँ तक इसकी भयावहता की बात है वो भी हम सब देखते हैं अपने आस पास ही और देखी भी है …………मैने वात्सल्य और नारीत्व दोनो को साथ लेकर लिखी है ना कि अकेले वात्सल्य पर ………मानती हूँ काम चल जाता है मगर एक अधूरापन जब नारी महसूसती है तो कैसा लगता है उसे मैने उस दृष्टिकोण से लिखा है ना की पुरुष को बडा दिखाने या नारी को नीचा दिखाने के लिये क्योंकि कोई भी नारी हो वो कम से कम अपनी निगाह मे पूर्ण रहना चाहती है इसिलिये नारी के दृष्टिकोण पर कहा भी है कि उसे नही होती परवाह ना समाज की ना पति की भावनाओं की अगर होती है तो अपनी अपूर्णता की जो उसे अन्दर ही अन्दर खोखला करती है फिर चाहे वक्ष हों या दूसरे अंग ………और किसी का भी कोई अंगभंग हो तो वो ऐसा ही महसूसेगा उस भावना को कहने की कोशिश की है ना कि किसी को भी महिमामंडित करने की ……………जहाँ तक आपकी आखिरी बात का सवाल है वो बीमारी के बारे मे है जबकि मैने एक बीमारी से उपजे साइड इफ़ेक्ट के बारे मे लिखा है बस यही फ़र्क है आपके और हमारे दृष्टिकोण मे ।उम्मीद है आप अन्यथा नही लेंगी आपने दूसरे नज़रिये से देखा और मैने दूसरे और दोनो ने अपने अपने पक्ष रख दिये जो कि जरूरी है ताकि कोई कन्फ़्यूज़न ना रहे ।

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    5. दोबारा कमेंट लगा रही हूँ पहले वाला ना जाने कहाँ गया ताकि अपनी सोच आपके सामने रख सकूँ कि मैने किस वजह से लिखा और आपने किस वजह से


      आर. अनुराधा जी ये एक आम बीमारी होती जा रही है आजकल महिलाओं के बीच और जहाँ तक इसकी भयावहता की बात है वो भी हम सब देखते हैं अपने आस पास ही और देखी भी है …………मैने वात्सल्य और नारीत्व दोनो को साथ लेकर लिखी है ना कि अकेले वात्सल्य पर ………मानती हूँ काम चल जाता है मगर एक अधूरापन जब नारी महसूसती है तो कैसा लगता है उसे मैने उस दृष्टिकोण से लिखा है ना की पुरुष को बडा दिखाने या नारी को नीचा दिखाने के लिये क्योंकि कोई भी नारी हो वो कम से कम अपनी निगाह मे पूर्ण रहना चाहती है इसिलिये नारी के दृष्टिकोण पर कहा भी है कि उसे नही होती परवाह ना समाज की ना पति की भावनाओं की अगर होती है तो अपनी अपूर्णता की जो उसे अन्दर ही अन्दर खोखला करती है फिर चाहे वक्ष हों या दूसरे अंग ………और किसी का भी कोई अंगभंग हो तो वो ऐसा ही महसूसेगा उस भावना को कहने की कोशिश की है ना कि किसी को भी महिमामंडित करने की ……………जहाँ तक आपकी आखिरी बात का सवाल है वो बीमारी के बारे मे है जबकि मैने एक बीमारी से उपजे साइड इफ़ेक्ट के बारे मे लिखा है बस यही फ़र्क है आपके और हमारे दृष्टिकोण मे ।उम्मीद है आप अन्यथा नही लेंगी आपने दूसरे नज़रिये से देखा और मैने दूसरे और दोनो ने अपने अपने पक्ष रख दिये जो कि जरूरी है ताकि कोई कन्फ़्यूज़न ना रहे ।

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    6. अपनी अपूर्णता की जो उसे अन्दर ही अन्दर खोखला करती है @ vandana

      और आप की कविता उसको ये एहसास कराती हैं की एक अंग नहीं हैं तो तुम अपूर्ण हो , ये कविता का थीम ही गलत हैं मेरी आपत्ति इस पर हैं
      अपूर्णता का एहसास उसको हैं ये बात क्या किसी कैंसर के मरीज ने कही हैं , क्यूँ कैंसर का मरीज , मरीज नहीं विजेता कहलाता हैं क्युकी वो मृत्यु को जीत कर आया हैं
      क्या आप एक भी लिंक , किताब कहीं से भी रेफेर के रूप में दे सकती हैं जहां अपूर्णता का एहसास का जिक्र किया हो किसी महिला ने जिसने कैंसर को जीता हो

      वंदना जी ये एहसास दुसरे की दिमागों की उपज होता हैं ना की मरीज की , और मरीज की होता तो कहीं ना कहीं कोई तो कहता की हम खंडित हैं हमारा विसर्जन कर दो

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    7. vandana ji - this is the BEST way to demoralise those courageous winners...insisting that they feel apoorna...

      r anuradha ji - i salute u and others like you. i personally know some ladies who have emerged victorious - and NONE of them feel APOORNA ... u r not - u probably are more poorn than the others - because u have fought and defeated this disease - and u give strength to others

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  2. Rachna ji

    I haven't read the other links, but i agree with you on the point that posts concentrating on the physical beauty / loss of "beauty" and equating human beauty to woman's body parts is a sure way of making women DIE OF of a disease which could have been cured :(

    i salute people like anuradha ji and jodi jacks.

    BUT there is nothing wrong with treatments being developed if women DO want to use them. but again the fact remains that WHY should women have to be forced to buy such beauty symbols, because of social pressure to be "beautiful". very complicated ... :(

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  3. I do agree with your views Rachna. we need to understand the very basic concept of woman and feminism. kudos for this post.

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  4. कैंसर पर और वह भी स्तन कैंसर को लोग चर्चा और कविता का विषय बना कर उसे नारी स्वरूप को विद्रूप बनाने वाला साबित कर रहे हें. ये जो जिस पर किसी का वश नहीं होता और शरीर तो सब एक जैसा लेकर ही पैदा होते हें फिर उसकी व्याधि को चर्चा का विषय बना लिया जाय. वह भी पुरुष जो उस दर्द को समझ ही नहीं सकता है. अगर जीवन साथी के इस व्याधि से ग्रस्त होने पर उसके साथी से पूछा जाय कि क्या वह एक पुरुष होने के नाते यही महसूस करता है. नहीं , उसे शरीर के इस अंग से नहीं बल्कि उस नारी के ह्रदय और उसके अस्तित्व से प्रेम होता है और वह किसी भी हालात में उसको जीवित और अपने साथ देखना चाहता है. ये कविता किसी बड़े कवि के जीवन में ऐसा घटित होने के बाद भी नहीं लिखी जायेगी.

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    1. आप एक परिजन खो चुकी हैं कैंसर से , कितनी कोशिश की थी सब ने की वो किसी भी रूप में बच जाये , हाथ पेर ना रहे तब भी , आप की बहिन कितना अपने हमसफ़र को फिर भी चाहती रही थी आप की वो पोस्ट और आप से फ़ोन पर उस समय की हुई बात याद हैं मुझे

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    2. रेखा श्रीवास्तव से सहमत

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  5. कोई उनसे जाकर पूछे जो इस दौर से गुजरतीं हैं, उन्हें अपना वक्ष प्रिय था या प्राण..
    एक से एक सुन्दर इन्सान उम्र के साथ बन्दर हो जाता है, वो वक्ष जो प्राण लेने पर उतारू हो उसका नहीं होना ही ठीक है, और अगर इस कमी की वजह से कोई किसी को असुंदर दिखती है, तो देखने वाले के दिमाग ईलाज होना चाहिए, ख़ूबसूरती ३४-३२-३४ के इतर भी होती है...देखने वाली नज़र चाहिए...

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    1. ख़ूबसूरती ३४-३२-३४ के इतर भी होती है
      @ada ji

      भी को ही कर दे तो कैसा रहे

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    2. बहुत 'ही' बढ़िया रहेगा, :) अभी 'ही' कीये देते हैं :)
      बल्कि यही होना 'ही' चाहिए..
      ख़ूबसूरती ३४-३२-३४ के इतर 'ही' होती है

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    3. :)
      khoobsoorati insan ke insaan hone me hoti hai :)

      HI hoti hai ....

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  6. रचना जी, अनुराधा जी, शिल्पा जी, रेखा श्रीवास्तव जी और अदा जी से पूरी तरह सहमत.

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    1. वंदनाजी की कविता अभी पढ़ नहीं पाई हूँ , मगर इन सबके विचारों से सहमत हूँ कि खूबसूरती सिर्फ शरीर ही नहीं है ! शरीर के एक अंग की बीमारी इंसान को बदसूरत नहीं बनाती बल्कि विचार और चरित्र ही किसी व्यक्ति को खूबसूरत या बदसूरत बनाते हैं !

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    1. इस विचार विमर्श के साथ "सुन्दर" शब्द अजीब सा लग रहा है।

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  8. दो अपनों (1महिला 1पुरुष) को कैंसर के कारण खो चुका हूं।
    कुछ समय पहले अनुराधा जी का ब्लॉग पढता था। वहां इस व्याधि के शापितों को इससे लडने की ऊर्जा मिलती है।
    वहां एक विजेता मुस्कुराते हुये दूसरों को भी विजयी होने का आवाह्न करता नजर आता है।
    क्या इस लडाई में विजयी होने पर कैंसर पीडिता की सुन्दरता समाप्त हो जाती है?

    प्रणाम

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    1. क्या इस लडाई में विजयी होने पर कैंसर पीडिता की सुन्दरता समाप्त हो जाती है?

      उत्तर आप ही दे अंतर सोहेल

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    2. anuradha is a role model and ideal for me

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    3. @ anuradha is a role model and ideal for me

      correction

      for many of us - many many of us

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  9. मुझे लगता है की ऐसी अवस्था में साथी का आत्मिक प्यार सबसे बड़ा संबल होता है ... इस स्थिति में अंग विहीन जैसी बात नहीं होनी चाहिए ... स्त्री की किसी भी तरह की मानसिक पीड़ा को उसके साथ जुड़े हर पुरुष को समझना चाहिए ...
    असल सुंदरता मन की होती है ...

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  10. रचना जी और अनुराधा जी की इस बात से तो सहमत हूँ कि इसे नारीत्व या मातृत्व में कमी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और निश्चित रूप से इससे समाज में एक गलत संदेश ही जाएगा.यहाँ तक तो ठीक...
    लेकिन वंदना जी की कम से कम इस बात से मैं सहमत हूँ कि हर एक महिला मैं अनुराधा जी जैसा जज्बा हो ये जरूरी नहीं हैं.एक व्यक्ति चाहे वह महिला हो या पुरुष किसी भी कारण से शरीर का कोई अंग गँवा देने के बाद भीतर से टूट तो जाता हैं चाहे वह समाज की सोच की परवाह बिल्कुल न करता हो या भीतर से कितना ही मजबूत क्यों न रहा हो बाद में वह धीरे जीने के लिए एक जज्बा बटोरना शुरु करता है और कामयाब भी होता हैं.हाँ अपवाद हो सकते हैं जिन्हें विकलांग हो जाने पर भी कभी कोई फर्क न पडे.इस बिमारी से होकर गुजर चुकी महिला क्या सोचती हैं इसके बारे में वंदना जी ने अपने हिसाब से लिखा जिससे असहमत हुआ जा सकता हैं लेकिन ये आरोप लगाना थोडा ज्यादा जजमेंटल हो जाना हैं कि ऐसा करना कोई दया दिखाना हैं.और चलिए मान लीजिए ऐसा हैं तो फिर आप दोनों( रचना जी और अनुराधा जी) का ये कहना क्या कहलाएगा कि उन्हे हिम्मत बंधानी चाहिए.इस तरह तो ये भी एक तरह से दया दिखाना ही हैं.बहुत से विकलांग व्यक्ति इस तरह का विशेष व्यवहार से भी असहज महसूस करते हैं और ये भी तो उनमें हीन भावना भरता हैं ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैंने कई विकलांग व्यक्तियों को ये बात कहते सुना हैं.इस हिसाब से तो फिर कुछ भी नहीं लिख सकते.

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    1. राजन
      मैने कहीं भी दया की बात की ही नहीं हैं मैने केवल ये कहा हैं की क्अपूर्णता का एहसास उसको हैं ये बात क्या किसी कैंसर के मरीज ने कही हैं , क्यूँ कैंसर का मरीज , मरीज नहीं विजेता कहलाता हैं क्युकी वो मृत्यु को जीत कर आया हैं
      क्या आप एक भी लिंक , किताब कहीं से भी रेफेर के रूप में दे सकती हैं जहां अपूर्णता का एहसास का जिक्र किया हो किसी महिला ने जिसने कैंसर को जीता हो



      यहाँ मुद्दा विकलांगता नहीं हैं यहाँ मुद्दा और भी गंभीर हैं , मुद्दा हैं ब्रेस्ट कैंसर और उसकी वजह से ना जाने कितनी महिला मौत के मुह में जा रही केवल इसी भावना की वजह से की लोग उनके वक्ष का स्थान खाली देख कर क्या सोचेगे . यहाँ ना तो दया की बात हैं और ना ही विकलांगता की , यहाँ बात हैं जागरूकता की , बात हैं बीमारी को बीमारी समझने की ना की अंग का खंडित होने की .
      आज पहली बार लगा आपके कमेन्ट से मुद्दा भटका पर हो सकता हैं आप ने ब्रेस्ट कैंसर के विषय में उतना ना पढ़ा हो इस लिये आप ने उसको विकलांगता से जोड़ दिया
      एक लिंक दे रही हूँ पढ़े जरुर http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2011-02-26/india/28636118_1_breast-cancer-cancer-cases-cancer-registries

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    2. This comment has been removed by the author.

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    3. My previous comment got posted with some typing errors. Will delete the previous one..

      एक सैनिक जो समर में, अपना पाँव गवाँ कर और जीत कर आता है,
      क्या वो दुखी होता है ?
      क्या वह दया का पात्र है ?
      क्या उससे यह कहना कि हमें तुम पर नाज़ है, उसे छोटा दिखाता है ? नहीं,हरगिज़ नहीं...वो नमन का पात्र होता है, शौर्य का प्रतीक होता है...उसके सामने सारे दो पाँव वाले झुकते हैं..क्योंकि वो एक फाइटर है.. उसे आत्मसंतोष रहता है कि, न सिर्फ़ उसने ये लड़ाई जीती है, उसने अपना फ़र्ज़ निभाया है और अपने प्राणों की रक्षा करके वो घर लौट आया है, उसकी एक टाँग गई है तो क्या हुआ...बाकी सबकुछ उसके पास है...जो उसे अच्छा जीवन जीने से नहीं रोक सकते...

      ब्रेस्ट कैंसर से ग्रसित ज्यादर स्त्रियाँ, ठीक ही तब होती है, जब वो फाइटर होती है...कहते हैं किसी भी बिमारी से आधी मुक्ति तो मनोबल से ही मिल जाता है, यह बिमारी भी अपवाद नहीं..
      जब कोई स्त्री इस बीमारी से मुक्ति पाकर घर लौटती है, तो सिर्फ़ दवा ने काम नहीं किया होता है, उसके अपनों की दुआ, उसका अपना फाइटिंग स्पिरिट. और अपने प्रति उसका सम्मान भी काम करता है..ऐसी बहादुर स्त्री .इस बात का उदाहरण बन जाती है, क़ि कैसे विपरीत परिस्थियों का जम कर मुकाबला किया जा सकता है ..

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  11. आने में काफी देर कर दी मैंने | वंदना जी की पोस्ट तो पढ़ी किन्तु कविता जी की पोस्ट नहीं पढ़ी है टिप्पणी को उसी तरह देखा जाये | नारी स्तनों को उसके स्त्री होने और ममता से इतना ज्यादा जोड़ा जाना समझ नहीं आ रहा है | क्या ममता से इसे जोड़ कर हम उन स्त्रियों का अपमान नहीं कर रहे है जो बच्चे को गोद ले कर माँ बनी है या जो किसी अन्य कारण से अपने बच्चे को स्तनपान नहीं कर पति है क्या वो सब अधूरी माँ होती है | अपने किसी अंग का जाना जरुर कष्ट कारी है किन्तु वो पीड़ा एक समय बाद समाप्त हो जाती है बाद में पीड़ा समाज की इस तरह की सोच और बातो से होती है | मेरे भी एक जानपहचान की महिला ने अपने एक स्तन को कैंसर के कारण निकलवा दिया था ४५ साल से ऊपर के आयु की थी बेटी का विवाह हो चूका था लेकिन कही भी जाती सब एक दूसरो को बताते की देखो " बेचारी " के कैंसर के कारण इनके एक स्तन नहीं है और हर व्यक्ति स्त्री या पुरुष अपनी नजरो से उनके स्तनों को टटोलने लगता था जो उत्तर भारतीय तरीके साड़ी पहने के कारण साफ नहीं दिखता था लोगों को ऐसा करते देख गुस्सा आता था सोचती थी की इनकी आयु कम होती तो लोगों का ये व्यवहार कितना कष्ट देता उन्हें | कैंसर जैसी बीमारी खासकर स्तन कैसर को लेकर लोगों की ये सोच उससे पीड़ित लोगों की पीड़ा को ज्यादा कर देती है | फिर ये बात भी समझ नहीं आती है जब मात्र स्तन ना होने को अधुरा कहा जा रहा है तो उन स्त्रियों को क्या कहेंगे जो गर्भास्य के कैंसर के कारण या किसी अन्य बीमारी के कारण उसे पूरी तरह से निकलवा चुकि है तब तो शायद उन्हें स्त्री ही ना कहा जाये क्योकि वो बच्चे को जन्म ही नहीं दे सकती है , स्तन से ज्यादा गर्भास्य को स्त्री को स्त्री होने से जोड़ा जाता है और हमारे देश में तो इस तरह की महिलाओ की संख्या कही ज्यादा है , सोचने का ये तरीका बिल्कुल गलत है |

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  12. दूसरी बात स्त्री के साथ हमेसा सुन्दरता को क्यों जोड़ा जाता है क्यों ये जरुरी बना दिया जाता है की यदि कोई स्त्री है तो उसे शारीरिक रूप से हमेसा सुन्दर ही दिखना चाहिए , समाज की सोच का दबाव एक स्त्री पर कितना होता है जरा उदाहरन देखीये , २० दिन पहले टीवी पर ऋतिक रोशन की बहन को देखा जो दो बच्चो की माँ थी जब उन्हें अपने गर्भाशय के कैंसर के बारे में पता चला तो जहा उनके भाई और माँ उनकी बीमारी को कैसे ठीक किया जाये इस पर डाक्टर से विमर्श कर रहे थे उन्होंने डाक्टर से मिलते ही कहा की डाक्टर क्या आप मेरे बाल बचा सकते है निश्चित रूप से उन्हें इस बात की चिंता थी की कैंसर का उपचार उनकी सुन्दरता को बहुत ज्यादा प्रभावित कर देगा , ये लोगों की उस सोच का नतीजा है जो कैसर के बारे में ये बाते सोचता है | वो आगे कहती है की उन्होंने बीमारी का इलाज शुरू होते है खुद से अपने सारे बाल निकलवा दिये वो कहती है की इलाज के दौरान रोज रोज उन्हें गिरता हुआ देखना कष्टकारी था इसलिए पहले ही सारे बाल एक बार में ही निकाल कर विग पहन लिया जो उन्हें मानसिक रूप से और मजबूत कर गया | उनकी बाते सुन थोडा आश्चर्य हुआ की उन्हें उस समय में भी अपने बलों की अपनी सुनदरता की चिन्ता थी , वही समाज की सोचा का प्रभाव था , उन्होंने बताया की जिस समज से वो आती है वहा भी लोगों की सोच कैसर को लेकर एक ही थी मौत और उसके इलाज का ये बदसूरत तरीका | आज वो स्वस्थ है और कहती है की मेरी इस बीमारी पर जीत ने लोगों का नजरिया बदला है | आप ने सही कहा की हमें इस बीमारी से लड़ कर बाहर आने वालो को विजेता के रूप में याद करना चाहिए ताकि दूसरे भी इस बीमारी का डट कर हिम्मत से मुकाबला कर सके ना की इस तरत की सोच आगे बढ़ कर उनमे ये डर पैदा करना चाहिए की देखो इलाज कर कर तुम भले ही ठीक हो जाओ पर तुम समाज के लिए लोगों के लिए अधूरी हो जाओगी |

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  13. एक हौसला अफजाई कितना काम आता है मुझसे पूछिये साल भर पहले चाची को कैन्सर होने का पता चला और इलाज के दौरान उनके सारे बाल चले गये साथ ही वो बहुत ही कमजोर हो गई इस बीच इकलौती और पहली बेटी की शादी भी थी बेचारी अपने दशा को लेकर इतनी परेशान थी की घर से बाहर ही नहीं निकलती थी और रिश्तेदारों से मिलने में झिझक रही थी कैमरों से दूर भाग रही थी | घर में दूसरे बच्चो ने तुरंत उसे समझा और उन्हें विग ला कर दिया और उन्हें शादी कितैयारियो के लिए उतसाहित किया , पूरे विवाह के दौरान उन्हें ये एहसास दिलाया जाता रहा है वो बिल्कुल पहले की जैसे ही है उनमे कुछ भी बदलाव नहीं आया है बल्कि बार बार सभी के द्वारा कहा जाता रहा की वो बहुत ही अच्छी दिख रही है विवाह के दिन वो बहुत कुछ सामान्य हो गई थी उसका एक ही कारण था की सब उनकी हौसला अफजाई कर रहे थे ना की बेचारी बीमारी की मारी जैसी बातो से उनका मनोबल गिरा रहे थे |

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  14. anshumala - i agree with all three comments -

    but i think it is not the thought of "beauty" which wud have been the prime cause of the lady's disturbance, losing any part of ourselves to any treatment / disease is temporarily disturbing to a person. wearing a wig is a method to boost one's own self confid - not for looking nice to others (i think.)

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  15. रचना जी अब चूँकी मुझे खुदको लग रहा था कि विषय भटक रहा हैं इसलिए मैं जवाब देने से बच रहा था लेकिन अब निवेदन हैं कि एक बार मुझे अपने जवाब दे लेने दीजिए बाद में आप चाहे तो कमेंट्स हटा सकती हैं.विकलांगों वाला विषय बीच में केवल अपनी बात को समझाने के लिए लाया एक मजबूरी थी वर्ना मैं निजी तौर पर इस शब्द का प्रयोग किसीके लिए भी गलत मानता हूँ.अब देखिए वहाँ अनामिका जी ने स्तन कैंसर से पीडित महिला की मनोदशा बताते हुए एक अजीबो गरीब कविता लिखी और वंदना जी ने उसके जवाब में कविता लिखी कि नहीं वह ऐसा सोचता होगी जो कि मुझे यथार्थ के करीब लगी एक आम स्त्री ऐसा ही सोचेगी हाँ अपवादों के लिए स्थान मैंने भी रखा हैं लेकिन एक आम व्यक्ति जो अपना कोई अंग बीमारी में गँवा चुका हो एकबारगी निराश तो होता हैं.आप पूछ रही हैं कि किस महिला को आपने ऐसा कहते सुना पर मुझे तो लगा कि उसी टिप्पणी में आप बता भी रही हैं कि बहुत सी महिलाएँ दुखी होती हैं अब किस कारण से होती हैं ये अलग बात हैं पर होती हैं ये पक्का है.और फिर भी मैंने कहा हैं कि ऐसी महिला अपने जज्बे से बीमारी पर विजय भी पा लेती हैं.हाँ वंदना जी के जवाब में आपने विकल्प दिया कि 'ऐसा होना चाहिए' तो उस पर मैंने पहले ही सहमति जताई हैं और वंदना जी की कविता से असहमति.लेकिन मैं नहीं मानता कि उनका मंतव्य उस महिला को हीन दिखाना रहा होगा या पुरुष का महिमामंडन जैसा.आप कह सकती हैं कि आपने ऐसा नहीं कहा लेकिन सफाई अपनी तरफ से वंदना जी भी दे ही रही हैं.और ये शिकायत केवल आपसे नहीं थी.साहित्य समाज का दर्पण हैं वह हमें यह भी बताता हैं कि क्या हैं तो यह भी कि क्या होना चाहिए.महिलाओं की बेबसी पर कई कविताएँ आपने पढी होंगी जो समाज में महिलाओं की दोयम स्थिति और दुख को व्यक्त करती हैं लेकिन ऐसे रचनाकार के बारे में ये कैसे कह सकते हैं कि वह चाहता हैं महिला का ये दुख यूँ ही बना रहे या वह कोई दया दिखा रहा हैं या महिलाओं को कमतर साबित कर रहा हैं? हाँ विकल्प के तौर पर आप कोई नया तरीका या विचार दें तो उससे सहमत हुआ जा सकता हैं.
    निष्कर्ष के तौर पर मैं पहले ही कह चुका हूँ कि आपका नजरिया ज्यादा सकारात्मक हैं.इस पर तो कोई बहस हैं ही नहीं.

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    1. raajan ji, i dont think we are questioning vandana ji's motive (mantavya) - what we are saying is - she meant well - but it could probably have the boomerang effect and hurt the very woman whose pain she is feeling and stating in her poem. she is trying to put their pain in words. but unintentionally, those very words may increase the pain of a future patient...

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    2. उनका मंतव्य महिला को हीन दिखाना नहीं हैं
      राजन आप मुद्दा समझ ही नहीं रहे हैं , कौन साहित्य में क्या लिख रहा हैं , क्यूँ लिख रहा हैं मुद्दा ये है ही नहीं , मुद्दा हैं की कविता में जो भाव / थीम लिया हैं वो उन महिला को नुक्सान पहुचा सकता हैं जो कैंसर से पीड़ित हैं अगर बाद किस्मती से वो ऐसी कविता को पढ़ती हैं , जिस अपंगता का एहसास , खंडित होने का एहसास और दर्द स्तन को खो कर जीने का , इत्यादि किसी कैंसर पीडिता के लिये जहर का काम कर सकते हैं . वो ओपरेशन ना करने का फैसला भी ले सकती हैं .
      क्या एक जिन्दगी जो बच सकती हैं एक स्तन या दोनों को खो कर उसको बचाना जरुरी हैं या उसके स्तन को बचा कर उसको अखंडित चिता पर सजाना जरुरी हैं
      राजन सोचिये और समझिये यहाँ एक मिनट का फैसला जीवन और मरन का कारण होता हैं और आप कविता की निहित में उलझ गये हैं

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  16. रचना जी अब चूँकी मुझे खुदको लग रहा था कि विषय भटक रहा हैं इसलिए मैं जवाब देने से बच रहा था लेकिन अब निवेदन हैं कि एक बार मुझे अपने जवाब दे लेने दीजिए बाद में आप चाहे तो कमेंट्स हटा सकती हैं.विकलांगों वाला विषय बीच में केवल अपनी बात को समझाने के लिए लाया एक मजबूरी थी वर्ना मैं निजी तौर पर इस शब्द का प्रयोग किसीके लिए भी गलत मानता हूँ.अब देखिए वहाँ अनामिका जी ने स्तन कैंसर से पीडित महिला की मनोदशा बताते हुए एक अजीबो गरीब कविता लिखी और वंदना जी ने उसके जवाब में कविता लिखी कि नहीं वह ऐसा सोचता होगी जो कि मुझे यथार्थ के करीब लगी एक आम स्त्री ऐसा ही सोचेगी हाँ अपवादों के लिए स्थान मैंने भी रखा हैं लेकिन एक आम व्यक्ति जो अपना कोई अंग बीमारी में गँवा चुका हो एकबारगी निराश तो होता हैं.आप पूछ रही हैं कि किस महिला को आपने ऐसा कहते सुना पर मुझे तो लगा कि उसी टिप्पणी में आप बता भी रही हैं कि बहुत सी महिलाएँ दुखी होती हैं अब किस कारण से होती हैं ये अलग बात हैं पर होती हैं ये पक्का है.और फिर भी मैंने कहा हैं कि ऐसी महिला अपने जज्बे से बीमारी पर विजय भी पा लेती हैं.हाँ वंदना जी के जवाब में आपने विकल्प दिया कि 'ऐसा होना चाहिए' तो उस पर मैंने पहले ही सहमति जताई हैं और वंदना जी की कविता से असहमति.लेकिन मैं नहीं मानता कि उनका मंतव्य उस महिला को हीन दिखाना रहा होगा या पुरुष का महिमामंडन जैसा.आप कह सकती हैं कि आपने ऐसा नहीं कहा लेकिन सफाई अपनी तरफ से वंदना जी भी दे ही रही हैं.और ये शिकायत केवल आपसे नहीं थी.साहित्य समाज का दर्पण हैं वह हमें यह भी बताता हैं कि क्या हैं तो यह भी कि क्या होना चाहिए.महिलाओं की बेबसी पर कई कविताएँ आपने पढी होंगी जो समाज में महिलाओं की दोयम स्थिति और दुख को व्यक्त करती हैं लेकिन ऐसे रचनाकार के बारे में ये कैसे कह सकते हैं कि वह चाहता हैं महिला का ये दुख यूँ ही बना रहे या वह कोई दया दिखा रहा हैं या महिलाओं को कमतर साबित कर रहा हैं? हाँ विकल्प के तौर पर आप कोई नया तरीका या विचार दें तो उससे सहमत हुआ जा सकता हैं.
    निष्कर्ष के तौर पर मैं पहले ही कह चुका हूँ कि आपका नजरिया ज्यादा सकारात्मक हैं.इस पर तो कोई बहस हैं ही नहीं.

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  17. अदा जी,ये तो मैं पहले ही अपनी टिप्पणी में कह चुका हूँ कि कैंसर से जूझ रहा व्यक्ति में जज्बा होता हैं और इसीके बल पर वह बीमारी पर विजय पाता हैं.और निश्चित रूप से उनका जज्बा हमारे लिए भी प्रेरणा का सबब हैं.वहाँ मैंने ये बात केवल अपनी समझ के अनुसार नहीं कही बल्कि कई विकलांग(माफी चाहूँगा इस शब्द के लिए) व्यक्तियों को ये शिकायत करते सुना हैं कि उन्हें सामान्य व्यक्तियों की तरह ट्रीट क्यों नहीं किया जाता? वहाँ ऊपर ये बात आई थी कि कैंसर पीडित महिला को समझाओ कि जीवन क्या होता हैं और शारीरिक सुंदरता कुछ नहीं हैं आदि आदि तो इस पर मैंने कहा था कि यदि ऐसा कोई विशेष व्यवहार भी आप पीडित के साथ करते हैं तो इससे भी वह असहज महसूस करता हैं जबकि होना ये चाहिए कि स्तन कैंसर को भी एक सामान्य बीमारी माना जाना चाहिए और किसी भी दुर्घटना में अपना कोई अंग गँवा चुके व्यक्ति से भी सामान्य व्ववहार करना चाहिए.
    युद्ध में लडने और अपनी एक टाँग खो चुके फौजी और कैंसर में अपना कोई अंग गँवा चुके व्यक्ति में ये समानता तो आपने सही बताई कि दोनों योद्धा हैं दोनों में ही जज्बा एक सा हैं और दोनों ही अपना कोई अंग गँवा देने के बावजूद विजेता कहलाएँगे लेकिन ध्यान रहे फौजी मोर्चे पर जाने से पहले हर तरह की परिस्थिति के लिए तैयार रहता हैं कि उसके साथ कुछ भी हो सकता हैं यहाँ तक कि मृत्यु भी.उसने बकायदा ट्रेनिंग भी ली होती हैं(इस हिसाब से देखा जाए तो कैंसर से लडने के लिए बल्कि ज्यादा जज्बा चाहिए) लेकिन कैंसर में ऐसा नहीं होता वह अचनाक से आई एकदम अनचाही स्थिति होती हैं इसीलिए मरीज एकदम से नहीं संभल पाता और उसे अपना अंग गँवाने का दुख होता है भले ही वह धीरे धीरे इससे उबर जाए.फौज में जाकर देश के लिए मर मिटने का ख्वाब या जूनून बहुत से लोगों में होता हैं.पर कैंसर हम अपने लिए नहीं चाहते यहाँ तक कि जो कैंसर से लडकर जीते हैं वो भी नहीं चाहेंगे कि किसी और के साथ ऐसा हो इसीलिए यह बिमारी है वर्ना इसे व्याधि न कहा जाए.

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  18. अंशुमाला जी,आप लोगों ने उन्हें व्हिग लाकर क्यों दिया?यदि बालों को नुकसान हुआ तो क्या सुंदरता तो मन की होती हैं फिर इस तरह का कृत्य कर फिर से महिला की खूबसूरती का ही महिमामंडन किसलिए?
    चलिए समाज की सोच एक बाधा हैं वर्ना शायद आपकी चाचीजी को कोई फर्क न पडता लेकिन एक बार तो उन्हें दुख हुआ ही होगा अपने बालों को खोकर? लेकिन इस सच्चाई को स्वीकार कर लेने में इतनी लाग लपेट क्यों की जाए?हाँ करना ये ही चाहिए था जो आप लोगों ने किया यानी हौसला अफजाई.लेकिन ये एक सच्चाई हैं कि वो व्यक्ति एक बार खुद को कमजोर तो पाता हैं जबकि उसे किसी बीमारी के कारण टाँग गँवानी पडे या बाल या हाथ या आँख.महिलाओं के बारे में उनकी खूबसूरती को इतना महत्तव दिया जाता हैं इसलिए उनकी पीडा बढ जाती हैं (इससे मैं सहमत हूँ)हालाँकि कुछ हद तक ये स्वाभाविक भी होता हैं.लडकों की सुंदरता को विशेष महत्तव नहीं दिया जाता लेकिन यकीन मानिए यदि किसी लडके के साथ भी यदि दुर्घटनावश या बीमारी के कारण ऐसा हो जाए कि उसका चेहरा कुरुप हो जाए या रंग साँवला पड जाए आँख में भेंगापन आ जाए या चेहरे पर कोई सफेद दाग ही उभर आए तो उनमें भी वैसी ही हीन भावना आती हैं.एक बिमारी का नाम याद नहीं आ रहा जिसमें पुरुष के सीने का उभार थोडा बढ जाता हैं और यह स्थिति उनके लिए भी शर्मिंदगी का सबब होती हैं.मातृत्व को महिंमामंडित किया गया हैं लेकिन ध्यान रहे यदि पुरुष भी पिता बनने में सक्षम न हो तो समाज उसे भी पुरुष मानने से इंकार कर देता हैं और ऐसे पुरुष भी खुद को दूसरों की तुलना में हीन मानते हैं.अब कोई इस तरह की तमाम परिस्थितियों से गुजर रहे पुरुष की मनोव्यथा के बारे में लिख दे कि कैसे वह खुद को हीन पा रहा हैं तो हमें उसके मंतव्य पर सवाल क्यों उठाने चाहिए कि वह उसका मनोबल तोडना चाहता हैं?हाँ लेकिन सही तरीका बताया जाना चाहिए जो कि आप समेत दूसरे टिप्पणीकारों ने बताया भी ,उससे कौन असहमत हो सकता है?

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    1. विग लगाना और क्रत्रिम ब्रा पहन कर स्तन का लगाना दो बिलकुल अलग बाते हैं , एक में दर्द नहीं होता , दूसरे में होता हैं . सेलेब्रिटी की बात ना करना इस समय बेहतर होगा क्युकी उनकी जीवन शैली / रोजगार सौन्दर्य से जुडा हैं सो उनके लिये सुंदर दिखना अति आवश्यक हैं बाकी ये व्यक्ति से व्यक्ति पर निर्भर करता हैं की वो क्या पसंद करता हैं और क्या उसे सही लगता हैं ,

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    2. राजन जी
      मैंने ये नहीं कहा है की यदि शरीर का कोई अंग ना हो तो नकली अंगो को लगाना ही नहीं चाहिए बेहतर बनाने के लिए कुछ करना ही नहीं चाहिए , बिल्कुल करना चाहिए किन्तु अब उसके बाद ये कहा जाये की ये तो फिर भी नकली है आप अधूरे है जैसी बाते गलत है | मैंने ये भी नहीं कहा है की आप के शरीर का कोई अंग काट दिया जाये तो दर्द नहीं होगा
      " अपने किसी अंग का जाना जरुर कष्ट कारी है किन्तु वो पीड़ा एक समय बाद समाप्त हो जाती है बाद में पीड़ा समाज की इस तरह की सोच और बातो से होती है " ये मैंने पहली ही टिप्पणी में कहा है लोग बार बार आप के दर्द की तरफ उँगली कर उसे और बढाते है वरना बड़े से बड़ा जख्म शरीर का या मन का भर ही जाता है पर ये लोगों की सोच होती है जो बार बार उसे हरा कर देती है | जैसे रचना जी ने कहा की एक भी महिला ये जान ले की इलाज के बाद उसे समाज इस रूप में देखेगा तो क्या उसकी हिम्मत नहीं टूट जाएगी वैसे तो ये पूरी थेरपी ही अपने आप में बहुत कष्टकारी है किन्तु इतने कष्टों के बाद भी किसी महिला को ये सुनने को मिले की वो अधूरी है निश्चित रूप से ये मनोबल तोड़ने वाली बात है |

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  19. jise jo bhaye
    wh usi ke gun gaaye.

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  20. अंतर सोहिल, Er Shilpa Mehta, राजन, रचना, अदा, निशांत मिश्र...(और सभी,जिन्होंने मेरे बारे में सोचा) अब मैं ब्लॉग पर कम ही जाती हूं। लेकिन इस बीच फेसबुक पर कैंसर की जानकारी को समर्पित एक पेज बनाया है। वह Public है। पता है- http://www.facebook.com/BoneMetastasesInBreastCancer. आप सबका वहां स्वागत है। वह मेरा रोजनामचा भी है। जरूर Like करें।

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  21. विषय की गंभीरता बहुत बडी है टिप्पणी देने की बजाय एक ही बात कहना चाहूंगा कि आपका प्रयास बहुत अच्छा है । बाकी नारियो का मंच है नारियो का विषय किसी और विषय पर फिर आयेंगे

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  22. @ vनारी के वक्ष उसका सौंदर्य नहीं , नारी का जीवित होना उसका सौन्दर्य हैं...

    जीवन रक्षा से बड़ा कुछ हो ही नहीं सकता !

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  23. अब रचना जी के लेख के बारे में क्या विचार हैं या वंदना जी की कविता के बारे में मेरे क्या विचार हैं ये मैं कितनी बार दोहराऊ?शिल्पा जी ऊपर की कुछ टिप्पणियाँ पढकर देख सकती हैं जैसा मुझे लगा वैसा मैंने कहा वर्ना पोस्ट तक सब ठीक था.अब हर एक पाठक एक ही तरीके से नहीं सोचता हैं फिर भी आप कहते हैं कि आपका इरादा ये नहीं था तो मान भी लूँगा क्योंकि टीपें आपकी थी तो भावनाएँ भी आपकी होंगी.और अंशुमाला जी मेरे जवाब में आप जो अपनी पहली टिप्पणी से कोट कर कुछ बता रही हैं वह बात सबसे पहले यहाँ मैंने ही कही हैं.फिर भी आपसे इसलिए पूछा(बल्कि आप देख रही होंगी मैंने आपको जवाब के लिए उकसाया हैं) क्योंकि मैं एक दो बातें खुद आपसे कहलवाना चाहता था जो आपने कही भी.ये बहुत ही स्वाभाविक सी बात है कि ऐसी स्थिति में वह मरीज और उसके चाहने वाले अपनी तरफ से कोई बेहतर विकल्प तो अपनाना चाहेंगे.यहाँ कोई किसीको दीन हीन नहीं समझ रहा और न कोई सुंदरता का महिमामंडन कर रहा हैं.इसलिए ये थ्योरी हर जगह नहीं चलेगी.लेकिन फिर भी वंदना जी कि कविता से क्या असर होगा ये पहले ही लिख चुका हूँ.
    रचना जी,आप इस कमेंट या मेरे किसी भी कमेंट को हटाने के लिए स्वतंत्र हैं.मुद्दा भटकाना मेरा मकसद नहीं था.

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    1. राजन
      आप मेरे बहुत पुराने पाठक हैं इस लिये आप की टिपण्णी को मै बहुत सीरियस मानती हूँ

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  24. यहाँ कविता / कवि का आकलन नहीं हैं यहाँ मात्र कविता के थीम की बात हैं
    वंदना मेरी ब्लोग्गर दोस्त हैं और रहेगी . कौन कविता कैसे लिखता हैं ये उसका अपना नज़रिया हैं और रहेगा , बस कैंसर से लड़ने के लिये , उसको जीतने के लिये और उसको जीतने की प्रक्रिया में शल्य चिकित्सा करवाने वाले के लिये ये कविता डीप रेस करने वाली होगी ये यहाँ आये पाठको के कमेन्ट से पता चल गया हैं , इस पोस्ट का वंदना की कविता लिखें की कैपेबिलिटी पर क़ोई कमेन्ट आगे ना दिया जाये . वरना मोडरेट करना होगा

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  25. .
    .
    .

    समय कम मिलता है आजकल, देर से विमर्श में शामिल हो रहा हूँ इसलिये क्षमा चाहता हूँ... पर मैं राजन जी के साथ हूँ... नारी वाद को अतिवादी नहीं होना चाहिये व कवि-रचनाकार के Creative license का सम्मान करना चाहिये... उदाहरण के लिये सोचिये कि किसी पुरूष के penis के ऊपर कोई Malignant Growth हो जाती है व उसकी जान बचाने के लिये उसके यौनांग निकाल दिये जाते हैं तो कैंसर के ऊपर जीत जाने, विजेता या नायक होने, असली पुरूष होने आदि आदि के तमाम दावों के बावजूद भी यह तो हो ही सकता है कि ऐसे कुछ पुरूष अपने में एक अपूर्णता, जिंदगी में कुछ कमी महसूस करें, कुछ पूरी तरह से टूट भी सकते हैं... अब उस दर्द को वह स्वयं या दूसरा कोई कवि अभिव्यक्ति देता है, इससे एक तरह का Catharsis होता है, पीड़ित को कुछ राहत मिलती है.... तो किसी को भी इसमें बाकी पुरूष कैंसर पीड़ितों के प्रति असंवेदनशीलता की बात कह उस कविता पर सवाल उठाने की जरूरत ही क्या है... एक परिपक्वता की दरकार है आज हम सभी से...



    आभार!



    ...

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    1. उस कविता पर सवाल उठाने की जरूरत ही क्या है

      पहली बात
      वंदना ने कविता पर खुद विमर्श का अवाहन किया हैं
      कविता का शीर्षक देखिये
      दूसरी बात आर अनुराधा का कहना देखिये

      साहित्य का एक मकसद होता है। वह एक समानांतर समाज खड़ा करने में योगदान करता है

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    2. @ प्रवीण जी - यह नारिवादिता नहीं- मानवतावादिता है | इस बात का न सम्बन्ध breast से है, न penis से है - इसका सम्बन्ध cancer , life , and death से है | इसका सम्बन्ध इससे है कि हमारी रचना - चाहे वह रचना काव्यात्मक दृष्टि से इतनी सुन्दर हो कि नोबल प्राइज़ जीते - परन्तु क्या वह संभावित तौर पर एक भी इंसान को जीवनरक्षक इलाज़ से रोक सकती है ? हम बात यह कर रहे हैं | वंदनाजी के उद्देश्य , या उनकी कविताई के ऊपर यहाँ कोई भी सवाल नहीं उठा रहा |

      जैसे आपने उदाहरण दिया - यदि वह पुरुष "अपूर्ण" अनुभव करे - तो आवश्यकता उसे counsel कर के यह विश्वास दिलाने की है कि इसके अभाव में भी जीवन सम्पूर्ण हो सकता है, जीवन सिर्फ शरीर भर ही नहीं है | न कि उसकी हाँ में हाँ मिला कर उसे और depress किया जाए कि हाँ - अब तुम अपूर्ण हो गए हो | and such counselling needs to be done privately in professionally trained doctors' clinics / psychiatrists' clinics / home with loving and caring family members, for whom the survival of the loved one is the shining sun which wipes away all rain water puddles of loss of body parts.. NOT by self professed experts who think they "understand" the person's feelings and unintentionally rub salt on wounds. यह बात नारी और पुरुष दोनों ही के लिए सामान रूप से लागू होती है |

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  26. यह सत्य है कि कुछ लोग अंग खोने को बड़ी गम्भीरता से लेते हैं पर सभी लोग नहीं। मानसिक रूप से उसे सम्बल देने का प्रथम उत्तरदायित्व चिकित्सक फिर रोगी के स्वजन और अंत में समाज का होता है। जहाँ तक सौन्दर्य की बात है तो वास्तविक सौन्दर्य तो भीतर है बाहर नहीं। एक बात और कहना चाहूँगा कि यदि हम कुछ खोते हैं तो प्रकृति हमें उसके बदले में कुछ देती भी है, यह जो पाना है वही जीवन का सबसे बड़ा सौन्दर्य है।

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